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मैली लाल डोरी – भाग 1 : दास्तान अपर्णा की

रविवार होने के कारण अपर्णा सुबह की चाय का न्यूज पेपर के साथ आनंद लेने के लिए बालकनी में पड़ी आराम कुरसी पर आ कर बैठी ही थी कि उस का मोबाइल बज उठा. उस के देवर अरुण का फोन था.

‘‘भाभी, भैया बहुत बीमार हैं. प्लीज, आ कर मिल जाइए,’’ और फोन

कट गया.

फोन पर देवर अरुण की आवाज सुनते ही उस के तनबदन में आग लग गई. न्यूजपेपर और चाय भूल कर वह बड़बड़ाने लगी, ‘आज जिंदगी के 50 साल बीतने को आए, पर यह आदमी चैन से नहीं रहने देगा. कल मरता है तो आज मर जाए. जब आज से 20 साल पहले मेरी जरूरत नहीं थी तो आज क्यों जरूरत आन पड़ी.’ उसे अकेले बड़बड़ाते देख कर मां जमुनादेवी उस के निकट आईं और बोलीं, ‘‘अकेले क्या बड़बड़ाए जा रही है. क्या हो गया? किस का फोन था?’’

‘‘मां, आज से 20 साल पहले मैं नितिन से सारे नातेरिश्ते तोड़ कर यहां तबादला करवा कर आ गई थी और मैं ने फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. तब से ले कर आज तक न उन्होंने मेरी खबर ली और न मैं ने उन की. तो, अब क्यों मुझे याद किया जा रहा है?

‘‘मां, आज उन के गुरुजी और दोस्त कहां गए जो उन्हें मेरी याद आ रही है. अस्पताल में अकेले क्या कर रहे हैं. आश्रम वाले कहां चले गए,’’ बोलतेबोलते अपर्णा इतनी विचलित हो उठी कि उस का बीपी बढ़ गया. मां ने दवा दे कर उसे बिस्तर पर लिटा दिया.

50 वर्ष पूर्व जब नितिन से उस का विवाह हुआ तो वह बहुत खुश थी. उस की ससुराल साहित्य के क्षेत्र में अच्छाखासा नाम रखती थी. वह अपने परिवार में सब से छोटी लाड़ली और साहित्यप्रेमी थी. उसे लगा था कि साहित्यप्रेमी और सुशिक्षित परिवार में रह कर वह भी अपने साहित्यज्ञान में वृद्धि कर सकेगी. परंतु, वह विवाह हो कर जब आई तो उसे मायके और ससुराल के वातावरण में बहुत अंतर लगा.

ससुराल में केवल ससुरजी को साहित्य से लगाव था, दूसरे सदस्यों का तो साहित्य से कोई लेनादेना ही नहीं था. इस के अलावा मायके में जहां कोई ऊंची आवाज में बात तक नहीं करता था वहीं यहां घर का हर सदस्य क्रोधी था. ससुरजी अपने लेखन व यात्राओं में इतने व्यस्त रहते कि उन्हें घरपरिवार के बारे में अधिक पता ही नहीं रहता था. सास अल्पशिक्षित, घरेलू महिला थीं. वे अपने शौक, फैशन व किटी पार्टीज में व्यस्त रहतीं. घर नौकरों के भरोसे चलता. हर कोई अपनी जिंदगी मनमाने ढंग से जी रहा था. सभी भयंकर क्रोधी और परस्पर एकदूसरे पर चीखतेचिल्लाते रहते. इन 2 दिनों में ही नितिन को ही वह कई बार क्रोधित होते देख चुकी थी. यहां का वातावरण देख कर उसे डर लगने लगा था.

सुहागरात को जब नितिन कमरे में आए तो वह दबीसहमी सी कमरे में बैठी थी. नितिन उसे देख कर बोले, ‘क्या हुआ, ऐसे क्यों बैठी हो?’

‘कुछ नहीं, ऐसे ही,’ उस ने दबे स्वर में धीरे से कहा.

‘तो इतनी घबराई हुई क्यों हो?’

‘नहीं…वो… मुझे आप से डर लगता है,’ अपर्णा ने घबरा कर कहा.

‘अरे, डरने की क्या बात है,’ कह कर जब नितिन ने उसे अपने गले से लगा लिया तो वह अपना सब डर भूल गई.

विवाह को कुछ ही दिन हुए थे कि एक दिन डाकिया एक पीला लिफाफा लैटरबौक्स में डाल गया. जब नितिन ने खोल कर देखा तो उस में केंद्रीय विद्यालय में अपर्णा की नियुक्ति का आदेश था जिस के लिए उस ने विवाह से पूर्व आवेदन किया था. खैर, समस्त परिवार की सहमति से अपर्णा ने नौकरी जौइन कर ली. घर और बाहर दोनों संभालने में तकलीफ तो उठानी पड़ती, परंतु वह खुश थी कि उस का अपना कुछ वजूद तो है.

तनख्वाह मिलते ही नितिन ने उस का एटीएम कार्ड और चैकबुक यह कहते हुए ले लिया कि ‘मैं पैसे का मैनेजमैंट बहुत अच्छा करता हूं, इसलिए ये मेरे पास ही रहें तो अच्छा है. कहां कब कितना इन्वैस्ट करना है, मैं अपने अनुसार करता रहूंगा.’

मेरे पास रहे या इन के पास, यह सोच कर अपर्णा ने कभी इस ओर ध्यान ही नहीं दिया. इस बीच वह एक बेटे की मां भी बन गई. एक दिन जब वह घर आई तो नितिन मुंह लटकाए बैठा था. पूछने पर बोला कि वह जिस कंपनी में काम करता था वह घाटे में चली गई और उस की नौकरी भी चली गई.

अपर्णा बड़े प्यार से उस से बोली, ‘तो क्या हुआ, मैं तो कमा ही रही हूं. तुम क्यों चिंता करते हो. दूसरी ढूंढ़ लेना.’

‘अच्छा तो तुम मुझे अपनी नौकरी का ताना दे रही हो. नौकरी गई है, हाथपैर नहीं टूटे हैं अभी मेरे,’ नितिन क्रोध से बोला.

‘नितिन, तुम बात को कहां से कहां ले जा रहे हो. मैं ने ऐसा कब कहा?’

‘ज्यादा जबान मत चला, वरना काट दूंगा,’ नितिन की आंखों से मानो अंगारे बरस रहे थे.

