फिर 40वां आया (40 दिन बाद की रस्म) एक दिन पहले ही सास और ननद जुबेदा के पास आ कर बड़ी मुहब्बत से बातें करने लगीं. उस की सेहत की फिक्र करने लगीं. फिर सास धीरे से बोलीं, ‘‘जुबेदा बेटी, कल इमरान की 40वें की रस्म है. यह बहुत धूमधाम से करनी होती है. यह आखिरी काज है. तुम 40 हजार का एक चैक भर दो ताकि यह प्रोग्राम भी शानदार तरीके से हो जाए. करीब 200 लोगों को बुलाना पड़ेगा. रिश्तेदार भी फलमिठाई वगैरह लाएंगे, पर खाना तो अपने को पकाना पड़ेगा.’’
जुबेदा ने सोचते हुए कहा, ‘‘अम्मां, ऐक्सीडैंट के वक्त मैं ने 1 लाख का चैक सुभान भाई को दिया था. उस में से कर लीजिए 40वें का इंतजाम. अब बैंक में मुश्किल 70-80 हजार होगें जो मेरी बड़ी मेहनत से की गई बचत है. इमरान का वेतन तो घर खर्च व उन के अपने खर्च में ही खत्म हो जाता था.’’
‘‘हां तुम ने 1 लाख दिए थे. उन में से 35-40 हजार तो अस्पताल का बिल बना. 12-13 हजार बाइक ठीक होने में लगे. बाकी पैसे सियूम की फातेहा में खर्च हो गए.’’
जुबेदा ने धीमे से कहा, ‘‘अम्मां मरने वाला तो मर गया… यह गम कितना बड़ा है मेरा दिल जानता है पर इस गम में लोगों को बुला कर खानेपिलाने में खर्च करने का क्या फायदा?’’
‘‘अपना ज्ञान अपने पास रखो. यह 40वां करना जरूरी है. इस से इमरान की रूह को शांति मिलेगी और जितने लोग खाएंगे सब उस के लिए दुआ भी करेंगे.’’
जुबेदा को मजबूरन एक चैक भर कर देना पड़ा पर उस ने सिर्फ 30 हजार भरे. सास व ननद का मुंह बन गया. अभी उस के सामने कई खर्चे थे. एक साल पहले उस ने एक फ्लैट बुक किया था. उस की किस्त भी भरनी थी. अभी और भी कई काम थे.
2 दिन बाद 40वां हुआ. दूरदूर के रिश्तेदार और दूसरे लोग जमा हुए. खूब हंगामा रहा. जुबेदा तटस्थ अपने कमरे में रही. औरतें उस से मिलने आती रहीं.
वक्त गुजरता रहा. इद्दत भी पूरी हो गई. उस के बाद अम्मां ने मिन्नत कर के भारी बनारसी साडि़यां बेटी के लिए मांग लीं. जेवरों की भी डिमांड करने लगीं. उस ने एक सोने का सैट दे कर जान छुड़ाई. यह सैट उसे अम्मां ने ही दिया था. इस तरह जिंदगी थोड़ी आसान हो गई.
एक दिन जब जुबेदा स्कूल से वापस आई तो रूना भाभी का चेहरा उतरा हुआ था.
आंखें खूब रोईरोई लग रही थीं. उस ने बहुत पूछा क्या हुआ पर रूना भाभी ने कोई जवाब नहीं दिया. उस के बाद रूना ने जुबेदा से बातचीत भी करीबकरीब खत्म कर दी. उस की समझ में नहीं आया कि आखिर बात क्या हुई है? ऐसा क्या हुआ कि ऐसी बेरूखी दिखा रही हैं? आखिर राज एक छुट्टी के दिन खुल गया. वह नाश्ते के बाद सब्जी काट रही थी कि अम्मां ने बात छेड़ी, ‘‘देखो जुबेदा बेटी तुम बहुत कम उम्र में बेवा हो गई. अभी तुम्हारी उम्र सिर्फ 27 साल है. पहाड़ जैसी जिंदगी बिना किसी मर्द के सहारे के गुजारना बड़ा मुश्किल काम है. हमारा क्या है आज हैं कल नहीं रहेंगे. यह दुनिया बड़ी जालिम है. तुम्हें तनहा जीने नहीं देगी. अकेली औरत सब के लिए एक आसान शिकार होती है. मेरी सलाह यह है कि अब तुम शादी कर लो.’’
