Modern Women. आज के समय सोशल मीडिया विचारों की गुलामी की नई तकनीक बन गया है और लड़कियों के दिमाग को हाईजैक करने पर तुला है. यही वजह है कि हर धर्म लड़कियों को गुलाम बनाए रखना चाहता है. धर्म ने तो औरतों की आजादी, फैसले और खुशियों पर पाबंदी लगा रखी थी.
धर्म ने सदियों तक लड़कियों को घरों में कैद रखने का इंतजाम किया, उन की जबान पर ताले लगाए और उन की खुशियों की चाबी मर्दों के हाथों में थमाए रखी. संविधान ने यही चाबी मर्दों से छीन कर औरतों के हाथों में थमाई और उन के लिए पढ़ाईलिखाई, नौकरी और आजादी का रास्ता बनाया, लेकिन आज लड़कियां उसी धार्मिक दलदल में फंसती जा रही हैं, इसलिए यह सवाल उठता है कि क्या सिर्फ इकोनौमिकली स्ट्रौंग हो जाना ही स्मार्ट होना है?
स्नेहा को कुछ दिनों से सिर में दर्द रहता था. इस की वजह से वह औफिस में ठीक से काम नहीं कर पा रही थी. सुबह मैडिकल स्टोर से सिर दर्द की दवा लेती और औफिस के लिए निकल पड़ती, लेकिन सिरदर्द में उसे कोई आराम नहीं मिल रहा था.
स्नेहा हौस्पिटल नहीं जाना चाहती थी. उसे लगा कि बस सिरदर्द ही तो है, कुछ दिनों में ठीक हो जाएगा. लेकिन उस का सिर दर्द बढ़ता गया.
एक दिन स्नेहा के सिरदर्द की बात उस की सीनियर रेणुका को पता चली तो उस ने झट से स्नेहा को सलाह देते हुए कहा, ‘‘स्नेहा, तुम्हें नजर लग गई है. तुम तुरंत खाटू श्याम चली जाओ. वहां भगवान के दर्शन भी कर लेना और पुजारी से नजर भी उतरवा लेना.
‘‘मुझे नजर लग गई थी, तो मैं ने भी ऐसा ही किया था और बिलकुल ठीक हो गई. मैं खाटू श्याम में नजर उतारने वाले पुजारी के तुम्हें कुछ वीडियोज भेजती हूं.’’
स्नेहा औफिस से घर आई और रेणुका के भेजे वीडियोज देखने लगी. एक वीडियो के बाद दूसरा और फिर न जाने कितने घंटे वह इसी तरह के वीडियो देखती रही.
स्नेहा पहले नजर लगने जैसे अंधविश्वास पर भरोसा नहीं करती थी और पूजापाठ भी कम ही करती थी, लेकिन रेणुका से बातचीत के बाद और उस के भेजे गए वीडियोज के एल्गोरिदम में फंसने के बाद से तो उसे पक्का यकीन हो गया कि उसे किसी की बुरी नजर लग गई है.
औफिस से 2 दिन की छुट्टी ले कर स्नेहा सीधे खाटू श्याम गई. वहां से पुजारी के बारे में मालूम कर उन से मिली और अपनी समस्या बताई. कुल 10,000 रुपए में झाड़फूंक के जरीए पुजारी ने उस की नजर उतारी. सिरदर्द में उसे कुछ आराम मिला और वह रेणुका का शुक्रिया अदा करते हुए गुड़गांव लौट आई.
आने जाने में कुल 3 दिन लगे और पूरी यात्रा में जेब से कुल 25,000 रुपए खर्च हुए. पर कुछ दिनों बाद सिरदर्द फिर से असर करने लगा. इस बार पहले से ज्यादा तेज था. उस ने देर नहीं की और सीधे हौस्पिटल चली गई. न्यूरोलौजी के कई टैस्ट हुए, फिर उसे साइकेट्रिक डिपार्टमैंट में भेज दिया गया जहां स्नेहा की काउंसलिंग हुई और डाक्टर ने उसे 3 महीने की दवा दी. इसी दवा से धीरेधीरे उस का सिरदर्द खत्म हुआ.
