Blind Faith Story. साधु की बात सुन कर रंपो परेशानी में पड़ गई. क्या करे वह? पति को अच्छा करना है, तो साधु की बात माननी पड़ेगी. इज्जत चली जाएगी, लेकिन पति तो बच जाएगा.
साधु ने उस का हाथ पकड़ लिया और पूछा, ‘‘क्या सोच रही है?’’
रंपो अपनी कलाई को उस के हाथ से छुड़ाने की कोशिश करते हुए बोली, ‘‘आप की बात मान रही हूं बाबा, पर मेरा पति अच्छा हो जाना चाहिए.’’
साधु ने उस के गले में बांहें डालते हुए कहा, ‘‘हम खुश तो देवता खुश. तू चिंता मत कर. तेरा पति पूरी तरह ठीक हो जाएगा.’’
रंपो को साधु की बात पर पूरी तरह यकीन हो गया. वह मंदिर में ही लेट गई. उस ने अपना जिस्म साधु को सौंप दिया.
अपनी वासना का शिकार बनाने के बाद साधु बोला, ‘‘अब जा. कोई आ गया, तो गड़बड़ हो जाएगी.’’
रंपो खड़ी होते हुए बोली, ‘‘बाबा, देवता से सच्ची प्रार्थना करना.’’
साधु उसे हलका सा बाहर की ओर धकेलते हुए बोला, ‘‘जा, अब जल्दी जा यहां से. तू चिंता मत कर.’’
रंपो मंदिर से बाहर निकल आई. भीतर की तरह बाहर भी वैसा ही अंधेरा था. वह अपने पति के पास आ गई. वह सो रहा था. रंपो भी उस के बगल में जा कर लेट गई. उस का दिल जोरजोर से धड़क रहा था. उसे बारबार अपने किए पर पछतावा हो रहा था. पर फिर सोचा कि कल की सुबह नई रोशनी ले कर आएगी. सालों से बीमार पड़ा उस का पति ठीक हो जाएगा.
रंपो तो अपने पति को यहां ठीक कराने लाई थी. उसे क्या पता था कि देवता भी उस की जाति वालों से फर्क करते हैं. उस की आंखों में एकएक कर वह नजारा साफसाफ घूम रहा था.
उस ने तो साधु के पैरों में पड़ कर मंदिर के देवता के दर्शन की भीख मांगी थी, लेकिन साधु मंदिर की सीढि़यों पर खड़ा हो कर उसे दुत्कारते हुए बोला था, ‘बेहूदा औरत, दूर हट. यह देवता का मंदिर है. सीढि़यां मत चढ़ जाना. तेरा पति बीमार है, तो ठीक हो जाएगा. ले, भभूत ले जा, पर देवता के दर्शन तू नहीं कर पाएगी. देवता तो ऊंची जाति वालों के हैं.’
रंपो और उस का पति दोनों गांव के लोगों के कपड़े धो कर गुजारा करते थे.
रंपो दोनों हाथ जोड़ते हुए बोली थी, ‘देवता तो सभी के हैं. वे किसी जाति से बंधे हुए नहीं होते. मेरे पति दर्द से मरे जा रहे हैं. दर्शन कर लेने दो. हो सकता है, देवता सुन लें. मेरे पति को इस दर्द से छुटकारा मिल जाए, तो मैं आप का एहसान जिंदगीभर नहीं भूलूंगी.’
रंपो का पति भी गुजारिश भरी नजरों से उस साधु की ओर देख रहा था, पर साधु का उस ओर कोई ध्यान नहीं था.
चमकते लंबे काले बाल, गले में रुद्राक्ष की माला, गेरुए रंग का चमकता कुरताधोती, साधु के चेहरे पर अपने बड़े होने का दंभ साफ रूप से नजर आ रहा था.
साधु रंपो से फिर बोला, ‘तू तो विधवा होगी ही, हम को भी खाएगी. तेरे पति की पीठ में कैंसर का फोड़ा है. वह बच नहीं सकता. क्यों मेरी जान के पीछे पड़ी है? मैं ने तुझे मंदिर में आने दिया, तो समाज मुझे नहीं छोड़ेगा.’
