Story in Hindi
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अचानक तभी डिंपल भी जोरजोर से चीखने और हंसने लगी. उस के बाल खुल कर बिखर गए. अब तो गांव वाले और हैरानपरेशान हो गए. इस गांव के ही नहीं, बल्कि आसपास के बीसियों गांवों में कभी ऐसा नहीं हुआ था कि किसी औरत में देवी आई हो. डिंपल की आवाज में भी फर्क आ गया था. एक बुढि़या ने डरतेडरते पूछा, ‘‘आप कौन हैं, जो इस सीधीसादी लड़की में प्रवेश कर गए हो?
हे महाराज, आप देव हैं या देवी?’’ डिंपल भी चीखतीउछलती लटूरी देवता की पिंडी के पास पहुंच गई थी. वह जोर से बोली, ‘‘मैं महाकाली हूं. आज मैं पाखंडियों को सजा दूंगी. अब काली और महाकाली आ गई हैं, अब दुष्टों को दंड जरूर मिलेगा,’’ कह कर उस ने पिंडी के पास से दराट उठाया और बकरे का सींग पकड़े छांगू के हाथ पर दे मारा. छांगू चेले की उंगलियों की 2 पोरें कट कर नीचे गिर गईं.
वह दर्द के मारे चिल्लाने और तड़पने लगा. ‘‘बकरे, जा अपने घर, तु?ो कोई नहीं काट सकता. जा, घर जा,’’ डिंपल ने उछलतेकूदते कहा. बकरा भी माधो के घर की तरफ दौड़ गया. यह सब देख कर लोग जयजयकार करने लगे. अब तक तो सभी ने हाथ भी जोड़ लिए थे.
बच्चे तो अपनी मां से चिपक गए थे. डिंपल ने दराट लहराया, फिर चीखते और उछलते हुए बोली, ‘‘बहन काली, गुर और उस के ?ाठे साथियों से पूछ कि सच क्या है, वरना इन्हें काट कर मैं इन का खून पीऊंगी.’’ ‘‘जो आज्ञा. खालटू गुर, जो पूछूंगी सच कहना. अगर ?ाठ कहा, तो खाल खींच लूंगी.
आज सारे गांव के सामने सच बोल.’’ डिंपल ने एक जोर की लात खालटू को दे मारी. दूसरी लात कांता ने मारी, तो वह गिरतेगिरते बचा. गलत आदमी भीतर से डराडरा ही रहता है. डर के चलते ही खालटू ने सीधीसादी लड़कियों में काली और महाकाली का प्रवेश मान लिया था. छांगू की कटी उंगलियों से बहते खून ने उसे और ज्यादा डरा दिया था,
जबकि वह खुद में तो ?ाठमूठ का देवता ला देता था. लातें खा कर वह डर के मारे उन के पैर पड़ गया और गिड़गिड़ाया, ‘‘मु?ो माफ कर दीजिए माता कालीमहाकाली, मु?ो माफ कर दीजिए.’’ दर्द से तड़पते छांगू चेले ने अपनी उंगलियों पर रूमाल कस कर बांध लिया था.
गुर को देख कर डर और दर्द के मारे वह भी रोते हुए उन के पैर पड़ गया, ‘‘मु?ो भी माफी दे दो माता.’’ डिंपल ने गुर की पीठ पर कस कर लात मारी और बोली, ‘‘मैं महाकाली खप्पर वाली हूं. सच बता रे खालटू, या फिर तेरी गरदन काट कर तेरा सारा खून पी जाऊं,’’
डिंपल ने हाथ में पकड़ा दराट लहराया, तो वह डर के मारे कांप गया. ‘‘बताता हूं माता, सच बताता हूं. गांव वालो, माधो का बकरा खाने के लिए हम ने ?ाठमूठ की अफवाहें फैला कर माधो और डिंपल पर ?ाठा आरोप लगाया था. मु?ा में कोई देवता नहीं आता है. मैं, चेला छांगू, मौहता भागू, कारदार सब से ठग कर माल ऐंठते थे. ‘‘हम सारे दूसरों की औरतों पर बुरी नजर रखते थे.
