Social Story. गांव के लोग नए कलक्टर से गांव के बांध का उद्घाटन कराना चाहते थे, पर कलक्टर ने उन्हें कोई भाव नहीं दिया. इस से गांव वाले हैरान थे. पर जब उन्हें नए कलक्टर के बारे में पता चला, तो उन की आंखें फटी की फटी रह गईं. क्या था कलक्टर की जिंदगी का राज?

कुरुक्षेत्र शहर से तकरीबन 20 किलोमीटर दूर पिहोवा रोड पर गांव मुर्तजापुर गांव में बहुत बड़ा बांध बनाया गया. वहां बहती नदी पर खूबसूरत और चौड़ा पुल बनाया गया जिस से कि गांव के अंदर से आने और बाहर से निकलने वाले ट्रैफिक की वजह से ज्यादा परेशानी न हो.

अब बाहर से जाने वाला ट्रैफिक पुल से निकल जाएगा और गांव में गाडि़यों की भीड़ भी जमा नहीं होगी. साथ ही, बांध बनाने से किसानों को बारिश में फसल खराब होने का खतरा भी नहीं और सूखा पड़ने पर पानी का भी इंतजाम हो गया.

गांव वाले आज खुशी से फूले नहीं समा रहे. गांव की तो मानो काया ही पलट गई. सब आपस में बातें कर रहे थे कि नए कलक्टर ने तो गांव की सूरत ही बदल डाली. पंचायत ने गुजारिश की कि इस पुल और बांध का उद्घाटन भी कलक्टर के हाथों कराया जाए.

आखिर वह दिन भी आ गया. कलक्टर साहब आए और सीधे रैस्टहाउस में चले गए. सभी गांव वाले उन का धन्यवाद करना चाहते थे लेकिन कलक्टर साहब ने किसी से मिलना तो दूर अपनी शक्ल तक न दिखाई.

आखिर 2 दिन बाद उद्घाटन की पूरी तैयारी हो गई. कलक्टर साहब को न्योता भेजा गया कि उद्घाटन उन्हीं के शुभ हाथों से होगा. सरपंच खुद कलक्टर साहब से मिलने गए, तो बाहर ही उन का पीए मिल गया, ‘‘भाई, ये आप के सरजी का पूरा नाम क्या है, क्योंकि बाहर तो केवल एससी लिखा है? आप पूरा नाम बता दो ताकि इस निमंत्रण पर उन का पूरा नाम लिख दें.’’

‘‘सरपंचजी, पूरा नाम तो मैं भी नहीं जानता, मुझे भी केवल एससी ही पता है. आप एससी ही लिख दीजिए और यह निमंत्रण पत्र मुझे दे दीजिए, मैं उन्हें दे दूंगा. कलक्टर साहब आराम कर रहे हैं. इस समय उन से कोई नहीं मिल सकता.’’ ‘‘अगर कलक्टर साहब अभी आराम फरमा रहे हैं, तो हम बाद में आ जाएंगे. हम चाहते हैं कि हम गांव के कुछ लोग खुद उन्हें न्योता दें.’’ ‘‘देखिए सरपंचजी, कलक्टर साहब आज बहुत बिजी रहेंगे, इसलिए आज मिलना मुमकिन न होगा. आप फिक्र मत कीजिए, मैं आप लोगों का संदेश उन्हें दे दूंगा. वैसे भी कल आप सब ही मिल लीजिएगा उन्हें,’’ कहते हुए पीए ने टाल दिया.

अगले दिन उद्घाटन वाली जगह पर पूरा गांव खुशी से झूमता हुआ जमा था. कलक्टर साहब काली पैंट, सफेद दूधिया सी शर्ट पर डार्क रौयल ब्लू रंग का कोट पहने, सिर पर घुंघराले मैगी जैसे बाल, आंखों पर धूप का काला चश्मा, चेहरे पर मास्क लगाया हुआ, रोबीली चाल से चलते हुए आए और गांव के कुछ खास लोग उन्हें फूलमाला पहनाने लगे, लेकिन कलक्टर साहब ने हाथ के इशारे से उन्हें रोक दिया.

