Story in Hindi. अरमान सिंह खूंख्वार डाकू था. लोग उस का नाम सुनते ही कांप उठते थे. हत्या, अपहरण और लूट जैसे कई संगीन मामलों में पुलिस को उस की तलाश थी.

अरमान सिंह का बेटा था रमेश. स्मार्ट और शरीफ. वह कालेज में पढ़ता था, लेकिन कालेज के तमाम छात्र उस से कटेकटे से रहते थे. उस के बारे में कहा जाता कि ‘सांप का बच्चा आखिर सांप ही होता है’.

रमेश को अपने पिता की खुराफाती जिंदगी बिलकुल पसंद नहीं थी. उस ने कई बार उन से कहा भी था कि वे डाका डालना छोड़ दें, लेकिन हर बार अरमान सिंह के चेहरे पर फीकी मुसकान थिरक उठती. वह कहता, ‘बेटा, मैं जुर्म की दुनिया में इतना आगे बढ़ चुका हूं कि अब पीछे मुड़ना मुमकिन नहीं. अगर मैं पीछे मुड़ना चाहूंगा, तो पुलिस मुझे मार डालेगी. बेहतर यही होगा कि मुझे  मेरे हालात पर छोड़ दो. कभी न कभी तो मेरा अंत हो ही जाएगा.’

रमेश अपने पिता की मजबूरी जान कर चुप हो जाता था.

उस साल प्रदेश की सरकार समय से पहले गिर गई. नतीजतन, राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया. पहले जो गुंडे और डाकू बेखौफ हो कर घूमा करते थे, वे अब गीदड़ों की तरह मांदों में छिप कर रहने लगे. गांव के लोगों को नया बल मिला. वे बेखौफ हो कर गुंडों की खबर पुलिस को देने लगे.

एक दिन आधी रात के वक्त सन्नाटे को चीरती हुई दूर से फायरिंग की आवाज आ रही थी. इस आवाज से रमेश की नींद टूट गई. वह बेचैनी से कमरे में टहलने लगा.

अचानक उसे लगा, जैसे गोलीबारी की आवाज नजदीक आती जा रही है. उस ने खिड़की खोल कर बाहर झांका, तो उस के मुंह से चीख निकल गई. खून से लथपथ अरमान सिंह बदहवास सा भागा आ रहा था और पुलिस के दर्जनों जवान गोलियां बरसाते हुए उस का पीछा कर रहे थे.

रमेश के देखते ही देखते अरमान सिंह का जिस्म छलनी हो गया और वह अपनी आखिरी चीख के साथ वहीं ढेर हो गया. रमेश को अपने पिता की मौत का गम तो बहुत हुआ, पर दिल में कहीं न कहीं चैन का एहसास भी हुआ.

चौधरी दिलीप सिंह गांव के महाजन थे. गांव के गरीब और लाचार किसानों को कर्ज दे कर एक का 3 वसूल करना उन का धर्म था.

जब अरमान सिंह जिंदा था, तब वह चौधरी दिलीप सिंह से मासिक रंगदारी लिया करता था. कभीकभी ऐसा होता कि अगर अरमान सिंह को आने में देर हो जाती, तो चौधरी साहब खुद ही जा कर रंगदारी दे आते.

अरमान सिंह की मौत से चौधरी दिलीप सिंह भी आजादी का एहसास कर रहे थे.

घर में जो जमापूंजी थी, उसे रमेश ने श्राद्ध के समय ब्राह्मणों को दान वगैरह देने में खर्च कर दिया. कुछ दिनों बाद वह खुद भी एकएक चीज को तरसने लगा. गांव के लोग तो उस से कन्नी काटते ही रहते थे, कोई भी मदद करने को तैयार न था.

उस से किसी को भी हमदर्दी न थी, क्योंकि उन्हें यह यकीन था कि सांप का बच्चा सांप ही होता है. क्या पता कहीं दूध पिलाने वाले को ही डस ले.

फसल के कर्ज के लिए चौधरी साहब के दरबार में किसानों की भीड़ बढ़ने लगी थी. लोग वहां जाते, अपना दुखड़ा सुनाते, कर्ज लेते और चौधरी साहब का गुण गाते हुए लौट जाते.

एक दिन रमेश भी हिम्मत कर के चौधरी दिलीप सिंह के दरबार में जा पहुंचा. चौधरी साहब तब आराम फरमा रहे थे. उसे देखते ही वे बोले, ‘‘अरे बेटा, तुम… आओआओ, क्या काम है?’’

‘‘जी… आप तो जानते ही हैं कि खेती का समय है और मेरे पास फूटी कौड़ी तक नहीं है. अगर खादबीज के लिए कुछ पैसे दे देते, तो बड़ी मेहरबानी होती. फसल कटते ही मैं सूद समेत वापस कर दूंगा.’’

चौधरी साहब सोच में पड़ गए. वे रमेश को कर्ज नहीं देना चाहते थे और साथ ही उसे नाराज भी नहीं करना चाहते थे. इसलिए कुछ देर सोच कर वे बोले, ‘‘कर्ज देने में कोई हर्ज तो नहीं है बेटे… तुम कोई गैर थोड़े हो… लेकिन तुम देर से आए, मेरे पास जो पैसे थे, वे मैं किसानों में बांट चुका हूं…’’

फिर कुछ देर रुक कर वे बोले, ‘‘खैर, जब तुम मेरे पास आ गए हो, तो बेफिक्र रहो… 5-6 दिनों में मैं कोई न कोई इंतजाम कर ही दूंगा.’’

चौधरी साहब की मीठी बातों को रमेश अच्छी तरह जानता था. वह चुपचाप वहां से लौट आया.

