Special Social Feature. महाराष्ट्र के नासिक जिले के त्रयंबकेश्वर मंदिर, राजस्थान के सीकर जिले के खाटू श्याम मंदिर, तमिलनाडु के मदुरै में बने मीनाक्षी अम्मन मंदिर, अजमेर की शरीफ दरगाह, जम्मूकश्मीर के कटरा के वैष्णों देवी मंदिर और मुंबई की हाजी अली दरगाह समेत असम के गुवाहटी में बने कामाख्या मंदिर और मध्य प्रदेश के उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में रोज लाखों लोग अपनी कोई न कोई मन्नत मांगने जाते हैं.

किसी को धनदौलत या रोजगार चाहिए, तो किसी को एक अदद औलाद की दरकार है. कोई लंबी बीमारी से नजात की मन्नत ले कर जाता है तो किसी को मुकदमे में जीत चाहिए.

यानी इन धार्मिक जगहों पर जाने वालों की हैसियत इन के बाहर बैठे भिखारियों से कमतर नहीं होती, फर्क सिर्फ इतना है कि भिखारी ऊपर वाले के नाम पर नीचे वालों से मांगता है जो उन की हालत पर तरस खा कर थोड़ाबहुत दे भी देते हैं, लेकिन सीधे ऊपर वाले से मांगने वालों पर अगर वह तरस खाता होता तो दुनिया में किसी को किसी भी किस्म की तकलीफ ही न होती, सब की मुरादें पूरी हो गई होतीं.

अब इन कमअक्ल लोगों को कौन यह सम?ाए कि जो ऊपर वाला अपने ही मंदिर के बाहर बैठे भिखारियों को पेटभर खाना देने की कूवत नहीं रखता वह किसी को धनदौलत, नौकरी, रोजगार और औलाद वगैरह कहां से देगा.

हर कोई इन धार्मिक जगहों पर कोई न कोई मांग या फरियाद ले कर ही जाता है और इन दरबारों में वादा कर के आता है कि अगर मेरा यह काम हो जाए तो मैं इतने का प्रसाद और चढ़ाऊंगा, दोबारा दर्शन करूंगा, इतने रुपए दान में दूंगा, इतने दिन के व्रतउपवास करूंगा और जोजो पंडा बता देगा वेवे सारे उपाय करूंगा.

कुंआरों की मन्नत, बस शादी करा दो

आजकल धार्मिक जगहों पर जाने वालों की अच्छीखासी तादाद उन कुंआरों और उन के मांबाप की होती है और जो वहां जा कर शादी की अर्जी लगा आते हैं. ये वे कुंआरे होते हैं जिन की शादी किसी न किसी वजह से नहीं हो पा रही है. क्यों नहीं हो पा रही उस की वजहें जाननेसम?ाने से पहले यह जानसम?ा लेना ज्यादा अहम है कि समय पर शादी न हो पाने की सब से बड़ा ब्रेकर ज्यादातर मामलों में धर्म ही है और उस में भी सब से बड़ा अड़ंगा मंगल ग्रह है जिस की न जाने क्यों भारत के शादी लायक हिंदू लड़केलड़कियों से ही दुश्मनी है. अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका समेत और देशों के नौजवानों से उस का कुछ लेनादेना नहीं है.

हर तीसरीचौथी जन्मकुंडली के पहले, तीसरे, सातवें, आठवें और बारहवें घर में मंगल किसी सांप की तरह कुंडली मारे बैठा होता है जो शादी नहीं होने देता. वजह, मंगल दोष वाली जन्मकुंडली खतरनाक मानी जाती है, क्योंकि वह हर किसी की जन्मकुंडली से मेल नहीं खाती है. लिहाजा, सामने वाले की जन्मकुंडली में भी मांगलिक दोष होना जरूरी हो जाता है. ऐसे में बाकी सब मसलन जाति, घरपरिवार, पढ़ाईलिखाई, माली हैसियत, इज्जत और रिश्तेदारी वगैरह ठीकठाक होने पर भी अच्छेखासे रिश्ते नहीं हो पाते हैं.