रिबन काट कर उद्घाटन किया गया. उस के बाद सरपंच ने कलक्टर साहब को फूलमाला पहनाने की कोशिश की, कलक्टर साहब ने हाथ रोक दिया और नत्थूलाल को स्टेज पर बुला कर कहा कि यह सम्मान उन्हें दिया जाए. ‘‘कलक्टर साहब, यह सम्मान आप के लिए है. आप ने नत्थूलाल भाई को क्यों बुलाया? मैं इस का कुछ मतलब नहीं समझा ?’’ सरपंच ने हैरानी से पूछा. नत्थूलाल चुपचाप खड़ा यह सब देख रहा था.

तब कलक्टर साहब ने अपने चेहरे से चश्मा तथा मास्क हटाया और पूरे गांव वालों के सामने जोर की आवाज में बोले, ‘‘गांव वालो, जरा गौर से देखो मुझे. क्या आप में से कोई जानता है मुझे? कोई पहचानता है मुझे? क्योंकि मैं इसी गांव की पैदाइश हूं. इस सम्मान पर मेरा हक नहीं (नत्थूलाल की तरफ इशारा कर के), बल्कि इन का हक है, इसलिए यह सम्मान इन्हें दिया जाए.’’

सभी हैरान हो कर यह सब सुन और देख रहे थे, लेकिन किसी की समझा में कुछ नहीं आ रहा था. हां, तभी बचनी दौड़ीदौड़ी स्टेज की तरफ आई और कलक्टर साहब को गले से लगा लिया. उस की आंखें आंसुओं का साथ ही नहीं छोड़ रही थीं. सरपंच हैरान से खड़े यह सब देख रहे थे. कुछ न सम?ा पाने पर वे बोले, ‘‘कलक्टर साहब….आप इस गांव की पैदाइश हैं… कौन? हैं आप और बचनी भाभी और नत्थूलाल को कैसे जानते हैं आप?’’

फिर नत्थूलाल और बचनी की तरफ मुखातिब होते हुए सरपंच बोले, ‘‘क्या आप पहचानते हैं कलक्टर साहब को?’’ लेकिन वे दोनों चुप रहे. कलक्टर साहब ने बोलना शुरू किया, ‘‘काकी, दाई अम्मां, रानी चाची, बिमला मौसी…’’ इस तरह कई नाम लिए. सब अपनाअपना नाम सुन कर हैरानी से देखने लगे कि कौन हैं ये.

‘‘क्या अभी भी आप लोगों ने नहीं पहचाना मुझे? दाई अम्मां, आप तो नहीं भूल सकती मुझे. याद करो वह दिन जब मेरा जन्म हुआ था.मुझे देखते ही मेरी नाल तक नहीं काटी थी आप ने. ‘मेरी मां खून से लथपथ पड़ी थीं और मैं नाल से मां के साथ बंधी वहीं गंदगी में पड़ी रो रही थी. मुझे साफ कर के गोद में लेना तो दूर रहा, बल्कि हाथों में से ऐसे पटका जैसे हाथों पर बिच्छू हो, जिस ने काट खाया हो.

‘‘हां… मैं वही हूं, वही तीसरा. आप तो जानते हो न तीसरा कौन? मैं वही तीसरा एससी मतलब सुशीला चौधरी. नत्थूलाल के बेटे मन्नु की औलाद, जिसे आप लोगों ने तीसरा कह कर कहीं फेंक आने के लिए मेरे दादादादी को कहा था, पर जब वे नहीं माने तो गांव वालों ने क्याक्या नहीं उन्हें कहा, कैसीकैसी धमकियां उन्हें दी गईं.

