Story in Hindi. आदिल अपनी बीवी महविश को दिलोजान से चाहता था. एक दिन महविश ने उस से अजीब सी डिमांड रख दी कि उसे किसी का लव लैटर पढ़ना है. आदिल ने बड़ी मेहनत से लव लैटर लिखा, पर महविश को पसंद नहीं आया. आगे क्या हुआ?
आ दिल जब अपने कमरे में पहुंचा, तो उस की बीवी सो चुकी थी. उस ने धीरे से कबर्ड खोला, अपना कोट उतारा और कबर्ड के एक हैंगर में टांग दिया. फिर बहुत ही आहिस्ता से कबर्ड को पुश कर दिया. ‘खट…’ की आवाज पूरे कमरे में गूंज गई.
सुर्ख जोड़े में दुलहन की तरह सजी आदिल की बीवी चौंक कर उठ बैठी. बिलकुल उसी तरह जैसे वह एक साल पहले शादी की पहली रात उठ कर बैठी थी.
आदिल को शादी की पहली रात का पूरा मंजर याद आ गया. वह अपनी बीवी के पास पहुंचा. उस की बीवी सिमट कर लजाने लगी. घूंघट उस के सिर से गायब था. उस ने अपने सिर पर घूंघट का पल्लू डालने की कोशिश की.
आदिल ने मना कर दिया, ‘‘नहीं, ऐसे ही ठीक है,’’ उस के हाथ में उस की बीवी का हाथ आ गया. नरम और नाजुक हाथ, ‘‘ऐसे ही ठीक है. बिना बदली का चांद. बेवजह घूंघट उठाने की जहमत करनी पड़ती.’’
‘‘मैं सो गई थी.’’ ‘‘मैं जानता हूं. सफर की थकान है.’’ आदिल की बीवी महविश ने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की. ‘‘अब तो यह हाथ जिंदगीभर नहीं छोडं़ूगा, कहीं भागने नहीं दूंगा.’’
महविश शरमा गई. आदिल ने उस के शरमाए हुए वजूद को अपने आगोश में ले लिया.
‘‘कहीं भी भागने नहीं दूंगा,’’ कहते हुए आदिल ने करीब की मेज पर रखा हुआ मिठाई का डब्बा उठाया, उसे खोला. काजू बर्फी का एक पीस उठा कर खिलाने लगा. फिर महविश ने भी उसे खिलाया.
‘‘कौन दूर भागना चाहेगा आप से… कोई बेवकूफ ही होगी, जो आप की मुहब्बत को ठुकराएगी, आप से दूर जाएगी,’’ महविश बोली.
‘‘फिर भी मेरे प्यार में कहीं कोई कमी रही हो तो मु?ो बता दीजिए. ऐसी कोई चीज जो मैं आप को नहीं दे पाया हूं, मु?ो बताइए,’’ आदिल ने बच्चे की तरह जिद की.
महविश ने आदिल के बालों में उंगलियां फेरते हुए कहा, ‘‘एक ख्वाहिश है मेरी, कहीं दिल में दबी हुई.’’ ‘‘कैसी ख्वाहिश?’’
‘‘मैं ने अपनी जिंदगी में कभी भी कोई लव लैटर नहीं पढ़ा है, पढ़ा क्या देखा तक नहीं है. मु?ो कहीं से लव लैटर ला दीजिए. किसी का लव लैटर, किसी को लिखा हुआ. मैं लव लैटर पढ़ना चाहती हूं. देखना चाहती हूं कि लव लैटर कैसा होता है,’’ महविश ने धीरे से कहा. आदिल हड़बड़ा कर उठ बैठा, ‘‘यह कैसी ख्वाहिश है…’’
आदिल यादों से बाहर आ गया. उस की नजर दीवार घड़ी पर पड़ी. रात के तकरीबन 3 बज रहे थे. उस ने एक नजर अपनी बीवी पर डाली. वह बेसुध पड़ी सो रही थी. बहुत ही खूबसूरत लग रही थी.
