लघुकथा

जिंदगी की खुशियों को अपनी मुट्ठी में भर लेना चाहती थी आनंदी, लेकिन खुशियां उस की मुट्ठी से रेत की तरह फिसलती गईं. पति को पा न सकी और बेटे को अपने ही हाथों दूर कर दिया. नियति ने कैसा खेल खेला था उससे.

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