‘‘अभि, मैं आज कालिज नहीं आ रही. प्लीज, मेरा इंतजार मत करना.’’
‘‘क्यों? क्या हुआ वेदश्री. कोई खास समस्या है?’’ अभि ने एकसाथ कई प्रश्न कर डाले.
‘‘हां, अभि. मानव की आंखों की जांच के लिए उसे ले कर डाक्टर के पास जाना है.’’
‘‘क्या हुआ मानव की आंखों को?’’ अभि की आवाज में चिंता घुल गई.
‘‘वह कल शाम को जब स्कूल से वापस आया तो कहने लगा कि आंखों में कुछ चुभन सी महसूस हो रही है. रात भर में उस की दाईं आंख सूज कर लाल हो गई है.
आज साढ़े 11 बजे का
डा. साकेत अग्रवाल से समय ले रखा है.’’
‘‘मैं तुम्हारे साथ चलूं?’’ अभि ने प्यार से पूछा.
‘‘नहीं, अभि…मां मेरे साथ जा रही हैं.’’
डा. साकेत अग्रवाल के अस्पताल में मानव का नाम पुकारे जाने पर वेदश्री अपनी मां के साथ डाक्टर के कमरे में गई.
डा. साकेत ने जैसे ही वेदश्री को देखा तो बस, देखते ही रह गए. आज तक न जाने कितनी ही लड़कियों से उन की अपने अस्पताल में और अस्पताल के बाहर मुलाकात होती रही है, लेकिन दिल की गहराइयों में उतर जाने वाला इतना चित्ताकर्षक चेहरा साकेत की नजरों के सामने से कभी नहीं गुजरा था.
वेदश्री ने डाक्टर का अभिवादन किया तो वह अपनेआप में पुन: वापस लौटे.
अभिवादन का जवाब देते हुए डाक्टर ने वेदश्री और उस की मां को सामने की कुरसियों पर बैठने का इशारा किया.
मानव की आंखों की जांच कर
डा. साकेत ने बताया कि उस की दाईं आंख में संक्रमण हो गया है जिस की वजह से यह दर्द हो रहा है. आप घबराइए नहीं, बच्चे की आंखों का दर्द जल्द ही ठीक हो जाएगा पर आंखों के इस संक्रमण का इलाज लंबा चलेगा और इस में भारी खर्च भी आ सकता है.
हकीकत जान कर मां का रोरो कर बुरा हाल हो रहा था. वेदश्री मम्मी को ढाढ़स बंधाने का प्रयास करती हुई किसी तरह घर पहुंची. पिताजी भी हकीकत जान कर सकते में आ गए.
वेदश्री ने अपना मन यह सोच कर कड़ा किया कि अब बेटी से बेटा बन कर उसे ही सब को संभालना होगा.
मानव जैसे ही आंखों में चुभन होने की फरियाद करता वह तड़प जाती थी. उसे मानव का बचपन याद आ जाता.
उस के जन्म के 15 साल के बाद मानव का जन्म हुआ था. इतने सालों के बाद दोबारा बच्चे को जन्म देने के कारण मां को शर्मिंदगी सी महसूस हो रही थी. वह कहतीं, ‘‘श्री…बेटा, लोग क्या सोचेंगे? बुढ़ापे में पहुंच गई, पर बच्चे पैदा करने का शौक नहीं गया.’’
‘‘मम्मा, आप ऐसा क्यों सोचती हैं.’’ वेदश्री ने समझाते हुए कहा, ‘‘आप ने मुझे राखी बांधने वाला भाई दिया है, जिस की बरसों से हम सब को चाहत थी. आप की अब जो उम्र है इस उम्र में तो आज की आधुनिक लड़कियां शादी करती दिखाई देती हैं…आप को गलतसलत कोई भी बात सोचने की जरूरत नहीं है.’’
गोराचिट्टा, भूरी आंखों वाला प्यारा सा मानव, अभी तो आंखों में ढेर सारा विस्मय लिए दुनिया को देखने के योग्य भी नहीं हुआ था कि उस की एक आंख प्रकृति के सुंदरतम नजारों को अपने आप में कैद करने में पूर्णतया असमर्थ हो चुकी थी. परिवार में सब की आंखों का नूर अपनी खुद की आंखों के नूर से वंचित हुआ जा रहा था और वे कुछ भी करने में असमर्थ थे.
‘‘वेदश्रीजी, कीटाणुओं के संक्रमण ने मानव की एक आंख की पुतली पर गहरा असर किया है और उस में एक सफेद धब्बा बन गया है जिस की वजह से उस की आंख की रोशनी चली गई है. कम उम्र का होने के कारण उस की सर्जरी संभव नहीं है.’’
15 दिन बाद जब वह मानव को ले कर चेकअप के लिए दोबारा अस्पताल गई तब डा. साकेत ने उसे समझाते हुए बताया तो वह दम साधे उन की बातें सुनती रही और मन ही मन सोचती रही कि काश, कोई चमत्कार हो और उस का भाई ठीक हो जाए.
‘‘लेकिन उचित समय आने पर हम आई बैंक से संपर्क कर के मानव की आंख के लिए कोई डोनेटर ढूंढ़ लेंगे और जैसे ही वह मिल जाएगा, सर्जरी कर के उस की आंख को ठीक कर देंगे, पर इस काम के लिए आप को इंतजार करना होगा,’’ डा. साकेत ने आश्वासन दिया.
वेदश्री भारी कदमों और उदास मन से वहां से चल दी तो उस की उदासी भांप कर साकेत से रहा न गया और एक डाक्टर का फर्ज निभाते हुए उन्होंने समझाया, ‘‘वेदश्रीजी, मुझे आप से पूरी हमदर्दी है. आप की हर तरह से मदद कर के मुझे बेहद खुशी मिलेगी. प्लीज, मेरी बात को आप अन्यथा न लीजिएगा, ये बात मैं दिल से कह रहा हूं.’’
‘‘थैंक्स, डा. साहब,’’ उसे डाक्टर का सहानुभूति जताना उस समय सचमुच अच्छा लग रहा था.
मानव की आंख का इलाज संभव तो था लेकिन दुष्कर भी उतना ही था. समय एवं पैसा, दोनों का बलिदान ही उस के इलाज की प्राथमिक शर्त बन गए थे.
पिताजी अपनी मर्यादित आय में जैसेतैसे घर का खर्च चला रहे थे. बेटे की तकलीफ और उस के इलाज के खर्च ने उन्हें उम्र से पहले ही जैसे बूढ़ा बना दिया था. उन का दर्द महसूस कर वेदश्री भी दुखी होती रहती. मानव की चिंता में उस ने कालिज के अलावा और कहीं आनाजाना कम कर दिया था. यहां तक कि अभि जिसे वह दिल की गहराइयों से चाहती थी, से भी जैसे वह कट कर रह गई थी.
डा. साकेत अग्रवाल शायद उस की मजबूरी को भांप चुके थे. उन्होंने वेदश्री को ढाढ़स बंधाया कि वह पैसे की चिंता न करें, अगर सर्जरी जल्द करनी पड़ी तो पैसे का इंतजाम वह खुद कर देंगे. निष्णात डाक्टर होने के साथसाथ साकेत एक सहृदय इनसान भी हैं.
‘‘देखिए, सब से पहले आवश्यक है आप का अपने ऊपर विश्वास का होना. स्वयं को अबला नहीं, बल्कि दुनिया का सब से सशक्त इंसान समझने का वक्त है. यदि आप मानसिक और भावनात्मक रूप से मजबूत हैं तो विश्वास कीजिए कि कोई आप को हाथ तक नहीं लगा सकता. मैं शिक्षकों से भी कहना चाहूंगा कि वे बालिकाओं को मानसिक रूप से इतना मजबूत बनाएं कि अपने साथ होने वाले हर अनुचित व्यवहार का वे दृढ़ता से मुकाबला कर सकें. यदि कभी कोई आप के साथ किसी प्रकार की हरकत करता है तो आप उसे मुंहतोड़ जवाब दें. यदि फिर भी मसला न सुल झे, तो हमारे पास आइए, हम आप की मदद करेंगे.’’
‘‘पर सर, यदि कभी हमारे शिक्षक ही हमारे साथ कुछ ऐसावैसा करें तो? क्योंकि न्यूजपेपर में तो अकसर ऐसा ही कुछ पढ़ने में आता है.’’
‘‘तो…तो…उसे भी छोड़ने की कोई जरूरत नहीं है. शिक्षक है तो क्या हुआ, आप उस के सौ खून माफ कर देंगी? ऐसे व्यक्ति को शिक्षक बनने का अधिकार नहीं है.’’ सिटी एसपी अमित ने कुछ उत्तेजना से 12वीं में पढ़ने वाली बच्ची के प्रश्न का जवाब तो दे दिया परंतु इस प्रश्न ने उन्हें अंदर तक झक झोर भी दिया. उन के हाथपांवों में कंपन महसूस होने लगा और भरी सर्दी में भी माथे पर पसीने की बूंदें छलक आईं. स्कूल स्टाफ के सामने बड़ी मुश्किल से वे स्वयं को संयत कर पाए और तय समय से आधे घंटे पूर्व ही अपना लैक्चर समाप्त कर के फुरती से गाड़ी में आ कर बैठ गए. खिड़की से बाहर की ओर वे गंभीर मुद्रा में देखने लगे.
हमेशा जोशखरोश से भरे रहने वाले और खुशमिजाज एसपी साहब को यों शांत और गंभीर देख कर ड्राइवर रमेश कुछ डरेसहमे से स्वर में बोला, ‘‘सर, कहां चलना है?’’
‘‘घर चलो,’’ एसपी अमित ने कहा.
जैसे ही उन के बंगले के सामने गाड़ी रुकी, वे तेजी से चलते हुए अपने बैडरूम में पहुंचे और दरवाजा बंद कर के अपने बैड पर निढाल से पड़ गए. यह तो अच्छा था कि पत्नी सृष्टि अभी घर पर नहीं थी, वरना उन का यह हाल देख कर परेशान हो जाती. आज उन के विवाह को 3 वर्ष और नौकरी को 5 वर्ष हो गए थे. वे 2 साल की बेटी के पिता भी थे. पत्नी सृष्टि एक सरकारी कालेज में प्रोफैसर और बहुत ही सुल झी हुई महिला थी. वह घरबाहर और नातेरिश्तेदारों की जिम्मेदारियां भलीभांति निभा रही थी. कुल मिला कर बड़ा ही खुशगवार जीवन जी रहे थे वे.
कुछ समय पूर्व ही उज्जैन जिले में तबादला हो कर वे आए थे. एक सरकारी स्कूल में आयोजित बालिका सुरक्षा सप्ताह के दौरान उन्हें मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था. वे बहुत खुशीखुशी आए थे. परंतु एक बालिका के प्रश्न ने उन के भूले साल सामने ला खड़े किए थे.
उस समय एमएससी करने के बाद वे अपने गांव से दूर छोटी बहन के साथ भोपाल में ही रह कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे. घर की माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी. सो, अपने खर्चे के लिए कुछ बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ा दिया करते थे. एक दिन उन की एक सहपाठी का फोन आया, ‘अमित, मेरी आंटी की बेटी 11वीं में है जिसे मैथ्स पढ़ना है. अगर तेरे पास टाइम हो तो देख ले.’
‘हांहां, ठीक है, मैं पढ़ा दूंगा. मेरे पास अभी एक भी ट्यूशन नहीं है.’
सहपाठी ने अपनी आंटी का पता और मोबाइल नंबर उन्हें भेज दिया. उन से बातचीत होने के बाद अगले दिन से उन्होंने बड़ी लगन से उस बच्ची को पढ़ाना प्रारंभ भी कर दिया. बच्ची होनहार थी. मातापिता भी शिक्षित थे. कुल मिला कर अच्छा संस्कारी परिवार था. आंटीअंकल दोनों ही उन से बहुत स्नेह रखते थे. उन की लगन और बच्ची की मेहनत ने असर दिखाया और बच्ची धीरेधीरे अपनी कक्षा में अच्छा प्रदर्शन करने लगी थी, जिस से आंटीअंकल दोनों ही उन से बहुत खुश थे.
