Story in Hindi: ‘‘कंगना, गोकुल की चिट्ठी आई है. ले जाओ,’’ बाहर खड़े पोस्टमैन ने आवाज दी.

कंगना एक बार तो यह सुन कर खुशी से उछल पड़ी, लेकिन अगले ही पल उस के चेहरे पर उदासी छा गई. वह उठ कर बाहर आई और पोस्टमैन से चिट्ठी ले ली. आज एक साल बाद गोकुल की चिट्ठी आई थी. उसे परदेश गए 3 साल हो गए थे.

कंगना के मांबाप बचपन में ही गुजर गए थे. चाचाचाची ने उसे पालापोसा था. उसे तीसरी जमात तक ही स्कूल भेजा गया था, फिर उसे घर के कामकाज में लगा दिया गया.

कंगना जब शादी के लायक हुई, तो चाचाचाची ने एक गरीब घर देख कर पास के गांव में ही गोकुल के साथ उस की शादी करा दी. ससुराल में बीमार ससुर और पति ही अब कंगना का सबकुछ था.

गोकुल शहर में मजदूरी करता था और शादी करने के लिए ही घर आया था. शादी के फौरन बाद उस के पिता गंभीर रूप से बीमार हो गए और काफी इलाज के बाद भी बच न पाए.

गोकुल शहर से जो पैसे कमा कर लाया था, वे शादी में और पिता के इलाज व क्रियाकर्म में खर्च हो गए.

घर की माली हालत खराब हुई, तो गोकुल ने फिर से शहर जा कर मजदूरी करने का फैसला कर लिया.

एक दिन गोकुल कंगना को अकेली छोड़ कर शहर चला गया. वह उस समय पेट से थी.

गोकुल यह कह कर गया था कि बच्चा पैदा होने के समय वह छुट्टी ले कर घर आएगा, लेकिन वह एक बार जो गया, तो फिर लौटा ही नहीं. अलबत्ता, हर महीने उस की चिट्ठी और 5 सौ रुपए जरूर आ जाते थे.

हर महीने गोकुल की चिट्ठी आ जाने से कंगना को संतोष रहता था कि उस का पति जहां भी है, ठीक से है, लेकिन सालभर से गोकुल की न तो चिट्ठी आई और न ही उस ने पैसे भेजे.

कंगना बड़ी मुसीबत में पड़ गई. वह अब अकेली नहीं थी. उस के साथ उस का 2 साल का बच्चा भी था. दोनों का पेट पालना मुश्किल हो गया था. वह किसी तरह इधरउधर से उधार ले कर काम चला रही थी.

अचानक एक दिन कंगना का बेटा गंभीर रूप से बीमार पड़ गया. पैसे न होने की वजह से वह बच्चे को जल्दी दवा नहीं दिला सकी, तो उस की हालत बहुत ज्यादा खराब हो गई. वह उसे कसबे के एक डाक्टर के पास ले गई.

बच्चे की जांच करने के बाद डाक्टर कंगना से बोला, ‘बच्चे को टायफाइड है. उस की हालत काफी खराब है. उसे 4-5 दिन के लिए यहां भरती करना पड़ेगा. आप फीस जमा कर दीजिए. हम बच्चे का इलाज शुरू कर देते हैं.’

‘इलाज पर कितना खर्च आएगा?’ घबराई हुई कंगना ने पूछा. ‘बच्चे के इलाज पर तकरीबन 4-5 हजार रुपए तक खर्च आ सकता है. वैसे, आप के साथ और कौन हैं?’

कंगना की आंखों में आंसू भर आए. वह बोली, ‘साहब, मेरे पति तो परदेश में हैं. मेरे पास पैसे भी नहीं हैं. लेकिन मैं पैसों का इंतजाम कर लूंगी. आप मेरे बच्चे कर इलाज शुरू कीजिए. मैं आप के हाथ जोड़ती हूं.’

‘ठीक है. हम आप के बच्चे को भरती कर लेते हैं, लेकिन आप आज ही पैसों का इंतजाम कर देना, वरना हम आप के बच्चे का इलाज नहीं कर पाएंगे,’ डाक्टर बोला.

कंगना बच्चे को डाक्टर के पास छोड़ कर गांव की ओर चल दी. गांव पहुंच कर उस ने लोगों से रुपए उधार देने की गुजारिश की, लेकिन सब ने कोई न कोई बहाना बना कर टाल दिया.

थकहार कर कंगना घर की तरफ चल दी. रास्ते में उसे लाला लालचंद आता दिखाई दिया. वह जानती थी कि लालचंद गांव का सब से रईस आदमी है, लेकिन एक नंबर का ऐयाश है.