यह कहानी सिर्फ स्नेहा की नहीं है. आजकल की ज्यादातर लड़कियां जो जौब में हैं, वे अंधविश्वासों में आकंठ डूबी हुईं हैं. सिर्फ महंगे कपड़े पहनना, सोशल मीडिया पर लाखों फौलोअर्स बना लेना या अच्छी नौकरी पा लेना ही स्मार्ट होना नहीं है. जो लड़कियां अपने हकों को जानती हैं, सही और गलत में फर्क करने की समझ रखती हैं, वैज्ञानिक सोच के साथ चलती हैं और अपने साथ दूसरी लड़कियों को भी आगे बढ़ाने की कोशिश करती हैं सही माने में केवल यही लड़कियां स्मार्ट कही जा सकती हैं. बाकी वे लड़कियां जो ऊंचे पदों पर हैं या अच्छी सैलरी पा रही हैं, अगर अपनी कमाई का एक फीसदी भी पाखंडवाद पर खर्च करती हैं तो उन्हें बेवकूफ ही कहा जाएगा.
नए दौर की गुलामी का शिकार होती लड़कियां
आज की लड़कियां अपनी मां, दादी और परदादी की तुलना में कहीं ज्यादा पढ़ीलिखी हैं. वे नौकरी करती हैं, अपने फैसले खुद लेती हैं, अपने पैरों पर खड़ी हैं और अपनी पहचान बना रही हैं लेकिन क्या सच में आज की मौडर्न लड़कियां आजाद हैं या वे धीरेधीरे एक नई तरह की गुलामी में फंसती जा रही हैं?
यह नई गुलामी बेडि़यों की नहीं है. यह गुलामी मोबाइल की स्क्रीन, रीलों, लाइक्स, फौलोअर्स और एल्गोरिदम की है. सदियों तक औरतों को धर्म, परंपरा और पैट्रिआर्की ने कंट्रोल किया. क्या पहनना है, कहां जाना है, किस से बात करनी है और कैसे जीना है यह भी मर्दों ने तय किया. आज हालात बदले हैं. संविधान ने बराबरी का अधिकार दिया, शिक्षा ने आत्मविश्वास दिया और नौकरी ने आर्थिक आजादी दी, लेकिन गुलामी लौट रही है, इस बार यह सोशल मीडिया की शक्ल में है.
सोशल मीडिया ने एक नया जाल बिछा दिया है. पहले समाज तय करता था कि औरत कैसी दिखनी चाहिए. आज यही काम सोशल मीडिया कर रहा है. फर्क सिर्फ इतना है कि अब आदेश किसी पुजारी, मौलवी या परिवार से नहीं आते, बल्कि स्क्रीन पर चल रहे एल्गोरिदम से आता है.
सोशल मीडिया का मकसद आप को ज्ञान देना तो कतई नहीं है. मकसद है कि आप जितनी देर हो सके, स्क्रीन से चिपके रहें. जितना ज्यादा समय बिताएंगे, उतना ज्यादा पैसा बड़ी टैक कंपनियां कमाएंगी, इसलिए एल्गोरिदम वही चीजें दिखाता है जो आप का ध्यान खींच लें, आप को गुस्सा दिलाएं, डराएं, तुलना करवाएं या आप को बारबार मोबाइल उठाने पर मजबूर करें.
खूबसूरती का दबाव, दिखावा, झूठी सफलता, महंगे कपड़े, महंगा मेकअप, लग्जरी लाइफ और दूसरों से तुलना सोशल मीडिया पर बस यही खेल चल रहा है. धीरेधीरे इनसान अपनी असली जिंदगी से ज्यादा दूसरों की नकली जिंदगी में जीने लगता है. बारबार मिलने वाले छोटेछोटे डिजिटल इनाम, जैसे लाइक और नोटिफिकेशन, दिमाग में डोपामिन पैदा करते हैं, जिस से बारबार मोबाइल देखने की लत पैदा होती है. यही लत सब से खतरनाक है.
इस लत का सब से बड़ा नुकसान यह है कि सोशल मीडिया सोचने की ताकत छीन लेता है. रील 30 सैकंड की होती है लेकिन किसी अच्छे विचार को सम?ाने में कई घंटे लगते हैं. एक रील आप को सिर्फ अगली रील देखने की आदत डालती है. किताबें सब्र सिखाती हैं लेकिन सोशल मीडिया की लत बेचैनी पैदा करती है. किताबें तर्क करना सिखाती हैं, सोशल मीडिया बिना सोचे प्रतिक्रिया देना सिखाता है. किताबें आजाद बनाती हैं और सोशल मीडिया भीड़ का हिस्सा बना देता है.
लड़कियां यह भूल जाती हैं कि इतिहास के हर बड़े बदलाव के पीछे सोशल मीडिया नहीं बल्कि किताबें थीं. सावित्रीबाई फुले ने पढ़ाई को हथियार बनाया. डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने हजारों किताबें पढ़ीं. पेरियार ने अंधविश्वास और जाति व्यवस्था को चुनौती देने के लिए तर्क और अध्ययन का रास्ता चुना. भगत सिंह जेल में भी किताबें पढ़ते रहे. वैज्ञानिक सोच रखने वाले लोगों ने हमेशा किताबों को अपना साथी बनाया. उन्होंने रीलें नहीं देखीं. विचार पढ़े और दुनिया को विचार दिए.
