Romantic Hindi Story. बसंती को जिंदगी का जो सुख अपने पति से मिलना चाहिए था… एक पराए मर्द से मिल रहा था. हालांकि अपने पति की तीमारदारी में उस ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी, पर पति ने तो उसे तकलीफें ही दी थीं.
उस कमबख्त ने तो आव देखा न ताव, उसे सरेआम बांझ कह कर बहुत बेइज्जत किया था. वह बोला था, ‘अगर तू मेरा कुनबा नहीं चला सकती, तो मेरे किस काम की? मैं दूसरी औरत कर लूंगा.’
इतना कह कर उस ने बसंती को घर से निकाल दिया था. कुछ सोचविचार कर वह घर से निकल पड़ी. चलतेचलते उस ने सरबती काकी की झोंपड़ी के आगे दम लिया. एकबारगी तो उस का दिल जोर से धड़क गया, पर फौरन उस ने खुद पर काबू कर लिया.
काकी उस समय दीयाबाती कर रही थी. अंदर जा कर वह काकी से लिपट गई और सिसकते हुए बोली, ‘काकी, मैं कहां जाऊं? क्या करूं? निकम्मे ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा…’
काकी ने उसे हिम्मत बंधाई, ‘अरी, आदमी ने निकाल बाहर किया है, जिंदगी ने नहीं… हौसला रख… जीने की ताकत पैदा कर. औरत तो बहुत ताकतवर होती है. जानती है, हम मेहनत करें और हिम्मत न हारें, तो बंजर जमीन उपजाऊ बना दें. मर्द भला क्या औरतों का मुकाबला करेंगे.’
काकी के पास एक ही चारपाई थी, जो उस ने बसंती को दे दी और खुद जमीन पर पसर गई. सरबती काकी के घर मुखिया का खूब आनाजाना था. एक वही था, जो गांवभर में अकेला उस की देखभाल करता था. काकी भी मुखिया का खूब मान करती थी.
सरबती काकी के पास 3 बकरियां थीं, जिन्हें वह रोजाना घास के मैदान में ले जाती और शाम को बकरियों के साथ ही लौटती. बसंती के आने से काकी के घर की देखभाल और खानेपीने का हिसाबकिताब सही हो गया था. दोनों साथ कामकाज करतीं, खातीपीतीं और एकदूसरे के काम में हाथ बंटातीं.
एक दिन जब काकी घर पर नहीं थी, तो मुखिया आया. उस ने बसंती को वहां देखा, तो बहुत हैरान हुआ कि काकी की अंधेरी झोंपड़ी में यह रोशनी करने वाली कहां से आ गई?
बसंती ने टूटी पड़ी खाट पर मुखिया को बैठने को कहा. उसे मालूम था कि काकी मुखिया का खूब मान करती है, इसलिए उस ने भी जो कुछ बन पड़ा, उस में कसर नहीं छोड़ी.
सांवलीसलोनी बसंती की मांसल देह में कमाल का खिंचाव था. आंसुओं से भरी उस की आंखें बो िझल जरूर हो गई थीं, पर चेहरे पर चमकती लाली और खिलखिलाती हंसी से गांव के मनचलों के दिल डोल उठते थे. कुछ दिनों से बसंती दुखी और बेचैन थी. काकी ने उसे पनाह तो दे दी थी, वह सब्जी का ठेला भी लगाने लगी थी, पर भविष्य में आने वाली किसी मुसीबत की बात सोच कर उस का मन कांप उठता था.
पता नहीं क्यों उसे गांव के मुखिया की आंखों में अपने लिए एक उम्मीद नजर आने लगी थी. वह तुरतफुरत काम से फारिग हो कर घरआंगन बुहार कर मुखिया की बाट जोहने लगती थी.
एक दिन मौका पा कर मुखिया ने बसंती की धोती का पल्लू खींच लिया. बहुत प्यार से उसे अपने पास खींच कर वह बोला, ‘कौन कहता है तू बुढ़ा गई है, शरीर से तो बड़ी हट्टीकट्टी है. इतनी दूर ठेला क्यों ले जाती है?