उसे देख कर अपर्णा सहम गई. आज उसे नितिन के एक नए ही रूप के दर्शन हुए थे. वह चुपचाप दूसरे कमरे में जा कर अपना काम करने लगी. नौकरी चली जाने के बाद से अब नितिन पूरे समय घर में रहता और सुबह से शाम तक अपनी मरजी करता. एक दिन अपर्णा को घर आने में देर हो गई. जैसे ही वह घर में घुसी.

‘इतनी देर कैसे हो गई.’

‘आज इंस्पैक्शन था.’

‘झूठ बोलते शर्म नहीं आती, कहां से आ रही हो?’

‘तुम से बात करना बेकार है. खाली दिमाग शैतान का घर वाली कहावत तुम्हारे ऊपर बिलकुल सटीक बैठती है,’ कह कर अपर्णा गुस्से में अंदर चली गई.

पूरे घर पर नितिन का ही वर्चस्व था. अपर्णा को घर की किसी बात में दखल देने की इजाजत नहीं थी. वह कमाने की मशीन और मूकदर्शक मात्र थी. एक दिन जब वह घर में घुसी तो देखा कि पूरा घर फूलों से सजा हुआ है. पूछने पर पता चला कि आज कोई गुरुजी और उन के शिष्य घर पर पधार रहे हैं. इसीलिए रसोई में खाना भी बन रहा है.

अपर्णा ने नितिन से पूछा, ‘यह सब क्या है नितिन? सुबह मैं स्कूल गई थी, तब तो तुम ने कुछ नहीं बताया?’

‘तुम सुबह जल्दी निकल गई थीं, सूचना बाद में मिली. आज गुरुजी घर आने वाले हैं. जाओ तुम भी तैयार हो जाओ,’ कह कर नितिन फिर जोश से काम में जुट गया.

उस दिन देररात्रि तक गुरुजी का प्रोग्राम चलता रहा. न जाने कितने ही लोग आए और गए. सब को चाय, खाना आदि खिलाया गया. अपर्णा को सुबह स्कूल जाना था, सो, वह अपने कमरे में आ कर सो गई. दूसरे दिन शाम को जब स्कूल से लौटी तो नितिन बड़ा खुश था. ट्रे में चाय के 2 कप ले कर अपर्णा के पास ही बैठ गया और कल के सफल आयोजन के लिए खुशी व्यक्त करने लगा. तभी अपर्णा ने धीरे से कहा, ‘नितिन, आप खुश हो, इसलिए मैं भी खुश हूं परंतु मेहनत की गाढ़ी कमाई की यों बरबादी ठीक नहीं.’

सुबह का भूला – भाग 1: आखिर क्यों घर से दूर होना चाहते थे मोहन और रोली

मोहन ने जब अपनी पत्नी रोली के गले में गुलाबी मोतियों का हार पहनाया, तो खुश होने के बजाय वह मुंह बना कर बोली, ‘‘मुझे नहीं चाहिए यह हार.’’

‘‘क्यों भला?’’ मोहन ने पूछा.

‘‘अब तो जब असली सोने का हार ला कर दोगे, तभी पहनूंगी. यह 20-30 रुपल्ली वाला हार नहीं चाहिए मुझे,’’ झूठमूठ का गुस्सा दिखाते हुए रोली रसोईघर में घुस गई.

मोहन भी उस के पीछेपीछे चल पड़ा और उसे अपनी बांहों में भर कर बोला, ‘‘अच्छा ठीक है मेरी मैना. एक दिन सोने के हार से भी सजा देंगे तेरे इस सुराहीदार गले को. लेकिन अभी तो इसे पहन ले.’’

‘‘सच बोल रहे हो न? तो खाओ मेरी कसम…’’ रोली ने आंखें नचा कर पूछा.

‘‘अरे, तेरी कसम मेरी जान. सच कह रहा हूं. अरे, तू कहे तो मैं अपना कलेजा निकाल कर तेरी हथेली पर रख दूं, तो यह सोने का हार क्या चीज है,’’ कह कर वह रोली को जीभर कर प्यार करने लगा.

मोहन और रोली की शादी को आज एक साल हो चुका था. आज ही के दिन मोहन रोली को ब्याह कर अपने घर ले आया था. उस ने सोच रखा था कि आज वह अपनी रोली को पूरा शहर घुमाएगा, इसलिए तो उस ने मालिक से बोल कर एक दिन की छुट्टी ले रखी थी. मगर रोली को लगता है कि वह उस से प्यार ही नहीं करता.

रोली को अपने रूपरंग का इतना गुमान है कि वह अपने आगे सांवलेसलोने मोहन को कुछ समझती ही नहीं है. जब देखो उसे झिड़कती रहती है, उस में कमी निकालती है और मोहन है कि उस की हर बात को हंसी में उड़ा देता है. वह तो चाहता है कि कैसे भी कर के, कुछ भी कर के रोली को बस खुश रखना है. लेकिन यह रोली भी न, पता नहीं और क्या चाहिए इसे जो हरदम मुंह बनाए रहती है.

‘‘अच्छा, अब गुस्सा थूक भी दे. देख, आज हम सिनेमा देखने चलते हैं और कहीं बाहर ही भेलकचौड़ी खाएंगे. तेरा मनपसंद पुचका भी. बोल, अब तो खुश?

 

‘‘तो चल जल्दी से तैयार हो जा. और सुन, वही गुलाबी वाली साड़ी पहनना जो मैं ने तुझे ला कर दी थी. उस पर यह मोतियों का हार खूब जंचेगा. है कि नहीं?’’ मोहन और रोली काफी देर रात घूमफिर कर घर आए, तो मोहन आते ही लुढ़क गया, क्योंकि वह इतना थक चुका था कि खाट पर लेटते ही उसे नींद आ गई.

लेकिन रोली की बड़ीबड़ी आंखों में अब भी वही बड़ेबड़े माल, चमकती दुकानें, बड़ीबड़ी और ऊंची बिल्डिगें, तैर रही थीं.