आदिल कमरे से निकाल कर बालकनी पर आ गया. घर के सामने गार्डन में शाम के प्रोग्राम की निशानियां अब भी बाकी थीं. एक तरफ स्टेज बना था. एक बड़ी सी मेज पड़ी थी. वही मेज जिस पर मैरिज एनिवर्सरी का केक काटा गया था.
केक कटते ही सब ने ‘हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी’ बोला था. ‘मुबारकबाद’ बोल कर गिफ्ट पैक भी दिए थे.
आदिल ने सभी के सामने महविश के गले में डायमंड का नेकलेस भी पहनाया था. फिर ‘भटाभट’ गुब्बारे फूटने लगे थे. मेज पर फटे हुए गुब्बारे अब भी नजर आ रहे थे. कुछेक गुब्बारे टैंट की सीलिंग और साइड के परदों पर अब भी चिपके हुए लटक रहे थे. गार्डन के दाएं और बाएं साइड में टेबल और कुरसियों के इर्दगिर्द डिस्पोजल गिलास और पत्तल पड़े हुए थे. स्टेज के साइड में छोटा सा डीजे सिस्टम भी था, जिस पर कुछ जिस्म थिरके भी थे.
आदिल अंदर अपने स्टडी रूम में आ गया. उस ने मेज के नीचे से कुरसी अपनी तरफ खींची. कुरसी पर बैठ गया. लव लैटर लिखने के लिए कागज और कलम उठाया.
‘कैसे लिखूं… कहां से शुरुआत करूं…’ आदिल सोच में पड़ गया. इस मोबाइल फोन ने तो खत लिखना ही भुला दिया. रोजाना सैकड़ो मैसेज लिखते हैं हम… सोशल मीडिया पर, मगर खत लिखना हम भूल गए.
पर कुछ तो लिखना पड़ेगा. आखिर आदिल की प्यारी बीवी महविश को लव लैटर जो पढ़ना है. कुछ सोच कर आदिल ने लिखा :
जानेमन… जाने तमन्ना… जाने अदा.
तु?ो जैसा है सोचा पाया वही
सूरज की किरनों सा इक चेहरा
देखा है तुम सा मैं ने नहीं…
जानेमन, तुम बहुत खूबसूरत हो. इतनी खूबसूरत कि मेरे पास अल्फाज नहीं हैं… मैं कैसे बयान करूं… तुम्हारे गाल गुलाब से हैं. आंखें बहुत ही नशीली और लब संतरे के दो फांक. तुम न मिलती, तो मैं अधूराअधूरा सा लगता. आई लव यू वैरी मच.
तुम्हारा सिर्फ तुम्हारा
आदिल
चलो हो गया. लिख गया खत. आदिल ने राहत की सांस ली. वह अपने कमरे में लौट आया. महविश अब भी सो रही थी. आदिल ने खत को फोल्ड कर के उस के तकिए के नीचे रख दिया.
सुबह हो गई. आदिल रोजाना की तरह समय पर अपने कालेज पहुंचा. तभी उस के स्टाफ ने आ कर उसे घेर लिया.
‘‘यह बात ठीक नहीं है सर,’’ कंप्यूटर टीचर अजीत वर्मा ने कहा.
‘क्या बात ठीक नहीं है?’ कई और टीचर एकसाथ बोल पड़े.
‘‘कल सर की मैरिज एनिवर्सरी थी… बड़ी धूमधाम से.’’
‘‘नहीं, ऐसे ही छोटीमोटी रस्म मना ली थी केक मंगा कर,’’ आदिल बोला.
‘‘आप ?ाठ बोल रहे हैं सर. यह देखिए मेरे पास सुबूत हैं,’’ अजीत फेसबुक की पोस्ट दिखाने लगा. अजीत रोज ही सोशल साइट पर जा कर चैक कर लेता था. देख लेता था कि कौन कहां है और क्या कर रहा है. आज किस का बर्थडे है. किस की मैरिज एनिवर्सरी.
