Hindi Story: विजय शंकर श्रीवास्तव उर्फ लाला भाई को अपने गांव का सरपंच बनने की सनक थी, पर उन्हें वोट नहीं मिलते थे. इस चक्कर में उन्होंने गांव की हर जाति को साधना चाहा, पर क्या वे कामयाब रहे? टना में बोरिंग रोड पर बने अपने दफ्तर से दोपहर बाद की छुट्टी ले कर जब मैं सड़क पर आटोरिकशा का इंतजार कर रहा था तो वहां अचानक एक बेहद दुबलापतला, गंजा, ठिगना आदमी भगवा कपड़ों में भूरे रंग के देशी कुत्ते के साथ घूमता मिला.

उस ने कुत्ते को मजबूत डोरी से बांध रखा था और बीचबीच में उसे प्यार से सहलाता भी था. उस ने खुद के साथ कुत्ते को भी लाल रंग का लंबा तिलक लगा रखा था.  वह आदमी थोड़ा दिलचस्प लगा. थोड़ा और नजदीक आने पर महसूस हुआ कि शायद इस आदमी से मेरी कहीं मुलाकात हो चुकी है. दिमाग पर थोड़ा जोर लगाया तो याद आया कि यह तो लाला भाई है, जिस से मेरी मुलाकात आज से तकरीबन एक साल पहले सासाराम के तहसीलदार दफ्तर में हुई थी और यह आदमी तो अपने गांव का मुखिया बनना चाहता था. लेकिन पंचायत का इलैक्शन हुए तो 2 महीने हो चुके हैं, फिर यहां यह कैसे घूम रहा है? इस ड्रैस में आने का क्या मतलब है? क्या बुरा हो गया इस के साथ?

मैं यह सब सोच ही रहा था कि उस ने अचानक चिल्लाना शुरू कर दिया, ‘‘जनता पर यकीन मत करना, सब दोगले होते हैं…’’ और फिर वह बहुत जोरजोर से हंसने लगा और काफी देर तक पागलों की तरह हंसता ही रहा. लेकिन यह पहले तो ऐसा नहीं था, बल्कि यह तो हुआ इनसान था, कम से कम मु? से हुई मुलाकात के हवाले से तो मैं यह कह ही सकता हूं. लेकिन, इस हालत में यहां कैसे? यादों को ताजा करने की कोशिश की तो सबकुछ परत दर परत याद आने लगा. आज से तकरीबन सालभर पहले, उस दिन अपने तहसीलदार दोस्त से मिलने के लिए मैं सुबह 10 बजे सासाराम में उन के दफ्तर पहुंच गया था.

वे दफ्तर में ही थे और लोगों से मिल कर उन की समस्याएं सुन रहे थे. मैं दफ्तर के बाहर लगी कुरसियों पर बैठ कर उन के खाली होने का इंतजार करने लगा. इस के साथ ही रास्ते में खरीदा गया अखबार उलटने लगा. थोड़ी देर में, मेरी बगल वाली सीट पर तकरीबन 55 साल का एक ठिगना दुबलापतला और गंजा इनसान कर बैठ गया. उसने  पूछा, ‘‘साहब कितनी देर से बैठे हैं?’’ मैं ने कहा, ‘‘काफी देर से.’’
वे सज्जन किसी औरत के खेत तक जाने वाले सरकारी रास्ते की पैमाइश चाहते थे और उस औरत का प्रार्थनापत्र ले कर तहसील आए थे. उन के हाथ में जो आवेदनपत्र था, जिस पर मारफत पूर्व मुखिया उम्मीदवार विजय शंकर लिखा था.

मेरी दिलचस्पी उन में बढ़ गई और मैं ने उन से बातचीत शुरू की. थोड़ी देर की बातचीत के बाद उन्होंने अपना पूरा संघर्ष  बयां किया. उन का नाम विजय शंकर श्रीवास्तव उर्फ लाला भाई था. 10वीं जमात तक पढ़े लाला भाई अपनी ग्राम पंचायत खुटहा का यह चौथा इलैक्शन लड़ने की तैयारी कर रहे थे, जो आगामी 10 महीने में होने वाले थे. इस से पहले के 3 पंचायत इलैक्शन वे हार चुके थे, जिन में से 2 मुखिया पद के लिए थे. पहली बार में, जहां वे 7वें नंबर पर थे, वहीं पिछले पंचायत चुनाव में वे तीसरे नंबर पर चुके थे. उन की केवल एक इच्छा थी कि वे अपनी ग्राम पंचायत खुटहा के एक बार मुखिया बन जाएं. इस के लिए वे कुछ भी करने को तैयार थे.