रोली सोच रही थी कि काश, उस के पास भी बहुत पैसे होते, तो वह भी इन दुकानों और माल में जा कर अपने लिए महंगेमहंगे कपड़े और जेवर खरीदती, होटलों में खाना खाती, मोटरगाड़ी में घूमती. लेकिन अफसोस…

आहें भरते हुए रोली ने पलट कर सो रहे मोहन की ओर देखा और उस की बगल में जा कर लेटते हुए सोचने लगी, ‘हाय रे, क्याक्या सपने ले कर आई थी इस दिल्ली शहर में. मगर मिला क्या बस ठेंगा…’

मोहन उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव बलरामपुर का रहने वाला था. वहां उस का अपना एक कच्चापक्का

3 कमरे का टूटाफूटा मकान था, जिस में 3 भाई, उन के बीवीबच्चे और बूढ़े मांबाप रहते थे. वे लोग अपने गांव में दूसरों की जमीन पर खेती कर के अपना गुजारा करते थे.

मोहन घर में सब से छोटा होने के चलते सारा दिन अपने हमउम्र दोस्तों के साथ यहांवहां मटरगश्ती करता फिरता था और घर आ कर खा कर सो जाता था.

मांबाप ने सोचा कि अगर मोहन की शादी कर देंगे तो शायद यह अपनी जिम्मेदारी समझने लगेगा, इसलिए एक सुंदर, सुशील लड़की देख कर उन्होंने मोहन की शादी करा दी.

मोहन की पत्नी रोली उस से 5 साल छोटी थी. खूबसूरत तो वह इतनी थी कि कोई देखे तो देखता रह जाए. दूध सी गोरीचिकनी रोली को अगर अंधेरे घर में बिठा दिया जाए, तो कमरा रोशनी से नहा उठे. तभी तो मोहन अपनी हूर की परी रोली को देख कर मचल उठता था. जब देखो वह उस के आसपास ही मंडराता रहता था.

मोहन का तो मन करता कि बस अपनी रोली को ताकता रहे, कोई काम ही न करे. जब बापभाई की डांट पड़ती तब वह कमरे से बाहर निकल कर काम पर जाता तो सही, पर जल्द ही वापस लौट आता था.

इधर, रोली को अपने पति से इतना प्यार पाते देख उस की तीनों जेठानी उस से जलन करतीं और कहतीं कि उस ने पति को अपने रूपजाल में फंसा कर निखट्टू बना रखा है. अरे, क्या उस के इस खूबसूरत थोबड़े को देखदेख कर मोहन की जिंदगी चलेगी या पेट भरने के लिए कमाना भी पड़ेगा?

जेठानियों के तानेउलाहने सुनसुन कर रोली को अब कोफ्त होने लगी थी, इसलिए गुस्से में वह भी उन्हें सुना डालती और इसी बात पर घर में महायुद्ध छिड़ जाता.

रात में मोहन के आगोश में समाई रोली जब अपनी जेठानियों की उस से शिकायत करती और कहती कि अब उसे इन के साथ नहीं रहना, क्योंकि ये लोग जब देखो उसे खरीखोटी सुनाते रहते हैं, पूरे घर का काम भी करवाते हैं, तो सुन कर मोहन का मन खिन्न हो उठता था.

लेकिन इस घर के सिवा और कोई ठिकाना भी तो नहीं था उस के पास,जहां वह अपनी खूबसूरत बीवी को ले कर जा पाता. सो, वह मनमसोस कर रह जाता था.

एक दिन जब रोली ने मोहन से कहा कि क्यों न हम शहर जा कर रहें और रखा ही क्या है यहां इस घर में, तो मोहन भी सोचने पर मजबूर हो गया कि हां, वहां शहर में अपना कमाएंगे, अपना खाएंगे तो किसी की आंखों में चुभेंगे नहीं. और रोली से मिलने से भी उसे कोई रोक नहीं पाएगा. यहां तो जब देखो, सब उसे सुनाते ही रहते हैं. रोली पर भी पूरे घर का काम लाद देते हैं, जैसे वह सब की नौकरानी हो.

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अब पता चलेगा – भाग 3 : क्या कभी रुक पाया राधा और विकास का झगड़ा

फंक्शन से फ्री हो कर जब सब साथ बैठे, मधु ने कहा,”मुझे आप लोगों से कुछ जरूरी बात करनी है.”

सुनते ही राधा ने विकास को इशारा किया, “देखो, मैं ने कहा था न…”

राधा ने कहा,”जी कहिए.”

”देखिए, पैसे की हमारे यहां कोई कमी है नहीं, बस मेरा मन तो अपने बच्चों की खुशी में खुश होता है, मेरी इच्छा है कि शादी अब जल्दी ही कर दें, घर में रौनक हो, हमारी बेटी कोई है नहीं और मुझे संदली के साथ रहने की बहुत इच्छा है, मुझ से अब इंतजार नहीं होगा, शादी अब बहुत जल्दी हो जाए, बस यही मान लीजिए.

“तैयारी भी मैं सब कर लूंगी और हां, संदली ने जो लोन लिया है, वह भी हम चुका देंगे, अब संदली यहां फैमिली बिजनैस संभाल लेगी. उसे वहां अकेली रह कर जौब करने की जरूरत है ही नहीं. अब बच्चे मिल कर बिजनैस संभालें, हमारे पास रहें और क्या…”

विकास ने हाथ जोड़ दिए,”आप जैसा चाहते हैं वैसा ही होगा, हम तैयार हैं. लोन चुकाने की बात आप न सोचें प्लीज, हमारा एक फ्लैट किराए पर चढ़ा है, उसे संदली को देने के लिए ही इन्वेस्ट किया था. अब उसे बेच देंगे तो लोन चुक जाएगा, कोई प्रौब्लम नहीं है. शादी जब आप कहें, हो जाएगी.”

मधु ने खुश हो कर उठ कर संदली को गले लगा लिया. खूब प्यार करते हुए बोलीं,”बस मेरी बहू अब जल्दी घर आ जाए. संदली, अब एक बार जाना और वहां से अपना सब सामान ले आओ, बस अब तो आर्यन के साथ ही घूमने जाना.”

आगे का प्रोग्राम तय होने लगा था. राधा हैरान थी कि इतनी जल्दी यह सब… ये कैसे लोग हैं? कोई इतना अच्छा कैसे हो सकता है?

मुंबई लौटते हुए संदली ने पूछा,”मम्मी, सब ठीक लगा न आप को?”

”देखते हैं, कुछ ज्यादा ही अच्छा परिवार लग रहा है. देखते हैं कि तुम कितना खुश रहती हो इन के साथ.अब पता चलेगा…’’

संदली चुप ही रही. राधा ने फिर विकास से कहा,”आप ने सब बात खुद ही कर ली उन से, मुझ से कुछ पूछा ही नहीं.”

