Social Story in Hindi .‘‘सपना... ओ सपना... कहां मर गई. सुनील के लिए एक कप चाय बना दे. 2 परांठे भी सेंक देना,’’ मां सुनील की ओर लाड़ से देख कर बोलीं.
सपना जल्दी से घड़े से एक गिलास पानी निकाल कर चुपचाप रख गई. थोड़ी देर में वह नीची नजरों से दुपट्टा ठीक करती हुई परांठे, अचार और चाय ले कर आई.
सुनील ने चाय पकड़ने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया और नजरें बचा कर उस के हाथ को धीरे से दबा दिया. सपना ने कसमसा कर धीरे से हाथ खींच लिया और वहां से चली गई.
सपना सुनील की हरकतों से परेशान थी, लेकिन बाबूजी से कैसे कहे? मां कुछ समझना ही नहीं चाहतीं.
सपना संकोची स्वभाव की दब्बू लड़की थी. जब से उस का भाई नीरज मां के गहने ले कर भागा था, तब से घर का माहौल बहुत खराब हो गया था. रहीसही कसर किराएदार सुनील ने पूरी कर दी.
एक बार सपना ने मां से कहा भी था, ‘अम्मां, मुझे सुनील अच्छा नहीं लगता.’ इस पर मां चिल्ला पड़ी थीं, ‘क्यों, क्या वह तुझे खा जाएगा?’
मां निर्मला अपनी नासमझ बेटी सपना की अक्ल पर तरस खाती थीं कि कैसे समझाएं इसे. वे सोचतीं, ‘बेवकूफ लड़की, फंसा ले इस लड़के को, नहीं तो सारी उम्र कुंआरी रह जाएगी. तेरा बाप तो तेरी शादी जिंदगीभर नहीं कर पाएगा.’
सपना के पापा नरेश एक प्राइवेट दुकान में सेल्समैन थे. छोटी सी तनख्वाह में किसी तरह गुजरबसर हो जाती थी. जब से बेटी सपना बड़ी हो गई थी, तब से उस के ब्याह के लिए वे थोड़ा चिंतित रहते थे.
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