‘सुबहशाम चौधरानी को सब्जी दे आया कर. गांव में स्कूल खुलवा देता हूं, तू उस की देखभाल करना. झाड़ूबुहारी तक का जिम्मा तेरा. बंटाई पर मेरे खेतखलिहान में भी काम कर सकती है. ‘अरे, करने वालों के लिए बीसियों धंधे हैं, बोल कौन सा काम कर सकेगी, वही तु झे सौंप दूंगा?’ कहते हुए मुखिया ने उसे अपने पास बैठा लिया था.
बसंती की समूची देह कांप उठी. उस की जिंदगी में एक पराए मर्द का आना क्या ठीक है? पर मन में पति के प्यार की कमी उसे खल रही थी. मुखिया के यों छूने से उस के मन में प्यार उमड़ पड़ा.
बसंती के आगे एक लंबी वीरान सी जिंदगी पड़ी थी, उस पर मुखिया का यों प्यार जताना, उस के मन में गुदगुदी पैदा कर रहा था. वह धीरेधीरे डग भरती हुई मुखिया के साथ अंदर आ गई और रोशनी की चौंध से बचने के लिए उस ने तेज जलती ढिबरी की लौ पर अपनी हथेली रख दी.
मुखिया और बसंती का प्यार गांव वालों से छिपा न रह सका… उन के मिलने में अब रुकावट पड़ने लगी. उड़तेउड़ते चर्चा मुखिया के घर तक भी जा पहुंची. खूब हंगामा हुआ. मुखिया की चौधरानी ने सुना, तो उस के पैरों तले की जमीन खिसक गई. वह थी भी बड़ी गुस्सैल. पहले तो वह चीखीचिल्लाई. वैसे भी वह हार मानने वाली नहीं थी.
वह दनदनाती हुई काकी की झोंपड़ी में जा पहुंची और जोरजोर से सांकल खटखटाने लगी. जैसे ही बसंती ने किवाड़ खोला, वह चिल्लाई, ‘इस दो कौड़ी की औरत के पीछे मु झ से फरेब. नासपीटी… करमजली… दुष्ट…’ बसंती को तो जैसे सांप सूंघ गया हो. पिट कर भी वह कुछ न बोली. सिर नीचा किए बस रोती रही और सोचती रही कि शायद मुखिया से उसे प्यार करने का हक नहीं था.
इस घटना के बाद कई दिन बीत गए. मौसम बदला… बरसात शुरू हो गई. आसमान कालेकाले बादलों से घुमड़ पड़ा. मुखिया का आना बंद हो गया. जैसे वह बसंती के घर का रास्ता ही भूल गया.
बसंती बीमार रहने लगी. रोतेबिसूरते उस की देह कमजोर पड़ने लगी. किसी तरह जोरजबरदस्ती कर के सरबती काकी उसे पास के अस्पताल में ले गई. वहां के डाक्टर को दिखाया, तो उस ने काकी को बताया कि बसंती 3 महीने के पेट से है. सरबती काकी किसी गहरी सोच में पड़ गई. घबराहट, चिंता और परेशानी तो बसंती को भी होनी चाहिए थी, पर वह तो जैसे फूली न समाई.
वह जोर से चिल्लाती हुई सरबती काकी से लिपट गई, ‘काकी, मैं मां बनूंगी. मैं बच्चा पैदा कर सकती हूं. मेरे मरद ने तो मु झे बांझ कह कर घर से निकाल दिया था.’
बसंती ने विचार किया कि प्यार करना कोई पाप नहीं है. उस ने घर की चौखट खुद नहीं लांघी, वह तो धकियाई गई है. उस के पति ने उसे निकाल बाहर किया है. अब तक वह इस बात से बिलकुल बेखबर और अनजान थी कि औरत ही नहीं, कभीकभी मर्द भी बच्चा पैदा करने लायक नहीं होता.
बसंती मुखिया से मिलने के लिए बेचैन थी. एक दिन वह चुपके से मुखिया से अपना हक मांगने चल पड़ी. ‘बसंती, मेरे 3 बच्चे हैं और चौधरानी है गुस्सैल मिजाज की. सौत कैसे बैठा दूं?’ मुखिया ने ईमानदारी की बात कही. ‘मुखियाजी, प्यार करते वक्त तो तुम ने न बच्चे की सोची और न चौधरानी के गुस्से की,’ बसंती ने उस पर ताना कसा.