”पूछना क्या था, सब अच्छा ही लग रहा था, अच्छे लोग हैं.”

दोनों तरफ शादी की तैयारियां शुरू हो गईं. 2 महीने बाद ही शादी थी. प्रिया भी सपरिवार आने वाली थी. संदली ने रिजाइन कर दिया और वहां से सब क्लियर कर लौट आई. मधु फोन पर ही उस से पूछपूछ कर उस की पसंद की तैयारी करने लगीं. मधु एक से बढ़ कर एक चीजें उस की पसंद से बनवा रही थीं.

राधा ने कहा,”मुझे पता ही है कि इन अमीरों के 4 दिन के चोंचले हैं, थोड़े ही दिनों में असलियत सामने आएगी, पहले तो सब अच्छा ही दिखता है.”

संदली मन ही मन बहुत उदास थी. शादी का समय था उस पर भी मां की अजीबोगरीब बातें रुकने का नाम ही नहीं ले रही थीं. जो भी तैयारी राधा कर रही थीं, बोझ समझ कर कर रही थीं, उस में बेटी को अच्छा परिवार मिलने की कोई खुशी नहीं थी. हर समय किसी न किसी बात पर आर्यन के परिवार को ले कर कुछ ऐसा कह देतीं कि संदली का चेहरा मुरझा जाता.

विकास सब समझ रहे थे पर क्या करते, राधा को कुछ कह कर घर का माहौल खराब नहीं करना चाहते थे. प्रिया भी आ चुकी थी, उस के पति विशाल और दोनों बच्चे सोनू,पिंकी मौसी की शादी को ले कर बहुत उत्साहित थे.

सब खुश थे पर राधा का स्वभाव अकसर रंग में भंग डाल देता. विकास ने अपने बजट के अनुसार सारा पैसा अनिल के अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया था. सब इंतजाम आर्यन का परिवार ही देख रहा था.

शादी से 4 दिन पहले संदली अपने परिवार के साथ दिल्ली पहुंची तो आर्यन की तरफ से कई गाड़ियां उन्हें लेने आई हुई थीं.

अनिल और मधु ने खुद एअरपोर्ट पर सब का स्वागत किया और उन्हें पानीपत के ही एक होटल में ले गए, जहां सारा इंतजाम बहुत शानदार था.

रस्में बहुत खुशी से पूरी की गईं. विवाह का आयोजन शानदार रहा. सबकुछ अच्छी तरह से संपन्न हुआ. राधा परिवार सहित मुंबई लौट आईं. कुछ दिन बाद प्रिया भी वापस चली गई.

विकास औफिस के काम में व्यस्त हो गए. राधा का पुराना रवैया चलता रहा. हर बात में अब भी अपने को ही सही ठहरातीं. संदली जब फोन करती, राधा खोदखोद कर पूछतीं कि ससुराल का क्या हाल है?

संदली तारीफ करती तो कहतीं,”मुझे पता है, यह सब प्यारव्यार थोड़े दिनों की बात है. आगे पता चलेगा.”

संदली ने घर का बिजनैस संभालना शुरू कर दिया था. एक नया शोरूम खोला जा रहा था जिस की देखरेख संदली और आर्यन पर छोड़ दी गई थी, उस के लिए एक कार और ड्राइवर हमेशा रहता. वह बहुत खुश रहती. उसे सारी सुविधाएं और ढेर सारा प्यार मिल रहा था.

कुछ ही दिनों में अभय की शादी भी उस की गर्लफ्रैंड तारा के साथ तय हो गई.

राधा ने सुनते ही कहा,”संदली, अब पता चलेगा तुम्हें जब देवरानी घर आएगी और प्यार बंटेगा.”

संदली चुप रही. अभय के विवाह में राधा और विकास भी गए. अब की बार भी उन्हें बहुत सम्मान दिया गया. सब कुछ पहले की तरह अच्छी तरह से हुआ. संदली की अपनी देवरानी तारा से खूब जम रही थी. दोनों खूब मस्ती कर रही थीं.

राधा ने मुंबई आने के बाद संदली से देवरानी के हाल पूछे तो वह खूब उत्साह से तारा और अपनी खूब अच्छी दोस्ती के बारे में बताने लगी. संदली और तारा का आपस में बहनों जैसा प्यार हो गया था.

राधा ने कहा,”बेटा, मैं ने देखे हैं ऐसे रिश्ते, अब पता चलेगा थोड़े दिनों में जब यही प्यार तकरार में बदलेगा, देखना.”

आज संदली का धैर्य जवाब दे गया. विकास भी वहीं बैठे थे, फोन स्पीकर पर था, संदली फट पड़ी थी आज,”हां, मुझे पता चल चुका है कि आप के लिए हर रिश्ता बेकार है. आप को कहां किसी रिश्ते में प्यार दिखता है? मम्मी, पता नहीं क्यों आप के लिए सब बुरा ही होने वाला होता है. मुझे तो इस घर में आने के बाद यह पता चला है कि शांति से रहना कितना आसान है, प्यार दो, प्यार लो, काश कि आप को भी यह पता रहता.

“बस, यहां जो मुझे पता चला है, वह सब आप के साथ रह कर कभी पता ही नहीं चला. आप मुझे अब कभी मत बताना कि मुझे क्या पता चलेगा? मुझे जो पता चलना था, चल चुका. इतना प्यार है यहां पर, मैं कितनी खुश हूं,आगे भी खुश ही रहूंगी, मुझे तो यह पता है.”

राधा का चेहरा देखने लायक था. संदली ने कभी इस तरह बात नहीं की थी. आज अपनी बात कह कर फोन ऐसे रखा था कि राधा शर्मिंदा सी बैठी रह गई थीं. विकास तो अपनी हंसी रोकने की कोशिश में आज चुपचाप वहां से उठ कर दूसरे रूम में जा चुके थे.

अब पता चलेगा – भाग 2 : क्या कभी रुक पाया राधा और विकास का झगड़ा

रात को अकेले में राधा भुनभुनाती ही रहीं. विकास ने टोका,”कभी तो किसी बात पर खुश रहना सीखो, राधा. इतना अच्छा लड़का पसंद किया है संदली ने. बेटी बहुत समझदार है हमारी, सब देखसुन कर ही मिलवाने लाई होगी.”

