Editorial. चुनाव आयोग ने पूरे देश में जो मतदाता सूचियों को ठीक करने का काम शुरू कर रखा है, यह असल में जताने के लिए है कि सरकार के हाथ कितने लंबे हैं कि वह किसी को भी जिंदामुरदा या पैदा हुआ मानने से कभी भी इनकार कर सकती है. पहले मतदाता सूची में नाम न होने का मतलब सिर्फ यह था कि वह जना वोट नहीं दे सकता था. अब धीरेधीरे मतदाता सूचियों को हर काम में इस्तेमाल किया जा रहा है. केरल में एक जानेमाने पत्रकार का पासपोर्ट इसलिए बनाया गया कि उस का पश्चिम बंगाल की सूची में नाम नहीं था जहां वह पहले रहा करता था.

धीरेधीरे जिन को सरकार या सरकार में बैठी पार्टी नापसंद करती है, उन्हें सूचियों से निकाल देगी. यह आसान काम है, जेल में डालने से ज्यादा सस्ता और उतना ही काम का. मतदाता सूची में नाम नहीं तो फोन नहीं ले सकते, ड्राइविंग लाइसैंस नहीं बनवा सकते, राशन नहीं ले सकते, किसान यूरिया नहीं ले सकेंगे, अपना अनाज सरकारी दामों पर नहीं बेच सकेंगे.

देश में खुली जेल में रखना सरकार के लिए सस्ता काम है. अपना कमाओ पर कम कमाओ. किसी कंपीटिशन में न बैठ सको. कहीं का टिकट न खरीद सको. कहीं किराए का मकान भी न ले सको. मतदाता सूचियों को इस बुरी तरह इस्तेमाल करने की साजिश पक रही है कि देश में आधे लोगों को गिनती में ही नहीं लिया जाएगा और उन्हें गुलामों की तरह या जानवरों की तरह मान लिया जाएगा.

हमारे पुराणों ने यही सिखाया है. ऊंची 3 जातियों के अलावा देश का हर तरह का बाशिंदा बाहरी या बेकार माना जाता रहा है. उन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी गांवों के बाहर पेड़ों के नीचे रहने को मजबूर किया गया है. उन्हें पढ़नेलिखने की तो छोड़ो ढंग का कपड़ा पहनने की भी इजाजत नहीं थी. मुगलों और अंगरेजों के पहले उन्हें आदमी ही नहीं माना गया था.

आज मतदाता सूचियों के सहारे ऐसा सा ही माहौल बनाया जा रहा है. देश के 8-9 करोड़ लोगों के नाम मतदाता सूचियों से काट दिए गए हैं. अब इन फटेहाल, गरीब लोगों को साबित करना होगा कि उन के दादापरदादा इसी देश में कहीं रहते थे और उस के कागज मौजूद हैं. जिन्हें सदियों से गांवों से बाहर रखा गया है, उन के कागज कहां होंगे? जो आग और बाढ़ के शिकार होते रहे हैं, उन के कागज कहां होंगे?

चुनाव आयोग बना था सरकार से अलग आजाद संस्था की तरह काम करने वाला पर बन कर रह गया है सरकार का पुलिस से भी बड़ा और ताकतवर फौलादी पंजा जिस पंजे पर मखमल लपेटी हुई है. जो सिर्फ कागजों की बंदूकों से चाहे जिसे मार सकता है.

एक जमाना था जब चुनाव आयोग ने इस देश में रहने वाले हरे जने को इज्जत की जिंदगी दी थी. बेघरों के नाम भी सूचियों में डलवाए थे. अनाथों को भी वोट डालने का हक दिया था. आज उलटा हो रहा है. आज वोट डालने का हक तो छीना ही जा रहा है, जीने का हक भी छीनने की पूरी तैयारी चल रही है. और देश की मूर्ख जनता को सिर्फ जयजय करने से फुरसत नहीं है. Editorial

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