Hindi Kahani: 20 साल के मजदूर रघु पर ईयरफोन का ऐसा जुनून चढ़ा कि वह हर वक्त उन्हें कान में ठूंसे रहता. बंशी चाचा ने इस के खतरे बताए, पर वह अनजान बना रहा. एक दिन गांव जाते समय रघु हाईवे पर ईयरफोन पर गाने सुन रहा था कि तभीवे सभी बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन के काम में लगे थे. सुबहसुबह अपने गांव से निकल कर फतुहा से पटना जाने वाली ट्रेन से वे रोजाना वहां पहुंच जाते थे. जैसी कि उम्मीद थी, पूजा के पहले ही बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन का यह काम पूरा हो जाना था. ऐसे में उन्हें अपने गांवघर में छुट्टी काटने की उम्मीद थी. मगर कुछ वजह से ऐसा मुमकिन नहीं हो सका था.

रघु के बाबा कहा करते थे, ‘राजा का भी महल तय समय में पूरा नहीं होता…’ तो फिर इस बिल्डिंग का काम कैसे पूरा होता. जो भी हो, मालिक ने कह रखा था कि वह छुट्टियों में काम बंद रखेगा और उन्हें पूरे पैसे देगा. इस बात से वे सभी खुश थे. बीसेक साल के रघु को दूसरे तमाम नौजवानों के समान ही मोबाइल फोन में दिलचस्पी थी. फिर हालात कुछ ऐसे बने कि उसे पढ़ाईलिखाई छोड़ कर काम में लगना पड़ा.
पिछली बाढ़ में रघु के गांवघर की फसल मारी गई थी. ऐसे में कहीं कहीं काम तो करना ही था. सो, वह भी दिहाड़ी मजदूरी में लग गया था. वही क्यों, उस के गांव के दर्जनों लोग दिहाड़ी मजदूर के रूप में पटना में काम पर जाया करते थे. महीने में दसेक दिन भी काम मिल गया, तो महीनेभर का खर्च निकल आता था.
और यहां तो जब बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन में काम मिला, तो जैसे सब की खुशी का ठिकाना नहीं रहा था. अब आराम से महीनेभर काम मिलेगा, तो अच्छे पैसे भी बनेंगे.

और जब घर में पैसे हों, तो अगली वासंती फसल के लिए बीजखाद और पटवन का भी इंतजाम हो जाएगा. तीजत्योहार भी अच्छे से मनाया जा सकेगा. एक बात तो तय है कि आजकल सभी नौजवानों के पास अपना एंड्रौइड मोबाइल फोन है, जिस से सभी का मनोरंजन होता है. बूढ़े तो अभी भी बस कीपैड वाले पुराने फोन का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि उन्हें एंड्रौइड  मोबाइल चलाना नहीं आता. लेकिन गरीब हैं, तो क्या हुआ. दीनदुनिया की खबर तो यूट्यूब, फेसबुक, व्हाट्सऐप से ही पता चल पाती है . इस के अलावा भी इस में कितना सारा कुछ है देखनेसुनने के लिए. कितने सारे फीचर हैं इस में और यहां कोई नौजवान पीछे नहीं रहना चाहता. सभी के अपने दोस्त हैं, गर्लफ्रैंड हैं, तो उन से भी तो बात करनी है. उन पर रोबदाब कायम करना है. इस के लिए मोबाइल फोन से सही और क्या हो सकता है. लेकिन दिक्कत यह है कि हर महीने इसे चार्ज भी तो कराना पड़ता है, जिस में अच्छे पैसे लग जाते हैं, इसलिए तो कहीं कामधंधा करना जरूरी है.

कुछ दिन पहले की बात है कि बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन की साइट पर मालिक का बेटा संतोष आया था. रघु सिर पर ईंट लिए चार मंजिले पर चढ़ रहा था. संतोष मजदूरों को कभी कुछ निर्देश देता, तो अपने कान से ईयरफोन निकाल कर उन्हें कुछ कहता. फिर अपने कान में ईयरफोन तुरंत लगा लेता था. उन लोगों को भी उत्सुकता होती कि आखिर कान में लगा ईयरफोन है कैसा. संतोष रघु का ही हमउम्र होगा. उस की बात पर संतोष ने हंसते हुए बताया, ‘‘अरे, यह मोबाइल फोन के साथ जरूरी है. सारा कुछ साफसाफ सुनाई देता है.’’ ‘‘लेकिन यह तो बहुत महंगा मिलता होगा ?’’ इस बार रामू ने उत्सुकता दिखाई, तो वह बोला, ‘‘हां, यह ईयरफोन ब्रांडेड कंपनी का है, तो महंगा तो है ही. लेकिन इलैक्ट्रौनिक मार्केट में लोकल ईयरफोन सस्ते में मिल जाता है.’’