”यह शादी कर के बहुत पछ्ताएगी.देखना, इस की किसी से नहीं निभ सकती, कुछ नहीं आता है, बस सैरसपाटा, आराम करना आता है.अब पता चलेगा, यह शादी के बाद बैठ कर रोएगी.”

विकास को गुस्सा आ गया,”कैसी मां हो, बेटी के लिए बुरा सोचती हो, शेम औन यू,राधा.”

संदली को मां का मन अच्छी तरह पता था. वह अंदर से दुखी भी थी पर आर्यन से बहुत प्यार करने लगी थी, अब विवाह करना चाहती थी पर मां इस विषय पर उस के लिए अच्छा नहीं सोचेंगी, पता था उसे.

अगले दिन आर्यन और संदली चले गए. फिर एक दिन प्रिया का फोन आया, वह संदली के लिए खुश थी.

कहने लगी,”आर्यन बहुत अच्छे परिवार से है, संदली ने नेट पर देख लिया है, उन के बिजनैस के बारे में वह सब जानती है, सब देख कर ही उस ने आर्यन से शादी का मन बनाया है. ऐसा लड़का तो हम भी उस के लिए नहीं ढूंढ़ सकते थे.”

राधा बिफरी,”मुझे पता था तुम उस की ही साइड लोगी.”

”ओह मां, यह जो आप को हर बात पता होती है न, बड़े परेशान हैं हम इस से, कभी तो कोई बात आराम से सुन लिया करो.”

थोड़ी देर बाद फोन रख दिया गया. संदली ने वहां से आर्यन के पेरैंट्स अनिल और मधु से भी विकास और राधा की बात करवा दी. विकास को दोनों का स्वभाव बहुत अच्छा लगा, दोनों संदली से मिल कर खुश थे. अब जल्दी से जल्दी उसे अपनी बहू बनाना चाहते थे.

विकास ने भी इस विवाह के लिए सहमति दे दी तो उन्होंने कहा,”आप भी आ कर हमारा घर देख लीजिए, तसल्ली कर लीजिए कि संदली हमेशा खुश रहेगी. यह बात विकास को बहुत अच्छी लगी.

उन्होंने कहा,”हम भी जल्दी ही आते हैं.”

दोनों परिवार अब आगे का प्रोग्राम बनाने लगे. संदली 2 दिन में वापस आ गई.

बैग खोलते हुए ढेरों गिफ्ट्स दिखाते हुए बोली,”पापा, मम्मी, देखो उन लोगों ने तो गिफ्ट्स की बौछार कर दी. इतने प्यार से मिले कि क्या बताऊं. पापा, मैं बहुत खुश हुई वहां जा कर.”

राधा ने सब सामान देखा, कहा कुछ नहीं, उठ कर अपने काम में लग गईं. 10 दिन बाद संदली चली गई. कोर्स पूरा हो चुका था. संदली को वहीं नई नौकरी जौइन करनी थी.

आर्यन अब पानीपत में फैमिली का बिजनैस ही संभालने वाला था. अनिल और मधु मुंबई आए. होटल में ठहरे और विकास और राधा से मिलने घर आए. गजब के खुशमिजाज, सुंदर दंपत्ति को देख कर राधा हैरान थीं. वे दोनों विकास और राधा के लिए बहुत सारे गिफ्ट्स भी लाए.

राधा के हाथ का बना खाना खा कर उन की कुकिंग की खूब तारीफ की तो राधा ने कहा,”पर संदली को कुछ भी बनाना नहीं आता. पहले इसलिए बता रही हूं कि आप लोग हमें बाद में यह न कहें कि आप लोगों को बताया नहीं.”

मधु ने खुल कर हंसते हुए कहा,”बेटी बहुत प्यारी है आप की. उस ने मुझे खुद ही बता दिया कि उसे कोई काम नहीं आता और उसे हमारे यहां कुकिंग की जरूरत पड़ेगी भी नहीं. हमारे यहां 2 कुक हैं, किचन में तो मैं ही जल्दी नहीं घुसती, आजकल की लड़कियां कैरियर बनाने में मेहनत करती हैं, जब जरूरत होती है सब कर लेती हैं और वहां अकेली रह ही रही है न, बहुत कुछ अपनेआप करती भी होगी.”

राधा चुप रहीं. अनिल और मधु ने अच्छा समय साथ बिताया. जाते हुए उन्हें भी गिफ्ट्स दे कर विदा किया गया.

अब अगले हफ्ते विकास और राधा को दिल्ली जाना था. तय हुआ कि अब सगाई भी कर देते हैं और संदली को भी बुला लेते हैं.

यह सुनते ही राधा को गुस्सा आ गया, विकास से कहा,”अब फिर उस के आने का खर्चा उठाना है?अभी तो गई है.”

संदली ने यह बात सुन कर कहा,”मम्मी, आप टिकट की चिंता न करो, सरप्राइज में आर्यन ने मुझे टिकट भेज दिए हैं.”

राधा ने कहा,”मुझे पता है कोई गड़बड़ जरूर है जो वे शादी के लिए इतनी जल्दी मचा रहे हैं. इतना अच्छा परिवार संदली को बहू बनाने के लिए क्यों मरा जा रहा है? कोई बात तो है.अब पता चलेगा.’’

विकास ने कहा,”गड़बड़ तुम्हारे दिमाग में है, बस.”

संदली सीधे दिल्ली पहुंची. विकास और राधा भी पहुंच गए.

प्रिया ने कहा था कि वह सीधे शादी में ही आएगी. पानीपत में आर्यन का विशाल घर, नौकरचाकर देख कर राधा दंग रह गईं. उस पर सब का स्वभाव इतना सहज, कोई घमंड नहीं. पर आदत से मजबूर, कमी ढूंढ़ती ही रहीं, जो मिली नहीं.

राधा यह देख कर हैरान हुईं कि मधु और संदली ने फोन पर ही एकदूसरे के टच में रह कर सगाई के कपड़ों की जबरदस्त तैयारी कर रखी है. अभय संदली से खूब हंसीमजाक कर रहा था, विकास और मधु के लिए बेहद आरामदायक गेस्टरूम था, अनिल और मधु के करीब 100 लोगों के परिचितों के मौजूदगी में सगाई का फंक्शन हुआ.