आदिल ने सिर्फ एक फोटो पोस्ट किया था. अपने घर के गार्डन में डैकोरेट किए गए स्टेज का, जिस पर बड़ेबड़े अल्फाज में लिखा था ‘हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी’.
‘‘यह तो गलत बात है आदिल साहब. आप को यहां भी पार्टी देनी पड़ेगी,’’ एक सीनियर टीचर ने कहा.
‘‘ठीक है सर मिल जाएगी, लंच टाइम में,’’ आदिल बोला.
लंच टाइम में आदिल को खत के बारे में याद आया. पता नहीं महविश ने खत पढ़ा है या नहीं, पढ़ा होता तो अब तक उस का फोन आ जाता. शायद खत पर उसकी नजर ही न पड़ी हो. शायद उसे फुरसत ही न मिली हो. कल का सबकुछ बिखरा हुआ पड़ा था. उसे गार्डन भी साफ करवाना पड़ा होगा. टैंट का सामान भी भिजवाना पड़ा होगा.
हालांकि, घरबाहर का सारा काम आदिल का छोटा भाई कामरान ही करता है, लेकिन महविश को भी तो देखना ही पड़ता है. घर पर काम वाली भी आती है, मगर उस के पीछेपीछे भी तो दौड़ना पड़ता है.
आदिल ने फोन मिलाया. पूरी घंटी गई. फोन नहीं उठा. उस ने दोबारा मिलाया.
उधर से फोन आदिल की बहन आलिया ने उठाया, ‘‘भैया मैं हूं आलिया… भाभी छत पर हैं. कपड़े धूप में डाल रही हैं… मोबाइल अभी देती हूं.’’
आलिया मोबाइल फोन ले कर छत पर पहुंची, ‘‘भाभी, भैया का फोन.’’
‘‘हैलो जी, कैसे हैं आप?’’ आलिया बालटी से कपड़े निकालनिकाल कर छत पर बंधे हुए तार पर फैलने लगी. छत पर नरम धूप फैली हुई थी, जो बहुत भली लग रही थी.
‘‘ठीक हूं,’’ आदिल बोला. ‘‘आप को थकान लग रही होगी…’’ ‘‘थोड़ीबहुत. ज्यादा नहीं. अच्छा, तुम्हें कुछ मिला?’’ आदिल ने पूछा. ‘‘क्या?’’ महविश ने पूछा. ‘‘कुछ भी,’’ आदिल ने कहा. ‘‘कल मु?ो बहुतकुछ मिला था. लोगों से गिफ्ट पैक, आप से डायमंड का नेकलेस.’’ ‘‘इस के अलावा… आज कुछ नहीं मिला… तकिए के नीचे?’’
‘‘अच्छा… वह खत. हां, मिला. आप ने लिखा था? लव लैटर ऐसे तो नहीं होते होंगे. सपाट सीधेसादे. न जज्बात, न एहसास… मु?ो असली लव लैटर चाहिए, नकली नहीं. एक महबूब का, उस की महबूबा के नाम या महबूबा का उस के महबूब के नाम. मियांबीवी का भी चलेगा, लेकिन उस में प्यार हो, मुहब्बत हो, जज्बात हों, एहसास हो.’’
महविश बात करतेकरते नीचे उतर आई. उधर आलिया जब कपड़े फैला चुकी, तो वह रैलिंग के पास पहुंची. बाएं साइड वाले घर के गार्डन में एक लड़की खड़ी थी. सजीधजी. मुसकराती हुई.
गली के मोड़ से एक लड़का आता हुआ दिखाई दिया. दुबलापतला. हाथ में कलावा पहने. छोटेछोटे बालों में एक मोटी सी चोटी. माथे पर तिलक. वह लड़का उस लड़की के घर के गेट के बहुत पास से गुजरा. लड़की से कुछ बोला. क्या बोला? आलिया को सुनाई नहीं पड़ा. लड़की हंस दी. लड़का मुसकराता हुआ गली में आगे बढ़ गया.
