ऐतिहासिक कहानी – भाग 1 : हाड़ी रानी की अंतिम निशानी

मेवाड़ का इतिहास शौर्य और वीरता की गाथाओं से भरा पड़ा है. कभी गुलामी स्वीकार नहीं करने वाले महाराणा प्रताप की इस भूमि में प्रेम, त्याग और बलिदान की कई कहानियां हैं. उन्हीं में से प्रस्तुत है, हाड़ी रानी सलेहकंवर की अमर कहानी, जिन्होंने शादी के एक सप्ताह बाद ही मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सिर काट कर युद्धभूमि में पति को इस तरह भिजवाया कि…

हाड़ी रानी सलेहकंवर का जन्म बसंत पंचमी के दिन बूंदी के हाड़ा शासक संग्राम सिंह के घर हुआ था. सलेहकंवर अपने पिता संग्राम सिंह

की लाडली व समझदार पुत्री थी. हाड़ी रानी सलेहकंवर जब सयानी हुई तो सलुंबर के सरदार राव रतन सिंह चुंडावत के साथ उन का विवाह हुआ. रतन सिंह मेवाड़ के सलुंबर के सरदार थे.

मेवाड़ के महाराणा राजसिंह प्रथम (1653-1681) ने जब रतनसिंह को मुगल गवर्नर अजमेर सूबे के खिलाफ विद्रोह करने के लिए आह्वान किया, उस समय रतन सिंह का सलेहकंवर से विवाह हुए कुछ ही दिन हुए थे. उन्हें कुछ हिचकिचाहट हुई. लेकिन राजपूतों की परंपरा का ध्यान रखते हुए वे रण क्षेत्र में जाने को तैयार हुए और अपनी नवव्याहता हाड़ी रानी से कुछ ऐसी निशानी (चिह्न) मांगी, जिसे ले कर वह रण क्षेत्र में जा सकें.

रानी हाड़ी को लगा कि वह रतनसिंह के राजपूत धर्म के पालन में एक बाधा बन रही है. हाड़ी रानी सलेहकंवर ने अपना सिर काट कर एक थाली में दे दिया. थाल में रख कर, कपड़े से ढक कर जब सेवक वह सिर ले कर उपस्थित हुआ तो रतनसिंह को बड़ी ग्लानि हुई. उन्होंने हाड़ी रानी के सिर को उस के ही बालों से बांध लिया और युद्ध लड़े. जब विद्रोह समाप्त हो गया तब रतनसिंह की जीवित रहने की इच्छा समाप्त हो चुकी थी.

उन्होंने अपना भी सिर काट कर अपनी जीवनलीला समाप्त कर दी. रतनसिंह और सलेहकंवर की शादी को एक सप्ताह भी नहीं हुआ था और मेवाड़ के महाराणा राजसिंह और रूपनगर की चारूमति की शादी में औरंगजेब कोई बाधा उत्पन्न न कर दे, इस के लिए रतनसिंह ने अपने प्राण न्यौछावर कर दिए और हाड़ी रानी का भी क्षत्रिय चरित्र रहा होगा कि रतनसिंह के एक सेनाणी (निशानी) मांगने पर अपना सिर काट के दे दिया था, जबकि शादी को महज एक सप्ताह हुआ था. न हाथों की मेहंदी छूटी थी और न ही पैरों का आलता.

सुबह का समय था. हाड़ा सरदार रतन सिंह गहरी नींद में सो रहे थे. हाड़ी रानी सलेहकंवर सजधज कर राजा साहब को जगाने शयन कक्ष में आईं. उन की आंखों में नींद की खुमारी साफ झलक रही थी.

रानी ने हंसीठिठोली से उन्हें जगाना चाहा. इस बीच दरबान आ कर वहां खड़ा हो गया. राजा का ध्यान उस की ओर न जाने पर रानी ने कहा, ‘‘हुकुम, महाराणा का दूत काफी देर से खड़ा है. वह आप से तुरंत मिलना चाहता है. दूत आप के लिए कोई आवश्यक पत्र लाया है. वह आप से मिलकर अभी पत्र देना चाहता है.’’

असमय दूत के आगमन का समाचार सुन कर ठाकुर रतनसिंह हक्काबक्का रह गए. वे सोचने लगे कि अवश्य कोई विशेष बात होगी. महाराणा को पता है कि वह अभी ही ब्याह कर के लौटे हैं. आपात की घड़ी ही हो सकती है.

ठाकुर रतनसिंह ने हाड़ी रानी को अपने कक्ष में जाने को कहा. दूत को बुला कर पास में बिठाया. ठाकुर रतनसिंह दूत को बिठा कर नित्यकर्म से निवृत्त होने चले गए. थोड़ी देर में वे निवृत्त हो कर अपने कक्ष में लौटे जहां राणा का दूत बैठा प्रतीक्षा कर रहा था.

ठाकुर रतनसिंह ने दूत को देख कर कहा, ‘‘अरे शार्दूल सिंह तू! इतनी सुबह कैसे? क्या भाभी ने घर से खदेड़ दिया है, जो सुबहसेवेरे आ कर नींद में खलल डाल दी.’’ सरदार रतन सिंह ने फिर दूत से कहा, ‘‘तेरी नई भाभी अवश्य तुझ पर नाराज हो कर अंदर गई होंगी. नईनई है न. इसलिए बेचारी कुछ नहीं बोलीं. ऐसी क्या आफत आ पड़ी थी. 2 दिन तो चैन की बंसी बजा लेने देते. मियांबीवी के बीच में क्यों कबाब में हड्डी बन कर आ बैठे. खैर, छोड़ो ये सब, बताओ राणा राजसिंह ने मुझे क्यों याद किया है?’’ वह ठहाका मार कर हंस पड़े.

दोनों में गहरी मित्रता थी. सामान्य दिन अगर होते तो शार्दूलसिंह भी हंसी में जवाब देता. शार्दूल खुद भी बड़ा हंसोड़ था. वह हंसीमजाक के बिना एक क्षण को भी नहीं रह सकता था, लेकिन इस वक्त वह बड़ा गंभीर था.

बींझा- भाग 1 : सोरठ का अमर प्रेम

सांचौर एक अच्छा और बड़ा राज्य था. इस राज्य की कमान रायचंद देवड़ा के हाथों में थी. करीब सवा लाख की आबादी वाले इस राज्य में 52 तहसीलें थीं. राजा रायचंद देवड़ा के राज्य में जनता सुख और शांति से रह रही थी. राज्य में न चोरी,

डाका और न लूट होती थी. लोग बड़े चैन के साथ रहते थे. राजा रायचंद देवड़ा की एक रानी ने एक रात एक पुत्री को जन्म दिया. राजा के आदेश पर सुबह राजपंडित लडक़ी की जन्मपत्री बनाने महल में हाजिर हुआ. पंडितजी ने पंचाग देखा, ज्योतिषशास्त्र की किताबें खोलीं. जोड़ लगाया, बाकी निकाली, राशियां मिलाईं, नक्षत्र देखे. इधर का उधर, उधर का इधर किया, लेकिन उस के चेहरे पर झलक रही परेशानी खत्म ही नहीं हो रही थी.

निराश होने के बाद उस ने हाथ जोड़ कर राजा रायचंद देवड़ा से अर्ज की, ‘‘अन्नदाता बाईसा का जन्म मूल नक्षत्र में हुआ है और वह भी पहले पहर में. इस नक्षत्र में जो भी पैदा होता है, वह अपने पिता के लिए घातक और राज्य के लिए घोर अनिष्टकारी होता है.’’

“आप ने दूसरे पंडितों से इस के बारे में कोई सलाहमशविरा किया है?’’ राजा ने पूछा.

“अन्नदाता, दूसरे विद्वानों से भी मैं ने पूछ लिया है. उन की राय भी मेरी राय से मिलती है.’’

“तो फिर इस बच्ची का क्या किया जाए?’’

“मैं तो इतनी अर्ज कर सकता हूं कि इस बच्ची को हमेशा के लिए इस राजमहल और राज्य से हटा देना चाहिए.’’ पंडित ने राय दी.