आंटी अकसर उन से प्रतियोगी परीक्षा की तैयारियों के बारे में बातचीत करती रहती थीं. उन से बात कर के उन्हें भी बहुत अच्छा लगता था, क्योंकि उन की सकारात्मक बातें सुन कर वे स्वयं उत्साह से भर उठते थे. एक वर्ष में ही उन्होंने अपना विश्वास सब पर भलीभांति जमा लिया था.
बच्ची की अब वार्षिक परीक्षाएं आने वाली थीं, सो, कोर्स पूरा करवा कर रिवीजन वर्क चल रहा था. इन दिनों पढ़ाने को तो कुछ खास नहीं होता था, वे बैठेबैठे पेपर या पत्रिकाएं पलटते रहते. बीचबीच में बच्ची के द्वारा पूछे गए प्रश्नों का उत्तर दे देते. कई बार उन का युवा मन बच्ची की ओर आकर्षित भी होने लगता. परंतु अगले ही पल अपनी बहकी भावनाओं पर वे काबू पा लेते. पर शायद बेरोजगारी व्यक्ति की विचारधारा, मानसिकता और सोचनेसम झने की शक्ति सभी का हरण कर लेती है, वे 2 वर्ष से बेरोजगार थे.
उस दिन उन की भावनाओं पर से उन का नियंत्रण ही मानो समाप्त हो गया. उस दिन आंटी अर्थात बच्ची की मां की तबीयत खराब थी और डाक्टर ने 6 बजे का टाइम दिया था. सो, वे अंकल के साथ चली गईं. उन के जाते ही उन की अभी तक सुसुप्त भावनाएं मानो कुलांचें भरने लगीं. उन्हें याद ही नहीं कि उन्होंने कब और कैसे बच्ची का हाथ जोर से पकड़ कर अपने सीने से लगा लिया और आंखें बंद कर लीं.
उन की चेतना कानों में पड़ी बच्ची की आवाज से लौटी, ‘सर, व्हाट आर यू डूइंग?’ बच्ची इस अप्रत्याशित सी घटना से सहम गई थी. झटके से अपना हाथ छुड़ा कर वह कोने में जा कर खड़ी हो गई. बच्ची की आवाज सुन कर वे मानो सोते से जाग गए और सौरी कह कर एक गिलास पानी पी कर अपना सिर नीचा कर के वापस घर की ओर चल दिए.
क्षणिक आवेग ने उन का चरित्र, संस्कार और आत्मनियंत्रण सब तारतार कर दिया. आत्मग्लानि से मन स्वयं के प्रति ही वितृष्णा से भर उठा. पूरे रास्ते वे सिर झुका कर चलते रहे, मानो सड़क पर चलने वाले हर शख्स की नजरें उन्हें ही घूर रही हों. जैसे ही वे घर में घुसे, उन के चेहरे का उड़ा रंग देख कर छोटी बहन बोली, ‘क्या हुआ भैया, इतने घबराए हुए क्यों हो?’
‘नहीं, कुछ नहीं. तुम अपना काम करो. मैं छत पर हूं,’ कह कर वे छत पर आ गए थे.
छत पर खुली हवा में आ कर लंबी सांस ली. मानसिक अंतर्द्वंद्व चरम पर था. ‘कैसे अपना आपा खो दिया मैं ने. यदि उन लोगों ने एफआईआर लिखा दी तो कहीं का नहीं रहूंगा. आजकल तो घूरने तक पर कड़ी सजा का प्रावधान है. मेरी तो जिंदगी ही बरबाद हो जाएगी.’ यह सब सोचतेसोचते वे बेचैन हो उठे.
हालात जानने के लिए बच्ची की मां को फोन लगा दिया और बड़ी ही मासूमियत से बोले, ‘आंटी, शुक्रवार को कितने बजे आना है?’
???‘रोज के समय पर ही आ जाना बेटे.’ आंटी को उतने ही प्यार से बात करते देख वे आश्वस्त हो गए कि बच्ची ने आंटी को कुछ नहीं बताया है क्योंकि चलते समय उन्होंने बच्ची से सौरी बोल कर मां को कुछ न बताने की विनती की थी.
2 दिनों तक जब उधर से कोई फोन नहीं आया तो वे आश्वस्त हो गए कि मामला शांत हो गया है. तीसरे दिन सुबहसुबह जब वे नाश्ता कर के उठे ही थे कि मोबाइल बज उठा. मोबाइल स्क्रीन पर आंटी का नाम देखते ही उन के हाथ कांप उठे. किसी तरह साहस कर के उन्होंने ‘हैलो’ बोला. उधर से कड़कती आवाज आई, ‘तुम्हारे मातापिता ने संस्कार नाम की चीज से परिचित कराया है या नहीं. तुम्हें ऐसी हरकत करते हुए खुद पर शर्म नहीं आई?’
सामने छोटी बहन बैठी थी. सो, वे एकदम हड़बड़ा गए और कड़क स्वर में बोले, ‘क्या, क्या किया क्या है मैं ने. अपने शब्दों को लगाम दीजिए.’
‘यह भी मु झे ही बताना पड़ेगा कि तुम ने किया क्या है. बेशर्मी की भी हद होती है.’
‘नहींनहीं आंटी, वह मेरी बहन थी सामने, इसलिए. अब मैं छत पर आ गया हूं. सौरी आंटी, गलती हो गई. मैं हाथ जोड़ कर माफी मांगता हूं.’
‘क्यों, अपनी बहन की इतनी चिंता हो रही है. अपनी सगी बहन के अलावा दूसरी हर लड़की तुम लड़कों को अपनी इच्छापूर्ति का साधन लगती है और तुम उन्हें छेड़ना शुरू कर देते हो. कितनी गंदी मानसिकता है तुम्हारी. तुम्हारे जैसे आवारा कुछ नहीं कर सकते अपनी जिंदगी में. मैं अभी थाने जा रही हूं तुम्हारी रिपोर्ट करने. तुम्हें तो मैं कहीं का नहीं छोड़ूंगी.’
आंटी के क्रोध से वे बुरी तरह घबरा गए. और जब वे कुछ शांत हुईं तो धीरे से अपना बचाव करते हुए वे बोले, ‘आंटी, मैं आप के हाथ जोड़ता हूं, आप जो चाहे सजा दे लें. आप ही बताइए 2 वर्षों से मैं उसे पढ़ा रहा हूं, कभी ऐसा नहीं हुआ. दरअसल, आज उस ने कुछ अलग, अजीब से कपड़े पहने थे, सो, मैं डिस्ट्रैक्ट हो गया था.’
‘क्या कहा? कपड़े ऐसे पहने थे? तुम्हारा दिमाग खराब है क्या? अब क्या लड़कियां अपनी मरजी के कपड़े भी नहीं पहन सकतीं, क्योंकि उन्हें देख कर लड़के अपनेआप पर काबू नहीं रख पाते. खुद को काबू नहीं कर सकते तो सड़क पर नजरें नीचे कर के चला करो या घर में बैठो. पर मेरी बेटी वही पहनेगी जो उस का दिल करेगा. क्या तुम्हारी बहन तुम से पूछ कर कपड़े पहनती है? क्या अपनी बेटी को भविष्य में तुम ऊपर से नीचे तक तन ढकने वाले कपड़े पहनाओगे?’
आंटी की तर्कयुक्त बातों के आगे उन की तो बोलती ही बंद हो गई. वे दबी आवाज में बोले, ‘नहीं आंटी, ऐसी बात नहीं है. मैं अपनी गलती मानता हूं. मैं बहक गया था. पर मेरा यकीन मानिए मैं ने ऐसावैसा कुछ नहीं किया.’
इतना सुनते ही आंटी फिर भड़क गईं और दहाड़ते हुए बोलीं, ‘और क्या करना चाहते थे मेरी बेटी के साथ? मन तो कर रहा है तुम्हें अभी ही पुलिस के हवाले कर दूं. जेल की सलाखों के पीछे सड़ोगे, तभी सम झ आएगा. मु झे शर्म आती है तुम्हारे मातापिता के संस्कारों पर. यदि उन्हें पता चल जाए तो अपनी परवरिश पर ही शर्म आने लगेगी उन्हें. तुम जानते हो तुम्हारे जैसे सैकड़ों, हजारों युवक बेरोजगार सड़कों पर क्यों घूम रहे हैं, क्योंकि उन के अंदर आत्मबल, आत्मविश्वास और आत्मनियंत्रण ही नहीं है. जिस दिन इन पर विजय पा लोगे, जिंदगी में कुछ बन जाओगे.’ यह कह कर आंटी ने फोन काट दिया.
वे बदहवास से मोबाइल को ही घूरने लगे. उन्हें काटो तो खून नहीं. आंटी ने कुछ ही मिनटों में उन्हें जमीन पर ला पटका था. सच पूछो तो वे घबरा कर रोने लगे थे. ‘क्या करूं, क्या जवाब दूंगा मातापिता को. मु झे क्या हो गया. मेरी एक बेवकूफी ने आज मेरे चरित्र को ही बरबाद कर दिया. यह मैं ने क्या कर दिया,’ सब सोचतेसोचते उन का सिर दर्द करने लगा. तभी बहन ने आवाज लगाई और वे नीचे आ गए.
बहन ने उन के सामने भोजन की थाली लगा दी थी. उन के हलक में तो थूक तक निगलने की गुंजाइश नहीं थी तो खाना कहां नीचे उतरता. सो, ‘भूख नहीं है बाद में खा लूंगा’ कह कर बहन से थाली उठाने को कह दिया. उसी समय उन के फोन की घंटी फिर बजी. फोन आंटी का ही था.
‘तुम्हारी बदतमीजी का फल तुम्हें खुद मिलेगा. मैं क्यों तुम्हारा वह जीवन खराब करूं जिस की अभी शुरुआत ही नहीं हुई है. जाओ, मैं ने तुम्हें अभयदान दिया. पर ध्यान रखना, अपने जीवन में सभी लड़कियों और महिलाओं की उतनी ही इज्जत करना जितनी अपनी मांबहन की करते हो. जीवन में यदि कुछ बन सकोगे तो समाज में इज्जत की दो रोटी खा पाओगे. वरना ऐसे ही सड़क पर चप्पलें चटकाते और लड़कियों को छेड़ते रहोगे,’ यह कह कर आंटी ने फोन काट दिया था.
उस के बाद की कई रातों तक ठीक से सो ही नहीं पाए वे. बारबार आंटी की बातें कानों में गूंजतीं. पर वह घटना उन के जीवन की टर्निंग पौइंट बन गई. उस के बाद के 2 साल तक उन्होंने जम कर मेहनत की. उसी मेहनत के परिणामस्वरूप अपने पहले ही प्रयास में उन्होंने आईपीएस की परीक्षा पास की और एसपी बने. 8 वर्ष पुरानी उस घटना को सोचतेसोचते उन का सिर दर्द से फटने लगा. मन एक बार फिर आत्मग्लानि से भर उठा.
तभी अचानक सृष्टि की आवाज उन के कानों में गूंज उठी.
‘‘क्या हुआ एसपी साहब, आज बड़ी जल्दी घर आ गए. तबीयत तो ठीक है न,’’ कह कर सृष्टि ने उन के माथे पर हाथ रख दिया और घबरा कर बोली, ‘‘अरे, तुम्हें तो तेज बुखार है. क्या हुआ, सुबह तो एकदम ठीक थे. अभी मैं डाक्टर को बुलाती हूं.’’ कह कर वह मोबाइल में नंबर खोजने लगी तो अमित ने उस का हाथ पकड़ लिया और बोले, ‘‘कोई जरूरत नहीं है. चाय पिला कर, बस दवाई दे दो, ठीक हो जाऊंगा.’’
सृष्टि चाय बनाने किचन में चली गई, तो वे फिर बेचैन हो उठे. तभी सृष्टि ने हाथ में चायनाश्ते की ट्रे के साथ कमरे में प्रवेश किया. चाय का कप हाथ में पकड़ाते हुए वह उन के चेहरे की तरफ देखते हुए बोली, ‘‘क्या बात है, कुछ बेचैन और परेशान से लग रहे हो. औफिस की कोई परेशानी है क्या. मु झे बताओ, शायद मैं कोई हल निकाल सकूं.’’