शाम को आदिल ने महविश से कहा, ‘‘यार, मैं ने बड़ी मेहनत से वह लव लैटर लिखा था. दिमाग पर कितना जोर डाला था, तब कहीं जा कर अल्फाज कागज पर उतरे थे. और तुम ने मेरा लव लैटर रिजैक्ट कर दिया.’’
‘‘आप ने खत लिखने में बेशक मेहनत की होगी, लेकिन वह सिर्फ लैटर था, लव लैटर नहीं. उस में मुहब्बत नदारद थी.’’
‘‘अच्छा महविश, यह बताइए कि यह लव लैटर वाली ख्वाहिश तुम्हारे दिल में कब पैदा हुई और कैसे?’’
महविश मुसकराई, ‘‘बचपन की बात है. मैं जमात 4 या 5 में पढ़ रही थी. मेरे क्लास में एक लड़का था. जैसे बहुत से लड़केलड़कियां साथ पढ़ते हैं, वह भी पढ़ता था. जैसे सब साथ में खेलतेकूदते हैं, बोलते हैं, लड़ते?ागड़ते हैं. वह भी साथ में खेलता था, बोलता था. बचपना था. नासम?ा थी मैं. शायद वह नासम?ा नहीं था. शायद वह नादान था. पता नहीं क्या था वह. किस का बेटा था, मैं नहीं जानती.’’ आदिल के चेहरे पर कई भाव आ
रहे थे, जा रहे थे. महविश उस के चेहरे को देख कर शांत हो गई, ‘‘आप कुछ उलटासीधा तो नहीं सोचने लगे. ऐसीवैसी कोई बात नहीं थी. आप गलतफहमी मत पाल लेना.’’
‘‘मैं इतने छोटे दिल का भी नहीं हूं. आगे बताइए. कहानी इंटरस्टिंग लग रही है.’’
‘‘मिस्टर, यह कहानी नहीं है, बल्कि हकीकत है. सुनिए, एक दिन सुबहसवेरे पहले ही घंटे में मेरे स्कूल के हैडमास्टर साहब उस लड़के को बेतहाशा पीटने लगे. वह चिल्ला रहा था. आखिरकार किसी तरह वह लड़का स्कूल से भाग पड़ा था.
‘‘हैडमास्टर साहब के कहने पर कई लड़कों ने उस का पीछा भी किया था, पर वह लड़का पकड़ में नहीं आया. अरहर के खेतों से होता हुआ वह अपने गांव निकल गया था.
‘‘कहते हैं कि वह लड़का अपनी मौसी के यहां पढ़ने के लिए आया था और मौसी के घर में ही रहता था.’’
‘‘लेकिन हैडमास्टर साहब ने उसे इतनी बेदर्दी से मारा क्यों? क्या गलती थी उस की?’’ आदिल के मुंह से अचानक निकला.
‘‘उस लड़के ने एक लव लैटर लिखा था और वह लव लैटर हैडमास्टर साहब के हाथ लग गया था.’’
‘‘लेकिन वह लव लैटर किस लड़की के नाम था?’’ आदिल ने जिज्ञासु हो कर पूछा.
‘‘मेरे नाम था वह लव लैटर. मु?ो यह बात बहुत बाद में पता चली. तब जब मैं प्राइमरी स्कूल पास कर के जूनियर में आ गई थी.’’ यह सुन कर आदिल अवाक रह गया. बात आईगई हो गई.
आलिया ने छत से देखा कि आज वह लड़का अपनी बाइक से आ रहा था. गली के उसी मोड़ से. बनाठना. वह लड़का पड़ोस के घर के गार्डन में ?ांकता हुआ है या यों कहें कि खुद को उस लड़की को दिखाता हुआ गुजरा. लड़की तैयार खड़ी थी. मुसकराई. लड़का भी मुसकराया. लड़का बाइक की स्पीड बढ़ा कर तेजी से गली से ओ?ाल हो गया.