मु?ो माफ कर दीजिए. आज के बाद मैं कभी बुरे काम नहीं करूंगा. मु?ो माफ कर दीजिए.’’ डिंपल और कांता की 2-4 लातें और खाने से वह रो पड़ा. अब तो कारदार भी उन दोनों के पैरों में लौटने लगे थे. ‘‘तू सच बता ओ छांगू चेले, नहीं तो तेरा सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा,’’ कांता ने जोर की ठोकर मारी तो वह नीचे गिर पड़ा, फिर उठ कर उस के पैर पकड़ लिए.
‘‘गांव के भाईबहनो, मैं तो चेला बन कर तुम सब को ठगता था. कई लड़कियों और औरतों को अंधविश्वास में डाल कर मैं ने उन से कुकर्म किया, उन से रुपएपैसे ऐंठे. मु?ो माफ कर दीजिए माता महाकाली. आज के बाद मैं कभी बुरे काम नहीं करूंगा.’’ गुर, चेले, मौहता और कारदारों ने सब के सामने सच उगल दिया. डिंपल और कांता ने उछलतेचीखते उन्हें लातें मारमार कर वहां से भागने पर मजबूर कर दिया. एक नौजवान ने पेड़ से एक टहनी तोड़ कर कारदार और मौहता भागू को पीट दिया.
डिंपल और जोर से चीखी, ‘‘जाओ दुष्टो, भाग जाओ, अब कभी गांव मत आना.’’ वे सारे सिर पर पैर रख कर भाग गए और 2 मील नीचे लंबा डग नदी के तट पर जीभ निकाले लंबे पड़ गए. उन की पूरे गांव के सामने पोल खुल गई थी. वे एकदूसरे से भी नजरें नहीं मिला पा रहे थे. कांता ने उछलतेचीखते जोर की किलकारी मारते हुए गुस्से से कहा, ‘‘गांव वालो, ध्यान से सुनो. खशलोहार के नाम पर रास्ते मत बांटो, वरना मैं अभी तुम सब को शाप दे दूंगी.’’
‘माफी काली माता, शांत हो जाइए. आप की जय हो. हम रास्ते नहीं बांटेंगे. माफीमाफी,’ सैकड़ों मर्दऔरत एक आवाज में बोल उठे. बच्चे तो पहले ही डर के मारे रोने लगे थे. काली और महाकाली के डर से अब खश खश न थे और लोहार लोहार न थे, लेकिन वे सारे गुर खालटू, चेले, मौहता व कारदारों से ठगे जाने पर दुखी थे. ‘माफी दे दो महाकाली माता. आप दोनों देवियां शांत हो जाइए.
हमारे मन का मैल खत्म हो गया है. शांत हो जाइए माता,’ कई औरतें हाथ जोड़े एकसाथ बोलीं. ‘‘क्या माफ कर दें बहन काली?’’ ‘‘हां बहन, इन्हें माफ कर दो. पर ये सारे भविष्य में ?ाठे और पाखंडी लोगों से सावधान रहें.’’ ‘हम सावधान रहेंगे.’ कई आवाजें एकसाथ गूंजीं. कुछ देर उछलतेचीखते और दराट लहराने के बाद डिंपल ने कहा, ‘‘काली बहन, अब लौट चलें अपने धाम.
हमारा काम खत्म.’’ ‘‘हां दीदी, अब लौट चलें.’’ डिंपल और कांता कुछ देर उछलींचीखीं, फिर ‘धड़ाम’ से धरती पर गिर पड़ीं. काफी देर तक चारों ओर सन्नाटा छाया रहा. सब की जैसे बोलती बंद हो गई थी. जब काफी देर डिंपल और कांता बिना हिलेडुले पड़ी रहीं, तो कांता की दादी ने मंदिर के पास से पानी भरा लोटा उठाया और उन के चेहरे पर पानी के छींटें मारे. वे दोनों धीरेधीरे आंखें मलती हुई उठ बैठीं. वे हैरानी से चारों ओर देखने लगी थीं, फिर कांता ने बड़ी मासूमियत से अपनी दादी से पूछा, ‘‘दादी, मु?ो क्या हुआ था?’’ ‘‘और मु?ो दादी?’’ डिंपल ने भी भोलेपन से पूछा.
