Uttar Pradesh के गाजीपुर में एक होटल कारोबारी के बेटे की हत्या के आरोपी कमलेश बिंद के तथाकथित एनकाउंटर पर निषाद पार्टी के मुखिया डाक्टर संजय निषाद ने सार्वजानिक तौर पर सवाल उठाया और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की.
डाक्टर संजय निषाद योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं और पूर्वांचल के बिंद, निषाद, कश्यप, मल्लाह जैसे समुदायों की राजनीति करते हैं. गौरतलब है कि योगी सरकार का हिस्सा होते हुए उन के द्वारा अपनी ही सरकार के इस एक्शन का खुलेआम विरोध करने से यह साफ समझा जा सकता है कि सरकार के भीतर सहयोगी दलों के लिए अपनी बात कहना कितना मुश्किल है.
बाकी सहयोगी दल भी अनदेखा महसूस कर रहे
बात केवल डाक्टर संजय निषाद की ही नहीं है, बल्कि इस से पहले भी कई मौकों पर भाजपा के दूसरे सहयोगी जैसे अपना दल (सोनेलाल), सुभासपा और राष्ट्रीय लोकदल अलगअलग मुद्दों पर सार्वजानिक रूप से सरकार की नीतियों और उस के काम करने के तरीकों पर सवाल उठाते रहे हैं.
चाहे प्रदेश में पिछड़ा वर्ग आरक्षण की गड़बड़ी का सवाल हो, क्रीमी लेयर का मुद्दा हो, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आपरेशन लंगड़ा से जयंत चौधरी के जाटमुसलिम गठजोड़ को नुकसान की बात हो या फिर ओम प्रकाश राजभर की किसी फाइल पर शून्य प्रगति का मामला, इन सब दलों के कोर जातिगत और राजनीतिक मुद्दों को योगी सरकार द्वारा अनसुना किए जाने का दर्द और एतराज गाहेबगाहे सामने आता रहता है.
सहयोगी दलों के कोर वोटर की भाजपा में शिफ्टिंग
भाजपा के सहयोगी दलों की सब से बड़ी समस्या यह है कि उन के कोर वोटर और समर्थक समुदाय की भाजपा में लगातार शिफ्टिंग हो रही है. भाजपा ने सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के मारफत इन दलों के कोर समर्थक समुदाय के बीच केवल अपनी हाजिरी ही नहीं बढ़ाई है, बल्कि हिंदुत्व के अपने कोर एजेंडे पर इन के बीच संवाद भी बढ़ाया है. इस से इन के समर्थकों को हिंदुत्व की छतरी के नीचे जमा करने में भाजपा ने कामयाबी हासिल की है.
भाजपा की इस रणनीति से इन दलों के जनाधार में बड़ी गिरावट आई है और अब इन्हें विपक्ष की जगह भाजपा से ही अपने खुद के वजूद का खतरा दिखने लगा है. अपने कोर वोटर के बीच लगातार कमजोर होने के चलते भाजपा ने इन दलों को गंभीरता से लेना भी बंद कर दिया है. सरकार के कोर नीतिगत फैसले में इन दलों का कहीं कोई रोल नहीं दिखता है.
हालांकि, आज भी ये दल भले ही योगी सरकार का हिस्सा हैं, लेकिन राजनीतिक तौर पर हिंदुत्व राजनीति ने इन्हें इन के ही इलाके में अप्रासंगिक बना डाला है. सामाजिक न्याय और पिछड़ा, अतिपिछड़ा भागीदारी के नाम पर भाजपा का समर्थन कर के ये दल अपने ही जाल में कुछ यों फंसे हैं कि उस से बाहर निकलते ही इन्हें खुद के खात्मे का डर सताने लगा है.
सहयोगी दलों के कोर वोटर का हिंदुत्वीकरण
भाजपा ने अपने इन सहयोगी दलों के जातिगत, सामाजिक और सांस्कृतिक जनाधार को हिंदुत्व में शामिल करने, उन्हें भाजपा के कोर समर्थकों में बदलने का जो प्रोजैक्ट शुरू किया था वह काफी हद तक कामयाब रहा है. सहयोगी दल भाजपा के इस प्रोजैक्ट को इसलिए नहीं रोक पाए, क्योंकि उन के पास हिंदुत्व के खिलाफ कोई दूसरा विचार नहीं था. इस से इन दलों की जमीन उखड़ गई है.