“कोई दूसरा रास्ता नहीं निकल सकता?’’ राजा ने पूछा.

“नहीं महाराज,’’ सिर नीचा किए हुए राजपंडित बोला.

रायचंद ने हुकम दिया कि बच्ची को मार दिया जाए.

जब इस की खबर रानी को हुई तो वह रोती हुई रायचंद के पैरों में गिर पड़ी और बोली, ‘‘बेचारी एक दिन की ही तो बच्ची है,

उसे जीवनदान दीजिए.’’

राजा रायचंद अडिग रहा. वह बोला,‘‘मेरा राज्य और मेरा जीवन इस लडक़ी के जीवन से खतरे में है. इस कारण मैं कोई सहायता नहीं कर सकता.’’

‘‘मैं आप को एक राय दे रही हूं, जिस से आप जीव हत्या से बच जाएंगे.’’ रानी बोली. बेटी को बहा दिया नदी में रानी की राय राजा रायचंद को पसंद आ गई. बच्ची को नदी में बहा दिया गया. नदी शांत भाव से बह रही थी. उगते सूरज की किरणें उस के पानी से खेल रही थीं. नदी के किनारे रखे सपाट पत्थर पर रामू धोबी पछाटपछाट कर कपड़े धो रहा था. थकी कमर को सीधी करने के लिए रामू ने सिर उठाया तो उसे नदी में बहती हुई कोई चीज नजर आई. जब सूरज की किरणें उस चीज को छूतीं तो वह चमकने लगती. पास ही चंपा कुम्हार बरतन बनाने के लिए मिट्ïटी खोद रहा था. रामू ने चंपा को आवाज लगाई, ‘‘अरे चंपा, देख, नदी में कोई चीज बहती आ रही है.’’ चंपा ने नदी की तरफ देखा, ‘‘मुझे तो कोई पिंजरे जैसी चीज दिख रही है, चल उसे निकालें.’’

रामू बोला, ‘‘पिंजरा मेरा, अंदर वाली चीज तेरी.’’

दोनों ने अपनी धोती ऊंची उठाई, फिर जोड़ी पानी में कूद गई. देखा तो पिंजरा. पिंजरा खोला तो अंदर रुई में लिपटी एक बच्ची थी. कोमल इतनी थी जैसे गुलाब का फूल.

उसे देखते ही रामू बोला, ‘‘कौन ऐसा हत्यारा बाप होगा, कौन ऐसी वज्र छाती वाली मां होगी. लगती तो किसी बड़े घर की

है, तभी ऐसे कीमती सोने के पिंजरे में इसे बहाया, लेकिन बेचारी को बहाया क्यों?’’

चंपा बोला, ‘‘लगता है, यह मेरे लिए ही हुआ है, क्योंकि मेरे कोई संतान नहीं है. नियति को मेरी घर वाली की गोद भरनी थी.’’ चंपा रुई में लिपटी बच्ची को ले कर भागता हुआ घर आया और पत्नी से बोला, ‘‘लो, तुम्हारी इच्छा पूरी हो गई. इसे पालपोस

कर बड़ा करो.’’ चंपा ने पत्नी को सारी बात कह सुनाई.

कुम्हारन ने बच्ची को छाती से लगा लिया और उसे पालनेपोसने लगी. यह सब नियति का ही खेल था, जो सांचौर के राजा की पुत्री चंपा कुम्हार के घर में पहुंच गई. चंपा अपनी पत्नी से कहता ही न थके, ‘‘सारे सोरठ देश में तू कहीं भी घूम आ, ऐसी सुंदर कन्या तुझे नहीं मिलेगी. लगता है, सोरठ देश का सारा रूप इसी में आ गया.’’

“आप की बात सोलह आना सच है. ऐसी रूपवती कहीं नहीं है.’’ समय के साथ बच्ची बड़ी होने लगी. चंपा कुम्हार ने उस बच्ची का नाम सोरठ रख दिया था. सोरठ ज्योंज्यों बढऩे लगी, त्योंत्यों उस की सुंदरता खिलने लगी थी. चंपा अपनी पत्नी को हमेशा समझाता रहता और सावधान करता रहता, ‘‘कितनी बार तुझे कहा है, सोरठ को दरवाजे पर मत जाने दिया कर, किसी से बात मत करने दिया कर. क्या मालूम कब किसी राजा की, अमीर आदमी की नजर इस पर पड़ जाए. अनर्थ हो जाएगा. हम रहे कुम्हार, छोटी जाति के. न ‘हां’ कहने की बनेगी, न ‘ना’ कहने की. तू तो इसे घर से बाहर

निकलने ही मत दिया कर.’’

लेकिन चांद कितने दिन बादल के पीछे छिप सकता है. एक दिन गढ़ गिरनार का राव खंगार अपने भांजे बींझा के साथ शिकार खेलता चंपा कुम्हार के गांव आ निकला. सहेलियों के साथ सोरठ भी राव खंगार की सवारी देखने उस के डेरे के पास चली आई. लड़कियों के झुंड में सोरठ ऐसी चमक रही थी, जैसे तारों के बीच चंदा. बींझा की नजर सोरठ पर पड़ी और वहीं की वहीं अटक गई.

सोरठ लड़कियों के झुंड में ऐसे चमक रही है जैसे किसी धुंधले बादल में बिजली चमक रही हो. राव खंगार का घोड़ा 30 कद आगे निकल गया, पीछे घूम कर देखा तो बींझा तो वहीं अटका खड़ा था. उस ने अपना घोड़ा वापस किया. राव खंगार को आते देख बींझा सोरठ की तरफ इशारा कर के बोला, ‘‘इस छोकरी का मोल करूं?’’ चंपा कुम्हार ने की परवरिश

उधर घर पर सोरठ को न पा कर चंपा कुम्हार की पत्नी सोरठ को ढूंढने आई. उस ने बींझा को सोरठ को घूरते देखा तो सोरठ का हाथ पकड़ अपने साथ खींचती घर ले गई. बींझा ने अपना सिर धुन लिया, ‘‘इस को तो मुंहमांगा धन दे कर अपना बनाना चाहिए.’’

राव खंगार ने हां भरी. सोरठ का पताठिकाना पूछ राव खंगार और बींझा दोनों चंपा कुम्हार के घर पहुंचे. उन्होंने सोरठ को उस से मांगा तो चंपा ने कहा, ‘‘पृथ्वी का राज भी दे दो तो भी मैं अपनी बेटी को नहीं बेचूंगा.’’

“बेचने के लिए कौन कहता है. गढ़ गिरनार का राजा हूं, इस से शादी करूंगा.’’ राव खंगार और बींझा ने चंपा को बहुत समझाया, लालच दिया, ऊंचानीचा लिया, लेकिन चंपा तो अडिग रहा, ‘‘अपनी बेटी की शादी अपनी बराबरी वाले से ही करूंगा.’’

राव खंगार और बींझा वापस गिरनार लौट गए. लेकिन बींझा के दिल पर सोरठ की छवि ऐसी उतर गई कि निकाले नहीं निकली, मिटाए नहीं मिटी. दिनरात यही सोचता रहा कि सोरठ को कैसे प्राप्त करूं.

इधर चंपा कुम्हार को फिकर लग गई. सोरठ बड़ी हो गई. गिरनार के राजा से तो किसी तरह पिंड छुड़ाया, लेकिन इस देश में राजाओं की, अमीरों की क्या कमी. कोई कभी भी आ टपके. किसकिस से मैं सोरठ को और अपने को बचाऊंगा. मैं ठहरा गरीब आदमी, गरीब की ताकत कितनी? पहुंच कितनी? वे होंगे बड़े आदमी, जिन की बड़ी ताकत लंबी पहुंच. उस ने तय कर लिया कि सोरठ की शादी जल्दी कर देनी चाहिए. मनचलों की भीड़ आने लगी और बदनामी होने लगी तो इस के लिए वर ढूंढना मुश्किल हो जाएगा.