‘‘क्या कुछ नहीं मेरे मातापिता और दादादादी को सहन करना पड़ा मेरी वजह से, लेकिन इन्होंने हार नहीं मानी. न केवलमुझे दूसरे भाईबहनों की तरह पाला बल्कि उन से ज्यादा प्यार दिया और मेरे भाईबहनों ने कभी मुझे अहसास नहीं होने दिया कि मैं उन के जैसी या जैसा नहीं, बल्कि तीसरा जैंडर हूं. उन्होंने हमेशा मुझे अपने जैसा ही समझा. हमेशा मुझे बड़ी बहन का ओहदा दिया.

‘‘आज मैं जोकुछ भी हूं, इस परिवार की वजह से हूं वरना न जाने मेरा भविष्य क्या होता. अब तक मन्नु और मुनिया और उन के चारों बच्चे भी स्टेज तक आ चुके थे. बचनी ने जोर दे कर कहा, ‘‘तू कोई तीसरावीसरा नहीं है, तू मेरी बच्ची है मेरी. मेरी सब से बड़ी और सब से लाड़ली पोती है तू.’’ आंखों में आंसू लिए बचनी ने नत्थूलाल से पूछा, ‘‘आप ने मुझे बताया क्यों नहीं?’’

‘‘लेकिन फिर भी तुम ने बिना बताए जान लिया… वह कैसे?’’ ‘‘मां का दिल है न. 2 दिन से बहुत बेचैनी हो रही थी. आप से कहा भी कि मेरी बात करा दो लेकिन आप टालते रहे और मैं अंदर ही अंदर परेशान होती रही.’’

‘‘मैं समझ रहा था तेरी परेशानी, मगर मैं तुम सब के चेहरों पर यह रौनक देखना चाहता था, इसलिए मैं ने किसी को कुछ नहीं बताया. मैं ने ही सुशीला से गांव की परेशानियों का जिक्र किया था.और सुशीला ने गांव की परेशानियों का हल निकाल कर खुद भी यहां हमारे साथ रहने के लिए अपनी पोस्टिंग कुछ समय के लिए यहां करा ली.’’

सब गांव वालों को अपनी वे बातें याद आने लगीं कि कैसे उन्होंने इस बच्ची को दुत्कारा था, किस तरह से उस के मातापिता और दादादादी को इसे गांव से निकालने के लिए कहा करते थे. दाई को भी याद आ गया वह दिन जब इस बच्ची का जन्म हुआ था.

दरअसल, यह बात है आज से 26-27 साल पहले की, जब कुरुक्षेत्र से तकरीबन 20 किलोमीटर पिहोवा रोड पर मुर्तजापुर गांव के एक किसान परिवार नत्थूलाल के बेटे मन्नु की शादी गांव के ही आसाराम की बेटी मुनिया से हुई. शादी के तकरीबन एक महीने बाद ही मुनिया के पांव भारी हो गए. घर में सब परिवार, जो कि लेदे कर मातापिता, मन्नु, मुनिया और मन्नु की छोटी बहन गुडि़या, बहुत ही खुश थे? घर में नया मेहमान जो आने वाला था.

मुनिया की खूब सेवा होती, खूब लाड़ लड़ाए जाते, खूब खयाल रखा जाता. सभी बेसब्री से आने वाले मेहमान का इंतजार कर रहे थे, लेकिन एक दिन जब मुनिया को दर्द शुरू हो गया तो मुनिया की सास बचनी देवी ने झट से मुनिया को गरम दूध में कैस्ट्रौल डाल कर पिलाया और उसे ऊपर छत पर 4-5 चक्कर काटने को कहा. 2-4 घंटे के भीतर ही दर्द बढ़ गया और मुनिया को एक छोटे से अलग कमरे में लिटा दिया गया और सास दौड़ कर दाई को बुला लाई.