‘‘कुछ नहीं. आज सच और ?ाठ का पता चल गया है. लूट और पाखंड का पता लग गया है. जाओ भाइयो, सब अपनेअपने घर जाओ,’’ दादी बोलीं. धीरेधीरे लोग अपने घरों को लौटने लगे. दादी कांता का हाथ पकड़ कर बच्ची की तरह उसे घर ले गईं. डिंपल को उस की मां और बापू घर ले आए. शाम गहराने लगी थी और हवा खुशबू लिए सरसर बहने लगी थी. एक बार फिर डिंपल और कांता सुनसान मंदिर के पास बैठ कर ठहाके लगने लगी थीं. ‘‘बहन महाकाली.’’
‘‘बोलो बहन काली.’’ ‘‘आज कैसा रहा सब?’’ ‘‘बहुत अच्छा. बस, अब कदम रुकेंगे नहीं. पहली कामयाबी की तुम्हें बधाई हो कांता.’’ ‘‘तुम्हें भी.’’ दोनों ने ताली मारी, फिर वे अपने गांव और आसपास के इलाकों को खुशहाल बनाने के लिए योजनाएं बनाने लगीं. आकाश में चांद आज कुछ ज्यादा ही चांदनी बिखेरने लगा था.
कार्यक्रम छोटा था. 2-4 लोगों ने माला पहनाई और सविता मैम ने उन के माथे पर तिलक लगाया. वे उन के साथ हो रहे गलत बरताव को जानती थीं, पर खामोश ही रहती थीं.रिटायरमैंट के समय ही गंगाधर शास्त्री को एक लिफाफा दिया गया, जिस में उन की कुल जमापूंजी का चैक था. छोटा बेटा वहां आया और मां को मोटरसाइकिल पर बैठा कर ले गया.
चैक भी अपने बाबूजी से तकरीबन छीन कर ले गया.सविता मैम कुछ दूर तक गंगाधर शास्त्री के साथ पैदल चलीं, फिर वे भी लौट गईं. वे पैदल चलते हुए गांव के बाजार से निकले. गांव के लोगों ने उन्हें देखा और मुंह फेर लिया. अब तो उन्हें इस की आदत ही पड़ चुकी है.
गुडि़या के लिए ही तो उन्होंने सबकुछ झेला था. उन का कदम सही था या गलत, यह तो वे खुद भी नहीं जानते, पर इतना जरूर जान गए थे कि भलाई करने का फल इतना कड़वा नहीं होता.पैदल चलते हुए गंगाधर शास्त्री के सामने उन की पूरी जिंदगी किसी फिल्म की तरह सामने आ रही थी. गुडि़या से मिलने के पहले तक उन की जिंदगी एकदम शांत और इज्जत से भरी थी.
वे आंखें उठा कर भी किसी को देख लेते तो सामने वाला घबरा जाता था. पर समय ने ऐसा पलटा खाया कि आज उन्हें कोई घर तक छोड़ने नहीं जा रहा था.गंगाधर शास्त्री के घर के आंगन में दोनों बेटे बैठे थे. पत्नी अंदर थीं शायद. उन के कदम गेट के सामने आते ही रुक गए.
उन्हें अहसास हुआ कि उन के बेटों के चेहरों पर गुस्से के भाव थे और उन की आंखें ज्वाला पैदा कर रही थीं. बेटों के हाथ में वही चैक था, जो उन्हें रिटायरमैंट के समय मिला था. वे समझ गए कि उन के बेटों को पता चल गया है कि उन्हें उतने पैसे नहीं मिले हैं, जितना बेटे हिसाब लगाए बैठे थे. इस वजह से वे नाराज दिख रहे थे.गंगाधर शास्त्री ने धीरे से गेट खोला.
