Hindi Story. इंटर में पढ़ने वाली प्रिया तो खूबसूरत थी ही, उस की 35 साल मां चंपा भी कम खूबसूरत नहीं थी. वैसे, प्रिया अपने बाप की औलादों में खुद और एक उस का 8 साल का छोटा भाई था.
प्रिया के पिता रामेश्वर के पास खेतीबारी तो कोई खास नहीं थी, पर प्राइवेट नौकरी करने की वजह से घर में किसी चीज की कमी नहीं थी.
रामेश्वर तनख्वाह के पैसे में से ही घर खर्च के लिए भी भेजा करता था और बैंक में जमा भी करता था. वह जानता था कि अगर पैसे नहीं बचाएंगे, तो प्रिया की शादी कैसे कर सकेंगे? उस की शादी में भी तो 5-7 लाख रुपए लग ही जाएंगे.
रामेश्वर के बाहर रहने की वजह से घर पर बेटे और बेटी के साथ चंपा को अकेले रहना पड़ता था. बाजार के लिए भी चंपा को ही जाना पड़ता था, जबकि उस का गांव राज्य के आला मंत्री का गांव था, इसलिए गांव में बिजली, सड़क वगैरह जैसी सुविधाएं शहरों से कम नहीं थीं.
किसी चीज की कमी तो थी नहीं, इसलिए चंपा भी हमेशा शहरी औरतों की तरह ही दिखती थी. उस के बच्चे भी गांव के अच्छे घरानों के बच्चों से कम अच्छे नहीं दिखते थे.
पति से दूर रहने की वजह से गांव के कई जिस्म के सौदागर चंपा पर गिद्ध की नजर लगाए रहते थे. बगल के ही एक नौजवान राकेश को चंपा के यहां आनेजाने से वैसे नौजवान जलतेभुनते भी रहते थे.
लोगों को लगता था कि राकेश रामेश्वर के न होने का नाजायज फायदा जरूर उठाता होगा और तभी चंपा दूसरों के जाल में नहीं फंस रही है. चंपा भी उन लोगों की नीयत को अच्छी तरह समझने लगी थी, इसलिए वह हमेशा सावधान ही रहा करती थी.
पिछले कोरोना काल में जब कंपनी बंद हो गई, तो एकाध महीने तो रामेश्वर गुजरात में जैसेतैसे रहा था, पर जैसे ही सुविधाओं की कमी होने लगी, वैसे ही वह जैसेतैसे घर आ गया था.
रामेश्वर घर तो जरूर आ गया था, पर कोरोना का शिकार हो गया था और अस्पताल ले जाने के समय में ही उस की मौत हो गई थी.
अब तो चंपा पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा था. पर करती भी तो क्या? तनाव में ही किसी तरह जिंदगी बसर करती जा रही थी. बच्चों के भविष्य की चिंता सताती जा रही थी, जिस की वजह से वह हाई ब्लडप्रैशर और दिल की बीमारी का शिकार हो गई थी, जबकि डाक्टरों ने बताया भी था कि अगर आप चिंता छोड़ दें, तो इन बीमारियों से आप को काफी राहत मिल सकती है.
इधर गांव के मनचले नौजवानों को लगने लगा था कि अब तो चंपा घर की समस्याओं से जूझती चली जाएगी. कटी हुई घास आखिर कितने दिनों तक काम आएगी, इसलिए जाल में यकीनन फंस सकती है.
तब तक प्रिया भी जवानी की दहलीज पर पहुंच चुकी थी. वह भी अपनी मां के जैसी ही थी. वैसे लोगों की नजरें कभी मां से गिरतीं, तो बेटी पर अटक जातीं और बेटी से गिरतीं, तो मां पर अटक जातीं, पर कभी दाल गल नहीं पाती थी, जिस की वजह से उन लोगों को काफी चिढ़ भी होती थी.
अगले साल जब फिर कोरोना की दूसरी लहर आई, तो चंपा उस से बच नहीं सकी, क्योंकि दोनों बच्चों को बुखार आया, तो छूटने का नाम ही नहीं ले रहा था, जिस की वजह से चंपा को बारबार कभी डाक्टर, तो कभी कैमिस्ट की दौड़ लगानी पड़ रही थी. उसे बस यही लग रहा था कि किसी तरह दोनों बच्चे ठीक हो जाएं.
