Hindi Inspirational Story. रामशरण के घर में खूब चहलपहल थी. मेहमान खापी कर बिस्तरों पर जा लेटे थे. विवेक सुबह से ही उन की खातिरदारी में जुटा था. खानेपीने की बात कौन कहे, उसे पलभर भी बैठने की फुरसत नहीं मिली थी.
रामशरण बीचबीच में ऊंची आवाज में कह उठते, ‘‘विवेक, मेहमानों का अच्छी तरह खयाल रखना… खातिरदारी में कोईर् कमी न रह जाए… सब के हुक्केपानी की फरमाइश पूरी करते रहना.’’
दादा की बात सुन कर विवेक झुंझला ला उठता कि हर साल यज्ञ कराने की क्या जरूरत है. इतने मेहमानों को न्योता दे कर वे क्यों खुद को ‘दानी कर्ण’ साबित करना चाहते हैं? आखिर इस से हासिल क्या होता है? झूठी इज्जत, वाहवाही या कुछ और?
पिछले दिनों जब इंटर का फार्म भरने के लिए विवेक ने दादाजी से फीस के रुपए मांगे, तो उन्होंने पल्ला झा झाड़ते हुए कहा था, ‘मैं कहां से लाऊं, घर में एक पैसा भी नहीं है.’
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विवेक के पिता दिल्ली में एक फैक्टरी में नौकरी करते थे और दादाजी के पास एक बैलगाड़ी थी, जिसे वे भाड़े पर चलाते थे. जो कोईर् भी उन के बांके बैलों को देखता, तो देखता ही रह जाता.
एक दिन जब विवेक ने महसूस किया कि वह इंटर का फार्म न भर पाएगा, तो वह दादाजी के पास जा कर बोला, ‘‘जब घर में पैसा नहीं है, तो इतना बड़ा यज्ञ कैसे होने जा रहा है?’’
‘‘बेटा, यह सब तेरे लिए ही किया जा रहा है…’’ दादाजी बोले, ‘‘जब तू पैदा हुआ था, तो तुझे साढ़ेसाती लगी थी… कितने डाक्टरों, हकीमों को दिखाने के बाद भी तुम ठीक न हो सके थे. फिर हम तुम्हें पुरोहितों के पास ले गए. तब उन्होंने बताया कि साढ़ेसाती से छुटकारा पाने के लिए हर साल यज्ञ कराना होगा.’’
यज्ञ शुरू होने से पहले दादाजी ने पुरोहित से पूछा, ‘‘महाराज, क्या इस यज्ञ से छुटकारा नहीं मिल सकता?’’
‘‘क्या…’’ पुरोहितजी ने चौंकते हुए तनिक गुस्से से उन की ओर देखा. फिर अचानक पुरोहितजी की नजर बैलों की जोड़ी की ओर चली गई.
चंद पलों के बाद वे ऊंची आवाज में बोले, ‘‘जजमान, अगर यह बैलों की जोड़ी दान कर दोगे, तो भविष्य में फिर यज्ञ कराने की जरूरत नहीं रहेगी.’’
यह सुनते ही रामशरण के मानो होश ही गुम हो गए. उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि पुरोहितजी इतने महंगे बैल भी मांग सकते हैं. तभी 3-4 गांव वालों ने भी पुरोहित की बात से रजामंदी जताई.
चमक लाल बोला, ‘‘चाचा, बैल दान कर दो. तुम ने बहुत यज्ञ कराए हैं. अब आखिरी यज्ञ होने जा रहा है, कंजूसी मत करो.’’
रामशरण की गांव में बहुत इज्जत थी. लोग उन्हें ‘दानवीर कर्ण’ कह कर बुलाते थे. उन्होंने कलेजे पर पत्थर रख कर ‘हां’ कर दी और यज्ञ शुरू करने की बात कह कर अंदर चले गए.
जब घर वालों को यह बात मालूम हुई, तो सभी को जैसे सांप सूंघ गया. पर विवेक बोला, ‘‘दादाजी, इस मामले को मैं सुलझा दूंगा… बस, आप बीच में टांग मत अड़ाना.’’
विवेक जल्दी से बढ़ई के पास गया और लकड़ी के 2 बैल बनवा लाया.
जब यज्ञ में बैल लाने का वक्त हुआ, तो विवेक वही लकड़ी के बैल ले कर पुरोहितजी के सामने जा पहुंचा.
पुरोहितजी बोले, ‘‘जजमान, बैलों की रस्सी हमारे हाथ में थमा कर पुण्य के भागी बनो.’’
यह सुनते ही रामशरण विवेक की ओर देखने लगे. तभी विवेक ने लकड़ी के बैलों की गरदनों में डोरी बांध कर उन्हें पुरोहितजी के पास खड़ा कर दिया.
रामशरण ने उन नकली बैलों की डोरी पुरोहितजी को थमा दी, तो वे चौंक कर बोले, ‘‘जजमान, मजाक मत करो. असली बैलों की डोरी थमाओ.’’
‘‘पुरोहितजी, हम ने बैल देने का वादा किया था, सो वे आप के पास खड़े हैं. जब आप पत्थर, मिट्टी, लोहे में प्राण प्रतिष्ठा कर देवीदेवताओं को प्रकट कर सकते हैं, तो लकड़ी के बैलों में भी प्राण प्रतिष्ठा कर के बैलगाड़ी में क्यों नहीं जोत सकते?’’ विवेक ने जब इतना कहा, तो पुरोहितजी बगलें झांकने लगे और गुस्से में तमतमाते हुए लकड़ी के बैल उठा कर घर की तरफ चल दिए.
–सत्यलाल प्र. कुशवाहा