आज गेट खोलते समय उन्हें लग रहा था जैसे वे किसी पराए घर में दाखिल होने जा रहे हैं. यह गेट ही क्यों यह मकान भी उन्होंने कितने अरमानों के साथ बनवाया था. स्कूल से छुट्टी ले कर खुद दिनभर धूप में खड़े रहते थे और मजदूरों से कहते थे, ‘देखो भाई, मकान मजबूत बनाना.
मेरे बेटों के काम आ जाए बस. हमारा क्या है, हम ने तो अपनी जिंदगी जी ली.’आज गंगाधर शास्त्री को यह मकान पराया लग रहा था. उन्होंने गहरी सांस ली और अंदर दाखिल हो गए. उन्हें देख कर बेटों की आंखों में खून उतर आया. वे बहुत देर से अपने पिताजी की राह देख रहे थे.
अपने पिता को अंदर आता देख कर छोटा बेटा उबल पड़ा, ‘‘सारा पैसा अपनी ऐयाशी में उड़ा दिया… अब यहां क्यों आए हो…’’‘‘अपनी जबान संभाल छोटे…
क्या ऐयाशी बोले जा रहा है…’’ उन्हें भी गुस्सा आ गया.
‘‘क्या जबान संभालूं… आप ने जबान संभालने लायक छोड़ा ही कहां है…
ऐयाशी करते समय यह भी याद नहीं रहा कि आप ने 2 बेटों को पहले ही पैदा कर रखा है…’’ बड़े बेटे की जबान आग उगल रही थी.गंगाधर शास्त्री को समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या जबाव दें…
‘‘देखो बेटा, यह जो मुझे पैसा मिला है न, वह सारा तुम लोगों का ही है…’’‘‘इतना सा पैसा… अहसान जता रहे हो… इस से ज्यादा पैसा तो अपनी नाजायज औलाद गुडि़या पर लुटा चुके हो…’’ छोटे बेटे ने कहा.‘‘बकवास मत करो…’’
गंगाधर शास्त्री ने भी तेज आवाज में कहा. इस बात ने गुस्से से उबल रहे बेटों के लिए जैसे आग में घी डाल दिया. वे उठे और गंगाधर को धक्का दे कर गिरा दिया.‘‘जाओ यहां से, हमें आप से कोई मतलब नहीं है… जाओ अपनी ऐयाशी करो…’’
बड़े बेटे ने कहा.एकाएक धक्का लगने से गिरे गंगाधर शास्त्री की कराह निकल गई. उन के आंसू बह निकले. उन की चेतना शून्य होने लगी. चेतना शून्य होने के पहले उन के कानों ने किसी गाड़ी के रुकने की आवाज सुनी.
गुडि़या को पता था कि आज उस के बाबूजी रिटायर होने वाले हैं. वैसे तो वह उन के रिटायरमैंट कार्यक्रम में ही पहुंचना चाहती थी और कार्यक्रम में सब को बताना चाहती थी कि देखो, दलित होने के बाद भी बाबूजी ने उसे अपनाया और ढेर सारा रुपया खर्च कर के उसे पढ़ाया…
वह बाबूजी का अहसान कभी नहीं चुका सकती, पर वह समय पर नहीं पहुंच पाई.गाड़ी रुकते ही गुडि़या धड़धड़ाते हुए अंदर दाखिल हो गई.
गेट के सामने ही उस ने बाबूजी को जमीन पर गिरा देखा. उस के कानों में उन के कराहने की आवाज पहुंची. वह हैरान हो गई और ‘बाबूजी’ कहते हुए उस ने गंगाधर शास्त्री के सिर को अपनी गोद में रख लिया.गुडि़या को समझते देर नहीं लगी कि बाबूजी के बच्चों ने ही उन पर हमला किया है.
वह बिफर पड़ी, ‘‘किस ने गिराया है बाबूजी को…
बोल दो नहीं तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा…’’
उस का गुस्सा देख कर सारे लोग सहम गए. साथ आए पुलिस के जवान भी गुडि़या की आवाज सुन कर गेट के अंदर आ गए.गुडि़या चिल्लाई,
‘‘इन्हें जल्दी अस्पताल ले चलो…
और इन से तो मैं वापस आ कर निबटती हूं…
’’गंगाधर शास्त्री ने जब अपनी आंखें खोलीं, तो वे अस्पताल के बिस्तर पर थे. गुडि़या उन के सिर को सहला रही थी. उन्होंने गुडि़या को देखा, पर पहचान नहीं पाए.‘‘मैं कहां हूं?’’
