शादी क्या की, उन की खरीदी हुई गुलाम हो गई. जब जी में आया फोन कर देंगे, ‘डार्लिंग, आज कुछ लोगों को डिनर पर बुलाया है, खाना तैयार रखना.’ कभी कोई कोलाबा से आ रहा है तो कोई अंधेरी से. जब कहती हूं, मैं तुम्हारे बच्चे को संभालूं या खाना बनाऊं तो बड़े प्यार से कहेंगे, ‘डार्लिंग, तुम खाना ही इतना अच्छा बनाती हो कि बस, खाने वाले उंगलियां चाटते रह जाते हैं. रोहन को मैं आ कर संभाल लूंगा.’ अब मैं क्या बताऊं, लीना के यहां 3 और निर्मला के यहां 2 नौकर हैं. यहां तक कि दांत से पैसा पकड़ने वाली उमा के यहां भी चौबीसों घंटे काम करने के लिए आया है और बाजार के काम के लिए एक लड़का अलग. और एक हम हैं कि दिनरात काम की चक्की में पिसते रहते हैं.

जनाब को औफिस जाना है, सुबह 7 बजे नाश्ता चाहिए. खाना घर से बन कर जाएगा. और दिनभर रोहन का काम अलग, नहलाना, धुलाना, खिलाना, पिलाना. एक मिनट की भी फुरसत नहीं मिलती. जब कहती हूं, बच्चा संभालने को एक आया ही रख लो तो मुसकरा कर टाल जाते हैं. इन का बस चले तो ये चौकाबरतन करने वाली को भी निकाल बाहर करें. ठीक है, जब शादी की थी तब प्राइवेट कंपनी में सीए थे. शिवाजीनगर में छोटे से फ्लैट में रहते थे.

लेकिन आज बांद्रा में अपना 4 कमरों का फ्लैट है. घर में टैलीविजन, फ्रिज, कार है और खुद का अपना औफिस है. शादी के 7 सालों में तरक्की तो बहुत की, लेकिन सोच वही है. अब कहती हूं कि  आप गाड़ी के लिए कोई शोफर क्यों नहीं रख लेते तो झट कहेंगे ‘डार्लिंग, तुम गाड़ी चलाना क्यों नहीं सीख लेतीं? अमेरिका में भी तो लोगों को नौकर नहीं मिलते. अपना काम खुद ही करना चाहिए.’

दिल जल कर खाक हो जाता है. आखिर तरक्की का मतलब ही क्या, जब इंसान अपना स्टैंडर्ड भी मेंटेन न रख सके. पड़ोसी क्या सोचेंगे, कम से कम इतना तो समझना चाहिए.

शांता के कदम तेजी से सड़क पर बढ़तेबढ़ते अचानक पार्क की चारदीवारी के पास आ कर थम गए. वह घर से इतनी दूर चली आई, पर सोचा ही नहीं कि  जाना कहां है. वह गुस्से में रोहन को उमा के यहां छोड़ कर चल पड़ी.

ठीक है, थोड़ा वक्त पार्क में ही काटा जाए. वे घर पहुंचेंगे तो अपनेआप रोहन को संभालेंगे. आखिर हद होती है हर बात की. पता चलेगा बच्चे को कैसे पालते हैं. और रोहन भी तो कितना शैतान हो गया है, बिलकुल बाप पर गया है.

ये भी पढ़ें- नो बौल विद फ्री हिट : प्यार की सच्ची कहानी

शांता पार्क में दाखिल हुई और दोनों तरफ बनी पत्थर की बैंचों के बीच तेज कदमों से चलती हुई पार्क के बीचोंबीच बने गोलाकार घेरे तक आ पहुंची. ‘ओह, कितनी उमस है, फौआरा भी टूट गया है.’

एक बार वह कई वर्षों पहले इसी पार्क में अपने पति के साथ आई थी. उस समय भी यही चने वाला दरवाजे के सामने बैठता था. लेकिन सूरज डूबने से पहले आज वह यहां पहली बार आई है.

शांता अनमनी सी हरे रंग की एक खाली आधी टूटी बैंच पर जा बैठी. टूटे हुए फौआरे के चारों तरफ लकड़ी की  7 बैंचें पड़ी हैं. सभी बैंचें भरी हुई हैं. ज्यादातर बैंचों पर वक्त गुजारने की गरज से इकट्ठे हुए रिटायर वृद्धों की जमात विराजमान है. आखिर इन्हें करना भी क्या है? जाना ही कहां है?

बच्चे कहीं बैडमिंटन खेल रहे हैं तो कहीं क्रिकेट. बाईं ओर हरीहरी दूब में कई जोड़े दुनिया से बेखबर अपनेआप में खोए हुए हैं. लगता है, मुंबई में रोमांस के लिए इस से बढि़या कोई जगह नहीं है. आसमान पर छाई लाली पर अंधेरा मंडराने लगा है. हवा थम गई है. शांता को लगा पसीना उस के ललाट से चू कर कपोल तक आ जाएगा. अजीब उमस है.

‘टाइगर, टाइगर’ की आवाज, फिर कुत्ते की भौंभौं और फिर दबी गुर्राहट. शांता ने दायीं ओर देखा. पार्क के दूसरे गेट से एक नौकरानी कुत्ते को हवाखोरी के लिए लाई थी. कुत्ता इधरउधर बेकाबू हो कर भाग रहा था और लड़की थी कि उस की जंजीर पकड़ने के लिए उस के पीछेपीछे भाग रही थी.

