Politics. उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने डाक्टर भीमराव अंबेडकर की विरासत को सम्मानित करने और दलित मतदाताओं के बीच पैठ मजबूत करने के लिए ‘डाक्टर अंबेडकर मूर्ति विकास योजना’ बनाई है. इस योजना के तहत उत्तर प्रदेश की हर विधानसभा में अंबेडकर की प्रतिमाओं का सौंदर्यीकरण करना, मूर्तियों के ऊपर छत्र और बाउंड्री वाल बनवाना शामिल है.

सरकार ने इस के लिए 403 करोड़ रुपए का बजट पास किया है. इस से उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों के हर क्षेत्र में 10-10 स्मारकों का विकास किया जाएगा.

इस योजना में अंबेडकर के साथ ही साथ दलितों के साथ जुड़े संत रविदास, कबीर, ज्योतिबा फुले और महर्षि वाल्मीकि जैसे महापुरुषों के स्मारकों के विकास को भी शामिल किया गया है.

उत्तर प्रदेश सरकार के इस कदम को 2027 के विधानसभा चुनाव से जोड़ कर देखा जा रहा है. पार्टी इस के जरीए दलित वोटर को जोड़ना चाह रही है. हर विधानसभा को करीबकरीब एक करोड़ रुपए इस काम के लिए मिलेंगे.

उत्तर प्रदेश की सरकार ने तय किया है कि प्रदेशभर में जहां कहीं भी  अंबेडकर की प्रतिमा होगी, वहां पर प्रतिमा के ऊपर छत्र लगाने का काम कराया जाएगा. जहां पर अंबेडकर की प्रतिमा स्थापित होगी वहां पर जो पार्क होगा. उस की बाउंड्री वाल का निर्माण और उस के सुंदरीकरण का काम भी सरकार अपने पास ले रही है.

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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के ऐशबाग में 50 करोड़ रुपए की लागत से ‘भारत रत्न’ भीमराव अंबेडकर मैमोरियल एंड कल्चरल सैंटर का निर्माण होगा. पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 28 जून को इस की आधारशिला रखेंगे. इस में अंबेडकर की 45 फुट ऊंची प्रतिमा लगेगी और अंबेडकर की पुण्यतिथि 6 दिसंबर पर इस का उद्घाटन करवाए जाने की तैयारी है.

‘भारत रत्न’ अंबेडकर के नाम पर बनने वाले मैमोरियल सैंटर में अंबेडकर की प्रतिमा के साथ ही डिजिटल लाइब्रेरी, म्यूजियम और शानदार एडिटोरियम भी बनाया जाएगा. स्मारक में पूरे साल कल्चरल प्रोग्राम का आयोजन किया जाएगा. छात्रों के लिए सैमिनार के आयोजन किए जाएंगे. यहां छात्रों को अंबेडकर पर शोध करने के लिए जरूरी चीज मुहैया करवाएगी.

यहां बनने वाली लाइब्रेरी को काफी बड़ी होगी. उस में अंबेडकर से जुड़ी किताबों का संग्रह होगा.

मूर्तियां होंगी दलित वोट का सहारा

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की नजर से दलित वोट काफी खास माने जा रहे हैं. साल 2024 के लोकसभा चुनाव में यही दलित वोट भाजपा से खिसक गया था, जिस की वजह से उत्तर प्रदेश में पार्टी को 33 सीटों का नुकसान हुआ था. ऐसे में अब भाजपा दलित वोटरों को काफी अहम मान रही है.

साल 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दलित वोट पर हर पार्टी की नजर है. उत्तर प्रदेश में तकरीबन 22 फीसदी दलित वोट हैं. यहां विधानसभा की आरक्षित 86 सीट में 84 दलितों के लिए हैं.

उत्तर प्रदेश की लगभग 150 विधानसभा सीटों पर दलित वोट ही हारजीत तय करते हैं. उत्तर प्रदेश में 4 बार मुख्यमंत्री रही मायावती दलितों की सब से बड़ी नेता मानी जाती रही हैं. 1995, 1997, 2003 और 2007 वे उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थीं. साल 2007 बसपा की बहुमत से सरकार बनी थी.

इस के बाद धीरधीरे मायावती की ताकत कम होती गई. बसपा को लगातार 2012, 2017 और 2022 में हार का सामना करना पड़ा है. विधानसभा में बसपा से सिर्फ एक विधायक है. वहीं लोकसभा में एक भी सांसद बसपा का नहीं है. बसपा को अभी भी 9 फीसदी वोट मिलते हैं.