दूसरी बड़ी वजह भी धर्म की ही देन है जिस ने यह फतवा जारी कर रखा है कि सभी को अपनी जाति में ही शादी करनी चाहिए. इस फतवे के चलते इंटरकास्ट मैरिज बड़े पैमाने पर नहीं हो पा रहीं. खासतौर पर ऊंची जाति वाले नीची जाति वालों से रिश्ता जोड़ने की सोचने मात्र से ही बौखला उठते हैं, फिर भले ही लड़का या लड़की कितना ही काबिल, कमाऊ, होनहार और पढ़ालिखा क्यों न हो यानी जातिगत भेदभाव की वजह से भी नौजवानों को लाइफ पार्टनर नहीं मिल पाता.

आजकल छोटीबड़ी सभी जाति वालों की एक बड़ी दिक्कत अपनी जाति में शादी के लिए काबिल उम्मीदवार का न मिलना है. लेकिन धर्म और समाज के ठेकेदार दूसरी जाति में शादी न हो इस के लिए तमाम ओछे और घटिया हथकंडे अपनाते हैं. इन से जो नहीं डरें या इन के उसूलों के आगे ?ाकने से इनकार कर दें वही हिम्मती इंटरकास्ट मैरिज कर पाते हैं, जिस के लिए मन्नत नहीं हिम्मत काम आती है. लेकिन ऐसे नौजवानों की तादाद 10 फीसदी भी नहीं है. बाकी 90 फीसदी किस्मत और मन्नतों के भरोसे लंबे समय तक कुंआरे बैठे रहते हैं.

ऐसी दर्जनों छोटीबड़ी फुजूल की वजहें हैं जिन के चलते शादी नहीं हो पाती या उस में देर होती है तो लड़कालड़की घबरा कर मन्नत मांगने की बेवकूफी करने लगते हैं कि हे ऊपर वाले, शादी करा दे तो मैं इतने व्रतउपवास करूंगा या करूंगी. और जोजो उपाय व जैसेजैसे पूजापाठ पंडेपुजारी, तांत्रिक और ज्योतिषी बताएंगे उन पर अमल करूंगा या करूंगी. इस के लिए वह जितनी दक्षिणा मांगेगा वह बाइज्जत दी जाएगी.

लड़कियों को दबाने की कहानियां

वैसे तो सभी देवीदेवताओं की चौखट पर कुंआरेकुंआरियां माथा टेकते हैं लेकिन शंकरपार्वती को मैरिज स्पैशलिस्ट माना जाता है, इसलिए कुंआरे खासतौर से कुंआरियां शादी की मन्नत के लिए शिव मंदिर ज्यादा जाती हैं और सोलह सोमवार के व्रत करती हैं. सोमवार चूंकि शंकर का प्रिय दिन है, इसलिए इस दिन भूखेप्यासे रहने से वे जल्दी प्रसन्न होते हैं.

इस के पीछे की पौराणिक कहानी यह है कि पार्वती चाहती थीं कि उन की शादी शिव से ही हो. इस के लिए उन्होंने व्रत और कठिन तपस्या हिमालय पर्वत की गुफाओं में की थी, जिस से खुश होकर शंकरजी उन से शादी करने के लिए तैयार हो गए थे. इन दोनों की शादी उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के त्रियुगीनारायण गांव में बने एक मंदिर त्रियुगीनारायण में हुई थी.

यह शादी कितनी अनोखी थी यह हर हिंदू जानता है कि शिव बारात में भूतप्रेत, पिशाच वगैरह गले में नरमुंडों की माला पहने और शरीर पर भस्म लगाए नाचते हुए गए थे. खुद शिव की वेशभूषा देख कर पार्वती की मां मैना बेहोश हो गई थीं.

इस कहानी को पौपुलर करने की पहली वजह यह थी कि लड़कियों को यह समझ  आ जाए कि मनपसंद पति यों ही फोकट में यानी बिना दानदक्षिणा दिए नहीं मिल जाता. उस के लिए पार्वती सरीखी तपस्या करना चूंकि मुमकिन नहीं इसलिए उस के एवज में सोलह सोमवार की कथा को हवा दी गई.

लड़कियां यह व्रत करती हैं तो हर सोमवार शिव मंदिर जा कर प्रसाद और पैसा जरूर चढ़ाती हैं जिस से पंडेपुजारियों को मुफ्त का माल बिना कुछ करेधरे मिल जाता है. दूसरी मंशा यह थी कि लोग भूतप्रेतों पर यकीन करने लगें. यह भी मुफ्तखोर पंडेपुजारियों और गुनिया, तांत्रिकों की आमदनी का बड़ा जरीया है.

