बारिश की हलकी फुहार थी. सड़क किनारे वही पुरानी सी चाय की दुकान, जहां अकसर भीड़ नहीं होती थी.
संजय वहां बैठा था, हाथ में गरम चाय का कप लिए.
तभी सवि आई और बोली, ‘‘आज भी यहीं बैठे हो?’’
संजय ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘हां, लगा तुम आओगी.’’
सवि संजय के सामने बैठ गई. दुकानदार ने बिना पूछे चाय का दूसरा कप रख दिया.
सवि ने पूछा, ‘‘तुम्हें कैसे पता मैं चाय पीऊंगी?’’
‘‘पिछले 3 सालों से हर मुश्किल
में तुम ने चाय ही तो मांगी है,’’

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संजय बोला.
सवि हंस पड़ी. वही हंसी, जिस में सुकून था.
सवि बोली, ‘‘कभीकभी लगता है, हमारी पूरी कहानी इन्हीं 2 कप चाय में सिमटी है.’’
संजय ने कहा, ‘‘हां, एक तुम्हारे
हाथ में, एक मेरेऔर बीच में ढेर
सारी बातें.’’
कुछ पल खामोशी रही. बारिश तेज हो गई.
सवि धीमे से बोली, ‘‘अगर मैं कभी दूर चली जाऊं तो?’’
संजय बोला, ‘‘तो भी यहां कर
2 कप चाय मंगाऊंगा. एक तुम्हारे
इंतजार में.’’
सवि ने संजय की ओर देखा. आंखों में नमी थी, पर चेहरे पर मुसकान.
सवि ने पूछा, ‘‘कभी कहा क्यों नहीं कि तुम मुझ से…’’
संजय बीच में बात काट कर बोला, ‘‘डरता था, कहीं चाय की यह आदत भी छूट जाए,’’ फिर वह मुसकरा दिया.
सवि ने संजय का हाथ थाम लिया और बोली, ‘‘पागल, प्यार कहा नहीं जाता, महसूस किया जाता है. जैसे
यह चाय.’’ बारिश थम रही थी. चाय खत्म हो चुकी थी, पर कहानी नहीं.
संजय ने पूछा, ‘‘तो कल फिर?’’
सवि बोली, ‘‘हांतुम, मैं और
2 कप चाय.’’
उस दिन संजय को समझ आया
कि प्यार बड़े वादों में नहीं, छोटी
दुकानों, गरम चाय और सच्चे इंतजार में होता है.                             

संजय सिंह चौहान

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