विकास ने खर्चे बांटने की बात कही तो अनिल ने हाथ जोड़ दिए,”हमें कुछ नहीं चाहिए. संदली इस घर में आ रही है तो हमें खुशी से यह सब करने दें. हमें कुछ भी नहीं चाहिए.”

राधा ने अकेले में विकास से कहा,”इतना अच्छा बन कर दिखा रहे हैं, मुझे पता है ऐसे लोग बाद में रंग दिखाते हैं. अब पता चलेगा.‘’

संदली भी उन के पास ही बैठी थी.गुस्सा आ गया उसे, कहा,”मम्मी, हद होती है, इतने अच्छे लोग हैं फिर भी आप ऐसे कह रही हैं, सब कुछ उन्होंने आज मेरी पसंद का किया है, मेरी ड्रैस, ज्वैलरी सब आर्यन की मम्मी ने ली, मुझे कुछ भी लेने से मना कर दिया था, अब शादी की भी पूरी शौपिंग मुझे करवाने के लिए तैयार हैं, पर आप की बातें…उफ…”

”मुझे पता है तुम्हारी जैसी लड़कियां बाद में खूब रोती हैं.”

संदली को रोना आ गया. उस के आंसू बह निकले तो विकास ने उसे गले से लगा लिया,”संदली बेटा, मत दुखी हो, तुम्हारी मम्मी को कुछ ज्यादा ही पता रहता है.‘’

विकास और संदली दोनों राधा से नाराज थे पर राधा पर न कभी पहले कोई असर हुआ था, न अब हो रहा था.

अब पता चलेगा – भाग 1 : क्या कभी रुक पाया राधा और विकास का झगड़ा

28दुबई से संदली उत्साह से भरे स्वर में अपने पापा विकास और मम्मी राधा को बता रही थी,”पापा, मैं आप को जल्दी ही आर्यन से मिलवाउंगी. बहुत अच्छा लड़का है. मेरे साथ उस का एमबीए भी पूरा हो रहा है. हम दोनों ही इंडिया आ कर आगे का प्रोग्राम बनाएंगे.”

विकास सुन कर खुश हुए, कहा,”अच्छा है,जल्दी आओ, हम भी मिलते हैं आर्यन से. वैसे कहां का है वह?”

”पापा, पानीपत का.”

”अरे वाह, इंडियन लड़का ही ढूंढ़ा तुम ने अपने लिए. तुम्हारी मम्मी को तो लगता था कि तुम कोई अंगरेज पसंद करोगी.‘’

संदली जोर से हंसी और कहा,”मम्मी को जो लगता है, वह कभी सच होता है क्या? फोन स्पीकर पर है पर मम्मी कुछ क्यों नहीं बोल रही हैं?”

”शायद उसे शौक लगा है आर्यन के बारे में जान कर.”

राधा का मूड बहुत खराब हो चुका था. वह सचमुच जानबूझ कर कुछ नहीं बोलीं.

जब विकास ने फोन रख दिया तो फट पड़ीं,”मुझे तो पता ही था कि यह लड़की पढ़ने के बहाने से ऐयाशियां करेगी. अब पता चलेगा पढ़ने भेजा था या लड़का ढूंढ़ने.”

”क्या बात कर रही हो, जौब भी मिल ही जाएगा. अब अपनी पसंद से लड़का ढूंढ़ लिया तो क्या गलत किया? संदली समझदार है, जो फैसला करेगी, अच्छा ही होगा.”

“अब पता चलेगा कि इस लड़की की किसी से निभ नहीं सकती, न किसी काम की अकल है, न कोई तमीज.और जो यह लोन ले रखा है, शादी कर के बैठ जाएगी तो कौन उतारेगा लोन? मुझे पता ही था कि यह लड़की कभी किसी को चैन से नहीं रहने दे सकती,” राधा जीभर कर संदली को कोसती रहीं.

विकास को उन पर गुस्सा आ गया, बोले,”तुम्हें तो सब पता रहता है. बहुत अंतरयामी समझती हो खुद को.पता नहीं कैसे इतना ज्ञानी समझती हो खुद को.

“आसपड़ोस की अपनी जैसी हर समय कुड़कुड़ करने वाली लेडीज की बातों के अलावा कुछ भी पता है कि क्या हो रहा है दुनिया में?”

हर बार की तरह दोनों का गुस्स्सा रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था.

विकास ने जूते पहनते हुए कहा, “मैं ही जा रहा हूं थोड़ी देर बाहर, अकेली बोलती रहो.”

यह कोई पहली बार तो हुआ नहीं था. बातबेबात किचकिच करने वाली राधा का तकियाकलाम था,’अब पता चलेगा.’

बड़ी बेटी प्रिया कनाडा में अपनी फैमिली के साथ रहती थी, संदली फिलहाल दुबई में थी. कोई भी कैसी भी बात करता, राधा हमेशा यही कहतीं कि उन्हें सब पता था. उन का कहना था कि उन्होंने इतनी दुनिया देखी है, उन्हें हर बात का इतना ज्ञान है कि कोई भी बात उन से छिपी नहीं रहती, फिर चाहे कुकिंग की बात हो या फैशन की.

यहां तक कि राजनीति की हलचल पर भी कोई बात होती तो उन का कहना होता कि उन्हें तो पता ही था कि फलां पार्टी यह करेगी. 1-2 दिन पहले वे किसी से कह रहीं थीं कि उन्हें तो पता ही था कि अब किसान आंदोलन होगा.

उन की बात सुनते हुए विकास ने बाद में टोका था,”ऐसी हरकतें क्यों करती हो, राधा? किसान आंदोलन होगा, यह भी तुम्हें पता था, कुछ तो सोच कर बोला करो.”

”अरे,मुझे पता था कि कुछ ऐसा होगा.”

विकास चुप हो गए, पता नहीं कौन सी ग्रंथि है राधा के मन में जो वह हर बात में घर में किसी न किसी बात में हावी होने की कोशिश करती थी. कई बार विकास अपने रिश्तेदारों के सामने राधा की बातों से शर्मिंदा भी हो जाते थे. बेटियां भी इस बात से हमेशा बचती रहीं कि राधा के सामने उन की फ्रैंड्स आएं.

विकास अंधेरी में एक प्राइवेट कंपनी में कार्यरत थे. आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी पर राधा कंजूस भी थी और बहुत तेज भी, साथ ही उन्हें अपने उस ज्ञान पर भी बहुत घमंड था जो ज्ञान दूसरों की नजर में मूर्खता में बदल चुका था. अजीब सी आत्ममुग्ध इंसान थीं.