‘मुझ पर रहम करो बाबा. मुझे देवता के दर्शन कर लेने दो. मुझे पूरा भरोसा है कि देवता मेरी अर्जी जरूर सुन लेंगे,’ रंपो ने गुजारिश की.
रंपो की बातों से साधु का दिल पिघलता नजर आया. वह बोला, ‘अभी थोड़ी देर रुक जा. दिन डूबने को है. जब सब चले जाएं, तब तू दर्शन कर के जाना, तब तक बाहर बैठ.’
साधु के कहने से रंपो को हिम्मत बंध गई थी. वह अपने पति रामहेत का हाथ पकड़ कर मंदिर से दूर ले गई.
वह साधु को मन ही मन दुआ देने लगी. महंगे इलाज की इस दुनिया में इतना पैसा उस के पास कहां था कि डाक्टरों से औपरेशन करा सके. अब तक छोटेमोटे डाक्टरों से ही उस ने बहुत इलाज कराया था. रुपए लगातेलगाते वह कंगाल हो गई थी, पर कैंसर में कोई फर्क नहीं पड़ा था.
रंपो के बच्चे अभी छोटे थे. लड़का 10 साल का और दोनों लड़कियां 5 साल और 7 साल की थीं. अब वह माली रूप से बुरी तरह टूट चुकी थी. लोगों ने सलाह दी थी कि अगर देवता ने उस की सुन ली, तो वे रामहेत को ठीक कर सकते हैं. इन देवता ने इस से पहले कई लोगों की बीमारी ठीक की है.
रंपो भी यही चाहती थी कि देवता उस की सुन लें, इसीलिए वह यहां उन के दर्शन करने आई थी. मगर यहां उस की जाति आड़े आ गई. निचली जाति में पैदा होने की वजह से साधु उसे मंदिर में घुसने नहीं दे रहा था.
रंपो ने कपड़ों की गठरी में से एक मैली सी चादर निकाली और रामहेत के नीचे बिछा दी.
रामहेत बोला, ‘दर्द से मरा जा रहा हूं रंपो. अब सांस लेना भी दूभर हुआ जा रहा है. या तो आज रात देवता सुन लेंगे, नहीं तो कल सुबह का सूरज मुश्किल से देख पाऊंगा.’
दिन ढल चुका था. मंदिर से लोगों की भीड़ कम होती जा रही थी. धीरेधीरे आसमान में तारे दिखाई देने लग गए थे. चारों ओर सन्नाटा था. मंदिर के बगल वाले कमरे में वह साधु भी कुछ देर बाद सो चुका था.
रंपो से अब नहीं रुका गया. वह वहां से चुपचाप उठी और मंदिर की ओर चल दी. साधु खर्राटे भर रहा था. उस ने सोचा कि यह अच्छा समय है अंदर जाने का. वह बेधड़क मंदिर की सीढि़यां चढ़ गई. मंदिर का दरवाजा खुला था.
रंपो देवता को मन ही मन धन्यवाद देने लगी, ‘हे ऊपर वाले, आज तो ठीक वैसा ही दिन है मेरे लिए, जैसे कृष्ण के जन्म के समय वसुदेव और देवकी के लिए था. वसुदेव के गोकुल जाते समय अपनेआप दरवाजे खुल गए और पहरेदार सो गए थे. उसी तरह तुम ने अपने दर्शन के लिए साधु को गहरी नींद में सुला दिया.
‘तुम्हारे दर्शन पा कर अब तो मेरे पति जल्दी ही ठीक हो जाएंगे,’ यह सोचती हुई वह मंदिर में घुस गई.
मंदिर में घोर सन्नाटे के अलावा कुछ नहीं था. रंपो अंदाज से टटोलती हुई देवता के पास पहुंच गई. मन में डर था, पर उस ने जल्दी से अपने पति के अच्छे होने की प्रार्थना की. फिर धूनी से भभूत ली और सीढि़यों से नीचे उतर गई.
रामहेत अब भी दर्द से कराह रहा था. रंपो ने भभूत उस के फोड़े के चारों ओर डाली और बोली, ‘हे देवता, सारा दर्द तुरंत बंद कर दो. आप के नाम के बताशे बांटूंगी.’