डायन – भाग 1 : बांझ मनसुखिया पर बरपा कहर

मालती अपने बेटे हजारू के साथ गुलगुलिया स्लम बस्ती में रहती थी. उस का एकलौता बेटा शादी के 5 साल बाद अपनी बहू मनसुखिया को गौना करा कर घर लाया था, जिस के चलते घर में काफी चहलपहल थी. पड़ोस की औरतों का जमावड़ा लगा हुआ था.

एक औरत ने कहा, ‘‘बहू सांवली है तो क्या हुआ, मुंह का पानी ऐसा है कि गोरी मेम के कान काट ले. बहू की आंखों में गजब का खिंचाव है, कोई एक बार झांक ले तो उन में बस डूबता ही चला जाए. बहू सांवली है तो क्या हुआ, वह हजारू को अपना गुलाम बना कर रखेगी.’’

उस औरत का कहना सच निकला. मनसुखिया के रूपजाल में हजारू ऐसा उलझा कि कामधाम छोड़ कर दिनरात घर में पड़ा रहता. वह नईनवेली पत्नी की खूबसूरती की भूलभुलैया में फंस कर रह गया था. वह अपनी पत्नी को छोड़ कर कभी दूर नहीं जाता था, जिस से उस की मां मालती परेशान रहती थी. वह बारबार उसे काम पर जाने को कहती, लेकिन हजारू कोई न कोई बहाना बना कर मनसुखिया की खिदमत में लगा रहता.

इसी तरह 5 साल कब बीत गए, पतिपत्नी को मालूम ही नहीं चला. पर  अब भी मनसुखिया की कोख हरी न हो सकी थी, जिस से गुलगुलिया स्लम बस्ती की औरतें उसे बच्चा न होने का ताना देती थीं. इन में पड़ोसन मनतुरनी और अंजू खास थीं. वे दोनों मनसुखिया से काफी जलती थीं. हजारू और मनसुखिया का प्यार उन्हें फूटी आंख नहीं सुहाता था, इसलिए एक दिन मनसुखिया के खिलाफ मालती को भड़काया.

‘‘बुरा न मानना मालती बहन, पर तेरी बहू की कोख किसी ने मार ली है, इसलिए वह कभी मां नहीं बन सकती. वह बांझ है… बांझ,’’ मनतुरनी ने कहा.

‘‘मालती बहन को क्यों झूठी तसल्ली देती हो मनतुरनी… इन की बहू औरत के नाम पर चुड़ैल है, चुड़ैल… डायन. पहले अपनी कोख मारती है, उस के बाद पति को मार कर डायन बनती है, इसलिए उसे अपने घर से निकालो और बेटे की सलामती चाहती हो तो उस की दूसरी शादी रचाओ, नहीं तो फिर ऐसे पछताओगी कि कोई आंसू पोंछने वाला तक नहीं मिलेगा,’’ मनसुखिया को डायन करार देते हुए अंजू ने डंके की चोट

पर कहा.

‘‘बस करो अंजू बहन, अब बस करो. मुझे डायन बहू नहीं, अपना बेटा प्यारा है. बेटे की दूसरी शादी रचा कर मैं अपने कुल का दीपक जलाए रखूंगी… कुल की पताका सातवें आसमान में लहराऊंगी, लेकिन इसे मैं अपने घर में नहीं रखूंगी…’’ अपनी बहू से नाराज मालती उन दोनों को भरोसा दिलाते हुए बोली.

‘‘2 साल पहले इस की छोटी बहन अपने यार के साथ भाग गई थी. आज तक पता नहीं चला कि वह कहां गुलछर्रे उड़ा रही है. एक आवारा, दूसरी डायन. दोनों बहनों ने पूरे खानदान की नाक कटवा दी है. जल्दी फैसला लो मालती बहन. हम सब तुम्हारे साथ हैं. देखना, कहीं समय हाथ से निकल न जाए,’’ अंजू हमदर्दी जताते हुए बोली.

अपनी सास मालती और बस्ती की औरतों की जलीकटी बातें सुन कर मनसुखिया हमेशा कुढ़ती रहती थी. उस का गुलाब की तरह खिला चेहरा मुरझाने लगा था. स्लम बस्ती के सार्वजनिक नल पर पानी भरना और लाइन में खड़े हो कर शौच जाना मुश्किल था. हर जगह उस की इज्जत पर उंगली उठने लगी थी, जिसे देख कर हजारू भी हैरान था.

घर में हर रोज उस की मां और पत्नी में झगड़ा होता रहता था. उस की मां बहू को डंडे से पीटती और घर से बाहर निकल जाने को कहती. लेकिन हजारू उस की हिफाजत करता. हजारू को लगता था कि वह काम नहीं करता है, इसलिए उस की मां बहू को सताती है. वह काम पर जाने लगा.

एक शाम हजारू अपने साथी मजदूरों के साथ पैदल ही काम से लौट रहा था, तभी उस के पैर पर किसी जहरीले सांप ने काट लिया. यह देख कर उस के साथियों ने सांप को मारना चाहा, लेकिन सांप सरसराते हुए झाड़ी में जा कर गायब हो गया.

तब हजारू के मजदूर साथी एक ओझा लड्डुइया बाबा के पास उसे ले गए, जिस ने हजारू की काफी झाड़फूंक की, पर उसे राहत नहीं मिली. उस के मुंह से झाग निकलने लगा और सांस लेने में दिक्कत होने लगी. धीरेधीरे हजारू का शरीर ठंडा पड़ चला गया.

सांप के काटने की खबर जंगल की आग की तरह चारों तरफ फैल गई. हजारू को देखने के लिए उस की मां, पत्नी और बस्ती के तमाम लोग पहुंच गए. लोगों में हजारू के न बचने की चर्चा तेज हो गई.

इसी बीच मालती लड्डुइया बाबा के पास गई और हजारू को जल्द ठीक करने की गुहार लगाने लगी, ‘‘बाबा, हजारू मेरा एकलौता बेटा है. इसे अपनी शक्ति से बचा लो, मैं आप के पैर पड़ती हूं,’’ मालती बाबा के पैरों पर गिर कर गिड़गिड़ाने लगी.

‘‘अब तेरा बेटा नहीं बच पाएगा. उस के सामने मौत बन कर तुम्हारी बहू खड़ी है. उस ने नागिन बन कर तेरे बेटे को ठीक उसी तरह काट लिया है, जैसे

2 सितंबर, 2022 को रांची में एक डायन ने अपने ही भतीजे को सांप बन कर काट लिया था, जिस के बाद वह मर…’’

बाबा की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि बस्ती के कुछ लोग मनसुखिया पर टूट पड़े. वे उस पर लातघूंसे और डंडे बरसाने लगे. पड़ोस की औरतें उस के बाल पकड़ कर पीटने लगीं.

इस के बाद बाबा ने मनसुखिया को अपने कब्जे में ले लिया और अपनी बेंत की छड़ी उस के पिछवाड़े पर मारने लगा.

मार खाती मनसुखिया बारबार एक ही बात कहती रही, ‘‘बाबा, मैं डायन नहीं हूं… मेरे पास कोई जादू नहीं है… मैं किसी को न मार सकती हूं, न जिंदा कर सकती हूं… मैं एक कमजोर औरत हूं… बाबा, मुझे माफ कर दो. मैं आप के पैर पड़ती हूं… मुझे यहां से जाने दो… मैं यहां दोबारा नहीं आऊंगी…’’

लेकिन उस बेरहम बाबा पर कोई असर नहीं पड़ा. उस ने भीड़ से कहा, ‘‘यह झूठी है… इस की बातों पर विश्वास मत करना… जब तक इस के मुंह में इनसानी गंदगी नहीं डालोगे, यह चुड़ैल बोलने वाली नहीं है… गांव को इस डायन से मुक्ति दिलानी है, तो नौजवानों को आगे आना होगा.’’

4-5 लड़कों ने तुरंत बाबा के आदेश का पालन किया. उन का इशारा पाते ही वे सब मनसुखिया के पास पहुंचे और बाज की तरह लपक कर उसे दबोच लिया. किसी ने पैर पकड़े, तो किसी ने हाथ और पलक झपकते ही उसे जमीन पर पटक दिया. एक लड़के ने अपनी पैंट का बटन खोला और उस के मुंह में पेशाब करने लगा… तभी दूसरे लड़के ने एक डब्बे में रखी इनसानी गंदगी उस के मुंह पर उड़ेल दी.

