सरस सलिल विशेष

सीरियल ‘क्यों होता है प्यार’ से अभिनय कैरियर की शुरुआत करने वाले अमित साध ने अब तक चंद सीरियलों के अलावा ‘काई पो चे’, ‘गुड्डु रंगीला’, ‘सुल्तान’ सहित कुछ अन्य फिल्मों में भी अभिनय कर अपनी अलग छाप छोड़ी है. अब वे अपनी नई फिल्म ‘रनिंग शादी डौट काम’ को ले कर काफी उत्साहित हैं. इस फिल्म में उन की जोड़ी फिल्म ‘पिंक’ फेम अदाकारा तापसी पन्नू के संग है. बौलीवुड के अन्य कलाकारों के मुकाबले वे कुछ अलग तरह के कलाकार हैं. उन्हें ऐडवैंचर बहुत पसंद है. वे साइकिल व बाइक पर लंबी यात्राएं करते रहते हैं. 2019 में माउंट एवरेस्ट फतह करने की योजना बना रहे अमित साध ने अपनी अब तक की यात्राओं, अपने ऐडवैंचर, अपनी भविष्य की योजनाओं आदि को ले कर बात की.

बौलीवुड में अकसर खुद के गायब हो जाने की चर्चाओं पर अमित से जब कम काम करने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा, ‘‘मैं गायब नहीं होता. मैं ऐडवैंचरस इंसान हूं. हर फिल्म की शूटिंग खत्म करने के बाद मैं बाइक पर घूमने निकल जाता हूं. मुझे हिमालय बहुत पसंद है. मैं लद्दाख 6 बार बाइक पर घूमा हूं. मैं ने कारगिल, ग्रास, मेन लद्दाख की 6 बार बाइक से यात्राएं की हैं. अभी मैं मनाली की यात्रा साइकिल से करने वाला हूं, पिंडारी ग्लेशियर चढ़ा हूं. 2019 में माउंट एवरेस्ट चढ़ने की योजना पर काम कर रहा हूं. मुझे ऐडवैंचर बहुत पसंद है इसलिए भी मैं खुश रहता हूं. फिल्मों की शूटिंग कर के मैं कुछ ऐडवैंचर्स करने निकल जाता हूं. लोगों को लगता है कि मैं नाराज हूं, गुस्सैल हूं, मेरे पास काम नहीं है, मैं कहीं गायब हो गया हूं वगैरावगैरा. दरअसल, एक चीज को देखने का नजरिया हर किसी का अलग होता है.’’

अपनी इन ऐडवैंचर्स व बाइक यात्राओं के अनुभव साझा करते हुए वे कहते हैं, ‘‘इन यात्राओं के दौरान मैं जमीन से जुड़े जिन लोगों से मिला, उन्होंने मुझे भी जड़ों से जोड़ कर रखा. इसलिए मेरा एक ब्ल्यूपिं्रट बन चुका है कि मुझे क्या करना है. हकीकत यह है कि फिल्मों में कलाकार को बिगाड़ा जाता है, यहां कोई कलाकार के लिए खाना ले आता है तो कोई पीने का कोई सामान ले आता है. इतनी सुविधाएं कलाकार को मिल जाती हैं कि वह बिगड़ जाता है. पर जब आप आम लोगों के बीच बैठते हैं, तो वे आप को आप की जड़ों से जुड़े रहने पर विवश करते हैं. इसलिए फिल्म की शूटिंग खत्म करने के बाद मैं एक आम इंसान बन कर आम लोगों के पास पहुंच जाता हूं. मुझे 14 से 15 हजार फुट ऊंचाई पर, बढ़ी हुई दाढ़ी के साथ, 8-10 लोगों के साथ जमीन पर बैठ कर कढ़ीचावल खाते हुए मजा आता है. मुझे पहाड़ों में टैंट में सोने में आनंद की अनुभूति होती है. ये सारी चीजें मुझे लोगों के साथसाथ कुदरत से भी जोड़ कर रखती हैं. जिस दिन आप का लगाव, आप का जुड़ाव प्रकृति से खत्म हो जाता है उस दिन आप भले ही दुनिया की बड़ी से बड़ी ताकत बन जाएं पर आप की जिंदगी खत्म हो जाती है.’’

वे आगे भी इसी तरह की यात्राओं की योजना बना चुके हैं. उन के मुताबिक, ‘‘सितंबर माह में मुंबई से एनएच 10 पकड़ कर पंजाब, जम्मूकश्मीर होते हुए 18,500 फुट लेह, खंडूरा पर जाऊंगा. फिर नीचे आते हुए लखीमपुर, खीरी जाऊंगा. वहां से काठमांडू, सिलीगुड़ी और भूटान जाऊंगा. भूटान जाने के लिए हम ने इजाजत मांगी है. वहां से असम होते हुए नगालैंड में मैं अपनी बाइकयात्रा खत्म करूंगा.’’ वे आगे कहते हैं, ‘‘पहाड़ मुझे हमेशा बुलाते रहते हैं. मुझे पहाड़ों पर जा कर बहुत सुकून मिलता है. मैं ने जो यह रूट चुना है, इस में संघर्ष बहुत ज्यादा है. इस रूट पर पहाड़ हैं, टूटेफूटे रास्ते हैं. यह यात्रा मैं 550 सीसी बुलेट पर करूंगा. यदि किसी ने स्पौंसर कर दिया, तो बेहतर होगा. मेरे लिए अब अच्छी बात यह है कि पहले यह सब करने के लिए अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़ते थे, अब मुझे यह सब मुफ्त में करने का मौका मिल रहा है.’’