क्यों नहीं लग पाई पेरियार की मूर्ति

मायावती जब उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने प्रदेश के अलगअलग हिस्सों में अंबेडकर की प्रतिमाएं लगवाई थीं. अंबेडकर की पत्नी रमा बाई के नाम पर लखनऊ में एक बड़ा स्मारक भी बनवाया गया था.

मायावती ने तब लखनऊ में अपनी मूर्तियां भी लगवाई थीं, जिस को ले कर खुद भाजपा ने ही सवाल खड़े किए थे. मायावती लखनऊ में जिन दलित महापुरुषों की मूर्तियां लगवाना चाहती थी उन में एक नाम पेरियार ईवी रामास्वामी नायकर का भी था. भाजपा को ब्राह्मण विरोधी पेरियार के नाम से नफरत थी.

भाजपा और अन्य दक्षिणपंथी संगठनों ने पेरियार की मूर्ति का कड़ा विरोध किया था. उन का मानना था कि पेरियार राम विरोधी थे, जबकि असल में वे ब्राह्मण विरोधी थे. उन के विचार हिंदू देवीदेवताओं के खिलाफ थे.

मायावती के तीसरे कार्यकाल 2002-2003 के दौरान जब मूर्ति लगाने का प्रस्ताव था. तब बसपा भाजपा के सहयोग से सरकार चला रही थी. भाजपा ने मूर्ति स्थापना का विरोध करते हुए सरकार से हटने की धमकी दी थी, जिस के कारण मायावती को यह योजना स्थगित करनी पड़ी थी.

उस समय मूर्ति न लगने का कारण यह बताया गया था कि पेरियार दक्षिण भारत के समाज सुधारक थे, इसलिए उन की मूर्ति उत्तर प्रदेश में नहीं लगनी चाहिए. मूर्ति न लगने देने का कारण पेरियार के ईश्वर विरोधी और तर्कवादी विचारों को धार्मिक भावनाओं खिलाफ माना गया था.

मायावती भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनी थीं तो उन्होंने भाजपा के दबाव को माना और पेरियार की मूर्ति लगाने की योजना को टाल दिया.

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पेरियार की नीतियों का मतलब था मंदिरों की दुकानदारी खत्म होना और पंडों को किए जाने वाले दान की बचत होना. दोनों बातें जनता के लिए लाभदायक हैं, पर धर्म का प्रचार इतना जबरदस्त है कि मायावती भी कुछ न कर पाईं और कांशीराम की नीतियां भी राजनीति का शिकार हो गईं.

क्या अंबेडकर की मूर्ति से होगा लाभ

भारतीय जनता पार्टी लगातार दलित और पिछड़ी जातियों से जुड़े महापुरुषों को अपने साथ जोड़ने की योजना पर काम कर रही है. अंबेडकर के अलावा सरदार वल्लभ भाई पटेल की सब से ऊंची मूर्ति गुजरात में लगाई. उन के जन्मदिन को ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ घोषित किया. बिहार के बड़े ओबीसी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को साल 2024 में ‘भारत रत्न’ दिया.

इस का लाभ भाजपा को साल 2025 के विधानसभा चुनाव में मिला. ?ारखंड के बिरसा मुंडा के जन्मदिवस को ‘जनजाति गौरव दिवस’ घोषित किया.

इसी तरह से संत रविदास का भी महिमामंडन किया. साल 2023 में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव को भारत का दूसरा सब से बड़ा सम्मान ‘पद्म विभूषण’ दिया. निषादराज गुहा और सुहेलदेव राजभर जैसे बड़े महापुरुषों का भी भाजपा ने महिमामंडन किया.

भाजपा दूसरे विचारों के महापुरुषों का सम्मान दे कर अपनी अलग पैठ बनाने का काम कर रही है. यह बात और है कि जमीनी लैवल पर वह जातीय भेदभाव को खत्म नहीं कर पा रही है.

दूसरी ओर नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के आंकड़ों से पता चलता है कि भाजपा शासन के दौरान दलित उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ी हैं. एनसीआरबी की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 की तुलना में 2022 में अनुसूचित जातियों के विरुद्ध अपराधों में 13.1 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई.

सब से अधिक मामले भाजपा शासित उत्तर प्रदेश में 15,368, राजस्थान में 8,752, मध्य प्रदेश में 7,733 और बिहार में 6,509 दर्ज किए गए थे. देश की कुल दलित उत्पीड़न की 76 फीसदी घटनाएं 5 भाजपा शासित राज्यों में हुईं.

औरतों के साथ अन्याय भी लगातार बढ़ रहा है. पढ़ीलिखी औरतों को नौकरियां नहीं मिल पा रही हैं और घरों में उन के साथ होने वाला भेदभाव एक नई शक्ल में सामने आ रहा है.