स्मार्ट होने का मतलब केवल रोजगार नहीं
स्मार्ट होने का मतलब केवल नौकरी करना या अपनी कमाई पर निर्भर होना नहीं है. लड़कियों के लिए स्मार्ट होने का मतलब अपनी बुद्धि से फैसले लेना है. किसी धर्म, किसी परंपरा, किसी नेता, किसी इन्फ्लुएंसर और किसी एल्गोरिदम का पिछलग्गू बनने वाली लड़कियां इकोनौमिकली कितनी भी स्ट्रौंग क्यों न हों वे असल में गुलाम ही हैं. अगर एक लड़की अपने हर फैसले से पहले किसी सोशल मीडिया गुरु या किसी इन्फ्लुएंसर का मुंह ताकने लगे तो यह मानसिक गुलामी ही है.
असली आजादी विचारों से शुरू होती है. किसी बात को सिर्फ इसलिए मान लिया कि सब मानते हैं यही गुलामी की पहली सीढ़ी है. यहीं से भेड़चाल शुरू होती है. हर बात पर सवाल करना, सुबूत मांगना और तर्क से सोचना यह वैज्ञानिक रास्ता है और यही आजादी की पहली सीढ़ी भी है. कोई अफवाह फैलती है और लाखों लोग बिना जांच किए
उसे सच मान लेते हैं. कोई अंधविश्वास वायरल होता है और करोड़ों लोग उसे सा?ा कर देते हैं. कोई नफरत फैलाने वाला वीडियो आता है और लोग बिना सोचे उसे शेयर कर देते हैं.
किताबें अलग रास्ता दिखाती हैं. एक अच्छी किताब धीमेधीमे ही सही लेकिन सोचने पर मजबूर करती है. वह आप को अलगअलग विचारों से मिलाती है. वह आप के भीतर सवाल पैदा करती है. वह आप को यह सिखाती है कि किसी भी बात को अंतिम सच मत मानो. लोकतंत्र और विज्ञान इसी सिद्धांत पर काम करते हैं. लड़कियों की मुक्ति का रास्ता डैमोक्रेसी और साइंस ही देते हैं, धर्म नहीं. धर्म तो भेड़चाल पर चलता है जहां तर्क की नहीं आस्था की जरूरत होती है.
आत्मनिर्भर लड़की की सब से बड़ी ताकत उस की तनख्वाह नहीं, उस का स्वतंत्र दिमाग़ होता है. अगर कमाई अपनी है लेकिन सोच किसी एल्गोरिदम से निकला है तो यह गुलामी ही है. इस का मतलब यह नहीं कि सोशल मीडिया पूरी तरह छोड़ दिया जाए. यह सीखने, काम करने, जानकारी पाने और लोगों
से जुड़ने का उपयोगी साधन जरूर है लेकिन साधन और मालिक में फर्क होना चाहिए. मोबाइल आप का औजार रहे, आप का मालिक नहीं.
हर लड़की अगर रोजाना सिर्फ एक घंटा सोशल मीडिया कम कर के किताबों को दे दे तो एक साल में वह कई किताबें पढ़ सकती है.
इतिहास, विज्ञान, संविधान, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, स्त्री अधिकार, दर्शन और साहित्य ये सब मिल कर ऐसा दिमाग़ तैयार करते हैं, जिसे कोई भी आसानी से गुमराह नहीं कर सकता.
याद रखिए, समाज हमेशा उस औरत से डरता है जो अपने दिमाग से चलती है, सवाल पूछती है और भेड़चाल का हिस्सा नहीं होती. ऐसी आजाद लड़कियों से धर्म, पितृसत्ता, राजनीति और एल्गोरिदम को भी खतरा होता है, इसलिए आज इन सब के निशाने पर औरतें ही हैं.
जो लड़की किताबें पढ़ती है, पत्रिकाओं से दोस्ती रखती है वह सिर्फ नौकरी नहीं करती बल्कि वह सोचती भी है और जो सोचती है, वही समाज बदलती है. असली मेकअप चेहरे पर नहीं, दिमाग में होता है.