थोड़ी देर बाद वह लड़की भी अपने घर से बाहर निकली. बुरके में. सड़क पर आई. एक आटोरिकशा पकड़ा. आटोरिकशा उसी दिशा में चल दिया, जिधर वह लड़का गया था.
आदिल के कालेज में सालाना इम्तिहान शुरू हो चुके थे. आज अंगरेजी का पेपर था. तकरीबन एक घंटा हो चुका था. एक घंटे के पूरा होने पर एक घंटी बजी.
‘‘चलिए सर, राउंड पर चलते हैं,’’ आदिल के एक साथी टीचर अजीत वर्मा ने कहा.
आदिल, अजीत वर्मा और अमित राठौर तीनों राउंड पर चल दिए. उन्होंने रूम नंबर एक से शुरुआत की. वे छात्रों के पास जाते और पेपर उठा कर देखते कि कहीं कोई निशान तो नहीं लगा है. कोई जवाब तो नहीं लिखा है. कौपियां भी उलटपुलट कर देखते. जिस छात्र पर शक होता उस की तलाशी भी लेते. ऐसा ही करते हुए जब वे रूम नंबर 3 में पहुंचे, तो आदिल को एक लड़के पर शक हुआ, ‘‘स्टैंडअप.’’
लड़का खड़ा हो गया. आदिल ने उस की शर्ट की तलाशी ली. उस की पैंट की दोनों जेबों की तलाशी ली. कुछ भी नहीं निकला. उस की बैल्ट के हुक में भी देखा. वहां भी कुछ नहीं था.
आदिल का शक गलत निकला. उस छात्र के पास नकल नहीं थी. आदिल ने उस लड़के पास वाले लड़के को इशारा किया. वह उठ खड़ा हुआ.
‘‘कुछ नहीं है सर, मैं नकल नहीं लाता हूं,’’ वह लड़का बोला.
आदिल ने उस लड़के की दोनों जब में हाथ डाला. कुछ नहीं मिला. फिर बैक पौकेट में देखा. एक पर्स था, जिस में 100-100 और 200-200 रुपए के कई नोट थे.
‘‘इतने रुपए क्यों ले कर आते हो? 9वीं जमात में पढ़ते हो, कहां खर्च करते हो इतने पैसे? और यह क्या है… रुपयों के बीच में यह परची कैसी है?’’
‘‘सर, यह नकल नहीं है. सर, यह परची मु?ो वापस कर दीजिए… प्लीज सर.’’
‘‘नकल ले कर आते हो, इतना सम?ाने पर भी.’’ ‘‘नहीं सर, यह नकल नहीं है.’’ ‘‘फिर क्या है?’’ आदिल ने पूछा.
लड़के ने सिर झुका लिया. आदिल ने पर्स लड़के को वापस कर दिया.
आदिल की नजर कागज पर लिखी इबारत पर पड़ी. लिखा था, ‘मेरी जान दीपाली…’
‘यह तो लव लैटर है…’ आदिल ने मन ही मन सोचा. उस की आंखों में ऐसी चमक दौड़ गई जैसे कि उस के हाथ कोई खजाना लग गया हो. ‘‘बैठ जाओ,’’ आदिल ने उस लड़के से कहा और परची अपने हाथ में दबा ली. आदिल के दोनों साथी टीचर उस के पास दौड़ आए. एक ने पूछा, ‘‘क्या निकला? लव लैटर है क्या?’’
‘‘लव लैटर नहीं है, न ही नकल सामग्री है. ऐसे ही फालतू की शायरी लिखी है.’’
शाम को आदिल अपने घर बहुत खुशखुश पहुंचा. महविश गार्डन में ही मिल गई आदिल का इंतजार करते हुए.
आदिल को देखते ही महविश भांप गई कि आज कुछ खास बात हुई है.
