Political News: इजराइल और अमेरिका के हवाई हमलों से परेशान ईरान ने अब सिर्फ इजराइल पर हवाई मिसाइलें दागनी शुरू कर दी हैं, उस ने उन देशों पर भी मिसाइलें दागनी शुरू कर दी हैं जहां अमेरिकी सेना के अड्डे हैं और इस से कुवैत, ओमान, यूएई, सऊदी अरब भी चपेट में गए हैं.

इन देशों में, जिन्हें गल्फ कंट्री कहा जाता है, करीब 90 लाख भारतीय मजदूरी का काम करते हैं. इस लड़ाई और बमों की बरसात के बावजूद तो ये 90 लाख लौटने की कोशिश कर रहे हैं और ही नए जाने वालों की कमी हो रही है. जो लोग भारत लौटने के लिए छटपटा रहे हैं और एंबेसियों को कह रहे हैं कि उन्हें निकालो, वे बिजनैसमैन या उन के बच्चे हैं.

आम मजदूर को कोईर् फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उसे तो 10,000 रुपए भारत में मिलने वाली पगार के बदले 40,000-50,000 की पगार, कैंप, खाना, इंश्योरैंस वगैरह बहुतकुछ मिल जाता है. वह तो कहता है कि बम गिरेंगे तो बड़े शहरों में या बड़ी बिल्डिंगों पर, उन के टिन के शैडों पर कौन बम डालेगा? वैसे भी वे कहते हैं कि भारत में बेरोजगारी या भूख से मरने से अच्छा है वहां मरना. वे कहते नहीं पर जानते हैं कि मरने के बाद भी वे घर वालों के लिए मोटा मुआवजा छोड़ जाएंगे.

यह भारत सरकार की पोल खोलने वाली बात है जो हर 4 में से 2 वाक्यों में जगदगुरु होने या विश्व की चौथी सब से बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दावा करती फिरती है. यह वैसा थोथा दावा है कि देश के 1 करोड़ जवान लोग एक छोटे से इलाके में मजदूरी करने जा रहे हैं, सिर्फ इसलिए कि उन्हें भारत में नौकरियां नहीं मिल रहीं.
यह देश की कौन सी बड़ी इकोनौमी का दावा है कि हमारे 2 करोड़ लोग दूसरे देशों में दूसरेतीसरे और चौथे दर्जे की नौकरियां करने भाग रहे हैं. हमारे प्रधानमंत्री किस मुंह से अपने मुंह मियां मिट्ठू बने रहते हैं जब वे दूसरे देशों के नेताओं से मिलते हैं जहां उन के लाखों लोग छोटे काम कर रहे हैं? यह तो शर्म की बात है कि देश के नेता दुनियाभर में घूमनेफिरते रहते हैं कि भारत का डंका बज रहा है जबकि दुनियाभर में भारत केवल लेबर सप्लायर की तरह जाना जाता है, जैसे अफ्रीका पहले सिर्फ गुलाम सप्लाई करने वाला जाना जाता था.
भारतीय नागरिक या भारतीय मूल के लोग घटिया काम कर के देश का नाम ऊंचा नहीं कर रहे, वे भारत के विकास की धज्जियां उड़ा रहे हैं. वे बता रहे हैं कि हमारा हिंदू धर्म हो या हमारी सरकार, हमारे लोगों को दो जून की रोटी भी देने लायक नहीं है. लड़ाई में बीच में जाने को तैयार होना भारत की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी है.

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जो हाल पुलिस जैसी सरकार की ईडी यानी एनफोर्समैंट डायरैक्टोरेट या सीबीआई यानी सैंट्रल ब्यूरो औफ इनवैस्टीगेशन ने दिल्ली के पहले रहे मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उन के साथियों मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन जैसों के साथ किया, वैसा लाखों के साथ पुलिस के हर थाने में होता है. बिना सुबूत किसी को भी पकड़ कर बंद कर देना इस देश के लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाता है पर जनता मुंह सिए रहती है.

वजह यह है कि सदियों से इस देश की जनता ने इसी तरह बिना किसी गलती के गांव के लैवल से ले कर राजा के लैवल तक सजाएं भुगती हैं और जो कमजोर रहा है वह पिटा है, मार डाला भी गया है. हमारा समाज इस की इजाजत देता है कि ब्राह्मण के अलावा किसी को भी कोई भी पाप या गुनाह करने पर कैसी भी सजा दी जा सकती है.

1950 में संविधान बना. उस से पहले अंगरेजों ने, जिन्हें ब्राह्मण पानी पीपी कर कोसते हैं, कानून बनाबना कर पुलिस के हाथ बांधे थे पर 1947 के बाद से ही पुलिस फिर बेलगाम हो गई. 2014 के बाद तो गैरब्राह्मण नेताओं को पकड़ कर बंद कर देने की एक आदत ही बन गई है, आम लोगों की तो क्या ही कहें.
अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन पर मुकदमे नहीं बनते थे यह पहली ही अदालत ने 500 पेज से ज्यादा के अपने फैसले में साफसाफ कह दिया था. उन का दोष असल में सिर्फ यह है कि वे ब्राह्मण नहीं हैं और सरकार में बैठे हैं. जो भी ब्राह्मणों के आशीर्वाद से सरकार में आएगा उसे कुछ नहीं कहा जाएगा वरना सब का लालू प्रसाद यादव, शिबू सोरेन, हेमंत सोरेन, अजित पवार, कनिमोझी जैसा हाल होगा. यह हाल हर गांव में होता है, हर कसबे में होता है.

ज्यादातर जज दिल्ली के जज की तरह हिम्मत वाले नहीं होते या फिर ब्राह्मण होते हैं या उन की कृपा बनी रहती है और वे हर नीची जाति के उस जने को गुनाहगार मानते हैं जिसे पुलिस पकड़ कर लाती है. सैकड़ों नहीं लाखों छूट जाते हैं क्योंकि पुलिस का केस कमजोर होता है पर पकड़ने और बेगुनाह साबित होने तक वे जेलों में रह कर अपने और अपने घरों की जिंदगी खराब कर चुके होते हैं.ज्यादातर की बीवियां रोतीकलपती रहती हैं, बच्चे पढ़ाई छोड़ कर आवारा बन जाते हैं, बूढ़े़ मांबाप दुख में मर जाते हैं. पुलिस और सरकार को इस जुल्म या मौत से कोई फर्क नहीं पड़ता.

अरविंद केजरीवाल वगैरह छूट गए हैं पर वे अफसर जिन्होंने मुकदमे किए, अपनी मोटी गद्दियों पर बैठे रहेंगे. उन्हें सदा ही बड़ी तसल्ली रहेगी कि उन्होंने मुख्यमंत्री को गिरफ्तार किया. वे अपने बच्चों के हीरो बनेंगे. उन पर कोई विभागीय मुकदमा नहीं चलेगा क्योंकि वे फिर जाने किसकिस को लपेटे में ले लेंगे. वे अगले मुख्यमंत्री को गिरफ्तार करने को तैयार हैं. पुलिस वाले उन की देखादेखी किसी भी दुकानदार, किसान, मजदूर, गरीब को पकड़ने को तैयार हैं. यही हमारा संविधान है. देश का भी, धर्म का भी, समाज का भी.                                                                      
  

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