जुबेदा ने अपने गुस्से को दबा कर कहा, ‘‘अम्मां, मुझे शादी नहीं करनी है. आप तो हिना (ननद) की शादी की फिक्र करें.’’
अम्मां ने मीठे लहजे में कहा, ‘‘जुबेदा, हम हिना के लिए लड़का तलाश कर रहे हैं. तुम्हारे लिए तो रिश्ता घर में ही मौजूद है. सुभान है न इमरान से 4 साल ही बड़ा है, अच्छा कमाता है. फिर मजहब भी 4 शादियों की इजाजत देता है. जरूरत पड़ने पर भाई भाई की बेवा का सहारा बन सकता है. उस से निकाह कर सकता है. कम से कम मजबूरी में वह 2 शादियां तो कर सकता है. तुम्हारे सिर पर एक सायबान हो जाएगा. तुम्हें शौहर के रूप में एक मददगार मिल जाएगा. मैं ने सुभान से बात कर ली है, वह तुम से निकाह करने को राजी है. बस, तुम हां कर दो.’’
जुबेदा तैश से उबल पड़ी, ‘‘अम्मां, आप कैसी बेहूदा बातें कर रही हैं? ऐसा कभी नहीं हो सकता है. वे मेरे लिए बड़े भाई की तरह हैं और मैं उन्हें भाई ही समझती हूं. मैं कभी भी रूना भाभी का घर नहीं उजाड़ूंगी. आप इस बात को यहीं खत्म कर दीजिए.’’ कह कर वह गुस्से में उठ कर अपने कमरे में चली गई. उस के दिमाग में जैसे लावा उबल रहा था. सास के अल्फाज उस के कानों में हथोड़े की तरह बज रहे थे. ‘सुभान तुम से निकाह करने को राजी है.’ वह तो राजी ही होगा शादी करने के लिए कम उम्र, कमाऊ, खूबसूरत औरत जो मिल रही है. उन्हें जरा भी शर्म नहीं आई… 2 बच्चे हैं, रूना भाभी जैसी प्यार करने वाली बीवी है, फिर भी दूसरी बीबी के ख्वाब देख रहे हैं. अब उसे समझ में आया कि रूना भाभी क्यों उस से उखड़ीउखड़ी रह रही थीं. घर में शादी की बातें चल रही होंगी. ये सब सुन कर रूना भाभी दुखी हो रही होंगी. जुबेदा खूब समझ रही थी. सुभान भाई की कोई खास आमदनी नहीं थी. अब उस की तनख्वाह पर नजर है. फिर कुछ सालों में फ्लैट भी मिल जाएगा. उस पर हक जमाएंगे और साथ ही जवान खूबसूरत नई बीवी मिल जाएगी. उस ने पक्का फैसला कर लिया कि वह किसी भी कीमत पर सुभान भाई से शादी नहीं करेगी. वह सोच में डूब गई कि उस का अगला कदम क्या होना चाहिए, क्योंकि वह जानती थी कि ये लोग अपनी जिद पूरी करने की हर संभव कोशिश करेंगे. शादी से बहुत फायदा है उन्हें.
दूसरे दिन जुबेदा ने स्कूल पहुंच कर अपनी सारी परेशानी प्रिंसिपल को बता दी.
प्रिंसिपल बहुत समझदार व जुबेदा की हमदर्द थीं. काफी देर सोचने के बाद उन्होंने कहा, ‘‘जुबेदा बेटा, मेरी समझ में तो इस का एक ही हल है कि तुम इन लोगों से कहीं दूर चली जाओे… तभी तुम इस अनचाही शादी से बच सकती हो. यहां से करीब 200 किलोमीटर दूर पहाड़ी कसबे सहदपुर में गर्ल्स स्कूल खुला है. उन्हें वहां अच्छी उत्साही टीचर्स की जरूरत है. वहां गर्ल्स होस्टल भी है. उस के वार्डन के लिए एक जिम्मेदार व अनुभवी टीचर की जरूरत है. मेरे पास भी नोटिस आया है. जो टीचर्स रुचि लें, उन्हें प्रेरित कर के मैं इस स्कूल में भेजूं. छोटा है पर अच्छा व सुरक्षित है. तुम्हारा नाम होस्टन वार्डन के तौर पर भिजवा देती हूं. तुम्हारे लिए होस्टल वार्डन क्वार्टर भी है और खाने का मेस भी. तुम्हें सारी सहूलतें मिलेंगी, वेतनवृद्धि भी अच्छी मिलेगी. तुम कहो तो मैं तुम्हारा नाम होस्टल वार्डन के लिए भेज देती हूं, साथ में लैटर भी लिख दूंगी. वहां की प्रिंसिपल मेरी कुलीग रह चुकी हैं. 3-4 साल बाद सही मौका देख कर तुम ट्रांसफर भी ले सकती हो. मेरी राय में तुम्हारी प्रौब्लम का यही उचित हल है.’’