लाख टके का सवाल इस कहानी से यह उठता है कि सोलह सोमवार का व्रत रखने की सलाह लड़कियों को ही क्यों दी गई, लड़कों को क्यों नहीं?  तो इस का जवाब यह है कि लड़कों की शादी तो पहले आसानी से हो जाया करती थी, जबकि लड़कियों की शादी में कई दिक्कतें पेश आती थीं जिन मे सब से अहम दिक्कत दहेज जुटाना है. वजह, लड़कियां भार समझी जाती हैं, इसलिए मांबाप की हरमुमकिन कोशिश यह होती थी कि जैसे भी हो बेटी के हाथ पीले हो जाएं तो समझ  गंगा नहा ली.

लड़कियों को ससुराल में न इज्जत मिलती थी, न ढंग से खानेपीने को मिलता था, उन की हैसियत गुलामों और शूद्रों सरीखी होती थी जिन का रोल एक के बाद एक बच्चे पैदा करना और ससुराल वालों की गुलामी ढोना होता था. इस पर भी कब पति सौतन ले आए इस का भी कोई ठिकाना नहीं रहता था.

ये और ऐसे तमाम जुल्मोसितम ‘मनुस्मृति’ जैसे धर्मग्रंथों की वजह से थे जिस में औरत को दासी, अपवित्र और नरक में धकेलने वाली बताया गया है. इन सब दुश्वारियों से बचने के लिए घबराई लड़कियां यह दुआ मांगा करती थीं कि हे भगवान ऐसा पति देना जो शराबी, कबाबी और जुआरी न हो और इज्जत और प्यार करने वाला हो.

हालात आज भी ज्यादा नहीं बदले हैं. ज्यादातर लड़कियों को अब भी पहले की सी ही परेशानियां उठानी पड़ रही हैं. जो थोड़ेबहुत बदलाव और सुधार नजर आते हैं उन की वजह संविधान और कानून में औरतों को बराबरी का दर्जा दिया जाना थी जिस के चलते उन्होंने तालीम और नौकरियां हासिल करना

शुरू कीं और उन मे अपने हकों के प्रति जागरूकता भी आई. इस के बाद भी धर्म के चलते समाज पर मर्दों का ही दबदबा है, इसलिए लड़कियां लड़कों के मुकाबले ज्यादा मन्नतें शादी के लिए मांगती नजर आती हैं.

मन्नत नहीं यह करें

लड़कों को चाहिए कि वे जितना ज्यादा हो सके पढ़ेंलिखें, सरकारी या प्राइवेट नौकरी हासिल करें. ये भी न मिलें तो जैसा भी खुद का धंधा शुरू करें. दहेज का लालच न रखें और लड़कियों की इज्जत करना सीखें. साथ ही, सलीके से बनसंवर कर साफसुथरे रहें, क्योंकि लड़कियां अब स्मार्ट और पैसे वाला लाइफ पार्टनर चाहती हैं, इसलिए इतने तो कमाऊ बनें कि अपनी ख्वाहिशें पूरी होने की उम्मीद उसे आप में दिखे.

इस तरह रहेंगे तो मुमकिन है कि मन्नत मांगने मंदिर जा रही कोई लड़की रास्ते में ही रुक कर आप पर ही फिदा हो जाए.

इसी तरह लड़कियों को चाहिए कि वे भी पढ़लिख कर नौकरी हासिल करें, क्योंकि आजकल लड़कों को भी कमाऊ बीवी चाहिए, जो बढ़ती महंगाई के इस दौर में घरगृहस्थी के भार में बराबरी से साथ दे सके और सम?ादार व मौडर्न भी हो. सब से ज्यादा जरूरी यह है कि मन्नत में वक्त और पैसा बरबाद नहीं करना चाहिए और न ही ऊपर वाले के भरोसे मनचाहा लाइफ पार्टनर चाहने अपनी कोशिश की जानी चाहिए.

मन्नतों से अगर मुरादें पूरी हो रही होतीं तो दुनिया में कोई भी दुखी ही न होता, फिर कुंआरे या कुंआरी रहना तो दूर की बात है.

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