मनसुखिया छूटने की कोशिश करती रही, पर उन दरिंदों के आगे उस की एक न चली… वह बेहोश हो कर जमीन पर गिर पड़ी, तो मरा हुआ समझ कर बस्ती के लोग उसे नदी के किनारे फेंक आए.

अगले दिन भोर में मनसुखिया को होश आया, तो खुद को नदी के किनारे श्मशान भूमि पर पाया. उस ने ठान लिया कि अब वह इस बस्ती से कोसों दूर किसी बड़े शहर में चली जाएगी, ताकि कोई उसे देख और पहचान न सके.

मनसुखिया किसी तरह वहां से उठ कर नदी के किनारे गई और झुक कर अपनी अंजुली में पानी भरने लगी कि तभी उस ने नदी के जल में अपनी मांग में भरे सिंदूर को देखा, जो उस के सुहागन होने का सुबूत था. उस की आंखें छलछला आईं. पर दिल पर पत्थर रख कर उस ने सिंदूर को धो डाला, फिर अपने गले से मंगलसूत्र, नाक से नथ, कलाई से चूडि़यां, पैरों से पाजेब उतारी और उन सब को अपने आंचल के पल्लू में बांध लिया.

इस के बाद मनसुखिया ने अपने चेहरे पर पानी के छींटे मार कर मुंह, नाक, कान की सफाई की. उस ने आसमान की ओर देखा. पौ फटने में अभी देर थी. उस ने सोचा कि सूरज उगने से पहले उसे रेलवे स्टेशन पहुंच जाना चाहिए.

मनसुखिया ने श्मशान में पड़ी एक साड़ी को अपनी गरदन में लपेटा और चिता की राख को दोनों हाथों में ले कर अपने चेहरे और कटेफटे घावों पर लगाया. एक पगली का रूप बना कर वह किसी तरह रेलवे स्टेशन पहुंची, जहां प्लेटफार्म से तभी चली एक रेलगाड़ी में चढ़ गई.

 

चिनम्मा- भाग 1: कौन कर रहा था चिन्नू का इंतजार ?

एक सीमित सी दुनिया थी चिनम्मा की. गरीबी में पलीबढ़ी वह, फिर भी पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी लेकिन उस के अप्पा की मंशा तो कुछ और ही थी…

पढ़तेपढ़ते बीच में ही चिनम्मा दीवार पर टंगे छोटे से आईने के सामने खड़े हो ढिबरी की मद्धिम रोशनी में अपना चेहरा फिर से बड़े गौर से देखने लगी. आज उस का दिल पढ़ाई में बिलकुल नहीं लग रहा था. शाम से ले कर अब तक न जाने कितनी बार आईने के सामने खड़ी हो वह खुद को निहार चुकी थी. बड़ीबड़ी कजरारी आंखें, खड़ी नाक, सांवला पर दमकता रंग और मासूमियतभरा अंडाकार चेहरा. तभी हवा का एक ?ोंका आया और काली घुंघराली लटों ने उस के आधे चेहरे को ढक कर उस की खूबसूरती में चारचांद लगा दिए. एक मधुर, मंद मुसकान उस 18 वर्षीया नवयुवती के चेहरे पर फैल गई. उसे अपनेआप पर नाज हो रहा था. हो भी क्यों न. किसी ने आज उस की तारीफ करते हुए कहा था, ‘चिनम्मा ही है न तू, क्या चंदा के माफिक चमकने लगी इन 3 सालों में, पहचान में ही नहीं आ रही तू तो.’

तभी अप्पा की कर्कश आवाज आई, ‘‘अरे चिन्नू, रातभर ढिबरी जलाए रखेगी क्या? क्या तेल खर्च नहीं हो रहा है?’’ तेल क्या तेरा मामा भरवाएगा. चल ढिबरी बुझा और सो जा चुपचाप. अप्पा की आवाज सुन कर वह डर गई और ?ाट से ढिबरी बु?ा कर जमीन पर बिछी नारियल की चटाई पर लेट गई. अप्पा शराब के नशे में टुन्न था. चिनम्मा को पता था कि ढिबरी बु?ाने में जरा सी भी देर हो जाती तो वह मारकूट कर उस की हालत खराब कर देता. अगर अम्मा बीचबचाव करने आती, तो उसे भी चुनचुन कर ऐसी गालियां देता कि गिनना मुश्किल हो जाता. पर आज उसे नींद भी नहीं आ रही थी. रहरह कर साई की आवाज उस के कानों को ?ांकृत कर रही थी.

चिनम्मा एक गरीब मछुआरे की इकलौती बेटी है. उस के आगेपीछे कई भाईबहन आए, पर जिंदा नहीं बच पाए. अम्मा व अप्पा और गांववालों को विश्वास है कि ऐसा समुद्र देवता के कोप के कारण हुआ है. चूंकि समुद्र के साथ मछुआरों का नाता अटूट होता है, इसलिए अपनी जिंदगी में घटित होने वाले सारे सुखोंदुखों को वे समुद्र से जोड़ कर ही देखते हैं. अप्पा चिनम्मा को प्यार करता है पर जब ज्यादा पी लेता है तो बेटा नहीं होने की भड़ास भी कभीकभी मांबेटी पर निकालता रहता है.

लंबेलंबे नारियल और ताड़ के वृक्षों से आच्छादित चिनम्मा का छोटा सा गांव यारडा, विशाखापट्टनम के डौल्फिन पहाड़ी की तलहटी में स्थित है, जिस का दूसरा हिस्सा बंगाल की खाड़ी की ऊंची हिलोरें मारती लहरों से जुड़ा हुआ है. आसपास का दृश्य काफी लुभावना है. लोग दूरदूर से यारडा बीच (समुद्र तट) घूमने आते हैं. प्राकृतिक सौंदर्य से यह गांव व इस के आसपास का इलाका जितना संपन्न है आर्थिक रूप से उतना ही विपन्न.

गांव के अधिकांश निवासी गरीब मछुआरे हैं. मछली पकड़ कर जीवननिर्वाह करना ही उन का मुख्य व्यवसाय है. 30-35 घरों वाले इस गांव में 5-6 पक्के मकान हैं जो बड़े और संपन्न मछुआरों के हैं. बाकी सब ?ोंपडि़यां ईटपत्थर और मिट्टी की बनी हैं, जिन पर टीन और नारियल के छप्पर हैं. गांव में 2 सरकारी नल हैं, जहां सुबहशाम पानी लेने वालों की भीड़ लगी रहती है. नजर बचा कर एकदूसरे के मटके को आगेपीछे करने के चक्कर में लगभग रोज वहां महाभारत छिड़ा रहता है. कभीकभी तो हाथापाई की नौबत भी आ जाती है.

गांव से करीब एक किलोमीटर पर 12वीं कक्षा तक का सरकारी विद्यालय है जहां आसपास के कई गांव के बच्चे पढ़ने जाते हैं. कहने को तो वे बच्चे विद्यालय जाते हैं पढ़ने, पर पढ़ने वाले इक्कादुक्का ही हैं, बाकी सब टीवी, सिनेमा, फैशन, फिल्मी गाने और सैक्स आदि की बातें ही करते हैं. उन्हें पता है कि बड़े हो कर मछली पकड़ने का अपना पुश्तैनी धंधा ही करना है तो फिर इन पुस्तकों को पढ़ने से क्या फायदा?

पर चिनम्मा इन से थोड़ी अलग है. वह बहुत ध्यान से पढ़ाई करती है. उसे बिलकुल पसंद नहीं है मछुआरों की अभावभरी जिंदगी, जहां लगभग रोज ही मर्र्द शराब के नशे में औरतों, बच्चों से गालीगलौज और मारपीट करते हैं. ये औरतें भी कुछ कम नहीं. जब मर्द अकेला पीता है तो उन्हें बरदाश्त नहीं होता, अगर हाथ में कुछ पैसे आ जाएं तो ये भी पी कर मदहोश हो जाती हैं.