असली फैशन महंगे कपड़े नहीं, स्वतंत्र विचार होते हैं. असली सुंदरता लाइक्स में नहीं, तर्क करने की क्षमता में है और असली स्मार्ट वे लड़कियां हैं जिन्हें धर्म हो या एलगोरिदम बरगला नहीं सकता, इसलिए अगर सचमुच स्मार्ट बनना है तो मोबाइल की स्क्रीन से थोड़ा बाहर निकलना होगा और किताबों की दुनिया में कदम बढ़ाना होगा, क्योंकि सोशल मीडिया आप को कस्टमर बनाता है, जबकि किताबें आप को नागरिक बनाती हैं. सोशल मीडिया आप को भीड़ में शामिल करता है, जबकि किताबें आप को अपना रास्ता चुनना सिखाती हैं.
जिस दिन लड़कियां सही माने में अपने दिमाग को आजाद कर लेंगी उस दिन उन की सोच को कोई धर्म, कोई परंपरा, कोई पितृसत्ता और कोई एल्गोरिदम फिर कभी कैद नहीं कर पाएगा.
लड़कियों का संघर्ष काफी बड़ा है
आज देश की करोड़ों लड़कियां पहले से कहीं ज्यादा पढ़ रही हैं, लेकिन पढ़ाई और सम?ादारी हमेशा एक जैसी चीज नहीं होती. अगर कोई लड़की इंजीनियर या डाक्टर बन जाए लेकिन जाति, अंधविश्वास, पितृसत्ता और धार्मिक भेदभाव को बिना सवाल किए मानती रहे तो उस की शिक्षा समाज के लिए एक डिजास्टर ही साबित होगी.
भारत का संविधान हर नागरिक को समानता का अधिकार देता है. अनुच्छेद 14 सभी को कानून के सामने बराबरी देता है. अनुच्छेद 15 धर्म, जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव को रोकता है. अनुच्छेद 21 सम्मान के साथ जीने का अधिकार देता है लेकिन सदियों तक महिलाओं की जिंदगी संविधान से नहीं, बल्कि धार्मिक और सामाजिक परंपराओं से तय होती रही. लड़कियों को शिक्षा से वंचित रखा गया, बाल विवाह कराया गया, औरतों को सिर्फ ‘पति की सेवा’ तक सीमित कर दिया गया और विधवाओं को समाज से अलग कर दिया गया.
भारत में आज भी महिलाओं के हालात पूरी तरह बराबरी के नहीं हैं. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे ताजा आंकड़ों के अनुसार लगभग 23 फीसदी लड़कियों की शादी 18 साल से पहले हो जाती है. महिला श्रम भागीदारी दर पुरुषों से काफी कम है. यही वजह है कि वर्ल्ड इकोनौमिक्स फोरम की ग्लोबल जैंडर गैप रिपोर्ट 2025 में भारत जैंडर इक्वालिटी के मामले में दुनिया के निचले देशों में शामिल रहा. इस का मतलब साफ है कि सिर्फ कानून बन जाने से बराबरी नहीं आती उस के लिए सामाजिक सोच बदलनी भी जरूरी है.
बाल विवाह से शिक्षा रुकती है, स्वास्थ्य बिगड़ता है और घरेलू हिंसा बढ़ती है. 2022 में 6,516 दहेज मौतें दर्ज हुईं. हर साल स्पाउसल वायलैंस का शिकार 22 से 30 फीसदी महिलाएं होती हैं. ये सब परंपरागत अंधविश्वास और धार्मिक रिवाजों का नतीजा हैं. डैमोक्रेसी ने औरत को इनसान सम?ा और संविधान ने बराबरी का मसौदा तैयार किया इसलिए आज की लड़कियों का पहला कर्तव्य तो धर्म के नाम पर थोपी गई सीमाओं को चुनौती देना ही होना चाहिए तभी असली आजादी आएगी.
शिक्षा महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाती है और फैसले लेने की ताकत देती है. किताबें अंधविश्वास तोड़ती हैं जबकि सोशल मीडिया सतही, गलत जानकारी और तुलना का जाल बुनता है. एएसईआर की रिपोर्ट कहती है कि 76 फीसदी लड़कियां सोशल मीडिया पर हैं और लड़कियां ज्यादा समय फालतू की गतिविधियों में बिताती हैं.
परंपराओं को तोड़े बिना आजादी मुमकिन नहीं
कोई भी परंपरा अगर इनसान की आजादी, बराबरी और सम्मान छीनती है तो उस पर सवाल उठाना जरूरी है. सती प्रथा, बाल विवाह, देवदासी प्रथा, परदा प्रथा और विधवाओं के साथ भेदभाव जैसी कई परंपराओं को इसलिए खत्म किया गया क्योंकि वे महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ थीं. अगर समाज ने सिर्फ परंपरा है कह कर इन्हें बचाए रखा होता तो आज भी करोड़ों औरतों की जिंदगी गुलामी के दलदल में फंसी होती.