‘‘सस्ता कितने तक का होता होगा?’’ रघु ने पूछा, तो संतोष बोला, ‘‘50 रुपए में मिल जाता होगा.’’
उस दिन मौका निकाल कर रघु काम के बीच ही में इलैक्ट्रौनिक मार्केट चला गया था और वहां से ईयरफोन खरीद लाया था. अब रघु को जब भी समय मिलता, वह मोबाइल चला कर कान में ईयरफोन खोंस लेता था. दूसरे लोगों ने भी देखादेखी ईयरफोन खरीद लिए थे, मगर रघु की बात ही निराली थी. वह एक तरह से मोबाइल एडिक्टेड सा था, इसलिए उसे अकसर ही डांट खानी पड़ती थी कि ईयरफोन के चलते वह किसी की नहीं सुनता. बंशी चाचा अकसर ही रघु को डांटते, ‘‘अरे, तुम हमेशा कान में यह कनठेपी क्यों घुसाए रहता है? किसी की तुम बात तक नहीं सुनते. ऐसे तो चल चुका तुम्हारा काम. कहीं मालिक ने देख लिया, तो तुम्हें काम से निकाल बाहर करेगा.’’

रघु को भी महसूस होता था कि इस ईयरफोन के वजह से किसी को सुनना मुश्किल होता है. ‘‘जब मालिक का बेटा ही कान में ईयरफोन लगाए इधरउधर घूमता हो, तो गलत तो नहीं ही होना चाहिए,’’ रघु बंशी चाचा की बात को हंसी में उड़ा देता था, ‘‘बुढ़ा गए हैं, तो बोलेंगे ही. उन्हें क्या पता कि हम जेनजी पीढ़ी वाले लोग हैं. पैसे नहीं हैं, तो क्या हुआ, जीना छोड़ दें? थोड़ी मस्ती भी नहीं करें क्या?’’ यह जेनजी शब्द रघु की डिक्शनरी में नयानया शामिल हुआ था, जिस का मतलब यह कि हम नई पीढ़ी और सोच के लोग हैं. ऐसे में उन्हें कुछ अलग करने और सोचने का हक है.
अब इत्तिफाक की बात है कि बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन साइट पर एक कच्चा चहबच्चा था. वहीं मालिक का बेटा ईयरफोन लगाए घूम रहा था. वहां एक जगह गीली, कच्ची मिट्टी थी.
बंशी चाचा चिल्लाते रह गए, ‘‘अरे सुभाष बाबू, जरा संभल कर. वहां फिसले, तो गहरे पानी में गिरोगे.’’
मगर सुभाष सुन नहीं पाया था और वही हुआ, जो नहीं होना चाहिए था. वह फिसल कर उस गहरे गड्ढे में जा गिरा था. गनीमत थी कि वहां लोग मौजूद थे और उसे बाहर निकाल लिया गया. मगर उसे चोटखरोंच तो आई ही थी.

तभी रामू को महसूस हुआ था कि यह ईयरफोन लगाना भी खतरनाक हो सकता हैशाम में तय समय पर उन्हें छुट्टी मिली, तो सभी को चैन आया. अब पूरे एक हफ्ते की छुट्टी है. अब पूजा के बाद ही तो काम शुरू होगा. पैसे भी मिल गए थे, तो सब में एक जोश भी था. पटना से फतुहा वे ट्रेन से गए थे और हाईवे के किनारे अपने गांव जा रहे थे. जब 50 मील दूर पटना से फतुहा मुफ्त में ट्रेन से गए, तो एकाध मील के लिए आटोरिकशा क्या पकड़ना. यह तो रोजरोज की बात है.
तीजत्योहार के दिन हों, तो मन आकाश में उड़ता रहता है. तब और, जब पास में पूरे पैसे हों. आखिर वे घर से बाहर शहरों में इसी दिन के लिए तो धक्के खाते फिरते हैं और कमाई की जुगत भिड़ाते रहते हैं. रामू यही सबकुछ सोचता, मस्ती में अपने ग्रुप के साथ आगे बढ़ता जा रहा था. तभी रघु बोला, ‘‘क्या रामू भाई, जरा यह गाना यूट्यूब पर सुनिए. मजा जाएगा.’’ ‘‘अब घर जा ही रहे हैं, तो वहीं आराम से सुनेंगे. यहां इस हाईवे पर गाडि़यों की तेज रफ्तार और शोर के बीच कोई कुछ क्या सुनेगा…’’