शांता ने ठंडी सांस ली. काश, यह नजारा कोई हमारे उन को दिखाए. लोग कुत्तों की हवाखोरी के लिए भी नौकरनौकरानियां रखते हैं और एक हमारे पति हैं जो 5,000 रुपए की साड़ी तो खुशीखुशी ला देंगे, लेकिन नौकर का जिक्र छेड़ते ही मुंह बना लेंगे. आखिर पैसा होता किसलिए है? आराम के लिए न.

कांवकांव करता हुआ एक कौआ पास वाले बिजली के खंभे पर आ बैठा. शांता ने पीछे नजर घुमाई. उस के पीछे 2 झूले लगे हैं, जिन पर रंगबिरंगे कपड़े पहने बच्चे झूल रहे हैं. साड़ी पहने, बालों को बड़े फैशन से सजाए बनीठनी एक आया लाल प्रैम में एक गोलमटोल बच्चे को बिठाए उसी तरफ बढ़ रही है. बच्चा खुशीखुशी हाथपैर मार रहा है, किलकारी मार रहा है. कितना प्यारा बच्चा है. एकदम नन्हा गुलाब. रोहन भी जब इतना बड़ा था, ठीक ऐसा ही था.

आया ने प्रैम खड़ी कर दी और दूसरे बच्चों को ले कर आई, पहले से जमा अपनी सहेलियों में जा मिली. बच्चे तो अपनेआप खेल ही रहे हैं. सहेलियों की महफिल गरम हो जाती है.

‘‘लिली, आज देर से आया?’’

‘‘क्या करें मेमसाब छुट्टी देर से दिया.’’

‘‘हाय, मां.’’

‘‘साब और मेमसाब कुत्तों का माफिक लड़ता और खालीपीली बोम मारता. हम तो तंग आ गया.’’

‘‘अरे, तुम बोला क्यों नहीं कि पार्क में हमारा बौयफ्रैंड वेट कर रहा होगा? हम देर से जाएगा तो वह किसी और के साथ मौज उड़ाएगा.’’

‘‘हाय, मां.’’

‘‘मालूम है, जब हमारा साब काम पर जाता तो हमारी मोटल्ली मेमसाब चालीस नंबर वाले से इश्क फरमाता है.’’

‘‘ऐसा भी होता है.’’

‘‘उस का भेजा खलास हो गया है. दिनभर फिल्मी गाने गाता. शाम होते ही साब, मेमसाब क्लब जाता और भेजा खाने कू बच्चा लोग को हमारे पास छोड़ जाता.’’

‘‘अच्छा.’’

‘‘ले, लिली, आ गया तेरा रोमियो. देख, तुझे बुला रहा है. ठाठ हैं तेरे. हमें तो कोई देखता ही नहीं.’’

लिली प्रैम छोड़ कर भागी. पीछे उस की हमउम्र और उम्र में बड़ी सभी सहेलियां खीसें निपोर रही हैं.

‘अरे, यह रोमियो तो हमारी ही बिल्ंिडग का चौकीदार है. ओह, तो यह चौकीदारी हो रही है?’ शांता मन ही मन सब सोच कर हैरान हो गई.

ये भी पढ़ें- इस में बुरा क्या है : लड़की की खूबसूरती की कहानी

मासूम बच्चे को प्रैम में शायद अपने अकेले होने का एहसास हो चुका था. उधर लिली और चौकीदार बांहों में बांहें डाले मस्ती कर रहे थे. अरे, यह क्या? दोनों मेहंदी की झाडि़यों के पीछे गायब हो गए.

बच्चा जोरजोर से रो रहा था. कान के परदे फटे जा रहे थे. अरे, यह क्या, बच्चा प्रैम में बैठ कर, पैर लटका कर उतरने की कोशिश करने लगा. अरे, वह तो गिर जाएगा. अरे, उसे कोई पकड़ो. लेकिन उसे कोई बचाता, तब तक धम्म की आवाज के साथ बच्चा नीचे गिर गया.

झाड़ी से निकल कर छेड़ी हुई बाघिन की तरह लिली आती है और बच्चे को उठा कर तड़तड़ 2 चांटे जड़ देती है, ‘‘हम को बात भी नहीं करने देगा.’’ बच्चा सहम कर चुप हो जाता है. लेकिन शांता को लगा जैसे किसी ने तड़तड़ 2 चांटे उस के गालों पर बेरहमी से रसीद कर दिए हों और मारने वाले के हाथों के निशान उस के अपने गालों पर उभर आए हों.

‘‘मेरा रोहन…’’ एकाएक शांता चीखती हुई उठी और बदहवास पार्क के दरवाजे की तरफ भाग खड़ी हुई.

लिफ्ट से निकल कर जैसे ही तेज कदमों से शांता उमा के फ्लैट की तरफ बढ़ी कि अचानक उस के कदम रास्ते में खड़े रोहन को गोद में उठाए, मुसकराते पति को देख कर थम गए.

‘‘मम्मा,’’ रोहन ने दोनों बांहें उस की तरफ फैला दीं. लपक कर शांता ने उसे अपने गले से लगा लिया और बुरी तरह चूमती हुई अपने फ्लैट की तरफ भाग खड़ी हुई. पीछे से उस के कानों में पति की आवाज टकराई. लेकिन शांता के पास पति की बात का उत्तर देने को शब्द नहीं, आंसू थे.

Tags:
COMMENT