गांव में सरकारी बिजली की सुविधा भी है. फलस्वरूप हर ?ोंपड़ी में चाहे खाने को कुछ न भी हो पर सैकंडहैंड टीवी जरूर है. हां, यह बात अलग है कि समुद्री चक्रवात आने या तेज समुद्री हवा चलने के कारण अकसर इस इलाके में बिजली 8-10 दिनों के लिए गुल हो जाती है. अभी 3 दिनों पहले आए समुद्री हवा के तेज ?ोंके से बिजली फिर गुल हो गई है गांव में. शायद 2-4 दिन और लगें टूटे तारों को ठीक होने और बिजली आने में. तब तक तो ढिबरी से ही काम चलाना पड़ेगा पूरे गांव वालों को.

आज अम्मा जब काम से लौटी तो शाम होने वाली थी, ज्यादा थकी होने के कारण उस ने चिन्नू (चिनम्मा) को रामुलु अन्ना से उधार में केरोसिन तेल लाने भेजा था. अन्ना ने उधार के नाम पर तेल देने से मना कर दिया क्योंकि पहले का ही काफी पैसा बाकी था उस का. पर चिन्नु कहां मानने वाली थी, मिन्नतें करने लगी, ‘‘अन्ना तेल दे दो वरना अंधेरे में खाना कैसे बनाऊंगी आज मैं? अम्मा ने कहा है, अभी अप्पा पैसे ले कर आने वाला है. अप्पा जैसे ही पैसे ले कर आएगा, मैं दौड़ कर तुम्हें दे जाऊंगी.’’

जंजाल – भाग 1 : मां की आशिकी ले डूबी बेटी को

पटेल चौक पर सुबह मजदूरों की भीड़ रहती थी. लोग दूरदराज के इलाकों से शहर में मजदूरी करने आते थे. केशव भी एक मजदूर था. वह भी पटेल चौक पर सुबह आ कर खड़ा हो जाता था. इस आस से कि किसी बाबू के पर घर मजदूरी का काम मिल जाए.

केशव की बीवी सुहागी घरों में बाई का काम करती थी. वह कसे हुए बदन की खूबसूरत औरत थी. उसे देख कर कोई नहीं कह सकता था कि उस की एक जवान बेटी भी है.

सुहागी की बेटी सोनम 10वीं जमात में पढ़ती थी. 16 साल की सोनम बड़ी खूबसूरत लड़की थी. उस के नैननक्श तीखे थे. उस की कजरारी आंखें बरबस ही लोगों को अपनी तरफ खींच लेती थीं. वह जवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी थी, जिस से उस का रंगरूप निखर चुका था.

हर रोज इलाके की पतली गलियों से हो कर सोनम स्कूल जाती थी. आसपास के घरों में ज्यादातर लोग मजदूर तबके

के थे, जो मजदूरी कर के अपना पेट पालते थे.

केशव की मजदूरी से तो घर चलाना मुश्किल था. सुहागी दूसरों के घरों में बाई का काम कर के केशव से ज्यादा पैसा कमा लेती थी. इस बात का उसे गुमान भी था.

दूसरे मजदूरों की औरतें केशव पर ताना मारतीं, ‘सुहागी रोज सिंगार कर के कहां जाती है? किसी यार से मिलने जाती होगी. तुझे कोई परवाह नहीं है.’

अनपढ़, जाहिल औरतों के तानों से केशव परेशान हो जाता था. वह सुहागी से ताने सुनने की बात कहता था, पर सुहागी इस से नाराज नहीं होती थी. वह केशव को ही समझाने लगती, ‘‘क्या ये औरतें रुपए कमा कर मुझे देंगी? अरे, गाल बजाने और कमाने में बड़ा फर्क होता है.’’

केशव चुप लगा जाता.

सुहागी महेश के घर बाई का काम करती थी. महेश बिजनैस करता था. उस की बिजली के सामान की बड़ी दुकान थी. उस के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी. लेकिन पिछले साल उस की बीवी गुजर गई थी, जिस से उस की जिंदगी बेरंग हो गई थी.

महेश जिंदगी की बोरियत दूर करने के लिए सुहागी के करीब आ गया था. महेश जैसा मालदार आदमी सुहागी को मिला था. वह महेश का दिल बहलाने लगी थी. बदले में वह कभी साड़ी, तो कभी रुपए सुहागी को दे देता था.

उस दिन आसमान में काले बादल छाए थे. महेश दुकान जाना चाह रहा था कि झमाझम बारिश होने लगी. सुहागी का काम खत्म हो चुका था. वह बारिश में भीग कर घर जाने लगी.

महेश ने उसे रोक दिया, ‘‘अरे सुहागी, इस बारिश में भीग जाओगी. जब बारिश रुक जाएगी, तब चली जाना.’’

‘‘साहब, भीगने से मुझे कुछ नहीं होगा,’’ कह कर सुहागी जाने लगी.

‘‘अरे, रुको भी,’’ महेश ने सुहागी का हाथ पकड़ कर रोक लिया.

झमाझम बारिश हो रही थी. बिजली कड़क रही थी. बरसाती हवा फिजाओं में शोर मचा रही थी. महेश का दिल इस तूफानी मौसम में बहक गया. वह सुहागी को बांहों में भर कर चूमने लगा.

सुहागी भी महेश की बांहों में सिमट गई. पलभर में दोनों बिछावन पर थे. जिस्म की आग भड़क चुकी थी. उस ने सुहागी के कपड़े उतार दिए. उस के उभार महेश पर कहर बरपाने लगे.

महेश सुहागी पर झपट पड़ा. वह सैक्स करने लगा. वह भी चिपक कर उस का साथ देने लगी.

थोड़ी देर में जब जिस्म की आग ठंडी हुई, तो वे दोनों अलग हुए. जोरदार बारिश अब थम चुकी थी.

‘‘अच्छा साहब, अब मैं चलती हूं,’’ सुहागी ने कहा.

‘‘ये 1,000 रुपए हैं, रख लो,’’ महेश ने कहा. सुहागी ने रुपए ले लिए. वह मुसकरा कर कमरे से बाहर निकल गई.

सुहागी महेश साहब के दिए हुए कपड़े, साड़ी वगैरह अपनी बेटी सोनम को दिखाती थी. वह सोचती थी कि महेश साहब के दिए हुए गिफ्ट देख कर सोनम खुश होगी.

लेकिन सोनम बच्ची नहीं थी. वह 16 साल की जवान लड़की थी. उसे समझते देर नहीं लगी कि मां और महेश साहब के बीच गलत संबंध हैं. उस के बापू में क्या कमी है, यही न कि वे एक मजदूर हैं. लेकिन बापू मेहनत से जो कमा कर लाते हैं, उस से घर की दालरोटी चलती है.

केशव की मजदूरी की अलग दुनिया थी, जिस में वह हर दिन पिसता रहता था. उसे सुहागी के चालचलन को देखने की फुरसत कहां थी. घर का खर्चा चल जाए, उसे यही चिंता रहती थी.

सोनम मां के बननेसंवरने का राज जान गई थी. वह जान गई थी कि मां महेश साहब के साथ क्या गुल खिला रही है. उस के जवान होते मन पर अजीब सा असर पड़ रहा था.

सोनम भी अपने लिए बौयफ्रैंड की तलाश करने लगी. वह खूबसूरत थी. भला उस की ओर कौन नहीं खिंचता.

गंगा किनारे की झोंपड़पट्टी में रवि रहता था. वह गाडि़यों की साफसफाई का काम करता था. गैराज में वह क्लीनर था. उस का पहनावा किसी बाबू से कम नहीं था. वह काली पैंट के साथ चैक की लाल शर्ट पहनता था. वह चोरी की मोटरसाइकिल औनेपौने दाम पर खरीद कर बेच देता था. उस पैसे से वह ऐश करता था.

सोनम जब स्कूल जाती, तो रवि उस का पीछा करता था. सोनम उसे देख कर मुसकरा देती थी. उस की मुसकराहट रवि की चाहत को और बढ़ा देती थी.