‘‘क्या बात है, आज आप बहुत खुश नजर आ रहे हैं? प्रमोशन हो गया क्या?’’
‘‘इधर तो आइए… अभी दिखाता हूं… आप भी खुश हो जाएंगी,’’ आदिल ने बाइक खड़ी करते हुए कहा. फिर दोनों साथसाथ घर के अंदर आ गए.
आदिल ने शर्ट की जेब से लैटर निकाल कर महविश के हाथ पर रख दिया और कहा, ‘‘यह रही आप की ख्वाहिश.’’
महविश ने खत को अनफोल्ड किया. खत सुर्ख रोशनाई से लिखा हुआ था :
मेरी जान दीपाली,
फूलों सा चेहरा तेरा, कलियों सी मुसकान है.
रंग तेरा देख के, रूप तेरा देख के, कुदरत भी हैरान है.
आई लव यू. तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. मेरे नंबर पर काल करना. क्या तुम भी लव मी? तुम्हारा दीवाना.
महविश जैसेजैसे खत पढ़ती गई, वैसेवैसे उस के चेहरे पर चमक फैलती गई. ऐसी चमक आदिल ने पहले कभी नहीं देखी थी. आदिल उसे खुश देख कर बहुत खुश हुआ.
‘‘हां , यह है लव लैटर… ऐसे होते होंगे लव लैटर… लफ्ज भले ही ठीक से नहीं लिखे हैं, लेकिन जज्बात और एहसास कितने क्लियर हैं. कहां मिला आप को?’’
आदिल महविश के खिले चेहरे को अपलक देख रहा था, चौंक पड़ा और बोला, ‘‘कालेज में एक छात्र के पास.’’
अगले दिन आलिया शाम के समय अपने गार्डन में बैठी पढ रही थी. एकदम से बगल वाले घर से जोरजोर की आवाजें आने लगीं. लड़ाईझगड़े की आवाजें.
‘‘इस पर नजर रखिए अम्मी, यह नाक कटवाएगी. बदतमीज हो गई है यह.’’
‘‘अम्मी, सुहेल से कहिए, मुंह बंद कर ले अपना… चिल्लाए नहीं.’’
‘‘चिल्लाऊंगा… खूब चिल्लाऊंगा. तू बदतमीज हो गई है, बेहया हो गई है. रातदिन मोबाइल पर लगी रहती है, इधरउधर घूमती फिरती है.’’
‘‘क्यों गला फाड़ रहा है? क्या किया है मेरी बेटी ने?’’ अम्मी की आवाज सुनाई पड़ी.
‘‘अम्मी, इसी से पूछिए कि यह कल कहां गई थी?’’
‘‘बेटी, सच बता कि तू किस के साथ घूमती फिरती है. महल्ले में तु?ो ले कर दबी जबान से बातें हो रही हैं.’’
‘‘अम्मी, मेरे साथ पढ़ता है वह लड़का.’’
इसी बीच मौका पा कर सुहेल ने उस लड़की के हाथ से मोबाइल फोन छीन लिया, ‘‘यह देखिए अम्मी, उस लड़के के साथ इस के कैसेकैसे फोटो और वीडियो हैं… देखिए.’’
अम्मी ने देखा, तो उन के होश उड़ गए, ‘‘हायहाय… तौबातौबा… यह सब क्या है… तेरे अब्बू जानेंगे, तो कयामत बरपा हो जाएगी… तेरी पढ़ाईलिखाई बंद हो जाएगी.’’
तभी अब्बू आ गए, ‘‘क्या हो रहा है? कैसा हंगामा है?’’
सुहेल अब्बू के पास दौड़ गया, ‘‘अब्बू, यह देखिए… आप की परी क्या गुल खिला रही है… यह देखिए.’’
अब्बू ने देखा कि उन की लाडली कलावा, तिलक और चोटी वाले के साथ. उन के होश उड़ गए. सोचने लगे कि परवरिश में कहां कमी रह गई. वे ‘धड़ाम’ से सोफे में धंस गए.
