Bihar. ‘बांकीपुर’ कभी पटना का पुराना नाम हुआ करता था. इसी नाम से पटना का शहरी विधानसभा क्षेत्र भी है. इस विधानसभा क्षेत्र से नितिन नवीन भारी मतों से विजयी हुए थे. उन के भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन जाने के बाद यह सीट खाली हुई थी. उस के उपचुनाव के लिए 2 जून को अधिसूचना जारी कर दी गई.

इस उपचुनाव को भाजपा के लिए काफी आसान माना जा रहा था. बिखरे विपक्ष के बीच लग भी रहा था. पहले के हालात भी ऐसा ही कुछ बता रहे थे. पर प्रशांत किशोर ने इस सीट पर खुद खड़े होने की घोषणा ने इस उपचुनाव के लिए हलचल मचा दी. ऐसा कयास लगाया जा रहा है कि साल 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में हुए करारी हार के कलंक से उसे छुटकारा मिल सकता है.

बिहार विधानसभा के 243 सीटों के पिछले चुनाव में जन सुराज पार्टी ने 238 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे. लेकिन उस में पीके ने कहीं से भी अपनी उम्मीदवारी नहीं दी थी. कहा यह गया कि वे अपने उम्मीदवारों के लिए चुनाव प्रचार करेंगे. लेकिन बांकीपुर सीट भाजपा के पास 1995 से ही परंपरागत सीट के रूप में रही है, जहां से भाजपा प्रत्याशी जीतते रहे हैं. पिछले चुनाव में भी नितिन नवीन ने भारी मतों से जीत हासिल की थी. ऐसे में यहां का चुनाव उस के पक्ष में ही ?ाका दिख रहा था. लेकिन पीके की घोषणा से अब यहां कांटे की टक्कर होने की उम्मीद है.

इस के पीछे बिहार की राजनीति की कुछ वजहें भी हैं, तो हालात भी हैं. हाल ही में कुछ नए संकट सामने आए, जिस से वर्तमान भाजपा को अपने ही लोगों की आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है.

पहला मामला तो रिशुश्री मामले के भ्रष्टाचार को ले कर हुई किरकिरी है. पटना में कोचिंग विवाद से भी कुछ लोगों ने दूरी बना ली है. भरत तिवारी मामले के चलते राजग में ही विवाद उठ खड़े हुए हैं.

भाजपा और जद(यू) के सवर्ण मतदाताओं की बेरुखी दिख रही है. चिराग पासवान ने भी अपनी चाल चल दी है. ऐसे में पीके ने भरत तिवारी मामले में पहल कर उन सभी की हमदर्दी अपनी ओर करने की कोशिश की है.

इस के अलावा स्टेट हाईवे पर टोल टैक्स और पंचायतों में कर, निजीकरण में तेजी, आर्थिक संकट मामलों के चलते राज्य सरकार बैकफुट पर है. ऊपर से ईथेनौल मामला, परीक्षाएं न करवा पाने के हालात के चलते लोगों में केंद्र के प्रति नाराजगी है.

पिछले 3 सालों तक बिहार के अनेक इलाकों में पीके ने पदयात्रा कर जनता की हमदर्दी पाई है. इस के अलावा उन का महल्ले लैवल पर किए गए चुनाव प्रचार से भी उन की अलग पहचान है.

हालांकि सच तो यही है कि देश में ही नहीं, बिहार के भी शहरी क्षेत्रों में मतदान का फीसदी कम रहता है. बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र में भी पिछले चुनाव में 40 फीसदी वोट पड़े थे. लेकिन यहां एक खास फैक्टर विपक्ष के बिखराव का भी है.

यहां पीके की सोच यह है कि वे विपक्ष को एकजुट कर आगे बढ़ जाएं. पहले का इतिहास तो खैर यही रहा है कि जबजब विपक्षी पार्टियों ने एकता दिखाई है, सत्ता पक्ष को मुंह की खानी पड़ी है. कांग्रेस उन्हें साथ देने को तैयार है. मुख्य बात यह है कि क्या वामदल और राजद उन्हें तवज्जुह देंगे?

इस के बावजूद प्रशांत किशोर मजबूत दिख रहे हैं, तो उस की काफी वजहें हैं. राजद ने पूर्णिया में पप्पू यादव का साथ नहीं दिया था, फिर भी वे वहां से जीते थे. और ऐसे चौंकाने वाले नतीजे बांकीपुर में भी आ जाएं, तो हैरानी की बात नहीं.

ऐसा अंदाजा लगाया जा रहा है कि वर्तमान मुख्यमंत्री पद को ले कर भाजपा के अनेक मंत्री नाराज हैं. जद(यू) की बेरुखी और नाखुशी भी किसी से छिपी नहीं है. ऐसे में नितिन नवीन के पुराने सहयोगी नील रतन घोष को भाजपा का टिकट मिलने की जोरों की चर्चा है. इस से बंगाली मतदाता शायद जोश में हों. परंपरागत कायस्थ और बनिया वोट तो हैं ही साथ.

अमित शाह की रणनीति की काट ढूंढ़ने में प्रशांत किशोर कितने सफल होते हैं, यह देखने की बात होगी. अमित शाह किसी सूरत में नहीं चाहेंगे कि भाजपा का गढ़ ढह जाए या उन के राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट पार्टी हार जाए. चूंकि एक खास सीट पर दोनों तरफ से जोर आजमाइश जबरदस्त होने की उम्मीद तो है ही.

पीके जो खुद एक कामयाब रणनीतिकार हैं, अमित शाह की सोच से आगे की रणनीति तैयार कर रहे होंगे. चूंकि पीके के उम्मीदवारी की घोषणा होते ही मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पूर्व मुख्यमंत्री नीतिश कुमार से मुलाकात की है, जो जद(यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं.

इस दौरान केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह भी मौजूद थे. आधिकारिक तौर पर इसे शिष्टाचार मुलाकात बताया गया, पर राजनीतिक हलकों में इस के अलगअलग माने निकाले जा रहे हैं, इसलिए इसे कांटे की टक्कर बताया जा रहा है. Bihar

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