‘तू मंदिर में कैसे घुस गई?’ रामहेत ने हैरानी से पूछा.
‘हां, देवता की हम पर कृपा है. साधु खर्राटे भर रहा है. मंदिर के दरवाजे खुले पड़े हैं,’ रंपो फुसफुसाई.
‘फिर तो चमत्कार हो गया.’
‘गरीबों की देवता सुन लेते हैं. उन्होंने खुद यह चमत्कार किया है. तुम आज ही अच्छे हो जाओगे.’
दोनों की देवता के प्रति अटूट श्रद्धा थी, पर बीमारी के लिए देवता भला क्या करता? कुछ देर तक तो दर्द कम रहा, पर फिर बढ़ गया.
रात काफी बीत चुकी थी. रामहेत से जब दर्द नहीं सहा गया, तो वह बोला, ‘तू एक बार और मंदिर से भभूत ले आ.’
‘वह साधु जाग गया तो…’ रंपो ने शक जाहिर किया. ‘वह नहीं जागेगा,’ रामहेत बोला.
रंपो को देवता पर विश्वास तो पक्का था, पर इस बार उस का दिल किसी अनजान डर से कांप रहा था. साधु के खर्राटे इस बार बंद हो गए थे.
रंपो फिर धीरेधीरे मंदिर की ओर गई. मंदिर की सीढ़ी चढ़ कर दरवाजे तक आई ही थी कि कड़क आवाज में किसी ने कहा, ‘कौन है वहां?’
रंपो ठिठक कर वहीं सिमट गई. वह थरथर कांप उठी. सीढि़यों से नीचे उतर कर वह बोली, ‘मैं हूं… रंपो.’
‘मंदिर में घुस रही है कमबख्त. तुझे से मना कर दिया, फिर भी,’ साधु यह कहते हुए उस के पास पहुंच गया.
रंपो ने चालाकी से काम लिया. वह बोली, ‘नहीं महात्माजी, आप ने कह नहीं दिया था कि जब यहां कोई नहीं हो, तब आना, इसलिए आई थी. अब तो यहां कोई नहीं है. मुझ पर कृपा करो. मेरे पति को ठीक कर दो.’
‘ठीक कर देंगे, मगर एक शर्त पर.’ ‘कौन सी शर्त?’ ‘थोड़ी देर के लिए अपनी देह मुझे सौंप दे,’ साधु बेशर्मी से बोला और रंपो का हाथ कस कर पकड़ लिया.
रंपो सुन कर हैरान रह गई और बोली, ‘तुम महात्मा हो महाराज, ऐसी बातें करते हुए तुम्हें शर्म नहीं आती.’
रंपो ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की, मगर वह नाकाम रही.
साधु बोला, ‘रंपो, अब तू बच नहीं पाएगी. अगर गांव वालों को पता चल गया कि तू मंदिर में आई थी, तो वे मारमार कर तेरी हालत खराब कर देंगे.’ रंपो ने आखिरकार साधु की बात मान ली थी.
रंपो यादों से बाहर निकल आई थी. रामहेत सो चुका था. रंपो को भी नींद आ गई. सुबह 4 बजे रंपो अचानक जागी, तो रामहेत जोरजोर से सांस ले रहा था.
‘‘क्या परेशानी है?’’ रंपो हड़बड़ा कर उठ बैठी. रामहेत घुटनों के बल बैठ गया और बोला, ‘‘लगता है, देवता ने हमारी सुन ली. मेरा जी निकल रहा है.’’
उस की बातें सुन कर रंपो ठगी सी रह गई.
रामहेत बोला, ‘‘रंपो, देवीदेवता सब बेकार की बातें हैं. तू देवता के दर्शन कर आई, पर कुछ हुआ तो नहीं. तू दर्शन नहीं कर पाती, तो तेरे भी मन में कसक रह जाती. अब मैं बच नहीं सकता.’’
रंपो ने उसे अपनी गोद में भर लिया. पर यह क्या, वह तो उस की गोद में ही जड़ हो चुका था.