घर में उन के व्यवहार से सब हमेशा दुखी रहते. राधा ने संदली को अगले दिन फोन किया और सीधे पूछा,”अभी शादी कर लोगी तो तुम्हारा लोन कौन चुकाएगा?”

”मैं इंडिया आ कर जौब करूंगी, लोन उतार दूंगी. अभी हम दोनों सीधे मुंबई ही आ रहे हैं, आर्यन को आप लोगों से मिलवा दूं?”

राधा ने कोई उत्साह नहीं दिखाया. संदली ने उदास हो कर फोन रख दिया. संदली और आर्यन को एअरपोर्ट से लेने विकास खुद जा रहे थे.

प्रोग्राम यह तय हुआ कि विकास औफिस से सीधे एअरपोर्ट चले जाएंगे. देर रात सब घर पहुंचे तो राधा ने सब के लिए डिनर तैयार कर रखा था. आर्यन उन्हें पहली नजर में ही बहुत अच्छा लगा पर बेटी से मन ही मन नाराज थीं कि पढ़ने भेजा था, लड़का पसंद कर के घर ले आई है.

उन्हें विकास पर भी बहुत गुस्सा आ रहा था कि अभी से कैसे आर्यन को दामाद समझ रहे हैं. संदली फोन पर पहले ही बता चुकी थी कि पानीपत में आर्यन के पिता का बहुत लंबाचौड़ा बिजनैस है. बहुत धनी, आधुनिक परिवार है. 2 ही भाई हैं, आर्यन बड़ा है, छोटा भाई अभय अभी पढ़ रहा है.

आर्यन से मिलने, उस से बातें करने के बाद कोई कारण ही नहीं था कि राधा कुछ कमी निकालती पर यह बात हजम ही नहीं हो रही थी कि बेटी ने अपने लिए लड़का खुद पसंद कर लिया है.

विकास को भी आर्यन बहुत पसंद आया था. वह ऐसे घुलमिल गया था कि जैसे कब से इस परिवार का ही सदस्य है.

डिनर करते हुए संदली ने कहा,”मम्मी, हम दोनों अब कल ही दिल्ली जा रहे हैं. वहां आर्यन के पेरैंट्स हमें एअरपोर्ट पर लेने आ जाएंगे. मुझे भी उन से मिलना है. मैं जल्दी ही वापस आ जाउंगी.”

राधा ने कहा,”मुझे तो पता ही था कि तुम हम से पूछोगी भी नहीं, खुद ही होने वाले ससुराल पहुंच जाओगी.अब पता चलेगा.’’

विकास ने आर्यन की उपस्थिति को देखते हुए मुसकरा कर बात संभाली,”यह तो अच्छा ही है न कि तुम अपनी बेटी को जानती हो, तुम्हें पता था, अच्छा है.”

संदली ने मां की बात पर ध्यान ही नहीं दिया. युवा मन अपने सपनों में खोया था, प्यार से बीचबीच में एकदूसरे को देखते संदली और आर्यन विकास को बड़े अच्छे लगे.

मेरे अपने – भाग 3 : क्यों परिवार से दूर हो गई थी सुरभि

उधर से गुजरती एक नर्स की दृष्टि उस पर पड़ी तो वह पास आ कर सुरभि को सांत्वना देने लगी. जब उस ने देखा कि बिना पूरे गरम कपड़ों के वह ठंड से कांप रही है तो उस ने तुरंत वार्ड बौय को आवाज लगाई और एक कंबल मंगवाया. उस के लिए एक कप कौफी मंगवा कर जबरदस्ती पिलाई. फिर धीरे से बोली, ‘‘मैडम, सर ठीक हो जाएंगे. आप चिंता मत करो. मैं देख रही हूं कि आप कब से अकेले ही भागदौड़ कर रही हैं. आप अपने बच्चों और रिश्तेदारों को फोन कर दो. फोन है न आप के पास. नहीं तो मैं दूं.’’

नर्स द्वारा पहुंचाई गई बाह्य उपकरणों की गरमी और उस की स्नेहमयी सांत्वना की गरमाई ने पत्थर बनी सुरभि को पिघला दिया. उस की आंखों में आंसू आ गए. कानपुर में होते तो एक फोन करने की देर थी, सारा शहर एकत्र हो जाता पर मास्टरजी के इस ‘अपने’ अनजान शहर में उसे एक भी व्यक्ति याद न आया जिस को संकट की इस घड़ी में वह सहायतार्थ बुला सके. 8 महीने हो गए थे यहां आए. पर अड़ोसपड़ोस से सामान्य परिचय से अधिक संबंध बनाने का अवसर ही न मिला था. बस्ती के कई व्यक्तियों, मीडिया व नाट्य अकादमी के कई छात्रों के फोन नंबर थे उस के पास. पर वह निश्चय न कर पा रही थी कि क्या कार्य संबंधी कुछ मुलाकातों में उन लोगों से इतना रिश्ता जुड़ गया है कि अपनी निजी आवश्यकताओं के समय उन्हें सहायता के लिए बुलाया जा सके.

सुरभि को एक बार फिर से उन अपनों की कमी खलने लगी थी जिन का अस्तित्व कभी था ही नहीं. मास्टरजी के मातापिता उन्हें किशोरावस्था में ही अकेला छोड़ कर इस दुनिया से चले गए थे. मास्टरजी अपने मातापिता के इकलौते पुत्र थे. मातृपितृविहीन बालक से धीरेधीरे सभी सगेसंबंधियों ने दूरी बना ली थी. सभी को डर था

कि कहीं अनाथ हो गए बालक का उत्तरदायित्व उन पर न आ पड़े. दूसरी ओर सुरभि ने अपने मातापिता को कभी देखा

ही न था. उस का पालनपोषण उस के चाचाचाची ने किया था. मास्टरजी के साथ ब्याह कर उन्होंने फिर कभी उन की ओर पलट कर भी न देखा था. इन दोनों ने विवाह के बाद जब अपना छोटा सा नीड़ बसाया तो उसे प्रेम, मधुरता, स्नेह और आपसी समर्पण से ऐसे सजाया कि किसी अन्य रिश्ते के अभाव की ओर उन का ध्यान ही न गया. 10 साल यों ही बीत गए थे. फिर धीरेधीरे उन्हें अपने आंगन में किलकारियों की कमी सताने लगी.