‘‘नहींनहीं, कुछ नहीं. बस, ऐसे ही मन कुछ उदास था. गोलू सो गई क्या? लाओ, उसे मेरे पास सुला दो.’’ कह कर अमित ने बात के रुख को बदलना चाहा. कुछ ही देर में सृष्टि गोलू को अमित की बगल में सुला कर चली गई. जैसे ही उन्होंने बगल में लेटी गोलू की तरफ देखा, तो सोचने लगे, ‘यदि कोई लड़का कभी मेरी गोलू के साथ ऐसी हरकत करेगा तो…तो मैं उसे जान से मार दूंगा. तो क्या मु झे भी उसी समय जान से मार दिया जाना चाहिए था?’ सोचतेसोचते कब आंख लग गई उन्हें भी नहीं पता.
सुबह जब सृष्टि ने उन्हें झक झोरा, तो उन की आंख खुली. चाय पीतेपीते सृष्टि बोली, ‘‘अमित, तुम कल से कुछ परेशान हो, बताओ तो हुआ क्या है? रात में भी तुम बड़बड़ा रहे थे. ‘नहीं, मु झे माफ कर दो. मैं ऐसा कैसे कर सकता हूं. आंटी, मु झे माफ कर दो.’ प्लीज, मु झे बताओ इस तरह अकेले मत घुटो, हुआ क्या है. मैं साइकोलौजी की प्रोफैसर हूं, अवश्य तुम्हारी कुछ मदद कर पाऊंगी.’’
अमित की आंखें भर आईं और वे दुखी स्वर में बोले, ‘‘सृष्टि मेरे जीवन की एक घटना है जिस ने मेरा जीवन तो बना दिया परंतु वह मेरे अब तक के सफल जीवन का एक काला धब्बा भी है. कल कुछ ऐसा हुआ कि मैं स्वयं की ही नजरों में गिरता जा रहा हूं. पहले तुम मु झ से वादा करो कि तुम मु झे गलत नहीं सम झोगी और मु झे इस झं झावात से निकलने का कोई उपाय बताओगी.’’
‘‘हां भई, पक्का वादा. अब 3 साल में तुम मु झ पर इतना भरोसा तो कर ही सकते हो न,’’ सृष्टि ने अमित का हाथ अपने हाथ में ले कर उस की आंखों में झांकते हुए कहा.
सृष्टि की आंखों में अपने लिए विश्वास देख कर अमित ने रुंधे गले से 8 वर्ष पूर्व का पूरा घटनाक्रम जस का तस सृष्टि को सुना दिया. ‘‘इस दौरान मैं उस घटना को भूल सा गया था पर आज स्कूल में उस बच्ची के एक प्रश्न ने मु झे फिर मेरी ही नजरों के कठघरे में ला खड़ा किया है,’’ कहते हुए अमित शांत हो कर सृष्टि के चेहरे के भाव पढ़ने का प्रयास करने लगे.
‘‘अमित, तुम्हें पता है हमारे समाज में हो रहे अपराधों का सब से बड़ा कारण आज के युवा की बेरोजगारी है. घर और मातापिता की जिम्मेदारियों के बीच में जब एक युवाओं अथक प्रयास के बाद भी नौकरी प्राप्त नहीं कर पाता या आर्थिक जिम्मेदारियों को उठाने के लायक नहीं हो जाता, तो वह स्वयं को असहाय सा महसूस करने लगता है. और जब यह काफी समय तक होता है तो वह युवा अवसाद से घिरने लग जाता है और उस की यह फ्रस्टे्रशन ही उसे गलत दिशा में मोड़ देती है.
‘‘मैं तुम्हारे इस व्यवहार को सही तो नहीं कह सकती क्योंकि आप कितने ही परेशान क्यों न हो, गलत मार्ग को अपना कर स्वयं पर से नियंत्रण खो देना तो सरासर गलत ही है. पर हां, अपनी गलती की स्वीकारोक्ति ही व्यक्ति की सब से बड़ी सजा होती है. वह तुम्हारा सैल्फरियलाइजेशन ही था जिस के परिणामस्वरूप तुम आज एक आला दर्जे के अधिकारी बन पाए हो. हां, तुम्हें जो आत्मग्लानि है उस से निकलने का एकमात्र रास्ता है कि तुम जा कर उन आंटी से मिल कर माफी मांग लो और उन्हें बताओ कि उस दिन उन के द्वारा तुम्हें दिया गया अभयदान बेकार नहीं गया.’’ ‘‘हां, तुम सही कह रही हो. मैं जब तक उन से मिलूंगा नहीं, चैन से सो नहीं पाऊंगा,’’ कह कर अमित अपनी पुरानी डायरी में आंटी का मोबाइल ढूंढ़ने लगे. उज्जैन से भोपाल की दूरी ही कितनी थी, सो, रविवार के दिन वे भोपाल की अरेरा कालोनी में थे.
‘न जाने वे मु झे माफ करेंगी भी, या नहीं. क्या प्रतिक्रिया होगी उन की मु झे देख कर? पता नहीं उन्हें मैं याद भी होऊंगा या नहीं. परंतु जब तक मैं उन से मिल कर अपने दिल का हाल कह कर माफी नहीं मांग लेता, मेरा प्रायश्चित्त ही नहीं हो पाएगा और मैं ताउम्र तिलतिल कर मरता रहूंगा. एक बार मिलना तो होगा ही. शायद वे मु झे माफ कर सकें,’ सोचतेसोचते वे कब अरेरा कालोनी के ई 7 के कामायनी परिसर में एक एचआईजी मकान के सामने आ कर खड़े हो गए, उन्हें पता ही न चला
उन्होंने धड़कते दिल से घंटी बजाई. दरवाजा आंटी ने ही खोला. अमित ने झुक कर उन के पैर छू लिए. वे बोलीं, ‘‘अरे, कौन हो भाई? मैं पहचान नहीं पा रही हूं.’’
‘‘आंटी, मैं, अमित.’’
‘‘ओहो अमित, कुछ बन पाए या आज भी…’’ आंटी अपनी याददाश्त पर कुछ जोर डालते हुए बोलीं.
‘‘आंटी, मैं आईपीएस हो गया हूं. पर यकीन मानिए कि आज मैं जो कुछ भी हूं आप के कारण हूं. पर 8 वर्ष पुरानी उस घटना के लिए मैं आज भी क्षमाप्रार्थी हूं. आप ने उस दिन क्रोध में मु झे मेरी असलियत, कर्तव्य और जीवन के मूल्य सम झाए थे. पर आज आप प्यारभरा आशीष मु झे दीजिए तो मैं सम झूंगा कि आप ने सच्चे मानो में मु झे माफ कर दिया है.’’
‘‘वैल डन, वैल डन. उस दिन तुम्हारी आत्मग्लानि देख कर मु झे सम झ आ गया था कि तुम बहक गए हो. तुम्हें माफ कर के मैं ने तुम्हें तुम्हारे हाल पर छोड़ दिया था कि यदि तुम्हें अपने ऊपर वास्तव में पछतावा होगा तो अवश्य जीवन में कुछ बन सकोगे. दरअसल, कभीकभी सजा से अधिक माफ करना आवश्यक होता है क्योंकि हर अपराधी को सजा से नहीं सुधारा जा सकता और न ही हरेक को माफी से. उस समय मैं ने वही किया जो मु झे ठीक लगा.
‘‘मेरा आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है. खूब उन्नति करो. पर महिलाओं का सम्मान करना कभी मत छोड़ना,’’ कह कर आंटी ने खुश हो कर उन के ऊपर अपना वरदहस्त रख दिया.
आंटी का प्यारभरा आशीष पा कर अपनी आंखों की कोरों में आए आंसुओं को सिटी एसपी अमित ने धीरे से पोंछ लिया और एक अनजाने बो झ से मुक्त हो कर खुशीखुशी अपने कर्तव्यस्थल की ओर चल दिए.
‘‘हां, वही, तुम्हारा सीनियर, तुम्हारा जिगरी दोस्त, कालेज का गुंडा.’’
‘‘अरे, तुम?’’
‘‘हां, मैं.’’
‘‘पुलिस में?’’
‘‘पहले कालेज में गुंडा हुआ करता था. अब कानून का गुंडा हूं. लेकिन तुम नहीं बदले, पंडित महाराज?’’
उस ने मुझे गले से लगाया. ससम्मान मेरा सामान मुझे लौटाया और अपने औफिस में मुझे कुरसी पर बिठा कर एक सिपाही से चायनाश्ते के लिए कहा.
यह मेरा कालेज का 1 साल सीनियर वही दोस्त था जिस ने मुझे रैगिंग से बचाया था. कई बार मेरे झगड़ों में खुद कवच बन कर सामने खड़ा हुआ था. फिर हम दोनों पक्के दोस्त बन गए थे. मेरे इसी दोस्त को कालेज की एक उच्चजातीय कन्या से प्रेम हुआ तो मैं ने ही इस के विवाह में मदद की थी. घर से भागने से ले कर कोर्टमैरिज तक में. तब भी उस ने वही कहा था और अभी फिर कहा, ‘‘दोस्ती की कोई जाति नहीं होती. बताओ, क्या चक्कर है?’’
मैं ने उदास हो कर कहा, ‘‘पिछले 6 महीने से पुलिस बुलाती है पूछताछ के नाम पर. जमाने भर के सवाल करती है. पता नहीं क्यों? मेरा तो जीना हराम हो गया है.’’
‘‘तुम्हारी किसी से कोई दुश्मनी है?’’
‘‘नहीं तो.’’
‘‘अपनी शराफत के चलते कभी कहीं ऐसा सच बोल दिया हो जो किसी के लिए नुकसान पहुंचा गया हो और वह रंजिश के कारण ये सब कर रहा हो?’’
‘‘क्या कर रहा हो?’’
‘‘गुमनाम शिकायत.’’
‘‘क्या?’’ मैं चौंक गया, ‘‘तुम यह कह रहे हो कि कोई शरारत या नाराजगी के कारण गुमनाम शिकायत कर रहा है और पुलिस उन गुमनाम शिकायतों के आधार पर मुझे परेशान कर रही है.’’
‘‘हां, और क्या? यदि तुम मुजरिम होते तो अब तक जेल में नहीं होते. लेकिन शिकायत पर पूछताछ करना पुलिस का अधिकार है. आज मैं हूं, सब ठीक कर दूंगा. तुम्हारा दोस्त हूं. लेकिन शिकायतें जारी रहीं और मेरी जगह कल कोई और पुलिस वाला आ गया तो यह दौर जारी रह सकता है. इसीलिए कह रहा हूं, ध्यान से सोच कर बताओ कि जब से ये गुमनाम शिकायतें आ रही हैं, उस के कुछ समय पहले तुम्हारा किसी से कोई झगड़ा या ऐसा ही कुछ और हुआ था?’’
मैं सोचने लगा. उफ्फ, मैं ने सोचा भी नहीं था. अपने पड़ोसी मिस्टर नंद किशोर की लड़की से शादी के लिए मना करने पर वह ऐसा कर सकता है क्योंकि उस के बाद नंद किशोर ने न केवल महल्ले में मेरी बुराई करनी शुरू कर दी थी बल्कि उन के पूरे परिवार ने मुझ से बात करनी भी बंद कर दी थी. उलटे छोटीछोटी बातों पर उन का परिवार मुझ से झगड़ा करने के बहाने भी ढूंढ़ता रहता था. हो सकता है वह शिकायतकर्ता नंद किशोर ही हो. लेकिन यकीन से किसी पर उंगली उठाना ठीक नहीं है. अगर नहीं हुआ तो…मैं ने अपने पुलिस अधिकारी मित्र से कहा, ‘‘शक तो है क्योंकि एक शख्स है जो मुझ से चिढ़ता है लेकिन यकीन से नहीं कह सकता कि वही होगा.’’
फिर मैं ने उसे विवाह न करने की वजह भी बताई कि उन की लड़की किसी और से प्यार करती थी. शादी के लिए मना करने के लिए उसी ने मुझ से मदद के तौर पर प्रार्थना की थी. लेकिन मेरे मना करने के बाद भी पिता ने उस की शादी उसी की जाति के ही दूसरे व्यक्ति से करवा दी थी.