गंगाधर शास्त्री ने पूछा.‘‘बाबूजी, आप अस्पताल में हैं…’’
‘बाबूजी…’ उन्हें यह आवाज सुनी सी लगी. उन्होंने फिर से उस ओर देखा और बोले,
‘‘गुडि़या…’’ उन की आवाज में दम आ गया था.‘‘हां बाबूजी, आप की बेटी…’’
कह कर गुडि़या उन के गले से लग गई. दोनों के आंसू बह रहे थे.
‘‘देखो बाबूजी, आप की गुडि़या कलक्टर बन गई है…’’
‘‘कलक्टर…’’ उन्होंने हैरत से उस की ओर देखा.‘‘हां बाबूजी…
यह सरप्राइज देने के लिए ही तो मैं ने आप को उस दिन कुछ बताया नहीं था और बीच में भी इसी वजह से फोन नहीं किया था.’’गंगाधर शास्त्री की आंखों से बहने वाले आंसुओं की रफ्तार तेज हो गई थी.
‘‘बाबूजी, आप ने मुझे यहां तक पहुंचाया है…
पिता बन कर मेरी देखभाल की है…
मैं आप का कर्ज तो कभी चुका ही नहीं सकती…’’
गुडि़या के आंसुओं ने भी रफ्तार पकड़ ली थी.‘‘मैं जानती हूं बाबूजी,
आप ने मेरे लिए क्याक्या नहीं सहा… मैं दलित जो थी.
सविता मैम मुझे सबकुछ बताती रहती थीं. पर बाबूजी, अब आप की बेटी आ गई है न…
आप के साथ हुई बेइज्जती का बदला मैं लूंगी…’’
कहते हुए गुडि़या ने अपने दांत भींच लिए थे.‘‘नहीं बेटी, ऐसा नहीं कहते. तू मेरी बेटी हो कर ऐसी बात कर रही है…’’‘‘नहीं बाबूजी…
आप की बेइज्जती का बदला तो मैं लूंगी ही. उन्होंने जिंदगीभर मेरी बेइज्जती की वह मुझे बरदाश्त है, पर कोई मेरे पिता समान बाबूजी की बेइज्जती करे, एक बेटी उसे कैसे सहन कर सकती है बाबूजी…’’
कहते हुए गुडि़या ने गंगाधर शास्त्री को अपनी बांहों में भींच लिया.‘‘तू तो पागल हो गई है… मेरी बेटी, ऐसा जिंदगी में कभी न सोचना और न ही करना.
किसी से बदला नहीं लिया जाता, बल्कि उसे बदलने की कोशिश की जाती है पगली…’’
गुडि़या कुछ नहीं बोली. वह खुद को अपने बाबूजी की बांहों में समेटे हुए थी. अस्पताल के मुलाजिम और गुडि़या के साथ आया स्टाफ बापबेटी के इस मिलन का गवाह बन रहा था. दूर कोने में गंगाधर शास्त्री की पत्नी और दोनों बेटे सिर झुकाए खड़े थे.
रवि कमरे से निकल गया. मगर उस की आंखों के पटल से मोनाली का वह दृश्य मिट नहीं पाया था. रवि ने भी फोन पर तनु को सम झाया कि जो कुछ उस ने देखा है वह ऐक्सिडैंटल एनकाउंटर मात्र था. एक दिन मोनाली ने रवि के कमरे में अपना मनपसंद रूम फ्रैशनर स्प्रे किया था. रवि कमरे में घुसते के साथ बोल पड़ा, ‘‘आज कोई स्पैशल खुशबू आ रही है कमरे में.’’