अंबेडकर के संविधान को कितना मानती है भाजपा

सब से बड़ा सवाल यह है कि भारतीय जनता पार्टी अंबेडकर की मूर्तियां तो लगवा रही है पर उन के बनाए संविधान का कितना पालन करती है? भाजपा पर चुनाव में धांधली, संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग, घरों को बुलडोजर से गिराने और फर्जी एनकांउटर के तमाम आरोप हैं. इस को ले कर कोर्ट तक ने टिप्पणियां की हैं.

इलाहाबाद हाईकोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि कानून के शासन में ‘बुलडोजर न्याय’ की कोई जगह नहीं है. कोर्ट ने कहा कि ‘सरकार या प्रशासन बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए किसी का घर नहीं तोड़ सकते हैं. केवल एफआईआर में नाम आने से कानूनी अधिकार नहीं हासिल हो जाता. सजा देने का अधिकार केवल कोर्ट को है सरकार या प्रशासन को नहीं.’

इसी मसले पर कोर्ट ने कहा कि नोटिस और सुनवाई जरूरी है. प्रभावित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का समय देना चाहिए. तुरंत बदले की कार्रवाई गलत है. अगर अवैध निर्माण के आधार पर यह हो रहा हो तो सब के साथ होना चाहिए. किसी एक का चुनाव करना कानून सम्मत नहीं है. घर तोड़ना केवल संपत्ति का नुकसान नहीं है, यह संविधान की धारा 21, जीवन और गरिमा से जुड़ा मामला होता है.

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में जावेद मोहम्मद का घर अवैध कह कर गिरा दिया गया. जावेद 2022 के सरकार विरोधी प्रदर्शन का हिस्सा थे. 2022 का ही दूसरा मामला दिल्ली का था. वह भी 2022 के प्रदर्शन के कारण किया गया था.

लोकसभा में संविधान पर चर्चा के दौरान भाजपा ने और गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि ‘अभी एक फैशन हो गया है… अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर… इतना नाम अगर भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता.’ यह अमित शाह द्वारा संविधान निर्माता अंबेडकर का अपमान माना गया था. अब भाजपा उन्हीं अंबेडकर के सम्मान में उतर आई है. भाजपा सरकार के मंत्री रहे ब्राह्मण वर्ग से आने वाले पत्रकार से नेता बने अरुण शौरी ने अपनी किताब ‘वर्शिपिंग फाल्स गौड्स’ में अंबेडकर की आलोचना की थी.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अंबेडकर के विचारों में काफी मतभेद रहे हैं. अब भाजपा इन को ‘जोड़ने’ करने की कोशिश कर रही है. अंबेडकर समानता यानी इक्वैलिटी पर जोर देते थे. दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समरसता की बात करता है. इन दोनो के विचारो में अंतर है.

इक्वैलिटी यानी समानता और समरसता यानी हार्मोनी के बीच जो अंतर है, वही अंतर अंबेडकर और संघ के बीच भी है. संघ वर्चस्व के उद्देश्य के लिए सद्भाव की अवधारणा का उपयोग करता है, जबकि अंबेडकर समानता की अवधारणा का उपयोग आजादी के लिए करते थे.

अंबेडकर की अवधारणा में समानता में जीवन को सम्मान के साथ समान अधिकारों की वकालत की गई है. अंबेडकर का समता का लक्ष्य और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की समरसता को एकसमान नहीं माना जा सकता है. समरसता का मतलब है एक होना और समता का मतलब है एकसमान होना है. समरसता कायम करने के लिए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समानता पहली शर्त है.

भाजपा इस का कहीं पालन करते नहीं दिखती है. अंबेडकर का अंतिम लक्ष्य धर्मांतरण नहीं, जाति उन्मूलन था. उन्होंने 1935 में हिंदू धर्म छोड़ने की घोषणा की और 1956 में बौद्ध धर्म अपना लिया था.

अब भाजपा अंबेडकर की मूर्तियों पर छत्र लगा कर उन को छत्रपति बनाना चाहती है. हिंदू धर्म में छत्र का अपना महत्त्व है. इस को ब्राह्मण, राजा और शंकराचार्य ही धारण करते हैं. छत्र के सहारे बाबा साहब को धार्मिक चोले में रखने की तैयारी  की जा रही है.

दलित समाज के नौजवानों को नौकरी और कारोबार करना है, ऐेसे में केवल बड़े महापुरुषों का महिमामंडन करने से वह वोट नहीं देने वाला है. उसे समानता चाहिए जहां उस के साथ जाति का भेदभाव और उत्पीड़न न हो सके. केवल अंबेडकर की मूर्तियां लगाने से वह वोट नहीं देने जा रहा है. Politics

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