‘‘तो फिर नंद किशोर ही आप को 6 महीने से हलकान कर रहे हैं.’’
मैं ने कहा, ‘‘यार, मुझे इस मुसीबत से किसी तरह बचाओ.’’
‘‘चुटकियों का काम है. अभी कर देता हूं,’’ उस ने लापरवाही से कहा.
फिर मेरे दोस्त पुलिस अधिकारी रामचरण ने नंद किशोर को परिवार सहित थाने बुलवाया. डांट, फटकार करते हुए कहा, ‘‘आप एक शरीफ आदमी को ही नहीं, 6 महीनों से पुलिस को भी गुमराह व परेशान कर रहे हैं. इस की सजा जानते हैं आप?’’
‘‘इस का क्या सुबूत है कि ये सब हम ने किया है?’’ बुजुर्ग नंद किशोर ने अपनी बात रखी.
पुलिस अधिकारी रामचरण ने कहा, ‘‘पुलिस को बेवकूफ समझ रखा है. आप की हैंडराइटिंग मिल गई तो केस बना कर अंदर कर दूंगा. जहां से आप टाइप करवा कर झूठी शिकायतें भेजते हैं, उस टाइपिस्ट का पता लग गया है. बुलाएं उसे? अंदर करूं सब को? जेल जाना है इस उम्र में?’’
पुलिस अधिकारी ने हवा में बातें कहीं जो बिलकुल सही बैठीं. नंद किशोर सन्नाटे में आ गए.
‘‘और नंद किशोरजी, जिस वजह से आप ये सब कर रहे हैं न, उस शादी के लिए आप की लड़की ने ही मना किया था. यदि दोबारा झूठी शिकायतें आईं तो आप अंदर हो जाएंगे 1 साल के लिए.’’
नंद किशोर को डांटडपट कर और भय दिखा कर छोड़ दिया गया. मुझे यह भी लगा कि शायद नंद किशोर का इन गुमनाम शिकायतों में कोई हाथ न हो, व्यर्थ ही…
‘‘मेरे रहते कुछ नहीं होगा, गुमनाम शिकायतों पर तो बिलकुल नहीं. लेकिन थोड़ा सुधर जा. शादी कर. घर बसा. शराफत का जमाना नहीं है,’’ उस ने मुझ से कहा. फिर मेरी उस से यदाकदा मुलाकातें होती रहतीं. एक दिन उस का भी तबादला हो गया.
मैं फिर डरा कि कोई फिर गुमनाम शिकायतों भरे पत्र लिखना शुरू न कर दे क्योंकि यदि यह काम नंद किशोर का नहीं है, किसी और का है तो हो सकता है कि थाने के चक्कर काटने पड़ें. नंद किशोर ने तो स्वीकार किया ही नहीं था. वे तो मना ही करते रहे थे अंत तक.
लेकिन उस के बाद यह सिलसिला बंद हो गया. तो क्या नंद किशोर ही नाराजगी के कारण…यह कैसा गुस्सा, कैसी नाराजगी कि आदमी आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाए. गुस्सा है तो डांटो, लड़ो. बात कर के गुस्सा निकाल लो. मन में बैर रखने से खुद भी विषधर और दूसरे का भी जीना मुश्किल. पुलिस को भी चाहिए कि गुमनाम शिकायतों की जांच करे. व्यर्थ किसी को परेशान न करे.
शायद नंद किशोर का गुस्सा खत्म हो चुका था. लेकिन अब मेरे मन में नंद किशोर के प्रति घृणा के भाव थे. उस बुड्ढे को देखते ही मुझे अपने 6 माह की हलकान जिंदगी याद आ जाती थी. एक निर्दोष व्यक्ति को झूठी गुमनाम शिकायतों से अपमानित, प्रताडि़त करने वाले को मैं कैसे माफ कर सकता था. लेकिन मैं ने कभी उत्तर देने की कोशिश नहीं की. हां, पड़ोसी होते हुए भी हमारी कभी बात नहीं होती थी. नंद किशोर के परिवार ने कभी अफसोस या प्रायश्चित्त के भाव भी नहीं दिखाए. ऐसे में मेरे लिए वे पड़ोस में रहते हुए भी दूर थे.
भारत में हर साल 28 फरवरी को ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस’ मनाया जाता है, क्योंकि 1928 में इसी दिन महान वैज्ञानिक चंद्रशेखर वेंकट रमन ने अपनी खोज ‘रमन इफैक्ट’ की घोषणा की थी. वे पहले भारतीय थे, जिन्हें विज्ञान के क्षेत्र में ‘नोबल पुरस्कार’ मिला था. उन्हें साल 1954 में ‘भारत रत्न’ से भी सम्मानित किया गया था.
भले ही चंद्रशेखर रमन को 42 साल की उम्र में ‘नोबल पुरस्कार’ मिला था, पर विज्ञान के प्रति उन की दिलचस्पी स्कूली जीवन में ही पड़ गई थी. शायद इसलिए कि विज्ञान की नई तकनीकों को समझाने के लिए थ्योरी के साथसाथ प्रैक्टिकल तरीके से भी पढ़ाया जाता है और छात्रों से प्रोजैक्ट्स बनवाए जाते हैं, ताकि नएनए आविष्कार होने की उम्मीद बंधी रहे.
दिल्ली के ब्रिटिश स्कूल में 11वीं क्लास में पढ़ने वाले छात्र अर्णव गुप्ता ने अपने एक ऐसे ही प्रोजैक्ट के तहत ऐसा ‘मोटोराइज्ड सोलर ट्रैकर’ बनाया है, जो बिजली पैदा करने के लिए सूर्य की ऊर्जा का इस्तेमाल कर के सौर पैनल की दक्षता को बढ़ाएगा.

दरअसल, ज्यादातर सोलर पैनल जब इंस्टौल किए जाते हैं तो उन्हें दक्षिण दिशा की ओर एक खास अवस्था में फिक्स कर दिया जाता है, लेकिन यह तरीका बहुत असरदार नहीं है, क्योंकि सूर्य की दिशा और दशा पूरे दिन बदलती रहती है, लेकिन इस ‘मोटराइज्ड सोलर ट्रैकर’ की खासीयत यह है कि यह पूरे दिन सौर पैनल को घुमाएगा और पूर्व से पश्चिम की ओर सूर्य की गति को ट्रैक करेगा, जिस से यह पहले से कहीं ज्यादा ऊर्जा का प्रोडक्शन करेगा.
आसान भाषा में समझें तो यह ‘मोटराइज्ड सोलर ट्रैकर’ एक जबरदस्त सन (सूर्य) लोकेशन सैंसर है जो डीसी मोटर को घुमाता है, जो बदले में सोलर पैनल को घुमाता है, ताकि पैनल का मुंह पूरे दिन सूर्य की ओर रहे और ज्यादा से ज्यादा बिजली का प्रोडक्शन हो.
इस तकनीकी से दूरदराज के गांवों और कसबों में बिजली की सप्लाई हो सकेगी. इतना ही नहीं, इस सौर ऊर्जा का इस्तेमाल हमारे घरों, दफ्तरों और स्कूलों में भी किया जा सकेगा.
विष्य में नतीजा कुछ भी निकले, पर छात्रों को इस तरह के प्रोजैक्टों पर काम करते रहना चाहिए, क्योंकि ये उन का आत्मविश्वास बढ़ाते हैं. छात्र जब अपने हाथों से मौडल बनाते हैं और प्रदर्शनियों में प्रस्तुतियां देते हैं, तो सार्वजनिक तौर पर बोलने से उन का मंच का डर भी दूर हो जाता है.

यही वजह है कि आजकल स्कूलों में इस तरह की गतिविधियों को बहुत ज्यादा बढ़ावा दिया जा रहा है. सरकार भी समयसमय पर छात्रों के लिए विज्ञान से जुड़ी प्रतियोगिताएं आयोजित कराती रहती है. प्राइवेट स्कूलों के साथसाथ सरकारी स्कूल भी विज्ञान से जुड़े प्रोजैक्ट और सैमिनार कराने में पीछे नहीं हैं.
इसी का सुखद नतीजा है कि साल 2017 में उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय डांगीगुनाऊं के एक छात्र रोहित रौतेला ने विज्ञान प्रतियोगिता में ब्लौक और जिला लैवल पर पहला नंबर हासिल किया था. रोहित ने ‘अपशिष्ट प्रबंधन और जलाशयों का संरक्षण’ नामक सब्जैक्ट पर अपना प्रोजैक्ट तैयार किया था.
इस के अलावा अगर मांबाप खुद जागरूक हो कर अपने बच्चों को विज्ञान से जुड़ी ऐसी गतिविधियों के बारे में बताएंगे और उन्हें इन में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित करेंगे तो यकीनन नएनए आविष्कारों की राह निकलेगी.
खबरों का टोटा पड़ना तो उसी दिन से बंद हो गया था, जिस दिन इलैक्ट्रौनिक मीडिया वजूद में आया था. लेकिन मीडिया के सोशल मीडिया में तब्दील होने के बाद तो खबरों की पैदावार बेतहाशा बढ़ी है. स्क्रीन पर हर मिनट में तमाम खबरें होती हैं. हालांकि इन की न्यूज वैल्यू न के बराबर होती है. खबरें अजीबोगरीब होने लगी हैं, जिन का आम लोगों और उन की परेशानियों से कोई लेनादेना नहीं होता.
ऐसी ही एक खबर पिछले दिनों राजस्थान से आई थी कि सचिन पायलट अशोक गहलोत गुट के मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास के यहां गए और उन्होंने उन के कुत्ते को पुचकारा भी.
यह वह दौर था जब राजस्थान की सियासी उठापटक जारी थी. इस के पहले कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने न बनने को ले कर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत गुट ने जो ड्रामा किया था, उस से देश भर में रोमांच छा गया था कि अब क्या होगा.
यह सस्पेंस कभी भी टूटे, लेकिन सचिन पायलट के कुत्ता प्रेम को ले कर लोगों ने खूब चटखारे लिए थे क्योंकि प्रताप सिंह गहलोत गुट के कद्दावर नेता माने जाते हैं. सोशल मीडिया उन के कुत्ते और सचिन पायलट की तसवीरों और कमेंट्स से भरा पड़ा रहा.
कुत्ते के बहाने हर किसी ने अपनी बात कही और भड़ास भी निकाली. इस में भी हैरानी की बात यह रही कि अधिकतर ने अपमानजनक ढंग से कुत्ते को कुत्ता नहीं कहा बल्कि सम्मान से पेट ही लिखा.
चंद घंटों में एक नेता और कुत्ते की यह मुलाकात सुर्खियां बन गईं, जिस के कोई माने नहीं थे. लेकिन सचित्र खबर थी तो थी. जिस से उस कुत्ते की अहमियत भी उजागर हुई कि बड़े घर या आदमी का कुत्ता होना भी कोई मामूली बात नहीं होती. लगता नहीं कि प्रताप सिंह खाचरियावास ने इस का बुरा माना होगा.
आप किसी के घर भी जा कर पुचकार कर उस के पेट को खिला लें, मालिक की खुशी का अंदाजा नहीं लगा सकते. ऐसे खास मौकों पर तो कुत्ते की फैमिली हिस्ट्री प्रजाति, आदतें और शरारतें कुछ इस तरह बखान की जाती हैं कि चंद मिनटों में ही माहौल इनफार्मल यानी मुद्दे की बात करने लायक सहज हो जाता है.
राहुल गांधी के पिडी का जलवा
लेकिन कई बार पेट आने वालों को इतना असहज भी कर देता है कि दोस्ती, नातेरिश्ते हमेशा के लिए टूट जाते हैं. कुत्ते में लाख खूबियां गिनाई जाएं, लेकिन उस की कुछ आदतें हर किसी को नागवार भी गुजरती हैं.
पहली जिस से हर कोई डरता है कि कुत्ता आखिरकार कुत्ता है कभी भी काट सकता है, यह उस के मूड की बात है. दूसरी यह कि वह गंदगी से रहता है यानी आदमी जितनी साफसफाई से नहीं रहता. एक तीसरी खामी राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा ने बताई, उस का सार यह है कि राहुल अपने पेट पिडी को ले कर बहुत केयरिंग हैं.