तकरीबन एक हफ्ते बाद की बात है. शाम को महविश अपने गार्डन में पौधों को पानी दे रही थी. हर छोटेबड़े पौधे के पास जाजा कर. पानी पा कर पौधे तरोताजा नजर आने लगते. फूलों की मुसकराहट और बढ़ जाती.
पानी देतेदेते जब महविश कौर्नर वाले पौट के पास पहुंची, तो उसे घास पर कागज की एक गेंद सी दिखाई पड़ी.
महविश ने उठा कर देखा. एक पत्थर पर कागज को लपेट कर गेंद बना दिया गया था… दूर फेंकने के लिए.
महविश ने कागज को सीधा कर के देखा. कागज एक खत था. खत भी साधारण नहीं, बल्कि लव लैटर.
लिखा था :
मेरी प्यारी आलिया,
इधर एक हफ्ते से मैं बहुत परेशान हूं. रातदिन चैन नहीं पड़ता. मेरी तुम से बात नहीं हो पा रही है. मिलनाजुलना, तुम्हें देखना तो दूर की बात. उस दिन तुम्हारे भाई ने तुम्हारे घर पर बड़ा तांडव मचाया. इसी बीच तुम्हारे पिताजी भी आ गए. उन्हें मेरे और तुम्हारे बारे में सबकुछ पता चल गया… कहां तक छिपता. आज नहीं तो कल पता चल ही जाता.
उसी दिन से तुम पर पाबंदी लगा दी गई. तुम्हारा कोचिंग जाना बंद कर दिया गया. तुम्हारा मोबाइल तोड़ कर फेंक दिया गया. तुम से कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है, इसलिए मजबूर हो कर मैं चिट्ठी लिख रहा हूं.
तुम जानती हो कि मैं तुम्हें कितना प्यार करता हूं. तुम्हारे बिना जिंदा नहीं रह सकता. तुम्हारे लिए मैं अपना धर्म बदल सकता हूं. इसलाम धर्म अपना सकता हूं. प्लीज, अपने अम्मीअब्बू को सम?ाओ… मनाओ… तुम नहीं मिली, तो मैं जान दे दूंगा.
तुम्हारा आशीष.

खत पढ़ कर महविश का वजूद कांप गया. उस के मुंह से चीख निकल गई. जोरदार डरावनी चीख. ऐसे जैसे कि सामने जहरीला सांप देख लिया हो.
‘‘आलिया…’’ महविश चिल्लाई. आलिया किचन में थी. सब्जी काट रही थी. छुरी रख कर भागती हुई आई, ‘‘क्या हुआ भाभी?’’
महविश बुत बनी खड़ी थी. ‘‘क्या हुआ भाभी?’’ आलिया ने पूछा. महविश ने उस के हाथों में लैटर थमा दिया, ‘‘यह क्या है आलिया?’’
आलिया ने लैटर हाथ में लिया. पहली ही लाइन पढ़ कर वह चकरा गई, ‘‘मेरी प्यारी आलिया… भाभी यह मेरा नहीं है… मतलब किसी ने मेरे लिए नहीं लिखा है. आलिया एक दूसरी लड़की भी है, जो इस बाजू वाले घर में रहती है.’’
यह सुन कर महविश के चेहरे पर मुसकान दौड़ गई, ‘‘हां, जानती हूं, पर है तो यह लव लैटर है.’’ ‘‘हां भाभी, लव लैटर ही है,’’ आलिया पसीनेपसीने हो गई थी.
‘‘कितना जज्बाती लेटर है यह,’’ महविश की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस ने अपनी जिंदगी में यह दूसरा लव लैटर देखा था. उस ने आलिया के हाथों से लव लैटर ले कर दोबारा पढ़ना चाहा.
इसी बीच न जाने कहां से कामरान आ गया. उस ने ?ापटा मार कर वह कागज छीन लिया.