एक दिन सोनम ने स्कूल से लौटते समय चर्च के पास रवि को मोटरसाइकिल पर बैठा देखा. वह ठिठक कर रुक गई.

हिम्मत कर के सोनम ने पूछ लिया, ‘‘मेरा पीछा क्यों करते हो?’’

‘‘मुझे तुम अच्छी लगती हो,’’ रवि ने कहा.

‘‘अगर कोई हम लोगों को देख लेगा, तो क्या सोचेगा…’’ सोनम ने कहा.

‘‘यही कि हम दोनों दोस्त हैं,’’ रवि ने कहा.

यह सुन कर सोनम मुसकरा दी. शह पा कर रवि ने कहा, ‘‘चलो, चौक तक तुम्हें छोड़ देता हूं. वहां से घर चली जाना.’’

सोनम रवि की मोटरसाइकिल पर बैठ गई. रवि के मन की मुराद पूरी हो गई थी. उस ने सोनम को मोटरसाइकिल से चौक तक छोड़ दिया. रास्ते में दोनों ने एकदूसरे का नाम पूछ लिया था.

रवि हर रोज सोनम को स्कूल जाने के रास्ते में मिल जाता था. वह सोनम को मोटरसाइकिल पर घुमाने लगा. होटल में खाना खाने और मौल में मूवी देखने का शौक सोनम का पूरा होने लगा था.

रवि सोनम के दिलोदिमाग पर छा गया. सोनम कमसिन थी. वह दुनिया के फरेब को जानती नहीं थी. वह रवि को दिलोजान से चाहने लगी. लेकिन रवि शातिर था. उस ने सोनम को अपने प्रेमजाल में फांस लिया था. उस की निगाह तो सोनम के जिस्म पर थी. वह उस के जिस्म को पाने के जुगाड़ में लग गया. वह उस से प्यार का नाटक करने लगा.

एक दिन रवि और सोनम पार्क में बैठे हुए थे. उन दोनों के सिवा वहां कोई नहीं था. रवि ने सोनम का हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘हम लोगों को घर से भाग कर शादी कर लेनी चाहिए. इस तरह मिलनाजुलना ठीक नहीं है.’’

‘‘मैं शादी के लिए मां और बापू

को मनाने की कोशिश करूंगी,’’ सोनम ने कहा.

‘‘तुम्हारे मांबापू शादी के लिए नहीं मानेंगे. उलटे तुम्हारा स्कूल जाना छुड़ा कर घर में बंद कर देंगे. हम लोगों को जल्दी ही घर से भाग कर शादी कर लेनी चाहिए,’’ रवि ने कहा.

सोनम घबरा गई. एकबारगी उस के जेहन में मांबापू का चेहरा घूम गया.

‘‘घर से भाग कर शादी… अभी नहीं, मैं सोच कर बताऊंगी,’’ सोनम ने कहा.

दिन बीत रहे थे. सोनम की मुहब्बत रवि पर परवान चढ़ती जा रही थी. उस की उम्र नासमझी की थी. वह पढ़ाई से दूर होने लगी.

इस बीच रवि सोनम से घर से भागने की जिद करता रहा. वह उस की जिद के आगे टूट गई और घर से भागने को राजी हो गई.

एक सांकल सौ दरवाजे- भाग 1: क्या हेमांगी को मिला पति का मान

19 साल की लड़की 43 साल की स्त्री को भला क्या समझेगी, ऐसा सोच कर मेरी समझ पर आप की कोई शंका पनप रही है तो पहले ही साफ कर दूं कि जिस स्त्री की चर्चा करने जा रही हूं, उस की यात्रा का एक अंश हूं मैं. उसी पूर्णता, उसी उम्मीद की किरण तक बढ़ती हुई, चलती हुई हेमांगी की बेटी हूं मैं.

43 साल की हेमांगी व्यक्तित्व में शांत, समझ की श्रेष्ठता में उज्ज्वल और कोमल है. वह विद्या और सांसारिक कर्तव्य दोनों में पारंगत है. तो, हो न. तब फिर क्यों भला मैं उस की महानता का बखान ले कर बैठी? यही न, इसलिए, कि 19 साल की उस की बेटी अपने जीवनराग में गहरी व अतृप्त आकांक्षाएं देख रही है, एक छटपटाहट देख रही है अपने जाबांज पंख में, जो कसे हैं प्रेम और कर्तव्य की बेजान शिला से. यह बेटी साक्षी है दरवाजे के पीछे खड़े हो कर उस के हजारों सपनों के राख हो कर झरते रहने की.

तो फिर, नहीं खोलूं मैं सांकल? नहीं दूं इस अग्निपंख को उड़ान का रास्ता?

आइए, समय के द्वार से हमारे जीवनदृश्य में प्रवेश करें, और साक्षी बनें मेरे विद्रोह की अग्निवीणा से गूंजते प्रेरणा के सप्तस्वरों के, साक्षी बनें मेरे छोटे भाई कुंदन के पितारूपी पुरुष से अपनी अलग सत्तानिर्माण के अंतर्द्वंद्व के, मां के चुनाव और पिता के असली चेहरे के.

हम मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के रामनगर कालोनी के पैतृक घर में रहते हैं. इस एकमंजिले मकान में 2 कमरे, एक सामान्य आकार का डाइनिंग हौल और एक ड्राइंगरूम है. बाहर छोटा सा बरामदा और 4र सीढ़ी नीचे उतर कर छोटेछोटे कुछ पौंधों के साथ बाहरी दरवाजे पर यह घर पूरा होता है.

48 साल के मेरे पापा अजितेश चौधरी सरकारी नौकरी में हैं. उन का बेटा कुंदन यानी मेरा भाई अभी 10वीं में है. मैं, कंकना, उन की बेटी, स्नातक द्वितीय वर्ष की छात्रा. हम दोनों भाईबहनों का शारीरिक गठन, नैननक्श मां की तरह है. सधे हुए बदन पर स्वर्णवर्णी गेहुंएपन के साथ तीखे नैननक्श से छलकता सौम्य सारल्य. यह है हमारी मां हेमांगी. 43 की उम्र में जिस ने नियमित व्यायाम से 32 सा युवा शरीर बरकरार रखा है. हमेशा मृदु मुसकान से परिपूर्ण उस का चेहरा जैसे वे अपनी विद्वत्ता को विनम्रता से छिपाए रहती हो.

मेरी ममा हम दोनों भाईबहनों के लिए हमेशा खास रही. ममा को हम मात्र स्त्री के रूप में ही नहीं समझते बल्कि एक पूर्ण बौद्धिक व्यक्तित्व के रूप में.

सुबह 9 बजे का समय था. कालेज के लिए निकल रही थी मैं. घर में रोज की तरह कोलाहल का माहौल था.

पापा सरकारी कार्यालय में सहायक विकास अधिकारी थे. वे अपने बौस के अन्य 10 मातहतों के साथ उन के अधीन काम करते थे. लेकिन घर पर मेरी ममा पर उन का रोब किसी कलैक्टर से कम न था.

‘हेमा, टिफिन में देर है क्या? यार, घर पर और तो कुछ करती नहीं हो, एक यह भी नहीं हो रहा है, तो बता दो,’ पापा बैडरूम से ही चीख रहे थे.

‘दे दिया है टेबल पर,’ ममा ने बिना प्रतिक्रिया के सूचना दी.

‘दे दिया है, तो जबान पर ताले क्यों पड़े थे?’

‘चाय ला रही थी.’

‘लंचबौक्स भरा बैग में?’

‘रख रही हूं.’

‘सरकारी नौकरी है, समझ नहीं आता तुम्हें? यह कोई चूल्हाचौका नहीं है. मिनटमिनट का हिसाब देना पड़ता है.’

ममा टिफिन और पानी की बोतल औफिस के बैग में रख नियमानुसार पापा की कार भी पोंछ कर आ गई थी. और पापा टिफिन के लिए बैठे रहे थे.