किस्तों में बयां की गई इस व्यथा को उन के मुंह से सुनना ही ज्यादा दिलचस्प होगा, ‘‘मुझ से बेहतर उन्हें कौन जानता है. मुझे याद है कि जब हम असम के मुद्दों पर बात कर रहे थे तब भी वह अपने कुत्ते को बिस्किट खिलाने में व्यस्त थे
‘‘राहुल से मिलने जाने वाले कांग्रेसियों को उसी प्लेट में नाश्ता दिया जाता है, जिस में पिडी खाता है. राहुल भी वही बिस्किट खाते हैं.
‘‘हमें चाय और बिस्किट परोसा गया. कुत्ता टेबल पर गया और टेबल से एक बिस्किट उठाया राहुल ने मेरी तरफ देखा और मुसकराए. मैं सोच रहा था कि वह क्यों मुसकरा रहे हैं. मैं इंतजार कर रहा था कि राहुल कालिंग बेल दबाएं और किसी से प्लेट बदलने के लिए कहें.
‘‘कुछ समय बाद मैं ने देखा कि कांग्रेसी नेता जोशी और गोगोई सभी एक ही प्लेट से बिस्किट ले कर खाने लगे. उस दिन मैं ने फैसला ले लिया कि मैं उस व्यक्ति यानी राहुल गांधी के साथ नहीं रह सकता.’’
गौरतलब है कि हेमंत बिस्वा शर्मा साल 2015 तक कांग्रेस में हुआ करते थे और 3 बार कांग्रेस के टिकट से असम की जालुकुबारी सीट से विधायक भी बने. लेकिन राहुल के कुत्ता प्रेम से वह इतने आहत हो गए थे कि उन्होंने कांग्रेस छोड़ भाजपा जौइन कर ली थी. जिस का ईनाम भी भाजपा ने उन्हें असम का सीएम बना कर दिया.
नेताओं का एक से दूसरी पार्टी में आनाजाना भी आम बात है लेकिन हेमंत की पिडी को ले कर जलन की वजह समझ पाना मुश्किल है, जो हर कभी उस के नाम पर रोने झींकने बैठ जाते हैं.
असल वजह यह है कि हेमंत की मानसिकता मनुवादी है जिस के चलते पूरी कांग्रेस उन से परेशान थी. पिछले दिनों असम में मदरसों पर बुलडोजर चलाने के कदम को भी इसी नजर से देखा जा रहा है. तय है कि कांग्रेसी होते तो वह ऐसा नहीं करते.
राहुल का ट्वीट हुआ था चर्चित
राजनीति से हट कर देखें तो खुद राहुल पिडी और दूसरे कुत्तों को ले कर विपक्षियों को उकसाते रहने में कामयाब होते रहे हैं. अब से कोई 5 साल पहले उन का किया एक ट्वीट खूब चर्चित हुआ था.
उन्होंने पिडी का एक वीडियो शेयर करते लिखा था कि लोग अकसर सवाल करते हैं कि इस आदमी के लिए कौन ट्वीट करता है? तो मैं सभी के सामने हाजिर हूं. यह मैं हूं पिडी. मैं उन्हीं की तरह स्मार्ट हूं. देखिए, मैं एक ट्वीट के साथ क्या कर सकता हूं. ओह.. ट्वीट के साथ.
इस के बाद तो विरोधी उन पर टूट पड़े थे और यह तक कहने लगे थे कि पिडी लाओ कांग्रेस बचाओ और यही राहुल गांधी शायद चाहते भी थे. फिर शुरू हुआ था पिडी के बारे में छानबीन का सिलसिला, जिस से यह सामने आया था कि यह कुत्ता वेल्स कार्गी नस्ल का है जो अपने मालिक को बहुत चाहता है इस में फुरती भी दूसरी नस्ल के कुत्तों से ज्यादा होती है.
अपने मालिक का ध्यान कहीं और बंटते देख इसे नाकाबिलेबरदाश्त गुस्सा आ जाता है. वेल्स कार्गी नस्ल की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ 2 का भी पसंदीदा रहा है.
बकिंघम पैलेस में इसे पारिवारिक सदस्य होने का फख्र मिला हुआ है. अब यह हेमंत बिस्वा के समझने की बात थी क्योंकि राहुल का ध्यान उन से हट कर पिडी की तरफ जाता था और अपने पेट से प्रेम इतना बुरा मानने वाली बात भी नहीं थी कि आप पार्टी और निष्ठाएं दोनों बदल लें.
अक्तूबर, 2017 में दिग्गज कांग्रेसी लोकसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने सरकार पर हमला करते कहा था, देश की एकता के लिए गांधीजी ने कुरबानी दी, इंदिराजी ने कुरबानी दी. आप के घर से कौन गया, एक कुत्ता भी नहीं गया.
इस तंज का जवाब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तंज कसते हुए दिया था कि हर युग में इतिहास को जानने और जीने का प्रयास जरूरी होता है, उस समय हम थे या नहीं थे, हमारे कुत्ते भी थे या नहीं थे. औरों के कुत्ते हो सकते हैं, हम कुत्तों वाली परंपरा में पलेबढ़े नहीं हैं.
दरअसल, कुत्तों को ले कर संसद तक में एकदूसरे को कुत्ता तक कहने की गरमागरमी की वजह राहुल गांधी के प्रिय पिडी को ही माना गया था, क्योंकि इस के कुछ दिन पहले ही उन्होंने पिडी का वीडियो ट्वीट किया था. इस के पहले कुछ भाजपाइयों ने उन का मजाक उड़ाने के लहजे में पूछा था कि इस आदमी के लिए ट्वीट कौन करता है. राहुल गांधी ने बता दिया कि ट्वीट वही करते हैं.
जिन नेताओं के कुत्ते चर्चाओं में ज्यादा रहे हैं उन में एक नाम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी है. योगीजी का कुत्ता प्रेम साल 2017 में तब सामने आया था, जब वह पहली बार मुख्यमंत्री बने थे. इस वक्त में उन की अपने पेट को दुलारती तसवीरें वायरल हुई थीं तो लोगों की उत्सुकता बढ़ी थी.
योगीजी के कालू, गुल्लू और राजा बाबू
धीरेधीरे जानकारियां आना शुरू हुईं कि योगीजी का पेट कोई देसी नस्ल का नहीं, बल्कि विदेशी लेब्राडोर है. लेकिन इस का नाम देसी कुत्तों की तरह कालू है. एक वक्त में कालू को इंटरनेट पर इतना ज्यादा सर्च किया गया था कि इसे इंटरनेट सेलिब्रेटी के खिताब से नवाज दिया गया था.
वायरल हुई एक तसवीर में योगी आदित्यनाथ अपने प्रिय कालू को पनीर का टुकड़ा खिलाते नजर आए थे. गोरखपुर के मठ में जब भी वह जाते हैं तो कालू उन के आगेपीछे दुम हिलाता घूमा करता है.
योगीजी भी उसे बहुत चाहते हैं, जैसी बातों से मीडिया और सोशल मीडिया अटा रहा था. पिडी की तरह कालू का भी अपना इतिहास है कि इसे साल 2016 में किसी भक्त ने दिल्ली में आदित्यनाथ को उपहार में दिया था, जिसे वह अपने मठ ले आए थे.
मुख्यमंत्री बनने के बाद खबर आम रही थी कि कालू योगीजी के लिए बहुत लकी है. गौरतलब है कि हिंदू धर्म में यह अंधविश्वास है कि काले कुत्ते को पालने से राहू, केतू और शनि जैसे क्रूर और अशुभ ग्रहों का प्रभाव कम होता है. जिस के चलते गलीगली में लोग शनिवार के दिन काला कुत्ता ढूंढते मिल जाते हैं.
अब वजह जो भी हो, कालू पर आदित्यनाथ का लाडप्यार किसी सबूत का मोहताज नहीं, जिसे ले कर राजनीति भी गरमाई रही. पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान सपा नेता अखिलेश यादव ने प्रचार में तंज कसते हुए कहा था कि हार के बाद योगीजी अपने कुत्ते को बिस्किट खिलाते नजर आएंगे.
बात सच तो साबित हुई लेकिन योगीजी जीत के बाद कुत्ते को बिस्किट खिलाते नजर आए थे. यानी काला कुत्ता उन्हें फिर शुभ फल दे गया था.
अब यह और बात है कि इस चर्चा में अगर कोई दम होता तो सभी काले कुत्ते वाले कहीं के सीएम होते. न होते वे सरकारी नौकरी जरूर पा गए होते, जिन का पूरे देश सहित यूपी में भी टोटा है.
निराले हैं कालू के ऐशोआराम
रही बात कालू की तो वह मठ में पूरे ऐशोआराम से रहता है. योगीजी की गैरमौजूदगी में मठ के कर्मचारी उस का बच्चों जैसा खयाल रखते हैं. कालू के रहने के लिए खास इंतजाम कुछ इस तरह किए गए हैं कि उसे मौसम की मार न झेलनी पड़े. मुमकिन है जाड़े से बचाने के लिए गर्म हवा वाले पंखे उस के कमरे में रखे गए हों और गरमी से बचाने के लिए कूलर और एसी वगैरह के इंतजाम किए गए हों.
चूंकि कालू एक शुद्ध शाकाहारी कुत्ता है, इसलिए उसे लंच डिनर और ब्रेकफास्ट तीनों में दूध रोटी दिया जाता है. कई बार मंदिर में तैयार होने वाला भोजन भी उसे थाली में परोसा जाता है.
योगीजी के एक और कुत्ते का नाम गुल्लू है, जिस से कई बार कालू और गुल्लू में कंफ्यूजन पैदा हो जाता है. कंफ्यूजन यह कि अगर कल्लू यह है तो गुल्लू कौन है. यह कोई राज की बात नहीं है और न ही इस में कोई सस्पेंस है.
असल में कालू ही गुल्लू है. हां, यह जरूर है कि योगीजी ने सब से पहले राजाबाबू नाम का कुत्ता पाला था, जो असमय ही मर गया था. इस से योगीजी बहुत दुखी और व्यथित हुए थे लेकिन कालू या गुल्लू, कुछ भी कह लें, के आ जाने के बाद वह पिछला सब भूल गए थे.
लोगों को लगा था कि योगीजी भी डौग लवर हैं, लिहाजा कुत्तों के भले के लिए कुछ करेंगे. लेकिन उन्होंने करने के नाम पर जो किया, उस से कुत्ता पालकों में सनाका खिंच गया था. इसी साल मई के महीने में उन्होंने सख्त निर्देश कुत्ता पालकों को यह दिए थे कि जो लोग घर में कुत्ता पालते हैं, वे कुत्तों को सड़कों पर ले जा कर गंदगी न फैलाएं और कुत्तों का रजिस्ट्रैशन जरूर कराएं.
अब कुत्ता पालकों का दर्द यह था कि कुत्ते को घुमाने पोट्टी कराने के लिए ले जाते हैं तो वह करेगा ही और गंदगी भी होगी. ऐसा न हो कि इस पर जुरमाना लगने लगे. क्योंकि कड़ी काररवाई की बात मुख्यमंत्री ने की थी. इस का यह मतलब नहीं कि लोग अपने पेट को घुमाते वक्त पौलीथिन साथ में रखने लगे थे.
बाद में बात आई गई हो गई, लेकिन साबित हो गया कि योगीजी सिर्फ अपने पेट से प्यार करते हैं दुनिया भर के कुत्तों से उन्हें कोई सरोकार नहीं.
केसरीजी के कुत्ते की बात जुदा थी
90 के दशक में 3 साल कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे सीताराम केसरी के कुत्ते की चर्चा के बगैर नेताओं के पेट्स की बात अधूरी रहेगी. जबजब भी पिडी की चर्चा हुई, तबतब लोगों खासतौर से कांग्रेसियों को केसरीजी के वफादार कुत्ते की याद जरूर आई.
कहा गया कि कुत्ता तो केसरीजी का था, जिस से मालिक की जुदाई एक दिन भी बरदाश्त नहीं हुई और उन के पीछेपीछे वह भी यह नश्वर संसार छोड़ गया. कैसे छोड़ गया, इस के पहले उस अनाम कुत्ते का मालिक से प्यार देखें और लगाव भी जो कतई एकतरफा नहीं था.
