Hindi Social Story. रमुआ की बहू पतुली के मुंह से बात पूरी तरह निकल भी न पाई थी कि गांव के हर घर के कोनेकोने तक जा कर हवा की तरह समा गई. फिर औरतों में जो कानाफूसी चली, तो जैसे बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी.

कुएं या नल पर पानी भर रही हों, गोबर उठा रही हों या खेत पर किसी काम से गई हों, जहां 2-4 औरतें इकट्ठी हुईं नहीं कि सब की जबान पर एक ही बात होती कि रुक्मिणी ऐसी तो नहीं लगती थी. वह तो हमेशा  झेंप कर, शरमा कर बात करती थी.

हरसुख के कानों में भी यह फुसफुसाहट घुस ही गई. उस का जी ऊपरनीचे होने लगा कि यही गनीमत है कि रुक्मिणी ने अपने उस सगे का नाम नहीं बताया, नहीं तो अब तक फौजदारी की नौबत आ जाती. पंचायत अलग से जुटती. लोगों को तो ऐसी बातों में ज्यादा ही रस आता है.

हरसुख को तो यहां तक पता चला कि रुक्मिणी का भाई कलुआ और बाप धनुआ उस का गला दबा देना चाहते थे. अच्छा हुआ कि रुक्मिणी की मां भानुमती ने उसे बचा लिया.

‘‘जवान छोरी है. इस ने कोई गलती की है, तो जान से ही मार डालोगे?’’ रुक्मिणी की मां ने पूछा था.

‘‘यह छोरी है या कलंक. इस ने हमें गांव में मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा. कितनी ढीठ है कि उस आदमी का नाम तक नहीं बता रही है,’’ रुक्मिणी के बाप ने उस की पीठ पर धौल जमाते हुए कहा था. ‘‘मैं पूछ लूंगी. अब तुम लोग इसे छोड़ दो. मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूं,’’ भानुमती ने पति से कहा और बेटे की चिरौरी की थी. तब जा कर बापबेटे ने उस की गरदन छोड़ी थी.

रात को बिस्तर पर लेटे हरसुख को नींद नहीं आई, क्योंकि वह उस आदमी को अच्छी तरह पहचानता था, जिस ने रुक्मिणी की जिंदगी में यह जहर घोला था. आखिर उस आदमी ने कुछ पलों के जिस्मानी सुख के अलावा क्या दिया है? रुक्मिणी की जिंदगी सचमुच खतरे में है. उस के बापभाई जरूर किसी दिन उस का गला दबा देंगे. वे भानुमती के कहने पर इस वजह से खामोश हो गए कि रुक्मिणी उस शख्स का नाम बता दे, जिस ने उस की जिंदगी में कालिख पोत दी थी.

अगर रुक्मिणी ने उस अपराधी का नाम बता दिया, तो क्या हरसुख और वह इतमीनान से इस तरह चारपाई पर सो सकेंगे?

हरसुख ने उस बदमाश को एक दिन ईख के खेत में से रुक्मिणी के पीछे निकलते देखा था. ऐसे ही किसी औरत ने भी देख लिया होगा. वह पहचान में नहीं आया होगा, इसलिए उस के नाम का खुलासा नहीं हो सका.

यों हरसुख ने उस शख्स को खूब धिक्कारा था. गांव में क्या कुछ हो सकता है, इस की चेतावनी दी थी. वह आंखें  झुकाए खड़ा था. यह बात भी ज्यादा पुरानी नहीं है, यही कोई महीनाभर ही बीता होगा.

हरसुख ने यह भी कहा था कि आइंदा ऐसा न होने पाए. लेकिन बात आखिर पूरे गांव में फैल ही गई. अब तो हरसुख के लिए इस मामले का निबटारा करना बहुत जरूरी हो गया था. देर करने पर और नाम खुलने पर कुछ भी हो सकता था. उस ने तय किया कि इस तरह वह रुक्मिणी को मरने नहीं देगा और अपनी फजीहत भी नहीं होने दगा.

बिस्तर से उठ कर वह सीधे शंभू के पास गया, जो पशुओं के पास चारपाई पर लेटा करवटें बदल रहा था.