यह रोज की कहानी थी, यह जतलाना कि मां की तुलना में पापा इस परिवार के ज्यादा महत्त्वपूर्ण सदस्य हैं. उन का काम ममा की तुलना में ज्यादा महत्त्व का है. यह दृश्य हमारे ऊपर विपरीत ही असर डालता था. इस बीच भाई और हम अपना टिफिन ले कर चोरों की तरह घर से निकल जाते.

रात को पापा की गालीगलौज से मेरी नींद उचट गई. रात 12 बजे की बात होगी. मैं शोर सुन ममा की चिंता में अपने कमरे के दरवाजे के बाहर आ कर खड़ी हो गई. ममा पापा के साथ बैडरूम में थी. ममा शांत लेकिन कुछ ऊंचे स्वर में कह रही थी- ‘आप के हाथपैर अब से मैं नहीं दबा पाऊंगी.

‘आप की करतूतों ने बरदाश्त की सारी हदें तोड़ दी हैं. आप की जिन किन्हीं लड़कियों और महिलाओं से संपर्क हैं, वे आप की कमजोरियों का फायदा उठा रही हैं. आप अपने औफिस की महिला कलीग को अश्लील वीडियो साझा करते थे, मैं ने सहा. किस स्त्री को क्या गिफ्ट दिया, बदले में आप को क्याक्या मिला, मैं ने अनदेखा किया और चुप रही. लेकिन अब आप सीमा से आगे निकल कर उन्हें घर तक लाने लगे हैं. क्या संदेश दे रहे हैं हमें? घर पर ला कर उन महिलाओं के साथ आप का व्यवहार कितना भौंडा होता है, क्या बच्चों से छिपा है यह?’

आज पहली बार ममा ने हिम्मत कर अपना विरोध दर्ज कराया था. पहली बार उस ने पापा के हुक्म को अमान्य कर के अपनी बात रखी थी. लेकिन यह इतना आसान नहीं था.परिणाम भयंकर होना ही था. मेरे पापा ऐसे व्यक्ति थे जो उन की गलती बताने वाले का बड़ा बुरा हश्र करते थे, और तब जब उन के कमरे में ममा का सोना उन की सेवा के लिए ही था.

झन से जिंदगी कांच की तरह टूट कर बिखर गई. आशा, भरोसा, उम्मीद का दर्पण चकनाचूर हो गया.

पापा ने ममा को जोरदार तमाचे मारे, ममा दर्द से बिलख कर उन्हें देख ही रही थी कि पापा ने ममा के पेट पर जोर का एक पैर जमाया. ममा ‘उफ़’ कह कर जमीन पर बैठ गई.

मैं जानती हूं यह दर्द उस के शरीर से ज्यादा मन पर था. आत्मसम्मान और आत्महनन की चोट वह नहीं सह पाती थी.

‘अब एक भी आवाज निकाली तो जबान खींच लूंगा. मैं कमाता हूं, तुम लोग मेरे पैसे पर ऐश करते हो, औकात है नौकरी कर के पैसे घर लाने की? जिस पर आश्रित हो, उसी को आंख दिखाती हो? जो मरजी होगी वह करूंगा मैं. अफसर हूं मैं. तुम क्या हो, एक नौकरी कर के दिखाओ तो समझूं.’

‘मेरी नौकरी पर पाबंदी तो आप ने ही लगा रखी है?’

‘अच्छा? नौकरी करना क्यों चाहती हो मालूम नहीं है जैसे मुझे. सब बहाने हैं गुलछर्रे उड़ाने के. तुम्हें लगता है नौकरी के बहाने मैं मौज करता हूं, तो तुम भी वही करोगी?’ पापा के पास जबरदस्त तर्क थे, जिसे सौफिस्ट लौजिक कहा जा सकता है. ग्रीक दर्शन में सौफिस्ट तार्किक वाले वे हुआ करते थे, जो निरर्थक और गलत बौद्धिक तर्कजाल से सामने वाले को बुरी तरह बेजबान कर देते थे.

दोराहा – भाग 3 : क्या हुआ था उस रात

उधर मंगलू की मां सूरज उगने के साथ ही बंगले की साफसफाई, कपड़े, बरतन, खाना बनाने और फिर सेठानी की सेवा में जुट जाती. उतनी सुखसुविधाएं होने पर भी सेठानी हमेशा किसी न किसी बीमारी का शिकार रहतीं और उस की मां कभी सेठानी के पैर दबाती, कभी सिर दबाती और कभी पूरे बदन की मालिश करती.

मंगलू खुद जो शायद उन दिनों 8-9 साल से ज्यादा का नहीं था, हमेशा साए की तरह उस बंगले में मां के साथसाथ लगा रहता.

सेठानी तो दिनभर पलंग से नीचे पैर भी नहीं रखती थीं. दूसरी तरफ मंगलू की मां भागभाग कर काम करती. उस की मां का मुंह पीला पड़ जाता और हाथपांव थक कर जैसे टूटने लगते.

कई बार मंगलू सोचता था कि थोड़ा बड़ा होने पर वह भी मां को सेठानी की तरह आराम करवाएगा. लेकिन इस से पहले कि वह इन बातों का ठीक से मतलब समझ पाता, उस की जिंदगी का रुख ही बदल गया.

मंगलू हथकड़ी पहने पुलिस जीप में सवार शहर की उन्हीं पुरानी जानीपहचानी सड़कों से गुजर रहा था. यह सब उस के लिए नया नहीं था. फिर भी न जाने क्यों अजीब सी बेचैनी महसूस करते हुए बारबार उस का गला सूख रहा था.

बस्ती वालों को हमेशा खूंख्वार दिखने वाला मंगलू उस दिन अपने को अंदर से कुछ पिघलता हुआ महसूस

कर रहा था. तेज रफ्तार से दौड़ती जीप में आने वाली हवा में भी उसे पसीना छूट रहा था. चाहते हुए भी उस का दिमाग अपनी यादों की कड़ी से अलग नहीं हो पाया. उस की यादों में सेठ

के एकलौते बेटे नकुल का चेहरा

घूमने लगा.

सेठ दयालराम का बेटा नकुल… मंगलू को ठीक से याद था कि किस तरह बंगले में मां के काम में हाथ बंटाने के साथ उस का असली काम हुआ करता था नकुल के साथ खेलना. नकुल भी उसी की उम्र का था. किसी भी खेल में यदि नकुल हार जाता तो जीतने पर भी वह हार मंगलू को ही माननी पड़ती. उसे यह सब अच्छा नहीं लगता. फिर भी मां के समझाने पर उसे वैसे ही खेलना पड़ता.

एक रोज आंखमिचौली के खेल में जब नकुल बारबार हारने पर भी हार मानने को तैयार न हुआ, तो मंगलू चिढ़ कर अपनी मां के पास जाने लगा.

तब नकुल ने उसे रोक लिया. वह

अपने कमरे से कीमती कलम व

पैंसिलों का डब्बा ला कर खेल जारी रखने के लिए खुशामद के तौर पर देते हुए बोला, ‘‘लो मंगलू, यह डब्बा तुम ले लो.’’

‘‘तो क्या इसे मैं घर ले जा सकता हूं?’’

‘‘हांहां, अब से मैं ने यह तुम्हें

दे दिया,’’ जोर दे कर नकुल ने कहा और फिर खेलने के लिए चिरौरी

करने लगा.

एकाएक इतने सुंदर कलम और पैंसिल पा कर मंगलू बेहद खुश हुआ और खेल से पहले भाग कर उसे

अपनी मां के थैले में सब से नीचे छिपा कर रख आया.

शाम को ट्यूशन पढ़ाने आई नकुल की मास्टरनी को जब उस के बस्ते

में पैंसिल का डब्बा नहीं मिला तो

सब से पहला शक मंगलू पर ही किया गया और नकुल की मां के थैले

से पैंसिल बौक्स बरामद भी कर

लिया गया.

मंगलू के बारबार सचाई बताने पर भी सेठ ने उन सब को चोर कह कर खूब कोसा और साफ कह दिया कि अब से मंगलू मांबाप के साथ उन के बंगले में कभी न आए.