शादी के इतने बरस बाद भी वे इस सुख से वंचित थे. सारे चिकित्सकीय प्रयास भी जब निष्फल रहे तो सुरभि ने मास्टरजी के विरोध और अपनी स्वयं की अवधारणाओं के विपरीत जा कर पूजापाठ, व्रत, मन्नत, पंडित, मौलवी कुछ भी न छोड़ा लेकिन सब व्यर्थ के पाखंड सिद्ध हुए. धीरेधीरे सुरभि की मां बनने की संभावना क्षीण होती जा रही थी. अब वह बच्चा गोद लेने का मन बना रही थी पर मास्टरजी के आदर्श कुछ और ही थे. उन के अनुसार, एक बच्चे को गोद ले कर उसे अपना वारिस बनाने से उत्तम है उस हर बच्चे में प्रेम बांटना, जो उन के पास पढ़ने आता है. एक बालक को अपना नाम देने से बेहतर है सब को ज्ञान देना. एक को ‘मेरा’ कहने से बेहतर है सब को अपना कहना. सुरभि ने सदा की भांति इस विषय में भी मास्टरजी का विरोध न किया था और अपने मातृत्व की धारा को उसी ओर मोड़ दिया था जिस ओर मास्टरजी चाहते थे. पर आज… आज कहां हैं वे सब अपने? कहां हैं वे?

अचानक रिसैप्शन की ओर कुछ हलचल सी हुई. 15-20 लोग हड़बड़ाए हुए तेजी से भीतर घुसे और रिसैप्शन को घेर कर कुछ पूछताछ करने लगे. रिसैप्शनिस्ट ने उन्हें इशारे से कुछ बताया और भीड़ तेजी से औपरेशन थिएटर की ओर लपक पड़ी. कुछ पास आने पर सुरभि ने देखा कि भीड़ में सब से आगे मीडिया केंद्र के कुछ लड़केलड़कियां थे. कुछ लोग नाट्य अकादमी के थे. उन के साथ पड़ोस में रहने वाले राजीवजी और उन की पत्नी थीं. कुछ और लोग भी थे जिन्हें सुरभि ने अकसर बस्ती में नुक्कड़ पर अड्डेबाजी करते देखा था.

‘‘अम्मा…’’ कहते हुए वृंदा दौड़ कर सुरभि के पास पहुंची और उस से लिपट गई. वे लोग पता नहीं क्याक्या कहनेपूछने लगे. सुरभि को बस एक ही आवाज सुनाई दे रही थी. क्या कहा था उस लड़की ने, ‘अम्मा…’

सुरभि को अम्मा कहा था उस लड़की ने.

ये सब विद्यार्थी अकसर उस के घर आते थे. कभीकभी किचन में भी घुस जाते थे चायकौफी या नाश्ता बनाने. मास्टरजी स्वयं बच्चों के साथ बच्चा हो जाते थे. पर सुरभि के साथ वे सब कभी अनौपचारिक न हो पाए थे. उस के गुरुगंभीर चेहरे को और भी गुरुता प्रदान करती बालों में

चांदी की चंद तारें और आंखों पर चढ़ा मोटे शीशों वाला चश्मा, कलफ लगी सिलवटविहीन सूती साड़ी और सदा कसे रहने वाले होंठों के कोर, ये सबकुछ मिला कर उस का व्यक्तित्व जैसे एक अदृश्य प्रभामंडल से घिरा रहता था जिस पर मानो प्रवेश निषेध की तख्ती लगी रहती थी. इन सब के साथ सुरभि की आत्मीयता थी, पर वह उद्दंड बरसाती झरने सी न हो कर शांत गंभीर मानसरोवर सी थी.

ऐसे में वह आदर और सम्मान की औपचारिकता में बंधे विद्यार्थियों व अन्य बस्ती वालों के लिए ‘मैम’ ही थी. पर आज यह क्या हुआ. शुष्क वर्जनाओं को ध्वस्त करता यह कौन सा झोंका था जो सुरभि को विभोर कर गया या वह स्वयं ही कोई और थी इस समय. बीती रात्रि का एकएक पल उस के चेहरे पर चिंता की झुर्रियां बन कर बिछा हुआ था. झुकी कमर और दुख से कातर आंखों में न जाने वह कौन सा खिंचाव था जो वृंदा उस के गले आ लगी थी. विकास, तरुण, तारा, सुबोध, रुचि सब ने उसे घेर लिया.

‘‘अम्मा, आप ने हमें फोन क्यों नहीं किया?’’ अरुण बोला.

‘‘वह तो अच्छा हुआ कि भूरा चाचा को मेज पर रखा मास्टरजी का फोन मिल गया. आप दरवाजे जो खुले छोड़ आई थीं. तब भूरा चाचा ने हमें ढूंढ़ कर सबकुछ बताया,’’ रुचि बोलतेबोलते रोंआसी हो आई थी.

उस के बाद किसी ने डाक्टरों और नर्सों से मास्टरजी के औपरेशन के विषय में जानकारी लेनी आरंभ कर दी, तो कोई नर्स द्वारा थमाया गया दवाओं का परचा ले कर कैमिस्ट की दुकान की ओर भागा. रुचि ने उस की पीठ के पीछे एक तकिया लगाया और उस के पांव बैंच के ऊपर कर दिए. फिर ठीक से कंबल ओढ़ा दिया. मालती शर्मा ने तुरंत थर्मस में से चाय निकाल कर उन्हें स्नेहपगी जिद के साथ पिलाई. अधिक खून की आवश्यकता न पड़ जाए, इसलिए सब बच्चों ने तुरंत अपने खून के सैंपल दिए जांच के लिए. बस्ती के टैक्सी ड्राइवर ने अपनी गाड़ी अस्पताल के बाहर ही खड़ी कर दी थी कि कहीं भागदौड़ की आवश्यकता न पड़ जाए. भूरा ने बताया कि वह दुलारी और अपनी घरवाली को मास्टरजी के घर बिठा कर आया है, इसलिए सुरभि को घर की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है.

सुरभि भौचक्की सी कभी एक की सूरत देखती कभी दूसरे की. कितने प्यारे, कितने अपने लग रहे थे आज ये सब. सुरभि ने पहली बार अपने भीतर मातृत्व को अंगड़ाई लेते महसूस किया था. उस ने बांहें फैला कर बच्चों को सीने से लगा लिया.

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