लाला भाई का गांव बिहार के सासाराम जिले में पड़ता था. 5,000 वोटर वाला गांव, जिस में यादव, कुर्मी और दलित ही मुख्य जातियां थीं. लेकिन, गांव में दबदबा कुर्मियों का था, क्योंकि वे पढ़ेलिखे और ज्यादा अमीर थे. यही नहीं, गांव के यादव भी काफी अमीर थे, लेकिन उन के उज्जड़पन, अक्खड़पन के चलते ज्यादातर गांव वाले उन से कम मेलजोल रखते थे. वहीं, गांव के दलित खेती और ईंटभट्ठे पर मजदूरी करते थे और ज्यादातर गांव के कुर्मियों के खेतों से ही अपने घर चलाते थे. वे लोग यादवों के यहां मजदूरी इसलिए नहीं करते थे, क्योंकि यादव लोग उन से ठीक से बात नहीं करते थे और उन के घर की बहूबेटियों पर गंदी नजर थे. लाला भाई की जातबिरादरी के लोग गांव में केवल 4 घर थे. कुल जमा 40 वोट, लेकिन उनका किसी से कोई बैर नहीं था. खेती भी जो थोड़ीबहुत थी, उसे उन लोगों ने दलितों को बंटाई पर दे दिया था.
गांव में इन जातियों के अपनेअपने महल्ले थे.

पंचायत की राजनीति शुरू करने के अपने शुरुआती दिनों में लाला भाई रोज सुबह खापी कर अपनी साइकिल ले कर पूरे गांव एक चक्कर मारते थे. गांव के लोगों से दुआसलाम के बाद, उन का बड़ा काम सरकारी योजनाओं तक गांव के लोगों की पहुंच पक्की करवाना और तहसील, पंचायत, थाना में लोगों की समस्याओं को डील कराना था. वे मानते थे कि इसी तरह वे गांव की जनता के दिल में उतर सकते हैं और उन का वोट ले सकते हैं. उन्होंने कभी इन सुविधाओं तक लोगों की पहुंच के लिए सरकारी महकमे में दिए जाने वाले सुविधा शुल्क को भी गांव के लोगों से नहीं लिया, बल्कि अपने घर से जो पिता के रिटायरमैंट का मिला पैसा था, उसे खर्च कर के मदद की. उन का मानना था कि एक बार मुखिया बनने के बाद, इन सब खर्चों की रिकवरी हो जाएगी. अभी सिर्फ गोल पर फोकस रहने की जरूरत है.

पहले पंचायत चुनाव में भाग लेने तक उन्होंने अपने रिटायर्ड पिता के फंड का आधा पैसा खर्च कर दिया था. फिर बड़े जोरशोर से परचा भी दाखिल किया और बहुत दिव्य और भव्य तरीके से अपना प्रचार किया. हालांकि वे केवल 40 वोट पा कर 7वें नंबर पर पहुंचे. यही हाल दूसरे पंचायत चुनाव में भी रहा. इस चुनाव में उन्हें बहुत कोशिश के बाद केवल 90 वोट हासिल हुए और तीसरे नंबर तक उन की गाड़ी पहुंच सकी.
2 बार की इस हार और बाप के रिटायरमैंट के फंड का 10 लाख रुपए खर्च करने के बाद उन के घर में भयानक कलह हो गई. उन के छोटे भाई ने उन्हें घर का पैसा बरबाद करने का दोषी ठहरा दिया. इस तरह से उन्हें घरपरिवार में अलग कर दिया गया और 2 एकड़ खेत और घर में एक कमरा उन के रहनेखाने के लिए दे दिया गया. इस तरह से उन के घर का बंटवारा हो गया.

