Story in Hindi. राम सेठ के कोई औलाद नहीं थी. वे बहुत परेशान रहते थे. डाक्टरी इलाज करा कर वे हार गए थे. किसी ने तांत्रिक के बारे में बताया तो वे वहां जाने की तैयारी में जुट गए थे.

बीहड़ इलाका था और पैदल का रास्ता. सब से बड़ी परेशानी यह थी कि घर की देखरेख के लिए कोई नहीं था, सिवा एक नौकर के.

राम सेठ ने उस नौकर के भरोसे घर छोड़ दिया और पत्नी समेत तांत्रिक के पास चले गए. तांत्रिक ने उन्हें भभूत, जंतर और आशीर्वाद दिए.

राम सेठ और उन की पत्नी घर लौट आए. पैदल चलतेचलते उन का बुरा हाल हो गया था. अंगअंग टूट रहा था. वे दोनों बिस्तर पर निढाल आ पडे़ थे.

उन्हें रातभर होश नहीं रहा. सुबह जरा मिजाज ठीक होते ही नौकर को बुलाया, पर नौकर का कहीं अतापता नहीं था.

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वे दोनों इधरउधर देखने लगे, मगर नौकर कहीं नजर नहीं आया. हां, तिजोरी के ताले जरूर टूटे मिले. उन के 12 लाख रुपए के जेवर चोरी हो चुके थे.

सेठजी को पैरों के नीचे की जमीन खिसकती नजर आई. मगर अब क्या किया जा सकता था. पुलिस का लफड़ा मोल लेना भी ठीक नहीं था.

उधर नौकर पुलिस के डर से भागाभागा फिर रहा था. न सही ढंग से सोना, न खानापीना. उस की दाढ़ी बढ़ गई थी. वह हरदम चौंकता रहता था. 2 महीने में ही उस की शक्ल बदल गई थी.

भागताभागता नौकर शहर से काफी दूर ऐसे इलाके में आ चुका था, जहां बस्ती का नामोनिशान नहीं था. हर तरफ बंजर खेत थे. कहींकहीं घने पेड़ नजर आ रहे थे. कुछ दूरी पर एक बड़ी सड़क थी, जिस से गाडि़यां गुजरती थीं. एक गांव वहां से दूर था और इसी रास्ते से बाजार आनाजाना होता था.

छिपताभागता नौकर एक टाल में आ छिपा था. टाल से कुछ दूरी पर एक पेड़ था. वह उसी के नीचे बैठ गया. इसी तरह दिन बीतने लगे.

एक दिन कुछ पुलिस वाले टाल के पास आए. उन में से एक ने पूछा, ‘‘कौन है तू? यहां क्या कर रहा है?’’

पहले तो नौकर की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई, मगर उस ने पहले ही इंतजाम कर लिया था. वह एक पत्थर का लोढ़ा ले आया था, जिस पर खूब रोली और चंदन घिस कर लगा दिया था. वह खुद भी सिंदूर लगा कर बैठा था. पत्थर का वह लोढ़ा पूरी तरह देवता बन चुका था.

नौकर ने जहां लोढ़ा रखा था, उस के नीचे ही उस ने गड्ढा खोद कर जेवर छिपा दिए थे.

उस पुलिस वाले ने जितनी कड़कती आवाज में पूछा था, उतनी ही कड़कती आवाज में नौकर ने जवाब दिया, ‘‘देखते नहीं, यहां क्या रखा है.’’

पुलिस वाले सहम गए. टार्च जला कर देखा कि आगे लोढ़ा देवता थे और उन के पास बढ़ी दाढ़ीमूंछों में कोई पहुंचा हुआ सिद्ध बाबा. पुलिस वाले चुपचाप आगे बढ़ गए.

एक दिन पुलिस के एक दारोगा ने आते ही नौकर के पैर छुए और आशीर्वाद देने की विनती करने लगा.

दरअसल, दारोगा के कोई औलाद नहीं थी और वह औलाद पाने की इच्छा ले कर वहां आया था.

नौकर कुछ देर देखता रहा, फिर उस ने आंखें मूंद कर आशीर्वाद दे दिया, ‘‘जा, लोढ़ा देवता तेरा बेड़ा पार करेंगे. तुझे बेटा होगा.’’ दारोगा खुशीखुशी लौट गया.

समय बीतने लगा. एक दिन दारोगा की मुराद पूरी हो गई. नौकर ने तो डरतेडरते अशीर्वाद दे दिया था, लेकिन वह आशीर्वाद कामयाब हो गया.

एक दिन दारोगा मिठाईकपड़े वगैरह ले कर आया और नौकर को 1001 रुपए का चढ़ावा दे कर चला गया.