रमेश के जाने के बाद चौधरी साहब चिंता में डूब गए कि कहीं यह सांप का बच्चा कोई गड़बड़ न कर दे.

सुबह रमेश चौधरी साहब के यहां कर्ज लेने गया था और उसी रात उन के यहां डाका पड़ गया. डाकू नकदी और काफी जेवर लूट कर ले गए. उन्होंने चौधरी साहब को खूब पीटा भी था.

डकैती होने के बाद पुलिस की कई जीपें गांव में आईं. थानेदार ने अपने कड़क पुलिसिया अंदाज में चौधरी साहब से कई सवाल पूछे. उस का आखिरी सवाल था, ‘‘क्या आप को किसी पर शक है?’’

चौधरी साहब ने कराहते हुए जवाब दिया, ‘‘हां, अरमान सिंह के बेटे रमेश पर मुझे  शक है.’’

थानेदार की बांछें खिल गईं, ‘‘आप शक की बात करते हैं जनाब, उस का तो पूरा खानदान ही डकैतों का है. यह जरूर उसी के गिरोह का काम होगा. मैं अभी जा कर उस के घर की तलाशी लेता हूं. आप बेफिक्र रहिए.’’

थानेदार ने तुरंत अपने दलबल के साथ रमेश का घर घेर लिया और तलाशी ली. फिर उसे पकड़ कर थाने लाया और रातभर खूब पीटा गया. लेकिन पक्के सुबूतों और गवाहों के न होने के चलते उसे छोड़ दिया गया.

कानून की नजरों में रमेश बेकुसूर साबित हो चुका था, लेकिन समाज की नजरों में उस पर ऐसा काला धब्बा लगा, जिसे मिटाने में शायद सदियां लग जातीं.

लोगों के दिलोदिमाग में यह बात बैठ गई कि रमेश ने भी अपने पिता के नक्शेकदम पर चलना शुरू कर दिया है. इस तरह समाज के तमाम लोग उसे डर और नफरत की नजर से देखने लगे.

इस बात को कई महीने बीत गए. एक दिन की बात है, अचानक गांव की उत्तर दिशा में आग की लपटें उठती दिखाई पड़ीं. चारों ओर से लोग एकदूसरे को मदद के लिए पुकारते हुए दौड़ पड़े.

वहां का नजारा बड़ा ही डरावना था. चौधरी दिलीप सिंह की हवेली में आग लगी हुई थी. आग की लपटें पूरी हवेली को अपनी गिरफ्त में ले चुकी थीं.

काले बादलों की तरह हर तरफ आसमान में काला धुआं छा गया था. चारों ओर चीखपुकार मची थी. लोग बालटियों में पानी भरभर कर आग पर फेंक रहे थे, पर लपटें आकाश छूती जा रही थीं.

अचानक एक औरत की जोरजोर से चिल्लाने की आवाज उभरने लगी. लोगों ने देखा कि वह औरत चिल्लाती हुई आग की तरफ भागी जा रही है.

3-4 लोगों ने झट से उसे कस कर दबोच लिया. एक बोला, ‘‘अरे, यह तो चौधराइन है… पर यह आग की तरफ क्यों भागी जा रही है?’’

‘‘मरने का इरादा तो नहीं है?’’ दूसरे ने कहा.

चौधरी साहब की बीवी रोती हुई चिल्लाए जा रही थी, ‘‘मुझे छोड़ दो. मेरी बेटी जल रही है… कोई मेरी बेटी को बचा ले… हाय, मेरी बेटी…’’

सैकड़ों लोगों की नजरें जलती हवेली की तरफ उठी थीं. उन्होंने देखा कि चौधरी साहब की 7 साल की लड़की पिंकी लपटों के बीच घिरी छटपटा रही थी, पर किसी में यह हिम्मत न थी कि वह आगे बढ़ कर उस को बचा ले. कोई भी अपनी जान आफत में नहीं डालना चाहता था.

अचानक कंबल ओढ़े हुए एक नौजवान तेजी से आग की लपटों को चीरता हुआ पिंकी के पास जा पहुंचा. उस ने पलक झपकते ही पिंकी को कंबल में लपेटा और दोबारा लपटों को चीरता हुआ बाहर आ गया.

बाहर आते ही पिंकी कूद कर अपनी बेहाल मां से जा मिली, लेकिन तब तक उस नौजवान के शरीर में आग लग चुकी थी. वह तड़प कर गिर पड़ा. देखते ही देखते उस के बदन से आग की लपटें उठने लगीं. लोगों ने झट से उस पर पानी डाला, तो आग बुझ गई.

सब ने देखा कि अधजला रमेश दर्द से तड़प रहा था. चारों ओर मची अफरातफरी अचानक शांत हो गई. लोग सन्न खड़े रमेश को देख रहे थे.

उधर रमेश की आंखों के सामने अंधेरा तैरने लगा और इधर लोगों की नफरत पछतावे में बदलती चली गई.

रमेश ने अपनी बुझती आंखों से पिंकी की तरफ देखा. वह डरी हुई मां से चिपटी थी. रमेश के चेहरे पर संतोष की एक मुसकान उभरी और इस के साथ ही उस ने आखिरी सांस ली.

किसी ने दर्दभरी आवाज में धीरे से कहा, ‘‘काश, हम पहले यह समझ पाते कि रमेश डाकू नहीं है.’’

लोगों की आंखों से आंसू बह रहे थे. हवेली में लगी आग की लपटें बुझने लगी थीं, लेकिन बड़ीबड़ी चिनगारियां अभी भी धधक रही थीं.

चौधरी दिलीप सिंह आंखें बंद किए बुत बने खड़े थे, मानो अपनेआप से किसी सवाल का जवाब पूछ रहे हों. Story in Hindi

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