2 पंचायत चुनाव हार जाने के बाद, लाख कोशिश के बाद भी यह बात उन्हें में नहीं आई कि जिस जनता के लिए, जिस के सुखदुख में वह चौबीसों घंटे खड़े रहते हैं, वही उन्हें मुखिया लायक क्यों नहीं है? खैर, अब उन्होंने अपने हार की वजह की खोज शुरू की. उन के शुभचिंतक लोगों ने कहा कि बिना जातबिरादरी को साधे कोई चुनाव नहीं जीत सकता है. पहले कुछ जातियों पर पकड़ बनाओ, फिर वे ही तुम्हारा वोट बैंक बनेंगी. हर दिशा में तीर नहीं मारो. उन्होंने मामले को और गहराई में को ले कर बड़ी माथापच्ची की. ग्रहदशा ठीक करने का अनुष्ठान करवाया. बद्रीनाथ का दर्शन भी किया. इस के लिए उन्हें अपने 2 एकड़ खेत का आधा हिस्सा गिरवी रखना पड़ा. एक दिन एक ज्योतिषी उन के गांव में आया. उन का हाथ देख कर उस ने कहा कि जब तक शादी नहीं करोगे तुम चुनाव नहीं जीत पाओगे.

फिर क्या था. उन्होंने एक महीने के भीतर 55 साल की उम्र में 28 साल की एक ऐसी लड़की से शादी की जिस के मांबाप दोनों नहीं थे और जिस की परिवरिश उस की एक कथित मौसी ने की थी, जिसे उन्हें 30,000 रुपए देने पड़े. वह लड़की एक 4 महीने के बच्चे के साथ ससुराल आई थी. वह ससुराल में 5 महीने रही और बाद में गांव के ही एक दुसाध लड़के के साथ दिल्ली भाग गई, जो वहीं मजदूरी करता था.
खैर, इस घटना के बाद भी वे अपने लक्ष्य पर लगे रहे. चतुर लोगों से राय ली. अब उन्होंने तय किया कि वे यादवों को अपना वोट बैंक बनाएंगे. उन का विश्वास कुर्मियों पर इसलिए नहीं जमा, क्योंकि कुर्मी बहुत ज्यादा दिमाग खर्च करते हैं. वहां थोड़ा कम चांस हैं. फिर यादव समाज में उन्होंने जगह पाने की कोशिश में काफी पैसा खर्च किया. गांव के लोगों ने उन का भरपूर दोहन किया.

वे दलितों पर दांव इसलिए नहीं लगा सकते थे, क्योंकि बिना दारूनकदी के यह बिरादरी वोट नहीं देती. इस पर वे आखिर में दांव लगाते, यही सोच कर उन्हें इग्नोर किया. यादव बिरादरी को मैनेज करने के लिए उन्हें 5 लाख रुपए पर अपना बाकी खेत गिरवी रखना पड़ा. लेकिन, तीसरे चुनाव में उन्हें यह कह कर वोट नहीं दिया गया कि उन की जाति के लोग दब्बू होते हैं. यादव लोग एक दब्बू को अपना वोट नहीं दे सकते. वे फिर से चुनाव हार गए. असल में वे निहायत ही भावुक किस्म के आदर्शवादी इनसान थे. लेकिन गांव में उन की इमेज एक ऐसे बेवकूफ और पागल की थी, जिसे कोई भी गंभीरता से नहीं लेता. यहीं नहीं, गांव में जातीय तनाव के चलते मुखिया का चुनाव वही जीत सकता था जो कम से कम यादव या दलित बिरादरी का एकतरफा समर्थन हासिल करे.

यही नहीं, उस की अपनी जाति का भी एक मजबूत आधार उस के साथ होना चाहिए. लाला भाई का अपने खुद के समाज या बिरादरी का कोई खास वोट गांव में नहीं था. उन की दोस्ती गांव के यादवों से थी जरूर, लेकिन वे लोग मानते थे कि लाला एक डरपोक जाति है. यह आदमी हमारा प्रतिनिधि नहीं हो सकता.
फिर गांव में यादव और कुर्मी कुशवाहा जाति के लोगों में आपसी तनाव रहता था, जिस का फायदा चुनाव में दलित उठाते थे. वे दोनों तरफ से माल खाते थे. दलितों ने लाला भाई का कुछ इस्तेमाल देशी ठर्रे से ले कर विदेशी शराब खरीदवाने तक में किया. चुनाव लड़ने की इस सनक ने उन्हें बड़ा कर्जदार बना दिया था. मैंने उन की कहानी जानने के बाद आगे पूछा, ‘‘आप मुखिया बनना ही क्यों चाहते हैं?’’
खैनी मलते हुए मुसकरा कर वे बोले, ‘‘बस, लोगों की सेवा करना चाहते हैं सर, अपना नाम करना
चाहते हैं.’’