सीताराम केसरी जहां भी जाते थे, उन का कुत्ता कार में साथ रहता था. अगर केसरी नीचे उतर कर मिलने वालों से मिलने लगते थे तो भी कार का एसी बंद नहीं किया जाता था. वह कुत्ते को ठंडक देता था.
असल में केसरीजी अपने कुत्ते के साथ 7 पुराना किला रोड वाले बंगले में अकेले ही रहते थे, इसलिए उन का पेट से आत्मीय लगाव स्वभाविक बात थी. वह अपने कुत्ते का पूरा खयाल रखते थे. इस घर में केसरी से मिलने वाले लोगों के एक हाथ में मिठाई का डब्बा तो दूसरे में कुत्ते के लिए बिस्किट का पैकेट होता था
यह लगाव वफा के किस्सेकहानियों से कम नहीं कहा जा सकता, क्योंकि 11 अक्तूबर 2000 को केसरीजी गिरे थे तो उन के कूल्हे की हड्डी टूट गई थी. जब तक वे इलाज के लिए अस्पताल में भरती रहे, तब तक उन के कुत्ते ने कुछ खायापीया नहीं था.
इतना ही नहीं, जब केसरीजी का मृत शरीर घर लाया गया था तब दूसरे दिन ही 25 अक्तूबर, 2000 को उन के कुत्ते ने भी दुनिया या देह कुछ भी कह लें, छोड़ दी थी. मालिक और कुत्ते के अंतरंग लगाव के भावुक किस्से तत्कालीन प्रसिद्ध पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुए थे.
ठाकरे के जेम्स बांड हैं निराले
मनसे नेता राज ठाकरे के पेट का नाम बांड है जिस पर ठाकरे परिवार जान छिडकता था. लेकिन अब से कोई 7 साल पहले बांड ने अपनी मालकिन यानी राज ठाकरे की पत्नी शर्मिला ठाकरे के चेहरे को बुरी तरह काट खाया था, जिस से उन के चेहरे पर 2-4 नहीं, बल्कि 64 टांके डाक्टरों को लगाने पड़े थे और चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी भी करनी पड़ी थी.
गौरतलब है कि राज ठाकरे ने 2 कुत्ते पाल रखे हैं दूसरे का नाम जेम्स है. राज के मुंबई स्थित घर कृष्ण कुंज का पहला माला इन्हीं पेट्स के नाम है. ठाकरे परिवार आम कुत्ता पालकों की तरह जेम्स और बांड को भी घर का सदस्य ही मानता है. इन दोनों के लिए एक ट्रेनर भी रखा गया है लेकिन बांड ने शर्मिला को कैसे काटा होगा, इस का जवाब किसी के पास नहीं. जबकि राज रोजाना इन के साथ खेलते भी हैं.
पेट्स को बच्चों की तरह चाहने वाले राज ने पत्नी के साथ हुए हादसे के बाद जेम्स और बांड को अपने फार्महाउस भेज दिया था और फिर कुछ दिन बाद वहां से घर वापस भी बुला लिया था.
पिछले साल जून में जब जेम्स की मौत हुई तो राज बेहद भावुक हो उठे थे और कुत्ते का अंतिम संस्कार परेल के कब्रिस्तान में खुद करने गए थे. अपने पेट्स की तसवीरें अकसर शेयर करने वाले राज ठाकरे का पेट प्रेम पूरी मुंबई जानती है. लेकिन शर्मिला पर बांड के हमले से यह बात तो साबित हो गई थी कि आप हमेशा पेट्स पर आंख मूंद कर भरोसा नहीं कर सकते.
दुनिया भर के नेता हैं डौग लवर
बात अकेले भारत की और राहुल गांधी या योगी आदित्यनाथ की नहीं है, बल्कि दुनिया भर के नेता पेट्स के शौकीन हैं. भारत में तो हर दूसरे बड़े नेता के घर कुत्ता या कुत्ते बंधे दिख जाएंगे. विदेशी नेता भी इस शौक या जरूरत कुछ भी कह लें, से अछूते नहीं हैं.
क्रिकेटर से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने इमरान खान कुत्तों के खासे शौकीन थे. उन्होंने 3-3 कुत्ते पाल रखे थे. उन का एक कुत्ता तो बाकायदा मीटिंगों में उन के साथ भी देखा जाता था. इमरान की तीसरी बीवी बुशरा बी घर छोड़ कर चली गई थीं, क्योंकि उन्हें शौहर के कुत्ता प्रेम से चिढ़ होने लगी थी.
इमरान के कुत्ता प्रेम पर आम पाकिस्तानियों को भी कोफ्त होने लगी थी और इसी के चलते मांग उठी थी कि आर्थिक संकट दूर करने के लिए क्यों न कुत्तों को चीन को बेचा जाए.
रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन तो इतने बड़े डौग लवर हैं कि लोग उन्हें गिफ्ट में कुत्ता देते हैं. उन के घर दरजनों कुत्ते हैं. वैसे भी उन की इमेज एक पशु प्रेमी की है. अलगअलग तरह के जानवरों के साथ फोटो खिंचवाने का उन का शौक दुनिया जानती है.
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा को भी एक अमेरिकी सीनेटर एडवर्ड केनेडी ने पुर्तगीज वाटर नस्ल का कुत्ता, जिस का नाम बो था, गिफ्ट किया था. जो पूरे ओबामा परिवार का चहेता बन गया था.
अमेरिका के ही राष्ट्रपति रहे जार्ज बुश का पेट बोर्न काफी लोकप्रिय हुआ था, जिसे साल 2004 में एक बार बुश एक मीटिंग में भी ले गए थे.
जार्ज बुश से मिलने जो भी व्हाइट हाउस जाता था, बुश उसे बोर्न से जरूर मिलवाते थे. नार्थ कोरिया के राजा किम जौन के पास देसी विदेशी नस्ल के कई कुत्ते हैं, जिन्हें वीआईपी सहूलियतें मिली हुई हैं
और हिटलर का ब्लांडी
जर्मनी के शासक रहे एडोल्फ हिटलर के नाम और कारनामों से हर कोई वाकिफ है. लेकिन यह बात कम ही लोग जानते हैं कि हिटलर अपने पेट ब्लांडी से बेइंतहा प्यार करते थे. इतना कि वह हमेशा उन के साथ रहती थी और साथ ही सोती थी.
दरअसल, ब्लांडी जरमन शेफर्ड नस्ल की मादा थी. तानाशाहों के दिल में किसी के लिए प्यार भी हो सकता है यह कहना बेमानी है. क्योंकि हिटलर ने ब्लांडी पर 1945 में सायनाइड का परीक्षण करवाया था, जिस से उस की मौत हो गई थी.
हिटलर को वाकई कुत्तों से प्रेम था, लेकिन मोह नहीं था. सेना में रहते हिटलर ने कई कुत्ते पाले और खाली वक्त कुत्तों के साथ ही बिताते थे.
सूचनाएं, किस तरह की?’
‘यही कि शहर में हो रही घटनाओं में आप का हाथ है.’
‘लेकिन…?’
उस ने मेरी बात काटते हुए कहा, ‘आप को बताने में क्या समस्या है? हम आप से एक सभ्य शहरी की तरह ही तो बात कर रहे हैं. पुलिस की मदद करना हर अच्छे नागरिक का कर्तव्य है.’
अब मैं क्या बताऊं उसे कि हर बार थाने बुलाया जाना और पुलिस के प्रश्नों का उत्तर देना, थाने में घंटों बैठना किसी शरीफ आदमी के लिए किसी यातना से कम नहीं होता. उस की मानसिक स्थिति क्या होती है, यह वही जानता है. पलपल ऐसा लगता है कि सामने जहरीला सांप बैठा हो और उस ने अब डसा कि तब डसा.
इस तरह मुझे बुलावा आता रहा और मैं जाता रहा. यह समय मेरे जीवन के सब से बुरे समय में से था. फिर मेरे बारबार आनेजाने से थाने के आसपास की दुकानवालों और मेरे महल्ले के लोगों को लगने लगा कि या तो मैं पेशेवर अपराधी हूं या पुलिस का कोई मुखबिर. कुछ लोगों को शायद यह भी लगा होगा कि मैं पुलिस विभाग में काम करने वाला सादी वर्दी में कोई सीआईडी का आदमी हूं. मैं ने पुलिस अधिकारी से कहा, ‘सर, मैं कब तक आताजाता रहूंगा? मेरे अपने काम भी हैं.’
उस ने चिढ़ कर कहा, ‘मैं भी कोई फालतू तो बैठा नहीं हूं. मेरे पास भी अपने काम हैं. मैं भी तुम से पूछपूछ कर परेशान हो गया हूं. न तुम कुछ बताते हो, न कुबूल करते हो. प्रैस के आदमी हो. तुम पर कठोरता का व्यवहार भी नहीं कर रहा इस कारण.’
‘सर, आप कुछ तो रास्ता सुझाएं?’
‘अब क्या बताएं? तुम स्वयं समझदार हो. प्रैस वाले से सीधे तो नहीं कुछ मांग सकता.’
‘फिर भी कुछ तो बताइए. मैं आप की क्या सेवा करूं?’
‘चलो, ऐसा करो, तुम 10 हजार रुपए दे दो. मेरे रहते तक अब तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी. न तुम्हें थाने बुलाया जाएगा.’
मैं ने थोड़ा समय मांगा. इधरउधर से रुपयों का बंदोबस्त कर के उसे दिए और उस ने मुझे आश्वस्त किया कि मेरे होते अब तुम्हें नहीं आना पड़ेगा.
मैं निश्ंचत हो गया. भ्रष्टाचार के विरोध में लिखने वाले को स्वयं रिश्वत देनी पड़ी अपने बचाव में. अपनी बारबार की परेशानी से बचने के लिए और कोई रास्ता भी नहीं था. मैं कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं था. न मेरा किसी बड़े व्यापारी, राजनेता, पुलिस अधिकारी से परिचय था. रही मीडिया की बात, तो मैं कोई पत्रकार नहीं था. मैं मात्र लेखक था, जो अपनी रचनाएं आज भी डाक से भेजता हूं. मेरा किसी मीडियाकर्मी से कोई परिचय नहीं था. एक लेखक एक साधारण व्यक्ति से भी कम होता है सांसारिक कार्यों में. वह नहीं समझ पाता कि उसे कब क्या करना है. वह बस लिखना जानता है.
अपने महल्ले में भी लोग मुझे अजीब निगाहों से देखने लगे थे, जैसे किसी जरायमपेशा मुजरिम को देखते हैं. मैं देख रहा था कि मुझे देख कर लोग अपने घर के अंदर चले जाते थे. मुझे देखते ही तुरंत अपना दरवाजा बंद कर लेते थे. महल्ले में लोग धीरेधीरे मेरे विषय में बातें करने लगे थे. मैं कौन हूं? क्या हूं? क्यों हूं? मेरे रहने से महल्ले का वातावरण खराब हो रहा है. और भी न जाने क्याक्या. मेरे मुंह पर कोई नहीं बोलता था. बोलने की हिम्मत ही नहीं थी. मैं ठहरा उन की नजर में अपराधी और वे शरीफ आदमी. अभी कुछ ही समय हुआ था कि फिर एक पुलिस की गाड़ी सायरन बजाते हुए रुकी और मुझ से थाने चलने के लिए कहा. मेरी सांस हलक में अटक गई. लेकिन इस बार मैं ने पूछा, ‘‘क्यों?’’
‘‘साहब ने बुलाया है. आप को चलना ही पड़ेगा.’’
यह तो कृपा थी उन की कि उन्होंने मुझे कपड़े पहनने, घर में ताला लगाने का मौका दे दिया. मैं सांस रोके, पसीना पोंछते, पुलिस की गाड़ी में बैठा सोचता रहा, ‘साहब से तो तय हो गया था.’ महल्ले के लोग अपनीअपनी खिड़कियों, दरवाजों में से झांक रहे थे.
थाने पहुंच कर पता चला जो पुलिस अधिकारी अब तक पूछताछ करता रहा और जिसे मैं ने रिश्वत दी थी उस का तबादला हो गया है. उस की जगह कोई नया पुलिस अधिकारी था.