उस दिन सब से अधिक हैरानी

उसे इस बात पर हुई थी कि सबकुछ जानते हुए भी नकुल पास खड़ा

चुपचाप टुकुरटुकुर उसे देखता ही रहा. और वहीं से शुरू हुई थी मंगलू

की बरबादी.

मांबाप दोनों रात तक बंगले में काम करते और उधर मंगलू दिनभर इधरउधर गलियों में बेमकसद भटकता रहता. फिर कुछ आवारा लड़कों की सोहबत में पड़ कर उस ने छोटीमोटी जरूरत की चीजें चुरानी शुरू कर दीं. चोरी से मारपीट, नशाखोरी वगैरह का शिकार होते हुए वह कुछ ही सालों में बस्ती का एक नामी बदमाश बन गया.

उसी वजह से सेठ दयालराम ने उस के मांबाप को भी काम से निकाल दिया था. सेठ के डर से उन्हें कहीं और भी काम न मिल सका.

मंगलू असहाय मांबाप के दुख से दुखी हो कर एक दिन नशे की हालत में सेठ को खूब खरीखोटी सुना आया. इस पर सेठ के आदमियों ने रात में आ कर मंगलू और उस के बाप की जम कर पिटाई की.

सेठ से बदला लेने की भावना मंगलू के मन में लगातार पनपती रही. पर सेठ की धनदौैलत व ताकत के सामने वह खुद को हमेशा छोटा व कमजोर पाता. इसी दिमागी बोझ व तनाव के साथ उस के कदम गलत

व गैरकानूनी कामों की दुनिया में

बढ़ते गए.

लेकिन पैरों पर गिरे गिड़गिड़ाते बाप को सेठ ने जिस तरह धक्का दे कर गालियां दीं, उस की याद आते ही उस का मन और कसैला हो गया. अंदर की सारी कड़वाहट से मंगलू के चेहरे व हाथपैर की नसें फूलने लगीं. वह सोचने लगा कि अगर एक बार उस की हथकडि़यां खुल जातीं तो वह चलती जीप से कूद कर सवेरे के छूट गए अधूरे काम को पूरा कर आता.

इस से कि वह और आगे सोचता, तेज झटके से जीप पुलिस स्टेशन के अहाते में जा कर रुक गई.

बगल में बैठे सिपाही ने बड़ी रुखाई से उसे नीचे उतरने को कहा. फिर उसे अंदर उस कमरे में ले जाया गया, जहां बयान देने के लिए सेठ दयालराम, नकुल और उस के दोस्त पहले से ही मौजूद थे.

चूंकि नकुल और उस के दोस्त उस घटना की चपेट में सीधे आए थे, इसलिए नकुल के दोस्त ने बयान दिया, ‘‘सुबह मैं और नकुल जब कालोनी के पीछे की सुनसान सड़क से गुजर रहे थे, तो तेजी से सामने से आते मंगलू ने हमारा रास्ता रोक लिया व जो कुछ हमारे पास था, दे देने के लिए कहा.

‘‘मैं ने उसे रास्ता छोड़ने को कहा और नकुल की तरफ इशारा करते हुए मेरे यह बताने पर कि जानते हो, तुम सेठ दयालराम के बेटे का रास्ता रोकने की गलती कर रहे हो, जोरजोर से गालियां बकते हुए इस ने चाकू निकाल लिया और नकुल पर जानलेवा वार किया.’’

आगे से टूटी हुई चप्पल से बाहर निकल रहे अंगूठे को फर्श पर रगड़ते हुए सामने खड़ा मंगलू उस बयान को सुनते हुए मन ही मन यह मान रहा था कि कहने को यह सबकुछ ठीक कह रहा है, पर मेरे हाथ से एक अच्छा मौका निकल गया.

अगर उस हाथापाई के वक्त वह कमबख्त कार न आ गई होती, जिस में सवार आदमियों से उन्होंने मदद मांगी थी, और मंगलू को वहां से भागना पड़ा था, तो मैं इस नकुल को इतना पीटता कि सेठ जिंदगीभर अपने बेटे की चोटों का हिसाब लगाता रहता.

नकुल ने अपने बयान में पहले तो वही सब दोहराया कि किस तरह सुनसान सड़क पर मंगलू ने उन का रास्ता रोका. फिर थोड़ा रुक कर सीधे मंगलू की तरफ देखते हुए उस ने कहा, ‘‘यह आया तो हमारे पास लूटने की नीयत से था, परंतु मुझे पहचानते ही इस का इरादा बदल गया और मेरे दोस्त के साथ कहासुनी में इस के खुले चाकू से मुझे यह हलकी सी चोट लग गई. वहां से भागते हुए भी इस ने बचपन के दोस्त को अनजाने में चोट लग जाने का अफसोस जाहिर किया था.’’

बयान संबंधी कार्यवाही से निबट कर गाड़ी में बैठते ही सेठ दयालराम ने तिलमिलाते हुए बेटे से गलत बयान देने की वजह पूछी. पहले तो नकुल ने बात को टालने की कोशिश की, लेकिन बारबार वही सवाल दोहराए जाने पर, बरसों से केवल मंगलू या उस के परिवार पर ही नहीं, बल्कि ऐसे कई लाचार व मजबूर लोगों पर अपने पिता के जुल्म को देखती नकुल की खामोश आंखों में गुस्से की चिनगारी अलाव बन कर धधक उठी.

वह चाह कर भी चुप न रह सका और बोला, ‘‘अपने हथकंडों के इस्तेमाल के लिए आप ने आज तक न जाने कितने गुंडों व गैरकानूनी काम करने वालों को पनाह दी. आप के द्वारा सताए जिस बेगुनाह ने भी विरोध करने की हिम्मत की, उसे आप ने कुसूरवार साबित करवा दिया. आप की नजर तो हमेशा अपने फायदे पर रहती है. किसी गुनाहगार और बेगुनाह में आप कभी अंतर देख ही नहीं पाए.

‘‘आप ही बताइए, अगर आज मैं ने आप की ही करनी से बने एक गुनाहगार को फिर से सुधारने की कोशिश की है, तो क्या गलत

किया है?’’

अपने सामने किसी की ऊंची आवाज तो क्या, ऊंचा देखने तक की इजाजत न देने वाले सेठ दयालराम को अपने बेटे की बातों का कोई जवाब नहीं सूझा. वे चुप लगा गए. उन्हें लगा, नकुल की आवाज में जैसे नई पीढ़ी की बगावत उभर रही है. बेटे की जगह कोई दूसरा होता तो अब तक उन के गुस्से का शिकार हो चुका होता. लेकिन वह तो उन का अपना खून था.

उधर मंगलू खाली पड़ी उन कुरसियों को जिन पर कुछ देर पहले नकुल और उस के दोस्त बैठे थे, हैरान सा देखते हुए समझ नहीं पा रहा था कि आखिर सेठ के बेटे ने उसे बचाने के लिए झूठा बयान क्यों दिया.

‘क्या वह डर गया है कि यहां से छूट कर कहीं मैं उस पर दोबारा हमला न कर दूं या फिर…? बरसों पहले की पैंसिल वाले डब्बे से जुड़ी वह सचाई, जिसे नकुल तब आप के डर से नहीं कह पाया. आज उस की कीमत झूठे बयान से चुका गया, जबकि मैं उसे आज जान से मारने के लिए उतारू था.’

‘‘ऐ खड़ा हो, कहां बैठ रहा है?’’ तभी दुत्कार कर उस की पीठ में डंडा चुभाते हुए सिपाही ने कहा.

अचानक मंगलू ने अपनेआप को उसी दोराहे पर पाया, जहां से उस की जिंदगी जुर्म भरी राह पर चल पड़ी थी. वह सोच रहा था कि अब चाहे उसे सजा हो या छूट जाए, पर वह अच्छा इनसान बनने की कोशिश करेगा. नकुल से अपनी गलती की माफी मांगेगा.

इन्हीं विचारों को समेट सिपाही के धक्कों के साथ मंगलू हवालात की ओर चल पड़ा. वह मंगलू जो शायद

नकुल के चलते जुर्म की राह पर चलने लगा था, उसी की वजह से ही सही डगर फिर से खोजने की कोशिश कर रहा था.

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