‘मैं ने प्यार किया है बसंती, पर मु झे इतनी बड़ी सजा तो मत दे… मैं तु झ से दगा कहां कर रहा हूं?’ मुखिया ने कहा. बसंती बोली, ‘मु झे भी तड़पने के लिए यों ही न छोड़ो मुखियाजी. चाहे तुम मेरी जान ले लो, पर अपना बीज सब के सामने स्वीकार कर लो. मैं तुम्हारा कुनबा कतई नहीं उजाड़ूंगी. ‘अपने मन के किसी कोने में मु झे भी जगह दे दो. मैं चाहती हूं कि मेरी औलाद को तुम्हारा नाम मिले.’
गांव में ‘सर्वशिक्षा अभियान’ (सब के लिए पढ़ाईलिखाई कार्यक्रम) जोर पकड़ रहा था. रोजाना शहर के स्कूलों के लोग गांवों में पढ़ानेलिखाने के केंद्र खोल रहे थे.
बसंती के मन में पढ़ने की ललक सब से ज्यादा जाग रही थी. उस ने गांव की 20-25 औरतों को पढ़नेलिखने के लिए तैयार कर के उन के साथ अपना नाम भी लिखवा लिया था. सरकार की तरफ से मुफ्त कौपियां, किताबें और पैंसिलें बांटी जा रही थीं. मर्दों के लिए भी एक घंटा पढ़ाई का अलग से इंतजाम था.
स्कूल में एक घंटा सिलाई भी सिखाई जाती थी. मुखिया ने स्कूल में 3-4 सिलाई मशीनें भी रखवा दी थीं. एक मशीन पर बसंती अकेले ही काम सीखती थी. एक दिन शहर से एक खूबसूरत टीचर आई. उस ने गांव वालों के सामने जो भाषण दिया, उसे सुन कर तो जैसे सब हैरान रह गए.
उस ने लोगों को सम झाया, ‘देखिए, कोई भी गांव तब तक तरक्की नहीं कर सकता, जब तक उस गांव की औरतें हर लिहाज से महफूज न हों. जिस समाज में मर्द औरतों की इज्जत नहीं करते, वह समाज पिछड़ा ही कहा जाएगा. ‘जहां तक कमजोर तबके की बात है, उस पर जुल्म किया जाना तो एक आम बात हो गई है.
‘समझदार और पढ़ेलिखे गांव वालों से मेरी गुजारिश है कि अपने समाज में औरतों पर जोरजुल्म न होने दें… उन की इज्जत बनाए रखना आप का फर्ज है. गांव के मुखिया जैसे लोगों की तो और भी ज्यादा जिम्मेदारी है गांव में अमनचैन और तरक्की लाने की.’
मुखिया ने भी भाषण सुना. उस की तो जैसे नींद उड़ चुकी थी. रहरह कर उस के कानों में टीचर की बातें गूंज रही थीं. मुखिया ने जो कुछ किया, बसंती के प्यार में पड़ कर किया. उस का मकसद बसंती की देह से खिलवाड़ करना कतई नहीं था.
अब जो भी हो, वह बसंती को बेइज्जत नहीं होने देगा. चौधरानी के सामने वह सच स्वीकार कर लेगा. वह गांव में बसंती की इज्जत नहीं उतरने देगा. दोनों औरतों में मेलमिलाप करवाएगा.
इस तरह एक सू झबू झ वाला कदम उठाने का फैसला लेते ही मुखिया का तनाव खत्म हो गया. आंखें मूंदते ही उसे नींद आ गई. सुबह मुखिया सो कर उठा तो देखा, दिन चढ़ आया था. वह नहायाधोया और सफेद धोतीकुरता पहन कर बाहर निकल गया.
मुखिया ने देखा कि कुहरा छंट चुका था. आसमान बिलकुल साफ दिखाई दे रहा था. उस के कदम बसंती की झोंपड़ी की ओर बढ़ गए.
–जया रावत