इस तरह के रूट बनाने के पीछे सोच क्या है, इस पर अमित बताते हैं, ‘‘सोच कुछ नहीं. वजह यह है कि मुझे 2 अच्छे लोगों का साथ मिल गया है. ये जमीन से जुड़े लड़के हैं. बहुत विनम्र हैं. इन में से एक है दीपक जो कि साइकिल चैंपियन है. यह पीछे वाले पहिए पर 40 किलोमीटर साइकिल चलाता है. हवा में साइकिल उछाल देता है. दूसरा लड़का है गैरी दत्त. इन दोनों से मेरा मेलमिलाप बहुत ज्यादा है. हम लोग साइकिल के जरिए आपस में बहुत मिलते हैं.

जब हम लोगों ने बैठ कर विचारविमर्श किया कि कहां जाना है, तो किसी ने असम कहा, मैं ने काठमांडू कहा. मैं काठमांडू जाना चाहता था क्योंकि मैं ने काठमांडू में फिल्म ‘यारा’ की शूटिंग की थी. वहां पर भूकंप आ चुका है जो हैरिटेज साइट है, वहां पर हम ने गाना फिल्माया था. मैं ने कहा कि जब हम लोग इस यात्रा पर जा रहे हैं तो काठमांडू के उस हैरिटेज क्षेत्र की भूकंप आने के बाद क्या स्थिति है, देखने जाना चाहूंगा. इस के अलावा इस बार हम लोग इस पूरी यात्रा को फिल्मा भी रहे

हैं. हमारी पूरी टीम जा रही है. 10 कैमरामैंस की टीम है. यह काम बहुत बड़े पैमाने पर हो रहा है.’’

इस यात्रा को फिल्माने की वजह पर वे कहते हैं, ‘‘हम इस यात्रा को फिल्मा कर दुनिया को भी दिखाना चाहते हैं. दुनिया को बताना चाहते हैं कि हमारा देश क्या है. हम लोग रास्ते में गांव में रुकेंगे. वहां के लोगों से बातचीत करेंगे. हमारी योजना यह है कि यदि किसी गांव में 20-22 साल की युवा लड़की मिली और उस ने कहा कि उसे बाइक चलानी आती है पर उसे बाइक चलाने का मौका नहीं मिलता है, तो हम उसे अपनी बाइक देंगे और अपने साथ चलने के लिए कहेंगे. पूरे 40 दिनों की हमारी यह यात्रा है. हम लोगों ने कई योजनाएं बना रखी हैं.’’

अब तक की गई यात्राओं में सब से ज्यादा किन जगहों ने प्रभावित किया? इस सवाल पर अमित बताते हैं, ‘‘हमारा देश तो गांव का देश है. पर मैं ने बेहतरीन गांव पाया मुक्तेश्वर में. नैनीताल से 5 किलोमीटर की दूरी पर मुक्तेश्वर है. वहां बहुत कम लोग जाते हैं क्योंकि नजदीक में कोई एयरपोर्ट नहीं है. साधन उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए भी लोग कम जाते हैं. यदि मुक्तेश्वर के आसपास एयरपोर्ट होता, तो दिल्ली वाले जरूर पहुंचते. दिल्ली से मुक्तेश्वर जाने के लिए 12 घंटे चाहिए, इसलिए लोग नहीं जाते. वहां पर एक जगह है, सरगा खेत. मैं ने सरगा खेत में कैपिंग की थी. मुझे वह जगह इतनी पसंद आई थी कि मैं वहां कई माह रुका. मैं ने वहां नौकरी भी की है. उस गांव से मेरा लगाव हो गया. हर वर्ष मौका मिलते ही मैं 4-5 दिनों के लिए उस गांव में जाता रहता हूं.’’

वे आगे कहते हैं, ‘‘जब 2015 में फिल्म ‘सुल्तान’ की शूटिंग दिल्ली में कर रहा था, 4 दिनों की छुट्टी थी, तो मैं सरगा खेत चला गया था. एक जगह और है – पीपला. वहां एक एनजीओ काम कर रहा है – चिराग (सैंट्रल हिमालयन रूरल ग्रुप). उस एनजीओ ने पहाड़ों पर बहुत अच्छा काम किया है. उन के साथ मिल कर हम ने भी कुछ दिन काम किया. वह बहुत शानदार अनुभव रहा. उन सब के जीवन की सरलता मुझे भाती है. बिना किसी कारण मुहब्बत करने की उन की जो क्षमता है, वह मुझे उन तक खींच कर ले जाती है.’’