मैं ने कहा, ‘‘लेकिन इतनी बार हारने से तो लगता है कि लोग आप से सेवा करवाने के इच्छुक ही नहीं हैं. फिर आप क्यों परेशान हैं?’’ लाला भाई ने कहा, ‘‘हां, लेकिन 6 नंबर से 3 नंबर पर गए हैं तो अगले चुनाव में मुखिया बन ही जाएंगे.’’
मैं ने पूछा, ‘‘गांव में आप की बिरादरी के कितने वोट हैं?’’
लाला भाई ने कहा, ‘‘40 वोट.’’
मैं ने पूछा, ‘‘इतने कम वोट में बिहार जैसे जाति केंद्रित समाज में कैसे बनेंगे मुखिया?’’
लाला भाई ने कहा, ‘‘जैसे छठवें नंबर से तीसरे नंबर पर गए, वैसे ही बन भी जाएंगे.’’
मैं ने कहा, ‘‘बड़ा सब्र है भाई आप के पास…’’
फिर उन्होंने मुसकरा कर आगे कहा, ‘‘अभी मु? पर 8 लाख रुपए का कर्ज है, जिसे मैं ने जनता की सेवा के लिए अपना 2 एकड़ खेत एक रुपए सैकड़ा पर ले कर गिरवी रखा है.’’ अचरज हुआ कि कितना
अजीब आदमी है, जो मुखिया बनने के पागलपन में इतना बड़ा कर्जदार हो चुका है.

उन्होंने आगे कहा, ‘‘5 दिन हुए पिताजी मर गए. घर में होना चाहिए, लेकिन यहां हूं. साहूकारों का दबाव बहुत है कि पैसा लौटाओ नहीं तो खेत की रजिस्ट्री करो. लेकिन मैं हार नहीं मानूंगा. इस बार किसी भी कीमत पर मुखिया बनना ही है.
‘‘हमारे आदर्श सुभाष चंद्र बोस हैं. संघर्ष में पीछे नहीं हटना है. उन से प्रेरणा मिलती रहती है. दिनरात एक कर दिया है मेहनत में.’’
मैं ने कहा, ‘‘लेकिन उन्होंने तो कभी मुखिया का चुनाव नहीं लड़ा था.’’
लाला भाई ने कहा, ‘‘जी, सही
कहा. वे भी हमारी बिरादरी के थे, कायस्थ थे सर. इसीलिए वे हमारे
आदर्श हैं. उन्होंने आखिरी दम तक संघर्ष किया, मैं भी आखिरी सांस तक संघर्ष करूंगा. हम मिट जाएंगे लेकिन पीछे नहीं हटेंगे.’’
मैं ने कहा कि अच्छी बात है और फिर लाला भाई की पर मुसकराने लगा. लगा कि इस आदमी की
सोच इतनी गंदी है कि एक महान क्रांतिकारी केवल इसलिए इस का नेता है, क्योंकि वह भी इस की बिरादरी या जात का था
मैं ने कहा, ‘‘आप सही जा रहे हैं. आप एक दिन जरूर मुखिया बनेंगे.’’
उस ने से हाथ जोड़ कर नमस्कार  किया और कमरे में चला गया.
आटोरिकशा ड्राइवर के हौर्न से
मेरा ध्यान टूटा. उस ने पूछा, ‘‘कहां जाना है सर?’’
मैं ने कहा, ‘‘महेश्वरी कालोनी,
डी ब्लौक, बंगला नंबर 2 ले चलो भाई.’’

इस के बाद आटोरिकशा बढ़ चला और लग गया कि जरूर इस चुनाव में भी यह हार गया होगा और साहूकारों ने इस का गिरवी रखा खेत हड़प लिया होगा, जिस के गम में यह पागल हो
गया है. इस आदमी का मुखिया बनने का नशा इसे इस तबाही की हद तक ले आया कि आज यह कुत्ते के साथ घूम रहा है. मैं इस के साथ उस दुखद घटना की कल्पना भर कर सकता था, जो इस के साथ घटी होगी. तकरीबन 10 मिनट के बाद मेरे घर का गेट गया. 20 रुपए ड्राइवर को दे कर दुखी मन से मैं घर के भीतर चला गया. गांव और पंचायत के सियासी दांवपेंच में एक आदमी केवल तबाह हो गया था, बल्कि पागल हो चुका था

हरे राम मिश्र                              

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