असल में, देश को हिंदू राष्ट्र बनाने की जिस राजनीति को भाजपा मजबूत कर रही है उस की वैचारिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक काट इन दलों के पास नहीं है. ये केवल सत्ता की मलाई खाने की नीयत से योगी सरकार का हिस्सा बने थे, लेकिन भाजपा ने इन के सहारे इन के ही कोर वोटर के बीच हिंदुत्व राजनीति का प्रसार कर के इन्हें ही हाशिए पर डाल दिया.
भाजपा अपने सहयोगियों को निगल जाती है
भाजपा सहयोगी दलों की लाश पर ही मजबूत होती है. भाजपा की अब तक की यह नीति रही है कि वह अपने सहयोगी दलों के कोर समर्थकों के बीच घुस कर उन्हें हिंदुत्व का समर्थक
बना देती है. अगर उसे इस अभियान में कोई समस्या दिखती है, तो वह अपने सहयोगी दलों को तोड़ने में भी संकोच नहीं करती.
भाजपा की सिर्फ एक लाइन है कि वह अपने कोर मुद्दे हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र के अभियान पर कभी सम?ाता नहीं करती है. राजग के कई सहयोगी दल भाजपा की इस आक्रामक रणनीति का शिकार हो कर तबाह हो चुके हैं. चाहे वे हरियाणा में दुष्यंत चौटाला हों, महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे हों, ओडिशा में नवीन पटनायक हों या फिर बिहार में भाजपा के सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा.
इन सभी नेताओं के समर्थकों के बीच भाजपा ने अपना हिंदुत्व समर्थक समुदाय तैयार करने का वैचारिक काम जारी रखा और अपना जनाधार भी खूब बढ़ाया.
भाजपा ने तैयार की लीडरशिप
भाजपा ने प्रदेश में सहयोगी दलों के कोर जातिगत, सामाजिक और सांस्कृतिक जनाधार पर अपना कैडर तैयार किया है. यही नहीं, भाजपा ने इस नेतृत्व को इन दलों के नेताओं से ज्यादा अहमियत दे कर इन के ही समुदाय में इन्हें हाशिए पर भी डाल दिया और इन के कोर वोटर को हिंदुत्व चेतना से लैस एक ठोस जातिगत विकल्प भी दे दिया. इस की कीमत इन सहयोगी दलों को चुकानी पड़ रही है.
उदाहरण के लिए सुभासपा के जातिगत जनाधार में भाजपा द्वारा अनिल राजभर को खड़ा करना, जाट समुदाय में संजीव बालियान और भूपेंद्र चौधरी का कद बढ़ाना, कुर्मी वोट बैंक के लिए देव सिंह, छत्रपाल गंगवार और पंकज चौधरी को मजबूत करना व निषाद समुदाय में डाक्टर महेंद्र निषाद को विकल्प के बतौर खड़ा करना इसी रणनीति का हिस्सा है.
एक बात और यह कि जब सहयोगी दलों के ये नेता ही हिंदुत्व की छतरी के नीचे खड़े हैं तो इन का कोर जातिगत समर्थक हिंदुत्व राजनीति को किस आधार पर नकारेगा? हिंदुत्व की वैचारिक चेतना से लैस हो चुके ये समुदाय अब केवल भाजपा जैसी बड़ी ताकत के साथ खुद को आईडैंटिफाई होते देखना चाहते हैं.
क्षेत्रीय दल बेबस हो चुके हैं
आज चाहे वह निषाद पार्टी हो, सुभासपा हो, अपना दल (सोनेलाल) हो या फिर राष्ट्रीय लोकदल, इन पार्टियों के सामाजिक, जातिगत और सांस्कृतिक जनाधार का बड़ा हिस्सा हिंदुत्व समर्थक हो चुका है. इन्हें अब भाजपा चलाती और कंट्रोल करती है.
इस तरह भाजपा के ये सहयोगी दल लगातार अपने कोर समर्थक समुदाय के बीच ही कमजोर होते जा रहे हैं, इसलिए ये दल चाह कर भी अब भाजपा का साथ नहीं छोड़ सकते, क्योंकि ऐसा करने पर इन का कोर वोटर ही इन्हें छोड़ सकता है. हालांकि, सहयोगी के बतौर भाजपा भी इन्हें राजग गठबंधन में रखेगी, क्योंकि इन्हें इस से बाहर करने से कोई फायदा नहीं होगा. Uttar Pradesh