किसी भी विचार को सिर्फ इसलिए सही नहीं माना जा सकता क्योंकि वह किसी धर्मग्रंथ में लिखा है. हर विचार की कसौटी तर्क, विज्ञान, मानवता और समानता होनी चाहिए. अगर कोई धार्मिक नियम औरत के कपड़े, पढ़ाई, नौकरी, प्रेम, शादी या उस के निजी फैसलों के खिलाफ खड़ा नजर आता है तो ऐसे नियम को कूड़ेदान में फेंकना सब से जरूरी काम है.
इनसान का सम्मान और उस का अधिकार किसी भी धर्म या परंपरा से बड़ा होना चाहिए. औरतों को भी वही अधिकार, वही अवसर और वही सम्मान मिलना चाहिए जो पुरुषों को मिलता है. इस का मतलब है कि लड़की को यह अधिकार हो कि वह अपनी पढ़ाई, कैरियर, शादी, मातृत्व और जीवन के फैसले खुद ले सके. उस के सपनों का फैसला परिवार, समाज या धर्म नहीं, बल्कि वह खुद करे.
आज जरूरत सिर्फ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की नहीं है. जरूरत मानसिक रूप से स्वतंत्र बनने की है. अगर कोई लड़की लाखों रुपए कमाती है लेकिन स्नेहा और रेणुका की तरह बाबा, ज्योतिष, जाति, पाखंड या अंधविश्वास के नाम पर अपनी गाढ़ी कमाई का एक रुपया भी लुटाती है तो उस की यह आर्थिक आजादी किसी काम की नहीं. लड़कियों की असली आजादी तब होगी जब उस के फैसले सुबूत, तर्क और अपनी सम?ा के आधार पर लिए जाएं.
शिक्षित लड़की सिर्फ अपनी जिंदगी नहीं बदलती, बल्कि पूरे समाज को बदल सकती है. अगर एक लड़की अपने गांव या महल्ले की दूसरी लड़कियों को पढ़ने के लिए प्रेरित करती है, उन्हें कानून की जानकारी देती है, बाल विवाह और दहेज का विरोध करती है, अंधविश्वास के खिलाफ आवाज उठाती है और उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने में मदद करती है तो असल में वह समाज में सब से बड़ी क्रांति ला रही होती है.
यह जरूरी नहीं कि हर लड़की ऐसी क्रांति का हिस्सा बने और अपनी सैलरी समाज पर खर्च करे लेकिन सब से जरूरी बात यह है कि कोई लड़की अपनी मेहनत की कमाई अंधविश्वास के नाम पर धार्मिक गिरोहों को मजबूत करने में न लगाए.
आप का जिस्म, आप का फैसला और आप की सैलरी पर सिर्फ आप की मरजी होनी चाहिए. यही असली स्मार्टनैस है. यही असली आजादी है और यही एक आधुनिक, वैज्ञानिक और बराबरी वाले भारत की नींव भी है. सदियों से परंपराएं और धर्म औरतों को दबाए रखते आए हैं.
पिता की संपत्ति, पति की सेवा और पुत्र की इच्छा ये सब बातें धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी रहीं. विधवा दहन, बाल विवाह, दहेज, बहुविवाह जैसी कुरीतियां धर्म के नाम पर ही चलती रहीं.
धर्मग्रंथों की पुरुष प्रधान व्यवस्था औरतों को कमतर साबित करती रही. आज संविधान ने इन पुरानी मान्यताओं को सिरे से खारिज कर औरतों को आजादी और सम्मान से जीने का नया रास्ता दिया.
आज की लड़की को देवी बनने की जरूरत नहीं है. उसे इनसान बन कर जीने का अधिकार चाहिए. उसे पूजा नहीं, बराबरी चाहिए. उसे कैद नहीं, आजादी चाहिए. उसे संस्कार के नाम पर चुप रहने की सीख नहीं, सवाल पूछने की आजादी चाहिए.
भारत का भविष्य तभी बदलेगा जब लड़कियां सिर्फ डिगरी नहीं, वैज्ञानिक सोच भी हासिल करेंगी. जब वे संविधान को अपना सब से बड़ा सहारा मानेंगी. जब वे सोशल मीडिया की चमक से ज्यादा किताबों की रोशनी पर भरोसा करेंगी और जब वे सिर्फ खुद आगे नहीं बढ़ेंगी, बल्कि दूसरी लड़कियों का हाथ पकड़ कर उन्हें भी गरीबी, भेदभाव और अंधविश्वास के अंधेरे से बाहर निकालेंगी.