‘‘अच्छा, तो यह सब चल रहा है,’’ कामरान ने जल्दीजल्दी पूरा खत पढ़ डाला. खत पढ़ कर वह आगबबूला हो गया. गुस्से से कांपने लगा, ‘‘तुम इसीलिए यहां रह रही हो. तुम्हें शर्म नहीं आती. आजकल महल्ले में हर तरफ आलियाआलिया ही हो रहा है. आज सुबूत मेरे हाथ लगा है. पहले बोलता, तो कोई मानता ही नहीं. सब मुझे सनकी समझते है न…’’
‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है कामरान,’’ महविश ने कहा. आलिया ने भी सफाई दी, ‘‘कामरान, तुम्हें गलतफहमी हुई है. यह लड़की मैं नहीं हूं. यह लड़की दूसरी है. इस पास वाले घर में रहती है.’’
कामरान पर मानो गुस्से का भूत सवार हो गया था, ‘‘तुम यही सब करती रहती हो. गांव में भी तुम्हारे पास लव लैटर मिला था, इसीलिए अब्बा ने तुम्हें यहां शहर में भेज दिया था. तुम भैया का नाम बदनाम करना चाहती हो. भैया की कितनी इज्जत है… लोग क्या कहेंगे?’’
‘‘कामरान, ऐसा कुछ नहीं है,’’ महविश ने समझाना चाहा.
‘‘भाभी, आप नहीं जानतीं… आजकल क्या चल रहा है… हिंदू लड़के मुसलिम लड़कियों को… इस के जैसी बेवकूफ लड़कियों को भगवा ट्रैप में फंसाते हैं… भगा ले जाते हैं… एक मुहिम चला रखी है. उन लड़कों को मकान मिलता है, दुकान भी और नकद पैसा भी. वे लड़के मुसलिम लड़कियों को हिंदू धर्म में दाखिल कर लेते हैं… जहन्नुमी बना देते हैं.
‘‘दूसरी तरफ, अगर मुसलिम लड़का और हिंदू लड़की शादी करना चाहते हैं, तो नहीं कर पाते. मौब लिंचिंग हो जाती है. कचहरी हो या थाना… कहीं भी… यह सब हो रहा है भाभी… और आज अपने घर में भी…’’
‘‘अपने घर में ऐसा नहीं है. यह खत इस बाजू वाले घर की लड़की के लिए है, उस का नाम भी आलिया है.’’
तभी कामरान के हाथ में एक डंडा आ गया. उस ने आलिया पर जोरदार वार कर दिया. आलिया चीख पड़ी. वह चिल्लाती हुई भागी. कामरान ने एक और डंडा मार दिया. आलिया गिर पड़ी और बोली, ‘‘भाभी, बचाओ… समझाओ इसे.’’
‘‘कामरान, रुकोरुको… मारना मत,’’ महविश ने मौका पा कर उस के हाथों से डंडा छीन लिया, ‘‘कामरान, पागल मत बनो… बात को समझ.’’
उधर आलिया किसी तरह उठी. वह लंगड़ाती हुई भाग पड़ी. कामरान भी उस की तरफ दौड़ पड़ा. आलिया ने अपनी चाल तेज की. करीब ही किचन था. वह किचन में घुस गई. अंदर से दरवाजा बंद करने लगी. तब तक कामरान भी पहुंच चुका था. उस ने जोर से धक्का मारा. दरवाजा खुल गया.
सब्जी के पास छुरी अब भी पड़ी हुई थी. तेज धारदार छुरी. छुरी कामरान के हाथ में आ गई. उस ने आव देखा न ताव छुरी सीधे आलिया के पेट में भोंक दी. एक तेज बहुत तेज खून का फव्वारा फूटा, जो कामरान की आस्तीन के अंदर से होता हुआ, उस की भुजा पर चढ़ गया. आलिया की चीख पूरे घर में गूंज गई. साथ ही साथ महविश की भी.




