सरस सलिल विशेष

केंद्र सरकार हज जाने वालों को दी जाने वाली सब्सिडी को कतरने वाली है. यह कदम अच्छा है क्योंकि किसी भी सरकार को किसी भी धर्म को कोई आर्थिक सहायता नहीं देनी चाहिए. पर कठिनाई यह है कि अगर कांग्रेस सरकार मुसलमानों को हज सब्सिडी देती थी तो अब हिंदू मंदिरों, मठों, तीर्थों, तीर्थयात्रियों को कहीं सीधी, तो कहीं सुविधाओं के नाम पर छिपी सब्सिडी दी जा रही है.

हर धर्म अपने भक्त को कट्टर और निरंकुश बनाने की कोशिश करता है और साथ ही, उसे फुसला कर उस की जेब ढीली करवाता है. दुनियाभर के विशाल चर्च, मसजिदें, मंदिर, बौद्ध मोनस्ट्रियां गवाह हैं कि वहां सैकड़ों लोग बिना काम किए सुरक्षित जिंदगी जीते हैं क्योंकि धर्म के नाम पर बने मूर्ख लोग अपनी जेब कटाने वहां खुद आते हैं. उस पर सरकारी सहायता भी मिलने लगे, तो कौन धर्मों की पोल खोलेगा और कौन धंधे की आग को धीमा करेगा.

आधुनिक सोच, विज्ञान, तकनीक, नई खोजों, नए आविष्कारों से पिछले 300 वर्षों से मानव बेहतर तरीके से रहना सीख रहा है और यह किसी धर्म की देन नहीं है. यह व्यक्तियों की अपनी मेहनत, सूझबूझ, लगन और नया सोचने से हुआ. सरकारों को उसे प्रोत्साहन देना चाहिए, न कि हज सहायता या मानसरोवर सहायता दे कर उन्हें 1,000-2,000 साल पीछे ले जाना चाहिए.

मानव ने प्रकृति से लड़ना सीखा पर धर्म चतुराई से प्रकृति और मानव के बीच का दलाल बन बैठा. प्रकृति क्या है,

इस की जानकारी धर्म ने काल्पनिक किस्सेकहानियों से मानव मस्तिष्क में भर दी. धर्म को लगातार लाभ हुआ क्योंकि धर्म अघोषित टैक्स लगा सका और आमतौर पर राजा भी इस साजिश में हिस्सेदार रहा क्योंकि धर्म की कर्मठ, उत्साही, अनुशासित और सवाल न पूछने वाली फौज हमेशा राजा की फौज से ज्यादा उपयोगी रही है.

भारत में धर्म की दुकानें कभी मद्धम नहीं पड़ी थीं और भाजपा की जीत से अब और चमकेंगी. मोदी की जीत का अर्थ यह न समझें कि दूसरे धर्म वाले भयातीत हो कर दुबक जाएंगे, हर धर्म के भक्त अंधे होते हैं और धर्म के नाम पर वे हर तरह की कुरबानी दे सकते हैं. कालाधन जो सरकार को टैक्स न दे कर बचाया जाता है, धर्म के नाम पर चेहरे पर बिना शिकन लाए चढ़ावे में दे दिया जाता है. धर्म के लिए तो लोग मरने को भी तैयार हैं.

21वीं सदी की तकनीक का लाभ उठा कर गरीबी, बीमारी, भेदभाव, ऊंचनीच, प्रकृति प्रकोप से बचाने का प्रयास न कर, धर्म आधारित सरकारों का उदय होना मानव इतिहास के काले अध्याय की शुरुआत है और ऐसा दुनियाभर में हो रहा है. अरब देश जलने लगे हैं और अमेरिका इस के कगार पर है. यूरोप में भी ऐसा कुछ हो रहा है. अफसोस यह है कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग भी पाखंडों का मुरीद है और धर्र्मकर्म को ही उन्नति का मुख्य मार्ग मानता है.