कंगना तो उस की तरफ नजर उठा कर भी नहीं देखती, लेकिन अपने बच्चे की खातिर उस ने लालचंद से रुपए उधार लेने की सोची.

सिर का पल्लू ठीक करते हुए कंगना आगे बढ़ी. इस से पहले वह कुछ कह पाती, लालचंद खुद ही बोल पड़ा, ‘अरे कंगना, कहां से आ रही है? परेशान लग रही है. क्या बात है?’

‘मेरा बच्चा बहुत बीमार है. मु  झे रुपयों की सख्त जरूरत है. अगर आप मु  झे 5 हजार रुपए उधार दे दें, तो बड़ी मेहरबानी होगी. मैं इन के पैसे भेजते ही आप के रुपए लौटा दूंगी,’ कंगना धीरे से बोली.

लालचंद ठहाका लगा कर बोला, ‘5 हजार रुपए… अरे पगली, इतना कर्ज चुकाएगी कैसे? तेरा पति कितना पैसा भेजता होगा? यही 2-4 सौ रुपए न? वह तू मु  झे देगी, तो खुद क्या खाएगी?’

‘लालाजी, मु  झ पर दया करो. मैं कैसे भी कर के आप के रुपए लौटा दूंगी,’ कंगना हाथ जोड़ते हुए बोली.

‘हां, अब कही न तू ने कुछ सही बात. तो तू एक तरह से पैसे चुका सकती है. देख लालचंद को ज्यादा लालच तो है नहीं. बस, तु  झे एक रात मेरे साथ… सम  झ गई न,’ लालचंद ने शिकार फंसता देख कर कहा.

लालचंद की बात कंगना के दिल को चीर गई. उसे लगा कि काश, धरती फट जाए और वह उस में समा जाए. उसे कहने को कुछ भी नहीं सू  झ रहा था.

‘ठीक है कंगना, मैं चलता हूं. अगर बच्चे को कुछ हो गया, तो फिर अपनी जवानी का शरबत बना कर पीती रहना जिंदगीभर,’ लालचंद ने कंगना को खामोश देख कर कहा.

कंगना की आंखों के सामने अपने बच्चे का बीमार चेहरा घूमने लगा. उस ने एक झटके में फैसला ले लिया, ‘मुझे आप की बात मंजूर है लालाजी,’ कंगना कांपती आवाज में बोली. ‘तो फिर मैं तु  झ से वादा करता हूं कि तेरे बच्चे को कुछ नहीं होने दूंगा. अरे, 5 हजार तो क्या 5 लाख भी खर्च करने पड़े तो करूंगा,’ कहते हुए लालचंद ने कंगना का कंधा सहला दिया.

‘नहीं लालाजी, मेरे बच्चे के ठीक होने से पहले मुझे छूना भी नहीं,’ कहते हुए कंगना पीछे हट गई.

‘ठीक है. तू अस्पताल चल. मैं तुझ से एक घंटे बाद वहीं मिलूंगा. मु झे पहले जरा दुकान जाना पड़ेगा,’ इतना कह कर लालचंद चला गया.

कंगना डाक्टर के पास चल दी. घंटेभर बाद लालचंद भी वहां पहुंच गया. उस ने डाक्टर को पैसे दे दिए.

लालचंद डाक्टर के कमरे से बाहर आया और कंगना से बोला, ‘कंगना, मैं ने डाक्टर को पैसे दे दिए हैं. तुम अपना वादा मत भूलना.’

4-5 दिन के इलाज के बाद कंगना का बच्चा बिलकुल ठीक हो गया. वह उसे ले कर घर भी आ गई. लेकिन अब लालचंद के रूप में उसे अपनी मौत नजर आने लगी.

रात के 12 बज चुके थे, लेकिन कंगना की आंखों से नींद गायब थी, तभी बाहर से दरवाजा खटखटाने की आवाज हुई. कंगना डर के मारे अंदर तक कांप उठी. वह उठी और दरवाजे तक आई और बोली, ‘कौन है?’ ‘मैं लालचंद हूं. दरवाजा खोल,’ बाहर से लालचंद धीरे से बोला.

कंगना को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. दरवाजा खोले या न खोले.

‘अरी कंगना, दरवाजा खोल. तू अपना वादा भूल गई क्या? मेरी नींद उड़ा कर खुद चैन से सो रही है,’ लालचंद दोबारा बोला.

कंगना ने कांपते हाथों से दरवाजा खोल दिया. लालचंद    झट से भीतर घुस गया. अंदर घुसते ही वह कंगना से लिपट गया.