‘‘शंभू…शंभू्…’’ हरसुख ने धीरे से उसे आवाज दी.    ‘‘हां  भैया, क्या बात है?’’ शंभू उठ कर खाट पर बैठ गया.   ‘‘तु झे जरा भी शर्मलिहाज है. सोचा है कि इस हरकत की गांव में क्या सजा है? दोनों को फांसी पर लटका देंगे. तू ने मु झे गांव में मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा,’’ हरसुख की आंखों में आंसू छलक आए.

‘‘अब मैं क्या करूं, बोलो? गलती तो हो गई. अब तुम्हीं बताओ कि मैं क्या करूं?’’ शंभू रोते हुए बोला. ‘‘अब तू उस से ब्याह कर ले और कोई रास्ता नहीं है बचने का. अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है. मैं धनुआ काका के पास जाता हूं.’’ ‘‘मैं एकदम राजी हूं. आप ऐसा कर दें. बात यहीं की यहीं दब जाएगी.’’

इस के बाद हरसुख धनुआ काका की बैठक में जा पहुंचा. धनुआ की आंखों में भी नींद नहीं थी. वे खाट पर लेटेलेटे हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे. हरसुख के आवाज देने पर वे चौंक गए और बोले, ‘‘अरे, इस समय हरसुख बाबू… ऐसा क्या काम पड़ गया, जो सुबह का भी इंतजार नहीं किया?’’

हरसुख उन के पास बैठ गया. धनुआ हरसुख का बहुत आदर करते थे, क्योंकि उस के पास उन से दोगुनी जमीन थी और पढ़ालिखा होने के नाते तहसीलथाने में भी उस का आनाजाना था. गांव में उस की बात भी मानी जाती थी.

थोड़ी देर चुप रहने के बाद हरसुख ने कहा, ‘‘काका, रुक्को के बारे में गांव में जो बुरी खबर फैल रही है, वह मु झे भी खल रही है. तुम जानते ही हो कि मैं तुम्हारी कितनी इज्जत करता हूं. बच्चों से जवान उम्र में गलती हो ही जाती है.

‘‘एक गांव में रहने के नाते हमतुम भाईचारे का रिश्ता रखते हैं, लेकिन हमारे गोत्र तो अलगअलग हैं. मैं नहीं चाहता कि आप रुक्को का गला दबा दें या  और कोई कदम उठाएं. मैं शंभू के लिए उस का हाथ मांगने आया हूं.’’

‘‘यह तुम क्या कह रहे हो? भला गांव में ऐसा होता है. तुम बहुत दिलदार हो, जो यह सु झाव ले कर आए हो. तुम ने मु झ पर एहसान किया है. डूबते को तिनके का सहारा दिया है, लेकिन गांव के लोग क्या कहेंगे?’’

‘‘गांव के लोग तो कुछ न कुछ कहते ही रहते हैं, उन की चिंता मत करो. अपना भला देखो. रुक्को की जिंदगी के बारे में सोचो और मेरी बात पर ध्यान दो. इसी में भलाई है.’’

‘‘तुम ने मेरे होंठ सी दिए हैं. मैं इस हालत में मना भी नहीं कर सकता. मैं तुम्हारी इच्छा जरूर पूरी करूंगा.’’ हरसुख निहाल हो उठा, जैसे उसे मुंहमांगी मुराद मिल गई हो.

अगले ही दिन औरतों में एक नई खबर की चर्चा थी. ‘‘अरे, ब्याह हो रहा है रुक्को का शंभू के संग. गांव में पहले भी ऐसी बात सुनी है कभी?’’ एक औरत बोली. ‘‘अब नईनई बातों का जमाना है, दीदी. देखती जाओ, आगे क्याक्या होगा…’’ दूसरी औरत इठला कर बोली.

‘‘पर यह बात सम झ में नहीं आ रही कि बाबू हरसुख इस रिश्ते के लिए क्यों तैयार हो गए?’’ तीसरी ने सवाल दागा. ‘‘जरूर इस में कोई राज है?’’ चौथी ने आंखें मटका कर कहा.

और इस तरह गांव में फिर एक और नई खबर फैलने लगी थी.

-जगवीर सिंह वर्मा

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