‘‘अरे, शोर को मारिए गोली. कान में ईयरफोन लगाइए और सुनिए. इस ईयरफोन को लगा कर बाहर का कुछ सुनाई कहां देता है. आखिर इसी दिन के लिए ईयरफोन खरीदे हैं.’’ ‘‘उस दिन काम की साइट पर देखे थे कि मालिक का बेटा पानी भरे चहबच्चे में कैसे जा गिरा था,’’ रामू ने रघु को सम?ाना चाहा, ‘‘खतरा उठाने की क्या जरूरत है? आराम से घर जा कर सुनना.’’ इस पर रघु ठठा कर हंस दिया था.
‘‘जब देखो, तब कान में कनठेपी लगाए घूमता रहता है…’’ रामू के कान में बंशी चाचा के कहे शब्द गूंज रहे थे,
‘‘
देख लेना, अभी तो कुछ सुन नहीं रहा. कल को किसी भारी एक्सीडैंट के चपेट में आएगा, तो पता चलेगा.’’
‘‘इस ईयरफोन से आवाज कितनी बढि़या आती हैजैसे स्टेज के सामने खड़े हो कर सुन रहे हों. सिर्फ 50 रुपए में मिल गया. इतना सस्ता में कहां
मिलता है…’’
‘‘लेकिन इस तरह हाईवे पर ईयरफोन लगा कर चलने में कितना खतरा है…’’ रामू बोला.
‘‘अरे, हम सड़क के बीच में नहीं, सड़क किनारे चल रहे हैं…’’ रघु ने कहा.

हाईवे के दोनों तरफ भारी गाडि़यां तेजी से दौड़ रही थीं. अचानक सड़क पर होड़ लगा कर दौड़ते ट्रकों को ओवरटेक करती एक पिकअप वैन को अपनी तरफ आता देख कर रामू चिल्लाया और भागा, ‘‘बचो रघु, यह हमारी तरफ ही रही है.’’
रघु के साथ 2 साथी और थे, जिन्होंने कान में ईयरफोन लगा रखा था, इसलिए उन लोगों ने भी कुछ नहीं सुना, जबकि चाचा बंशी, चाचा सोनू और भैया भानु ने उस की आवाज सुन ली थी. वे चारों हाईवे की ढलान पर भागे. तब तक तो रघु के साथ मनोज और रंजीत उस पिकअप वैन की चपेट में ही चुके थे. पिकअप वैन पलभर को रुकी. उन तीनों को गिरते, सड़क पर छटपटाते देखा, फिर तेज रफ्तार से वहां से चली गई.
वे तीनों सड़क पर पड़े छटपटा रहे थे. सड़क का वह हिस्सा खून से लाल हो रहा था. किसी के सिर में, तो किसी के हाथपैर में चोट लगी थी.

बंशी चाचा अपने गमछे से उन के जख्मी शरीर को बांध रहे थे, ताकि बहता खून रुक जाए. रामू आतीजाती गाडि़यों को रुकने और मदद करने के लिए हाथ हिलाते हुए चिल्ला रहा था, मगर यहां किस को चिंता थी.
यहां हाईवे की भागमभाग में सब को अपनीअपनी ही पड़ी थी. आखिरकार एक आटोरिकशा दिखा, जिसे रामू ने रुकवाया. फिर तीनों घायलों को उस में टांगटूंग कर बैठाया और अस्पताल जाने का इंतजाम किया.
रास्ते में रघु कराहते हुए रामू से कह रहा था, ‘‘तुम ठीक कह रहे थे रामू.

अगर मैं ने अपने कानों में ईयरफोन नहीं लगाया होता, तो मैं बच सकता था.’’ रास्ते में ही रघु ने दम तोड़ दिया था. दूसरे 2 लोगों में से एक के हाथ, जबकि दूसरे के हाथपैर दोनों टूटे थे. अस्पताल से वापस गांव आने पर रामू बहुत उदास था. रघु के घर का हाहाकार उस के कानों में गूंज रहा था. बारबार उस की आंखों के सामने रघु का चेहरा रहा था. रामू के कानों में घायल रघु की आवाज अब भी गूंज रही थी, ‘‘अगर मैं ने अपने कानों में ईयरफोन नहीं लगाया होता, तो मैं बच सकता था.’’  

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