मोनाली वहीं कमरे में कुछ सजावट के सामान रख रही थी. उस ने कहा, ‘‘हां, मैं ने नया स्प्रे किया है. अच्छा नहीं लगा?’’
‘‘नो, नो. तुम्हारी चौइस लाजवाब है. बहुत अच्छा लगा.’’
उसी समय तनु वहां से गुजर रही थी और उस ने उन की बात सुनी. उसे पहली बार भय हुआ कि कहीं शायद अब वह रवि की प्रेमिका नहीं रही.
अगले दिन नए साल का पहला दिन था. नए मेहमान, मोनाली के पिता सुजीत अपनी पत्नी के साथ आए थे. प्रतीक ने रवि से उन का परिचय कराया. फिर प्रतीक और सुजीत दंपती आपस में बातें करने लगे.
सुजीत बोले, ‘‘क्यों न हम नए साल के दिन नए रिश्ते की बात करें? हम लोगों को और मोनाली को तो रवि बहुत पसंद है. आगे आप लोगों की क्या राय है?’’
प्रतीक बोले, ‘‘हम दोनों को तो मोनाली बहुत प्यारी लगी. एक बार रवि से बात कर सगाई की डेट रख लेते हैं.’’
उसी समय तनु चायनाश्ता ट्रे में ले कर आई और टेबल पर सजा गई. उस ने उन लोगों की बातें भी सुनी थीं. उस के दिल में बिजली सी कौंध गई. प्रतीक ने बेटे को आवाज दे कर बुलाया और सुजीत से परिचय करा उन के आने का मकसद बताया.
सुजीत ने रवि से कहा, ‘‘बेटे, तुम को पता है, हम लोग मोनाली के रिश्ते के बारे में तुम्हारी राय जानना चाहते हैं. सबकुछ तुम पर निर्भर करता है. निसंकोच बताना.’’
रवि बोला, ‘‘मु झे थोड़ा वक्त चाहिए.’’
सुजीत बोले, ‘‘हां, कोई जल्दी नहीं. सोच कर अपने पापा को बता देना. वैसे, शुभस्य शीघ्रं.’’
प्रतीक ने बेटे से कहा, ‘‘रात में न्यू ईयर की आतिशबाजी मोनाली को दिखा लाओ.’’
रवि का मन नहीं था, मगर सभी लोगों की जिद के आगे उसे झुकना पड़ा था. आतिशबाजी की जगह तनु भी अपने मातापिता के साथ गई थी. दोनों ने एक दूसरे को देखा, पर कोई बात नहीं हुई थी.
रवि बोला, ‘‘तो क्या हुआ? हम अमेरिकी हैं. यहां कर्म ही धर्म है. और तनु का परिवार भी एक तरह से हिंदू ही है, वे सब शाकाहारी भी हैं.’’
‘‘तुम्हें पता है कि मोनाली भी पांडे की इकलौती संतान है. वह परिवार भी काफी धनी है. उस पूरे परिवार की संपत्ति भी तुम्हीं लोगों को मिलेगी.’’
‘‘वाह पापा, अब धर्म से धन पर उतर आए. मैं नहीं मानता यह सब.’’
प्रतीक चिल्ला उठे, ‘‘तुम मानो, न मानो. तनु से शादी के पहले तुम्हें अपने मातापिता का क्रियाकर्म करना होगा.’’
दूसरे दिन प्रभा ने तनु की मां आशा को बुला कर उस से कहा कि वह उसे सम झाए कि वह रवि के रास्ते से हट जाए. आशा ने कहा, ‘‘मैं खुद नहीं चाहती कि दोनों की शादी हो. हमारे धर्म, रीतिरिवाज बिलकुल अलग हैं. अपनी बिरादरी में ही हम लोग शादी करते हैं. तनु के पापा भी यही चाहते हैं. वैसे, आप हमारी ओर से क्या चाहती हैं?’’
‘‘आशा, कुछ दिनों के लिए तनु हमारे घर नहीं आए. तुम ही कुछ समय निकाल कर काम कर दिया करो.’’