मेरे लिए खतरनाक यह था कि उस के नाम के बाद उस का सरनेम मेरे विरोध में था. वह बुद्धिस्ट, अंबेडकरवादी था और मैं सवर्ण. मैं समझ गया कि अपने पूर्वजों का कुछ हिसाबकिताब यह मुझे अपमानित और पीडि़त कर के चुकाने का प्रयास अवश्य करेगा. इस समय मुझे अपना ऊंची जाति का होना अखर रहा था.
मैं ने कई पीडि़त सवर्णों से सुना है कि थाने में यदि कोई दलित अफसर होता है तो वह कई तरह से प्रताडि़त करता है. मेरे साथ वही हुआ. मेरा सारा सामान मुंशी के पास जमा करवाया गया. मेरे जूते उतरवा कर एक तरफ रखवाए गए. मुझे ठंडे और गंदे फर्श पर बिठाया गया. फिर एक काला सा, घनी मूंछों वाला पुलिस अधिकारी बेंत लिए मेरे पास आया और ठीक सामने कुरसी डाल कर बैठ गया. उस ने हवा में अपना बेंत लहराया और फिर कुछ सोच कर रुक गया. उस ने मुझे घूर कर देखा. नाम, पता पूछा. फिर शहर में घटित तथाकथित अपराधों के विषय में पूछा.
मैं ने अब की बार दृढ़स्वर में कहा, ‘‘मैं पिछले 6 महीने से परेशान हूं. मेरा जीना मुश्किल हो रहा है. मेरा खानापीना हराम हो गया है. मेरी रातों की नींद उड़ गई है. इस से अच्छा तो यह है कि आप मुझे जेल में डाल दें. मुझे नक्सलवादी, आतंकवादी समझ कर मेरा एनकाउंटर कर दें. आप जहां चाहें, दस्तखत ले लें. आप जो कहें मैं सब कुबूल करने को तैयार हूं. लेकिन बारबार इस तरह यदि आप ने मुझे अपमानित और प्रताडि़त किया तो मैं आत्महत्या कर लूंगा,’’ यह कहतेकहते मेरी आंखों से आंसू बहने लगे.
नया पुलिस अधिकारी व्यंग्यात्मक ढंग से बोला, ‘‘आप शोषण करते रहे हजारों साल. हम ने नीचा दिखाया तो तड़प उठे पंडित महाराज.’’
उस के ये शब्द सुन कर मैं चौंका, ‘पंडित महाराज, तो एक ही व्यक्ति कहता था मुझ से. मेरे कालेज का दोस्त. छात्र कम गुंडा ज्यादा.’
‘‘पहचाना पंडित महाराज?’’ उस ने मेरी तरफ हंसते हुए कहा.
‘‘रामचरण अंबेडकर,’’ मेरे मुंह से अनायास ही निकला.
राजधानी दिल्ली में जगमगाते इंडिया गेट के पास की एक सरकारी इमारत के एक कोने की ओट लिए सांवली सी लड़की बैठी थी. रात के 10 बज रहे थे. खंभों पर चमकती एलईडी लाइटों में गंदे, फटे कपड़े, बिखरे बाल, धूलमिट्टी लगे चेहरे के बीच उस की सिर्फ दोनों आंखों में गजब की चमक दिख रही थी.
उस की आंखों की बारबार घूमती पुतलियों को देख कर कोई भी उस की चंचलता, चपलता और चतुराई के साथ जिज्ञासा और जरूरतों का अंदाजा लगा सकता था. हालांकि, साधारण देह, छोटी कदकाठी की वह दुबलीपतली कमजोर सी दिख रही थी.
उस की पसरी दोनों टांगों के बगल में जमीन पर छोटे से पौलीथिन के टुकड़े पर 3-4 माह का छोटा बच्चा लेटा बोतल से दूध पी रहा था. वह सामने सड़क पर आतीजाती गाडि़यों की चमकदार हेडलाइटों से दिख जाता था. जब कभी तेज रोशनी उस बच्चे पर पड़ती तो बोतल का निप्पल उस के मुंह से छूट जाता था और वह रोने लगता था.
लड़की गाड़ी वाले को अपनी भाषा में कोसती हुई गुस्से में बोतल का निप्पल फिर से बच्चे के मुंह में ठूंस देती थी. ऐसा वह कुछ मिनटों में ही कई बार कर चुकी थी.
कुछ देर में ही बच्चे ने तो हद ही कर दी. उस का रोना बंद ही नहीं हो पा रहा था. गुस्से में उस ने उसे अपनी गोद में लिया और अपना दूध पिलाने की कोशिश करने लगी. फिर भी बच्चा चुप होने के बजाय रोए जा रहा था. लड़की ने दूसरे हाथ से वहीं पड़ी बोतल को उठा कर देखा. उस में दूध खत्म हो चुका था.
लड़की बड़बड़ाई, ‘‘इतनी रात में दूध किधर मिलेगा…’’
सामने सड़क के दूसरी ओर नजर उठा कर देखा. चायवाला दुकान बंद कर जा चुका था, लेकिन दुकान के पीछे थोड़ी चहलपहल नजर आ रही थी. दुकान के 2 नौकरों का वही घर था. वे वहीं रहते थे. दुकान की छत पर सोते थे.
लड़की की आंखों में चमक आ गई. वह एक हाथ से बच्चे को गोद में पकड़े दूसरे हाथ में दूध की बोतल लिए सड़क पर उन के पास चली गई. वे अपने लिए छोटे सिलेंडर पर रोटियां सेंक रहे थे. भगोने में पके भोजन की खुशबू फैल रही थी.
खैर, लड़की ने कुछ बोले बगैर दूध की बोतल उन के आगे कर दी. आटे की लोई बेलता हुआ नौकर बोल पड़ा, ‘‘देख, इसी को कहते हैं, दानेदाने पर लिखा होता है खाने वाले का नाम.’’
…और फिर वहां से उठ कर अपने बरतनों के बीच से एक दूध की बोतल निकाल लाया. राजस्थानी भाषा में बोला और बोतल उसे पकड़ा दी.
‘‘कुछ देर पहले ही कार से एक बच्चे ने यह फेंक दी थी. उस में दूध भरा था, इसलिए मैं ने उठा कर रख ली. देखो इस के काम आ गया.’’ नौकर बोला.
लड़की ने भी तुरंत बोतल ली और उस की निप्पल वहीं रखे पानी से धोई और रोते बच्चे के मुंह में लगा दी. बच्चा चुप हो गया. लड़की उसे गोद में ले कर वहीं बैठ गई.
तवे की रोटी को गैस की आंच में सेंकता हुआ अपने दूसरे नौकर दोस्त से बोला, ‘‘अच्छा किया भाई, तूने बहुत ही अच्छा काम किया आज. लेकिन इस का मरद कहां है, इसे छोड़ दिया क्या?’’
‘‘पता नहीं क्या हुआ है इस के साथ, लेकिन ये लड़की पिछले 2 दिनों से यहीं सड़क के उस पार म्यूजियम की दीवार के साथ रह रही है. मैं इस की बोली कुछकुछ समझता हूं. राजस्थान की आदिवासी लगती है,’’ नौकर बोला.
‘‘और क्या जानता है इस के बारे में?’’ दूसरे नौकर ने कुछ और जानने की जिज्ञासा दिखाई.
‘‘पूछता हूं,’’ कहता हुआ पहले वाले नौकर ने लड़की की ओर देख कर उस की बोली में पूछा, ‘‘खाना खाया?’’
लड़की ने नहीं में सिर हिला दिया.
‘‘रोटी खाएगी. चिकन भी है. दूं खाएगी?’’
‘‘तू तो ऐसे बोल रहा है जैसे उसे चिकन पता हो… अरे बोल न कि मुर्गा बना है.’’
‘‘हां, सही बोला दोस्त!’’ पहला नौकर बोला और लड़की की ओर दयाभरी नजर से देखा. उसे लड़की की हालत और हुलिया देख कर तरस आ गया.
लड़की चुपचाप कभी उसे देख रही थी तो कभी उस की नजरें रोटी और भगोने में रखे चिकन पर भी घूम रही थीं. नौकर समझ गया. उस के कहे बगैर उस ने 3 रोटी और एक कटोरे में थोड़ा चिकन निकाल कर दे दिया. रोटियां मोटीमोटी थीं. लड़की ने अंगुली से 2 रोटी का इशारा किया.
नौकर ने कागज की प्लेट में 2 रोटियां और एक कटोरे में 2 पीस चिकन के साथ ग्रेवी दे दी. लड़की रोटी और चिकन ले कर वहीं बैठ कर खाने लगी. उसे खाता देख दोनों दोस्त एकदूसरे को देख मुसकराए और फिर बची रोटियां पकाने में जुट गए. पहले नौकर ने लड़की से उसी दौरान उस के मरद के बारे में पूछ लिया.
लड़की ने बताया उस की शादी नहीं हुई है, लेकिन जिस के साथ साल भर से रह रही थी, वह सिरोही में उसी के गांव के पास वाले गांव में रहता था. वही उस का मरद है. उस से प्रेम करती है. लड़की ने बताया कि उस का मरद एक महीना पहले दिल्ली आया था. उसी से मिलने वह भी दिल्ली आ गई है.
वह भी पहली बार ही दिल्ली आया है. यह बता कर लड़की चिंतित हो गई. अपने बच्चे की ओर देखने लगी. उस की आंखों में पानी आ गया.
दोनों ने कहा, ‘‘अरे मत रोओ, हम लोगों से जितना बन पड़ेगा, हम तुम्हारी मदद करेंगे. कल दिन में तुम्हारे रहने, खानेपीने का इंतजाम करवा देंगे. 3 टाइम यहां खाना देने वाला आता है, तुम उस से अपना खाना ले लेना. हम लोग बच्चे का दूध दे देंगे. उधर ही सरकारी नहानेधोने की जगह है. बच्चे की देखरेख भी जरूरी है. उधर तुम्हारी तरह और भी लोग रहते हैं. डरना नहीं…एक डंडा साथ में रखना… आवारा कुत्ते घूमते रहते हैं उन्हें भगाते रहना.’’
खाना खाने के बाद वह लड़की कुछ सामान्य हुई. फिर उस से बातचीत की तो पता चला कि उस की तरह आदिवासी समाज की कम उम्र की तमाम लड़कियां दापा प्रथा के तहत अपने मरद का चुनाव कर लेती हैं और फिर उस के साथ बिना शादी के पतिपत्नी की तरह रहती हैं.
इस तरह सिरोही इलाके में आदिवासी समाज के हर दूसरे घर में नाबालिग लड़कियां मां बन रही हैं. इस से होने वाली मौत के खतरे से वे सभी एकदम अनजान रहती हैं.
यह सब गांवों के लड़केलड़कियों में अपनी मरजी के जीवनसाथी चुनने और शादी से पहले लिवइन रिलेशनशिप की परंपरा के कारण हो रहा है.
वहां न केवल मनपसंद जीवनसाथी चुनने का अधिकार है, बल्कि कुछ महीने और सालों तक साथ रहने की छूट है. यहां तक कि बच्चे पैदा करने पर भी किसी को कोई शिकायत नहीं है.
ये हकीकत है राजस्थान के उदयपुर, सिरोही, पाली और प्रतापगढ़ जैसे जिलों की, जहां 12-13 साल की उम्र में लड़कियां दापा प्रथा के तहत अपनी पसंद का दूल्हा चुन लेती हैं. पारिवारिक और सामाजिक रीतिरिवाज से शादी होने से पहले ही 15-16 साल की उम्र में ही मां भी बन जाती हैं. यह प्रथा गरासिया जनजाति में तो आम है.
खेलनेकूदने की उम्र की लड़कियां अपनी गोद में बच्चा संभालती रहती हैं. ऐसी सैकड़ों लड़कियों की उम्र से पहले किशोरावस्था में ही गर्भवती होने के कारण प्रसव के दौरान ही मौत हो चुकी है. शिक्षा, जागरूकता से कोसों दूर गरासिया जनजाति की ये लड़कियां पुरानी परंपराओं को ही किस्मत मान बैठी हैं.
