सरस सलिल विशेष

12वीं की परीक्षाओं को ढंग से न करवा सकने के चलते सैंट्रल बोर्ड औफ सैकंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) के खिलाफ छात्रों को बारबार अदालतों में जाना पड़ता है. इस बार फिर आशा से कम अंक मिलने के कारण 11 लाख में से 2.47 प्रतिशत छात्रों ने उत्तर पुस्तिकाओं की दोबारा जांच की मांग की. पहले तो बोर्ड ने नियम बना डाले कि जांच केवल कुछ ही विषयों और सीमित संख्या में प्रश्नों की हो सकती है पर अब हाईकोर्ट की फटकार के बाद उस ने नियम बदले हैं. 12वीं की परीक्षा इस देश में छात्रों का पूरा जीवन बदल देती है. जो फिसड्डी हैं, उन का तो कुछ जाता नहीं है पर जो मेधावी, मेहनती हैं उन्हें कठिन मेहनत के बावजूद केवल जांचने वालों की लापरवाही के कारण असफलता देखनी पड़े, यह अन्याय है.

शिक्षा की पहली और एक तरह से आखिरी सीढ़ी पर ही छात्र को यदि किसी की गलती को भुगतना पड़े तो इस से बड़ा दोष नहीं हो सकता. लगता है हमारे गुरु आज द्रोणाचार्य के भक्त हैं जिस ने एक युवा एकलव्य को दंड दे डाला था क्योंकि उन्हें राजपुत्र अर्जुन को धनुर्विद्या में एक नंबर पर रखना था. यह बात दूसरी है कि अंगूठा कटवाने के बाद एकलव्य फिर लड़ा और अफसोस यह कि महाभारत में वह कौरवों के साथ था जिस में एक समय सेनापति द्रोणाचार्र्य ही थे. आज के कुछ टीचर भी यह समझते हैं कि उन के पास छात्रों के जीवन से खेलने का लाइसैंस है. बिहार में टौपरों का विवाद भी ऐसा ही है जहां लगभग अनपढ़ों को पैसा ले कर मनमाने अंक दे दिए जाते हैं और सही में योग्य छात्र पीछे रह जाते हैं. ये शिक्षा व्यवस्था के जर्जर हो जाने के कुछ नमूने हैं.

पिछले 70 सालों में एक तरफ जहां शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है, वहीं शिक्षा को धंधा बना लेने की आदत भी. इस में पिसते हैं युवाओं के सपने. 12वीं की परीक्षा, आईआईटी की परीक्षा हो, मैडिकल कालेजों की प्रवेश परीक्षा हो, हरेक में मनमाने नियम हैं, धांधली है, चोरी है, छल है.

शिक्षा न केवल बाजारू हो गई है, यह बेहद भेदभाव वाली और कुछ को सपोर्ट करने वाली होती जा रही है. देश की बुनियाद में सही शिक्षा ही है और अगर इस में बेईमानी व लापरवाही की रेत मिला दी गई तो यह देश कभी मजबूत न बनेगा.