आशा बोलीं, ‘‘मुश्किल वक्त में आप ने हमें काम दिया था. मैं पहले जितना काम तो नहीं कर सकती, पर आप के कुछ जरूरी काम कर दिया करूंगी.’’
आशा ने घर जा कर तनु को सारी बातें बताईं. उसे सुन कर बहुत बुरा लगा. रवि को अगले दिन लौटना था. उस ने फोन कर तनु से मिलने को कहा.
रवि ने उस से कहा, ‘‘जो कुछ हम दोनों के घर में हो रहा है, तुम्हें पता ही होगा. मेरे मातापिता का कहना है कि उन के जीतेजी मैं तुम से शादी नहीं कर सकता हूं. पर मैं तुम्हें भी खोना नहीं चाहता. मु झ पर भरोसा करो, मोनाली में मेरी कोई रुचि नहीं है. वह मु झ पर थोपी जा रही है.’’
तनु बोली, ‘‘हर प्यार करने वाले को मनचाहा अंजाम मिले, जरूरी नहीं.’’
‘‘पर मैं खोना नहीं चाहता. 4-5 महीनों में दोनों की पढ़ाई पूरी हो रही है. मु झे फ्रीमौंट के विश्वविख्यात इलैक्ट्रिक कार बनाने वाली कंपनी टेस्ला में प्लेसमैंट मिल गया है. मेरा मन करता है विद्रोह कर तुम्हारे साथ घर बसा लूं. क्या तुम तैयार हो?’’
‘‘हरगिज नहीं. दोनों में से किसी परिवार में प्यार या आदर नहीं मिलेगा, न मु झे न तुम्हें. और तुम पुरुष हो, धनी भी हो, साहस कर सकते हो, पर मैं क्या करूं? मां ने मेड का काम कर के हमें पालपोस कर बड़ा किया है. उन की भी कुछ अपेक्षाएं होंगीं. और हम दोनों अपने परिवार की इकलौती संतान हैं. मैं मां की उपेक्षा नहीं कर सकती, भले ही अपने प्यार की बलि देनी पड़े.’’
रवि बोला, ‘‘तुम ने, तुम्हारे मातापिता ने संघर्ष किया है और इस की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, मैं मानता हूं. पर मेरे मम्मीपापा तो बस पुरानी सोच और रूढि़वादिता के शिकार हैं.’’
तनु ने कहा, ‘‘जैसे भी हों, हैं तो हमारे जन्मदाता. प्यार में जीतना ही हमारा लक्ष्य नहीं होना चाहिए. मेरे कुछ खोने से किसी को खुशी मिले, तो मु झे दोगुनी खुशी मिलती है.’’
रवि ने तनु का एक हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘तुम अब उपदेश देने लगीं. मैं तो चाहता था कि यह हाथ कभी न छोड़ूं.’’
‘‘दोनों के परिवार की प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए हमें कुछ त्याग करना होगा. विडंबना है कि हम अमेरिकी हो कर इतने दिनों बाद भी पुरानी सोच और ढोंग से उबर नहीं सके हैं. उम्मीद करो कि हम से आगे की पीढ़ी को ऐसी स्थिति का सामना न करना पडे़,’’ तनु बोली.
थोड़ी देर दोनों खामोश रहे. फिर तनु ने ही चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ‘‘एक खुशखबरी है. मेरा भी प्लेसमैंट टेस्ला के अकाउंट डिपार्टमैंट में हो गया है. पिछले वर्ष इंडियन प्राइम मिनिस्टर भी इस प्लांट में आए थे, तुम्हें याद होगा.’’
रवि बोला, ‘‘यह तो बहुत अच्छा है, तुम से मुलाकात तो होती ही रहेगी.’’
तनु बोली, ‘‘मैं कभी तुम्हारी मानिनी प्रियतमा थी, मानिनी पत्नी होने के सपने देखा करती थी. मौजूदा हालात में मु झे बहुत खुशी होगी अगर तुम मु झे आजीवन मानिनी मित्र सम झोगे. यह मेरे लिए सुकून की बात होगी.’’
तनु ने अपनी दोस्ती का दूसरा हाथ भी रवि की ओर बढ़ा दिया.