कंगना जान चुकी थी कि लालचंद मानने वाला नहीं, फिर भी एक उम्मीद से वह हाथ जोड़ते हुए बोली, ‘लालाजी, मुझ बेबस पर रहम करो.’

‘नहीं कंगना, नहीं. अब कुछ न कहो. यह तो तुम्हें अपनी इज्जत का सौदा करने से पहले सोचना चाहिए था. अब तो बस मु  झे जवानी का मजा लूटने दो,’ कहते हुए लालचंद ने कंगना को अपनी बांहों में भर लिया.

सुबह कंगना को अपनेआप से घिन आने लगी. उस ने फैसला किया कि वह खुदकुशी कर लेगी. तभी उस के बच्चे ने उस का हाथ पकड़ लिया. उसे खयाल आया कि वह अपने बच्चे को किस के सहारे छोड़ कर जा रही है? वह अपने बच्चे के लिए जीने को मजबूर हो गई.

आखिरकार कंगना ने फैसला किया कि जब तक गोकुल घर नहीं आ जाता, तब तक वह अपने बच्चे की खातिर जिंदा रहेगी और गोकुल को बच्चा सौंप कर खुदकुशी कर लेगी.

कंगना गोकुल का इंतजार करने लगी. वह अंदर ही अंदर घुलती जा रही थी. उसे अपने खानेपीने का भी ध्यान न रहा, जिस से वह कमजोर होती चली गई. वह सम  झ नहीं पा रही थी कि बच्चे की जान के बदले उस ने इज्जत का सौदा कर के सही किया या गलत?

आज इतने समय बाद गोकुल की चिट्ठी आई, तो वह एक बार को खुशी से उछल पड़ी, लेकिन अगले ही पल वह उदास हो गई. उस ने बेमन से चिट्ठी खोली और उसे पढ़ने लगी.

गोकुल ने लिखा था कि वह जिस फैक्टरी में काम करता था, वह बंद हो गई है, इसलिए वह 25 तारीख को घर पहुंच रहा है.

कंगना ने चिट्ठी बंद कर के तकिए के नीचे रख दी. उस के चेहरे पर कोई खुशी या गम का भाव नहीं था.

आज 25 तारीख थी. सुबह से शाम और अब रात घिरने लगी थी, लेकिन गोकुल अभी तक नहीं आया था.

कंगना ने रात का खाना बनाया. बच्चे को खिला कर सुला दिया और खुद भूखी ही लेट गई.

‘‘कंगना, अरी ओ कंगना,’’ बाहर से गोकुल ने आवाज दी. कंगना ने गोकुल की आवाज सुनी, तो आंखों से आंसुओं की   झड़ी लग गई. उस ने सोचा कि आज वह गोकुल के सीने से लग कर जी भर कर रोएगी.

कंगना फौरन उठ कर बाहर आई. जैसे ही वह दरवाजे तक पहुंची, बाहर का नजारा देख कर उस के पांव ठिठक गए. बाहर गोकुल के साथ एक औरत गोद में बच्चा लिए खड़ी थी.

कंगना यह देख कर हक्कीबक्की रह गई.

‘‘कंगना, ऐसे क्या देख रही हो? यह मेरी दूसरी बीवी है. तू इसे अपनी सौत नहीं, बल्कि छोटी बहिन सम  झ.

‘‘दरअसल, कुछ ऐसे हालात बने कि मु  झे इस से शादी करनी पड़ी. मैं ने इसे तेरे बारे में सबकुछ सचसच बता दिया है,’’ गोकुल ने कंधे से बैग उतारते हुए कहा.

कंगना चुपचाप दरवाजे से सिर टिकाए खड़ी रही. आंखों से आंसू बहे जा रहे थे. अचानक उस ने अपने आंसू पोंछे. उस के अंदर छाया अपराधी होने का कुहरा छंटने लगा. आज उसे लगा कि उस ने अपने बच्चे की जान बचा कर कोई गलत काम नहीं किया. उस ने अपने बच्चे के लिए जीने का फैसला किया.

‘‘क्या हो गया है तुम्हें कंगना?’’ गोकुल ने कंगना को कंधे से पकड़ कर   झक  झोरते हुए पूछा.

कंगना बोली, ‘‘नहीं… कुछ नहीं. मैं ने अपने बच्चे को बचा लिया.’’ ‘‘क्या मतलब?’’ गोकुल बोला.

कंगना चुपचाप अंदर चली गई.    Story in Hindi

–अनिल कुमार चौहान

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