सरस सलिल विशेष

गुजरात और हिमाचल प्रदेश की विधानसभाओं के चुनाव जीत कर भारतीय जनता पार्टी ने साबित कर दिया है कि नोटबंदी और जीएसटी की चोटों के बावजूद देश को धर्मजनित पार्टी की ही प्राथमिकता है. 2014 में भारतीय जनता पार्टी को नरेंद्र मोदी ने भगवा झंडे पर लेकिन भगवा रंग के बगैर विकास व स्वच्छ सरकार बनाने के नाम पर जिताया था. पर 2017 के आतेआते इन दोनों वादों की कलई धुल गई और असल कट्टरवादी भाजपा सामने आ गई जिस में मंदिर, पूजापाठ, वर्णव्यवस्था, मुसलिम विरोध पहली जरूरतें हैं. जनता ने ऐसी ही पार्टी को सिर पर रखा हुआ है.

लोकतंत्र हो या राजतंत्र, आखिरकार शासकों को जनता की सहमति तो चाहिए ही होती है. जनता को नाराज कर के कोई भी शासक लंबे समय तक राज नहीं कर पाता. तानाशाह भी कुछ न कुछ ऐसा करते रहे हैं जिस से जनता को लगता रहे कि शासक असल में उसी का भला सोच रहा है.

गुजरात विधानसभा के चुनावों में राहुल गांधी ने जम कर नोटबंदी और जीएसटी पर तीर चलाए थे. अल्पेश ठाकोर, जिग्नेश मेवाणी और हार्दिक पटेल ने जातियों के साथ होने वाले भेदभाव व उन की आर्थिक दुर्दशा के सवाल उठाए थे. इन चारों को धर्म से लेनादेना न के बराबर था. पर इन की नहीं चली. भारतीय जनता पार्टी का धार्मिक तूफान सब को भगवाई रंग में भिगोता चला गया और वे चारों आज असहाय से खड़े हैं.

बस, आशा की किरण इस में है कि भगवाई भूकंप के गढ़ में 22 सालों बाद भारतीय जनता पार्टी को एक मजबूत टक्कर मिली है. इस से पहले कई विधानसभा और लोकसभा चुनावों में टोकनबाजी ही होती थी. कांग्रेस न के बराबर खड़ी होती थी, यह मान कर कि वह तो हारेगी ही. इस बार एकएक सीट के लिए भाजपा को लड़ना पड़ा है. जो

7 सीटों की बढ़त भाजपा को मिली है वह इतनी कम है कि चुनावी गिनती के समय कितनी ही सीटों पर ऐसा लगता था कि जनता ने कांग्रेस को ही वोट दिया है.

गुजरात का इलाका दशकों से कट्टर और कट्टर विरोधियों का गढ़ रहा है. एक तरफ यहां के ऊंची जातियों के लोग अपनेआप को धर्मश्रेष्ठ मनवाने की कोशिश करते हुए भक्ति रस में अपने को डुबोते रहे हैं तो दूसरी ओर वर्णव्यवस्था की बंदिशों को तोड़ने वाली कर्मठ जातियां धर्म के सहारे ही अपने वजूद को बचाने की कोशिश करती रही हैं. यहां के लोगों की अपनी जो भी समृद्धि है, उस के लिए वे कर्मठता को कम, पूजापाठ को ज्यादा श्रेय देते रहे हैं.

इसी को राजनीति में पहले रामधुन से भुनाया गया है और अब मंदिर वहीं बनाएंगे से. 2017 के चुनावों में राहुल गांधी समेत सभी नेताओं को राज्य के सभी मंदिरों में मत्थे टेकने पड़े. राज्य के बड़े कारखानों, व्यापारियों की मंडियों, बांधों, नहरों, बंदरगाहों की चर्चा कम रही. नरेंद्र मोदी ने खुद बुलेट ट्रेन की बात करनी बंद कर दी और राहुल गांधी कितने हिंदू हैं, इस पर चर्चा चलवा दी. यह गुजराती मानस के दिल को छूने वाली बात है जो दशकों से अपने से ऊंची जाति के पायदान पर खड़े होने के चक्कर में ज्यादा लगा रहता है बजाय सफल व्यापार को सरल बनवाने के.

यह व्यापारी वर्ग जम कर जीएसटी और नोटबंदी का विरोध कर रहा है पर वोट देते समय उसे फिर अपनी पहली प्राथमिकता नजर आ गई. नरेंद्र मोदी अपने राज्य में जीत गए, पर हां, 2012 के मुकाबले में 12 सीटों को हार कर, 2014 के लोकसभा चुनावों के आधार पर 65 विधानसभा क्षेत्रों में हार कर. पर जीत वे गए ही हैं और इसी के साथ जीएसटी व नोटबंदी भी जीत गई हैं.

इस जीतहार का अगले सालों पर असर पड़ेगा. राहुल गांधी अब टक्कर की पार्टी खड़ी कर सकेंगे. नरेंद्र मोदी को दूसरे राज्यों के चुनावों की खास तैयारी करनी होगी. अब विकास और स्वच्छ शासन की बातों का भरोसा कम रहेगा. चुनाव धर्म के नाम पर लड़े जाएंगे.