शाम को अंधियारा छाने लगा था कि बच्चे के रोने की आवाज आई. कमरे के बाहर खड़े सब लोग खुशी से उछल पड़े. सब एकदूसरे को बधाई देते हुए गले लगाने लगे. अब उत्सुकता यह थी कि हुआ क्या है बेटा या बेटी? सब लोग टकटकी लगा कर दरवाजे की ओर देख रहे थे कि इतने में मुंह लटकाए हुए दाई बाहर आई.

नत्थूलाल ने पूछा, ‘‘अरे भाभी, लाओ… बच्चा सब से पहले मेरी गोद में देना.’’ बचनी बोली, ‘‘न जी न, पहला हक तो दादी का है,’’ कहते हुए जैसे ही वह दाई से बच्चा लेने को पलटी, लेकिन दाई के खाली हाथ देख कर एक पल के लिए सहम गई, ‘‘भाभी, बच्चा कहां है? बच्चा लाओ और अपना नेग लो.’’

दाई को खामोश देख कर नत्थूलाल भी बोला, ‘‘हांहां भाभी, आज तो मुंहमांगा नेग मिलेगा, लेकिन लाओ पहले हमारे कुलदीपक के दर्शन तो कराओ.’’ ‘‘काहे का कुलदीपक… मैं तो उसे अंदर ही पटक आई,’’ कहते हुए दाई ने मुंह बना लिया.

दाई की बात सुन कर नत्थूलाल को गुस्सा आ गया और वह बोला, ‘‘अंदर पटक आई का क्या मतलब हुआ भाभी, लड़का हो या लड़की हमारे लिए तो कुलदीपक ही है. आज के समय में लड़के और लड़की में कोई फर्क नहीं. जैसे लड़का कुल का दीपक है तो लड़की भी तो कुल की ज्योति है न, तो हुए न दोनों कुलदीपक.

‘‘हमारी बहू का पहला बच्चा, जो भी है हमारा खून है. लाओ, हमारी गुडि़या या हमारा गुड्डू जो भी है ला कर हमारी झोली में दे दो और हमारे कलेजे को ठंडक पहुंचाओ.’’ ‘‘काहे का लड़का और काहे की लड़की भाई, वह तो तीसरा है तीसरा. मैं तो चली. बचनी, तू ही संभाल अपनी बहू को और बच्चे को फेंक आ कहीं जा के,’’ कहते हुए दाई घर से बाहर जाने के लिए कदम उठाने लगी.

‘‘तीसरा… बच्चे को फेंक आई… भाभी, क्या कह रही हो तुम, हमें कुछ समझा नहीं आ रहा,’’ नत्थूलाल बोला. ‘‘अरे भाई, तीसरा नहीं समझाते हो? वही…..जिस को सब नीची नजर से देखते हैं.’’

बचनी दौड़ती हुई अंदर गई. देखा तो मुनिया खून से लथपथ बेहोश पड़ी थी. बच्चा जारजार रोए जा रहा था, क्योंकि बच्चे के पैदा होते ही दाई उसे मुनिया की टांगों के बीच में लिटा कर सफाई किए बिना और बच्चे की नाल काटे बिना ही जाने की जो ठान ली थी.

बचनी ने अंदर का हाल देखा तो दौड़ी आई और दाई का हाथ पकड़ कर बोली, ‘‘भाभी, इस में बहू और बच्चे का क्या दोष? आप चल कर नाल काट कर बहू और बच्चे को संभालो. ऐसा न हो कोई अधर्म हो जाए हमारे हाथों से…’’ कहते हुए बचनी दाई के हाथपैर जोड़ने लगी.

अब तक नत्थूलाल भी समझ चुका था कि क्या हुआ है. उस ने झट से जेब से बिना देखे, बिना गिने मुठ्ठी भर कर रुपए निकाले और दाईं को देते हुए बोले, ‘‘भाभी, मेरी बहू और बच्चे को कुछ न होने देना.’’