उस दिन से नौकर का मनोबल बढ़ने लगा. वह लोगों को जम कर आशीर्वाद देने लगा और उसे कामयाबी भी मिलने लगी.

किसी को बेटा हो जाता था, तो किसी की कमाई बढ़ जाती थी. नौकर अब नौकर नहीं रह गया था. सभी उसे लोढ़वा बाबा के नाम से जाननेपहचानने लगे थे.

देखते ही देखते लोढ़वा बाबा अमीर बन चुका था. शहर में उस का अपना गैस्ट हाउस बन चुका था. कई मार्केट उस के नाम पर बन चुके थे. उस के पास कई गाडि़यां आ गई थीं. उस ने करोड़ों का बैंक बैलेंस भी बना लिया था.

एक दिन लोढ़वा बाबा का नाम राम सेठ तक भी पहुंच गया. उन की औलाद की इच्छा अब तक पूरी नहीं हुई थी. उन्होंने लोढ़वा बाबा के यहां जाने का मन बना लिया.

वहां खचाखच भीड़ थी. दूरदूर से लोग आए हुए थे. राम सेठ को नंबर लगाना पड़ा. उन का नंबर 3 दिन बाद आया. तब तक वे लोढ़वा बाबा की धर्मशाला में ठहर गए.

नंबर आने पर राम सेठ को लोढ़वा बाबा की शानदार इमारत के एक बड़े से कमरे में बैठाया गया.

लोढ़वा बाबा से मिलने के बाद राम सेठ ने बड़ी श्रद्धा से उस के पैर छुए, फिर सामने बिछी कालीन पर बैठ गए.

लोढ़वा बाबा ने आशीर्वाद में हाथ हिला दिया, फिर कुछकुछ पूछने लगा. कुछ देर पूछताछ करने के बाद लोढ़वा बाबा का चेहरा लाल पड़ गया. मगर वह अपना संतुलन बनाए रहा और एकटक राम सेठ को देखने लगा.

राम सेठ और उन की पत्नी कुछ समझ  नहीं पा रहे थे. थोड़ी देर सोचते रहने के बाद लोढ़वा बाबा ने पूछा, ‘‘आप ने मुझे पहचाना नहीं क्या?’’

उस घटना को 10 साल बीत चुके थे. राम सेठ किसी भी तरह उसे पहचान नहीं पा रहे थे. आखिर में लोढ़वा बाबा ने ही साफ करते हुए कहा, ‘‘मालिक, मैं आप का वही नौकर हूं, जो जेवर चुरा ले गया था.’’

राम सेठ और उन की पत्नी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा. वे बस लगातार उस की ओर देखते रहे.

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इसी बीच लोढ़वा बाबा ने जंतर और भभूत उन्हें देते हुए कहा, ‘‘इसे रख लीजिए. मेरा आशीर्वाद खूब लग रहा है. मुझे  पूरा विश्वास है कि आप को भी लग जाएगा. आप की औलाद पाने की इच्छा पूरी हो जाएगी. मैं दिल से चाहूंगा कि आप के यहां औलाद पैदा हो.’’

राम सेठ और उन की पत्नी तो अब तक हक्केबक्के थे. तभी एकाएक लोढ़वा बाबा उठा और कहीं से एक छोटा सा बैग ले आया.

उस ने राम सेठ को बैग देते हुए कहा, ‘‘इसे रख लीजिए. ये वही जेवर हैं. आप की अमानत है, जो मैं ने बरसों से सहेज कर रखी है…’’

उस ने आगे कहा, ‘‘आज मैं जो भी हूं, सब आप की कृपा का फल है. न मैं आप के यहां काम करता, न गहने चुराता और न ही यहां तक पहुंच पाता.

‘‘आज मेरे पास सबकुछ है. यह सब आप की मेहरबानी से हुआ है. इस के लिए मैं हमेशा आप का शुक्रगुजार रहूंगा.’’

फिर उस ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘आप से मेरी विनती है कि यह बात किसी और को नहीं बताइएगा, वरना मैं बरबाद हो जाऊंगा.’’

राम सेठ पुलिस के लफड़े में नहीं पड़ना चाहते थे. वे कुछ फैसला ले पाते, इस से पहले लोढ़वा बाबा ने कहा, ‘‘मैं ने आप के विश्वास का खून किया है. मैं खुद को कभी माफ नहीं कर सकूंगा.’’

इतना कह कर वह फफकफफक कर रोने लगा. मगर राम सेठ और उन की पत्नी तो बुत बने यह तमाशा चुपचाप देखते रहे. Story in Hindi

–कमल रंजन ‘हिमशैल’

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