वही हुआ भी. बच्चे तो ठीक हो गए, पर चंपा की तबीयत बिगड़ गई. कुछ दिनों तक तो घर पर ही दवा खाती रही, पर बुखार में सुधार नहीं हुआ. उसे देखने एक दिन गांव का मृत्युंजय नामक नौजवान आया और बोला, ‘‘आप लोगों ने नहीं कहा, गांवघर का होने के नाते हम लोगों का भी तो कुछ फर्ज होता है. आखिर गांवघर का आदमी होता है किसलिए? इन्हें ले चलिए. पटना के एक अच्छे अस्पताल में मेरी जानपहचान के कई लोग हैं.
‘‘अच्छा अस्पताल होने की वजह से वहां का चार्ज तो बहुत ज्यादा है, पर मैं चलूंगा तो काफी कम पैसे में इलाज हो जाएगा.’’
ऐसे हालात में चंपा की भी मजबूरी हो गई. भला जान किसे प्यारी नहीं होती, लिहाजा उस नौजवान के साथ चंपा चल दी, तो प्रिया भी साथ हो ली.
मृत्युंजय ने चंपा को अस्पताल में भरती करवा दिया. वह भी वहीं रहने लगा, जबकि प्रिया को कहा गया कि यहां मरीज की देखभाल अस्पताल वाले ही करते हैं, इसलिए आप को वार्ड के बाहर ही रहना पड़ेगा. हां, 24 घंटे में एक बार थोड़ी देर के लिए मिल सकती हो.
प्रिया अस्पताल के बाहर रह रही थी, पर रोज सुबह अपनी मां से मिलने जाती थी. चंपा की हालत में थोड़ा सुधार भी होता जा रहा था.
प्रिया को लगा कि 2-3 दिनों के अंदर ही अस्पताल से छुट्टी हो जाएगी, पर दूसरे दिन जब प्रिया मिलने गई तो देखा कि मां के हाथपैर रस्सी से बंधे हुए थे.
चंपा ने बताया, ‘मेरे साथ 5 लोगों ने बारीबारी से जबरदस्ती की है…’’
प्रिया ने अपनी मां के बयान का वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया. अस्पताल वाले सफाई देते रहे कि चंपा की दिमागी हालत अच्छी नहीं थी, इसलिए हाथपैर बांधे गए थे.
चंपा ने प्रिया से कहा, ‘‘बेटी, इस अस्पताल से बाहर निकालो, वरना ये भेडि़ए मुझे नोच खाएंगे. यहां तो जिस्म के सौदागर भरे पड़े हैं.’’
प्रिया ने अपनी मां को दूसरे अस्पताल में ले जाने के लिए कहा, तो अस्पताल वालों ने जो बिल बताया, जिसे सुन कर उस के पैरों तले से जमीन ही खिसक गई. उस ने मृत्युंजय को फोन लगाया.
मृत्युंजय ने कहा, ‘‘मैं घर आ गया हूं. मेरे जीजाजी की तबीयत काफी खराब है, इसलिए मैं दिल्ली जा रहा हूं…’’ और फोन काट दिया.
प्रिया को समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे. उस रात प्रिया को नींद भी नहीं आई, पर रातभर जागने की वजह से भोर में नींद आ गई थी.
सुबहसुबह अस्पताल से फोन आया कि चंपा की हालत ज्यादा बिगड़ गई थी, इसलिए उसे बचाया नहीं जा सका.
प्रिया की आंखों के आगे अंधेरा छा गया. वह किसी तरह अपनी मां के बिस्तर के पास पहुंची. जब वह जोरजोर से रोने लगी, तो अस्पताल वालों ने रोने से मना कर दिया.
वैसे तो अस्पताल में मरे मरीज को उस के परिवार वाले के सुपुर्द कर दिया जाता था, पर चंपा की लाश को पहले से ही बाहर खड़ी एंबुलैंस में डाला गया. उस में प्रिया को बैठाया गया. पीछेपीछे पुलिस की गाड़ी थी.
लाश को श्मशान घाट पहुंचाया गया और झटपट दाह संस्कार करवा दिया गया, ताकि प्रिया के पास कोई सुबूत न बचने पाए. Hindi Story
लेखक : अलखदेव प्रसाद ‘अचल’