नोटों से भरी मुठ्ठी देख दाई के मुंह में पानी आ गया. वह बोली, ‘‘भाई, बहू से तो मेरी को दुश्मनी न है, पर यह बच्चा कहीं भी जा के फेंक आ, नहीं तो यह गांव तुझे जीने नहीं देगा,’’ कहते हुए कमरे में जा कर बच्चे की नाल काट कर मुनिया के बदन की सफाई कर के ठीकठाक किया. लेकिन बच्चे को फिर हाथ तक न लगाया. उसे बचनी ने खुद से साफ कर के कपड़े में लपेटा.

जब दाई जाने लगी तो नत्थूलाल ने एक मुट्ठी नोटों की और थमा दी और बोला, ‘‘भाभी, किसी से कोई जिक्र न करना, आप को हमारी लाज का वास्ता. अभी हम सोचते हैं कुछ कि बच्चे का क्या करना है.’’

इतनी बात बचनी के कानों में पड़ी तो वह कमरे से बाहर आ गई. उस की गोद में बच्चा था. वह बोली, ‘‘क्यों जी, क्यों न जिक्र करें? जो भी कुदरत ने दिया इसे अस्वीकार कर दें क्या? यह भी इनसान ही है. हमारी बहू ने इनसान का बच्चा जना है, जानवर का नहीं, जो हम छिपाते फिरें,’’ कहते हुए उस ने बच्चे को सीने से लगा लिया.

नत्थूलाल भी सोचने पर मजबूर हो गया, ‘‘बचनी, कह तो तुम सही रही हो. इस में बहू और बच्चे का क्या कुसूर है,’’ और दाईं से बोला, ‘‘भाभी, मु?ो किसी की कोई चिंता नहीं. गांव वाले जब जो कहेंगे तब हम देख लेंगे.’’

अब तक मन्नु शांत खड़ा अचरज से यह सब देखसुन रहा था. मां ने उस की ?ाली में बच्चे को डालते हुए कहा, ‘‘मन्नु, इस तरह चुप क्यों है? देख अगर तू ही इसे नहीं स्वीकारेगा, तो दुनिया तो तेरे से पहले ही इसे दुत्कारेगी, इसलिए हम से पहले तु?ो इस सच को स्वीकारना होगा. ले… ले अपने बच्चे को गोद में ले कर प्यार कर.’’

मां की बात सुन कर मन्नु में भी जोश भर गया. उस ने बच्चे को गोद में ले कर प्यार किया और सीने से लगा लिया. पैसे के लालच में दाई ने अपना सारा काम तो कर दिया, मगर कहीं न कहीं उस के दिल में डर था कि इस बच्चे का ये क्या करेंगे? क्या इसे अपनाएंगे या कहीं किसी को दे आएंगे या यों ही फेंक देंगे?

खैर, दाई अपना कम निबटा कर, अपनी मेहनत से भी ज्यादा पैसे ले कर खुशी से अपने घर चली गई. अब उसे नत्थूलाल ने कहा था कि किसी से कुछ न कहे, मगर एक दिन दाई के मुंह से बात निकली और एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे के कान तक जा पहुंची.

पूरे गांव को खबर हो गई कि नत्थूलाल के बेटे मन्नु की बीवी मुनिया ने तीसरे को जन्म दिया. आसपड़ोस की औरतें पहुंच गई नत्थूलाल के घर इस बात को पुख्ता करने. उन में से एक काकी आते ही लगीं आवाज लगाने, ‘‘बचनी, अरी ओ बचनी.’’ ‘‘आओ काकी, आओ. बड़े दिनों बाद आई हो. आओ बैठो. मैं जरा बच्चे को उस की मां को पकड़ा कर आती हूं,’’ बचनी जानती थी कि इन सब को पता चल चुका है कि मुनिया का बच्चा हो गया है, तो फिर छिपाए क्यों?