इन जिलो के गांवों की यह स्थिति बेहद चिंताजनक बन चुकी है. ऐसी सैकड़ों लड़कियों ने मीडिया से बातचीत में अपनी अनंत समस्याएं गिनाईं, जबकि इसे ले कर शासनप्रशासन चुप है.
सिरोही जिले की पिंडवाड़ा तहसील से लगा आदिवासी गांव रानीदरा है. झोपड़ीनुमा बने एक अधपक्के मकान के बाहर एक लड़की गोद में एक बच्चे को लिए उसे खिला रही थी, जबकि आसपास 5-7 साल के कुछ दूसरे बच्चे भी खेल रहे थे. एक रिपोर्टर जैसे ही उस के पास गया, खेल रहे बच्चों के साथ लड़की भी खेतों की ओर दौड़ पड़ी.
रिपोर्टर ने उसे आवाज दे कर बुलाया. तभी उस घर से अधेड़ उम्र का आदमी बाहर निकला. रिपोर्टर का नामठिकाना जानने के बाद उस के वहां आने का कारण पूछा. फिर बताया कि खेतों की तरफ भागी लड़की उस के बेटे की बहू महती है. उस की गोद में खेलने वाला 8 महीने का बच्चा उस का पोता है. व्यक्ति ने महती को आवाज दे कर बुलाया.
महती ने बातचीत में बताया कि करीब डेढ़ साल पहले उसे मनोहर (18) बहुत पसंद था और वह अपनी मरजी से उस के साथ रहने लगी थी. मनोहर उसे गांव के एक मेले में मिला था. वहीं उस की जानपहचान हुई थी. मनोहर आसपास की खदानों में पत्थर काटने का काम करता है. बच्चे की मां बनने के बाद उस की मंदिर में शादी करवा दी गई. सामाजिक रीतिरिवाज कुछ नहीं हुआ.
अपने बारे में महती ने बताया कि वह अनपढ़ है. स्कूल को उस ने दूर से ही देखा है. उस के गांव की लड़कियां स्कूल नहीं जातीं. बताया कि स्कूल में मास्टर उन बच्चों से बहुत काम करवाते हैं और मना करने पर बहुत पीटते हैं, जो उस के आदिवासी समाज के होते हैं. यह सब उस ने गांव के ही लोगों से सुना है.
अपने और पति के बारे में ज्यादा कुछ नहीं बता पाई. किंतु जब उस से कम उम्र में बच्चे की मां बनने के बारे पूछा गया, तब उस ने तपाक से कहा कि मां बनना कोई गलत है क्या? और फिर वह शरमाती हुई चली गई.
उस के ससुर और गांव के दूसरे बुजुर्गों से ही मालूम हुआ कि 70-80 घरों वाले इस रानीदरा गांव में मात्र 10-12 पुरुष ही जिंदा बचे हैं. अधिकतर औरतें विधवा हो चुकी हैं.
इस का कारण उन्होंने बताया कि यहां पत्थरों से जुड़ा काम करने के कारण अधिकतर मर्द खतरनाक बीमारी के शिकार हो जाते हैं. उस बारे में और अधिक जानकारी जुटाने पर पता चला कि इलाके में पत्थरों की खदानों के कारण लोग सिलिकोसिस बीमारी की चपेट में आ जाते हैं.
रानीदरा से ही करीब 6 किलोमीटर की दूरी पर एक गांव लोटाना है. यहां की लगभग पूरी आबादी आदिवासियों की है. इस गांव की उपसरपंच भी एक महिला है. गांव की कम उम्र में लड़कियों के मां बनने के बारे में जब उन से पूछा गया, तब उन्हें आश्चर्य हुआ कि उन से यह सवाल क्यों पूछा जा रहा है.
पहले तो वह हंसी, फिर इस बारे में बात करने से ही इनकार कर दिया. वह न तो अपने बारे में और न ही अपने मर्द के बारे में कुछ बता पाई. जबकि वह खुद लिवइन रिलेशन में रहने के बाद कम उम्र में मां बनी थी.
उसी दौरान मोटरसाइकिल पर कम उम्र का एक जोड़ा वहां से गुजरा. पीछे बैठी लड़की की गोद में छोटा बच्चा किलक रहा था. रिपोर्टर ने अपनी गाड़ी से उन का पीछा किया. आवाज देने पर उन्होंने बाइक रोकी. दोनों पिंडवाड़ा बाजार से सब्जी खरीद कर लौट रहे थे.
लड़की ने अपना नाम सोनिया बताया. उस की उम्र 14 साल सुन कर रिपोर्टर चौंक गया, क्योंकि उस की गोद में बच्चा ही करीब डेढ़ साल का था. इस का मतलब था वह 12 साल की उम्र में ही गर्भवती हो गई थी.
उस का पति भी 20 साल का था, जिस के साथ उस की शादी बच्चा पैदा होने के बाद हुई थी. जब वह गर्भवती हुई थी, तब उसे काफी परेशानी का सामना करना पड़ा था. बीमार रहती थी. कभी पेट दर्द तो कभी कमजोरी. डाक्टर बताता था कि उस की देह में खून नहीं है. बच्चे के जन्म के समय तो उस की तबीयत काफी बिगड़ गई थी. अब वह खुश है क्योंकि उस का बेटा डेढ़ साल का हो चुका है.
उसी गांव की एक औरत ने बताया कि उस की 16 साल की बेटी मां बनने वाली है. उस ने अपनी पसंद का लड़का देखा है, जिस के साथ बगैर शादी किए रहने के बाद गर्भवती हो गई है.
कुछ दिन पहले ही मायके आई है. करीब उस की उम्र की बहू 4 माह के बच्चे की मां बन चुकी है. उस ने अपनी पसंद का लड़का चुना था. दोनों ने कुछ दिनों तक अपनेअपने जीवनसाथी के साथ रहने के बाद गर्भवती होने पर मंदिर में जा कर शादी कर ली थी.
आदिवासी इलाके में सैकड़ों सालों से दापा प्रथा चली आ रही है. उस के मुताबिक लड़की ही अपनी पसंद का लड़का तलाशती है. पसंद आने पर दोनों परिवारों की सहमति से बगैर शादी किए कुछ महीनों और सालों तक साथ रहते हैं. इस के पीछे दोनों में प्रजनन क्षमता का परीक्षण करना होता है.
वहां सात फेरों वाली शादी या किसी तरह का मांगलिक आयोजन जरूरी नहीं होता है. साल भर में आदिवासी समाज के 4-5 स्नेह मिलन कार्यक्रम होते हैं. उन में आदिवासी समाज के लड़के और लड़कियों को अपने पसंद का जीवनसाथी चुनने की छूट होती है. लड़कियां किशोर उम्र 12 से 15 साल की होती हैं. लड़के भी उन के हमउम्र ही होते हैं.
कई रातदिन कार्यक्रम में साथ बिताने के बाद ये अपना हमसफर चुन लेते हैं. इस के बाद लिवइन में रहना शुरू कर देते हैं. इस रिलेशनशिप को ले कर घर व समाज में भी कोई आपत्ति नहीं करता है. जल्द ही वे यौन संबंध बना लेते हैं और लड़की गर्भधारण कर लेती है.
सामान्य तौर पर लड़की 13-14 साल की उम्र में ही गर्भवती हो जाती है. यह उस के भविष्य के जीवन का एक शुभ संकेत और संदेश माना जाता है. घर वाले निश्चिंत हो जाते हैं कि उन की बेटी का परिवार बन गया.
इस समाज को उस कानून से कोई लेनादेना नहीं है, जिसे सरकार ने शादी के लिए बनाया है. जैसे लड़की की उम्र 18 और लड़का 21 साल का हो, तभी वे बालिग होंगे और शादी कर पाएंगे. या फिर लिवइन में रह सकेंगे. इस के नहीं मानने के कारण आदिवासी इलाके में किशोरावस्था में गर्भवती होने से जुड़ी सेहत संबंधी समस्या लगातार बढ़ती जा रही है.
महिला रोग विशेषज्ञ के अनुसार किसी भी महिला को गर्भधारण की सही उम्र 20 साल या इस से अधिक ठीक रहती है. किशोरावस्था में गर्भधारण मां और बच्चे दोनों के लिए घातक होता है.
गांवों में ऐसी मांओं की देखभाल मुख्य तौर पर दाइयों की सलाह पर निर्भर करती है. उन के अनुसार ही गर्भवती औरतों की देखभाल प्रसव और उस के कुछ दिनों बाद तक की जाती है.
यही कारण है कि आदिवासी इलाके में पोषण की बड़ी समस्या है. ऐसे में किशोरावस्था में गर्भधारण करने वाली लड़कियों के गर्भ में पलने वाले बच्चों पर खतरा बढ़ जाता है. उस का उचित विकास नहीं हो पाता है.
ऐसे लोगों के घर अभी भी कच्चे हैं, अधिकतर नाबालिग लड़के स्कूल जाने के बजाय शुरू से ही पत्थर की खदानों में काम करने लगते हैं. उन्हें भी इस का पता नहीं चल पाता है कि उस की पत्नी या साथ रह रही लड़की की तबीयत बिगड़ गई तो अस्पताल ले जाएं. उन की आमदनी भी इतनी नहीं होती कि वे इलाज पर खर्च कर पाएं.
अब सोनिया के पति रमेश को ही लें. वह मजदूरी करता है. खेतों में काम कर महीने में 10-12 हजार कमा पाता है. आनेजाने के लिए उस ने पुरानी बाइक ले रखी है. पत्नी भी साथ में मजदूरी करती है. दोनों मिल कर किसी तरह से घर का खर्च निकाल पाते हैं.
ऐसे गांवों में बच्चे और मांओं का कोई रिकौर्ड नहीं है. शादियों के दफ्तर में तो इन के रिकौर्ड होते ही नहीं हैं. यहां तक कि पैदा होने वाले बच्चे का भी किसी सरकारी संस्था में रजिस्ट्रैशन नहीं करवाया जाता है. इन की संख्या रानीदर, लोटाना, नादिया, वारकी खेड़ा, गरट, मोरस, वरली, भूला, पंच देवल, ठंडी बेरी आदि गांवों में अधिक है.
बहरहाल, प्रशासन और कानून का जो पक्ष है, वह इन के किसी काम का नहीं है. पूर्व सीडब्ल्यूसी सदस्य बी.के. गुप्ता के अनुसार चाइल्ड मैरिज एक्ट और पोक्सो के प्रावधान तभी लागू होते हैं, जब कोई शिकायत प्रशासन या पुलिस तक पहुंचे या फिर पुलिस या प्रशासन की नजर में कोई मामला आ जाए. जब शिकायत नहीं होती तो सरकारी सहायता भी ऐसी लड़कियों को नहीं मिल पाती.
उन के पैरेंट्स पढ़ेलिखे नहीं होते और वे परंपरा के नाम पर अपने बच्चों को साथ रहने की अनुमति देते हैं. फिर चाहे शादी हो या बिना शादी साथ रहें. खुद 13 से 15 साल की उम्र में ही साथ रहने की वजह से बच्चे भी स्कूल नहीं जाते. ऐसे में अर्ली चाइल्ड प्रेग्नेंसी के नुकसान का इन्हें पता ही नहीं है.
आदिवासी नेता रतन लाल गासिया की शिकायत सरकार से है. उन का कहना है कि कम उम्र में मां बनी इन लड़कियों को ले कर सरकार के पास कोई जानकारी ही नहीं है, जबकि सिरोही, उदयपुर, प्रतापगढ़ और पाली जिलों के आदिवासी इलाके में ऐसी हजारों लड़कियां हैं.
कम उम्र में प्रेग्नेंट हो जाने के चलते इन किशोरियों को कमजोरी, खून की कमी, कुपोषण और कई सैक्सुअल बीमारियों का सामना करना पड़ता है. कई बार इन किशोरियों की डिलीवरी के दौरान जान तक भी चली जाती है.
यह एक गंभीर समस्या है. गैरसरकारी संस्थाओं को आगे बढ़ कर इन इलाकों में जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है. साथ ही प्रशासन को भी अपनी कुंभकर्णी नींद से जागना होगा वरना यह समस्या जटिल होती जाएगी.