‘‘न बचनी न, बैठने का समय कहां है री. पहले तो यह बता… मैं क्या सुन के आई हूं… तेरी कुलछनी बहू ने क्या जन दिया…’’ ‘‘काकी, बुरा मत मानो. मेरी सुलछनी बहू के बारे में कुछ मत कहो और रही बच्चे की बात तो जो कुदरत ने दिया वह सिरमाथे पर. अब भला इस में बहू या बच्चे का क्या दोष?’’

बचनी की बात सुन कर काकी और दूसरी औरतें चुप हो गईं, लेकिन जातेजाते काकी एक बात बचनी के कानों में डाल गईं, ‘‘देख बचनी, यह तो सही है कि जो दिया कुदरत ने दिया इस में बहू का क्या दोष, लेकिन कुदरत के किए को हम संभाल तो सकते हैं न, इस बच्चे को कहीं छोड़ आओ या इन्हीं की बिरादरी में दे दो वरना ऐसा न हो कल को गांव में तुम लोगों का हुक्कापानी ही बंद हो जाए.’’

काकी की इस तरह की सीधीसीधी धमकी से एक पल के लिए तो बचनी के प्राण कंठ में आ गए, लेकिन दूसरे ही पल हिम्मत कर के वह बोली, ‘‘काकी, कल किस ने देखा है, जो होगा देखा जाएगा.’’ इसके बाद जैसे ही नत्थूलाल और मन्नु अपने काम से घर आए तो बचनी ने सारी बात कह सुनाई.

नत्थूलाल बोला, ‘‘बचनी, तू चिंता मत कर. देखना इस बच्चे को मैं क्या से क्या बनाऊंगा. गांव वाले जो कहते हैं, करते हैं उन्हें उन का काम करने दो और हमें हमारा.’’

वह बच्चा उस परिवार में पलने लगा. उस का नाम सुशीला रखा गया. सुशीला के बाद उस के 2 भाई और 2 बहनें और हुईं. सब को पढ़ायालिखाया गया. पहले तो सुशीला को स्कूल में एडमिशन देने से मना किया गया, लेकिन नत्थूलाल और मन्नु ने भागदौड़ कर के सरकारी कागज बनवाए, जिस में साफसाफ परमिशन दी गई थी कि तीसरे जैंडर के बच्चे भी आम बच्चों के साथ पढ़ सकते हैं.

सुशीला भी अब आम बच्चों के साथ पढ़ रही थी. 10वीं के बाद जिस तरह से बाकी बच्चों को बड़े स्कूल और फिर कालेज भेजा गया, तब सुशीला को उन से अलग कर दिया गया. उसे कहां और क्यों भेजा गया, यह नत्थूलाल के सिवा कोई नहीं जानता था. आज वही बच्ची एक कलक्टर बन कर जिस गांव में जिल्लत सही, उसी गांव की भलाई के लिए दिनरात कोशिश कर रही है.

यह सब सुन कर गांव वाले जो शर्म से आंखें नीची किए खड़े थे, एकजुट हो गए. एक बुजुर्ग बोले, ‘‘सुशीला बेटी, हमें माफ कर दो. हम ने खुद को बड़ा बना कर कुदरत की रचना में भी नुक्स निकालना चाहा. अनजाने में हम से बहुत बड़ी गलती हो गई.

‘‘अब तुम थोड़े समय के लिए नहीं, बल्कि हमेशा के लिए यहीं रहोगी. इसी गांव में और हमें अपने किए का पछतावा करने का मौका दोगी.’’

हिजड़ा कहो या किन्नर या फिर तीसरा जैंडर, देखने में बिलकुल साधारण इनसान जैसे होते हैं. वे भी एक आम इनसान की तरह जीना चाहते हैं, मगर समाज उन्हें बारबार तीसरा जैंडर या अलग तरह के होने का एहसास दिलाता है, उन्हें अपने से अलगथलग रख कर भेदभाव करता है. पर कुदरत के दिए गए तोहफे से भेदभाव कैसा?

लेखक : प्रेम बजाज

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...