जुबेदा को बात एकदम ठीक लगी. यही हल उस की परेशानी दूर कर सकता है. उस ने उसी वक्त अपना नाम दे दिया. प्रिंसिपल ने ट्रांसफर फार्म भरवा कर, सारी काररवाई पूरी कर अच्छी रिपोर्ट के साथ उस का फार्म विभाग को भिजवा दिया. जुबेदा ने सुकून की सांस ली.
जुबेदा ने कहकशां को फोन कर सारे हालात बताए. जबरन शादी की बात सुन कर वह भी परेशान हो गई. फिर ट्रांसफर की बात उसे भी पसंद आई. उस ने कहा, ‘‘जुबेदा, तुम जल्दी वहां से निकलने की कोशिश करो. जैसे ही तुम्हारा जौइनिंग और्डर आता है मुझे खबर कर देना. मैं तुम्हारे दूल्हाभाई अरशद के साथ गाड़ी ले कर आ जाऊंगी. तुम्हें जौइन करवा कर, वहां सैट कर के ही हम दोनों वापस आएंगे.’’
जुबेदा ने घर में किसी को इस बात की भनक नहीं लगने दी. सब से नौर्मल व्यवहार रखा. चुपचाप अपनी तैयारी करती रही. उसे कुछ खास तो साथ ले जाना न था. कुछ कपड़े, जरूरी चीजें और कागजात संभाल कर रख लिए. 15 दिनों के बाद ही उस का ट्रांसफर और्डर आ गया. स्कूल से उसे रिलीव कर दिया गया. रात को उस ने पूरी तैयारी कर ली. दूसरे दिन सुबह ही कहकशां और अरशद गाड़ी ले कर आ गए. नाश्ता करने के बाद उस ने सासससुर को बताया कि उस का ट्रांसफर सहदपुर हो गया है. उसे कल ही जौइन करना है, इसलिए वह कहकशां व अरशद के साथ जा रही है. आज ही निकलना जरूरी है.
ट्रांसफर की सुन कर सब सकते में आ गए. सुभान कहने लगा, ‘‘तुम मत जाओ. मैं कुछ दे दिला कर ट्रांसफर रुकवा दूंगा. तुम लंबी छुट्टी ले लो. ऐसा सब तो होता है. मैं सब ठीक कर दूंगा.’’
सासससुर ने भी खूब समझाया. तरहतरह की दलीलें दे कर उसे रोकना चाहा. पर उस ने दोटूक कह दिया, ‘‘मुझे प्रमोशन मिल रही है… मेरे भविष्य का सवाल है. मैं ने जाने का निर्णय कर लिया है. आप लोग परेशान न हों.’’
जुबेदा सोच चुकी थी इस बार इंतहाई कदम उठाना है. इस पार या उस पार. उस के सख्त रवैए को देख कर सब की बोलती बंद हो गई.
जुबेदा ने जाते वक्त रूना भाभी से गले मिलते हुए कहा, ‘‘भाभी, आप ने मुझे गलत समझा. मैं कभी आप की दुनिया नहीं उजाड़ती. मैं एक औरत का दर्द समझती हूं. मैं अब आप से दूर जा रही हूं. आप बेफिक्र हो कर खुश रहना.’’
रूना भाभी ने रुंधे गले से कहा, ‘‘जुबेदा मुझे माफ कर दो. मुझ से तुम्हें जानने में भूल हुई. पर तुम्हारा अकेलापन देख कर मेरा जी दुखता है…’’
‘‘आप मेरी फिक्र न करें. मैं काम में व्यस्त रहती हूं. वहां तो और भी तनहाई महसूस न होगी. होस्टल वार्डन बन कर जा रही हूं. मैं यह नहीं कहती कि मैं कभी शादी नहीं करूंगी पर अगर मुझे मेरा हमखयाल, हमदर्द, हमसफर मिल गया तो जरूर शादी करूंगी और मुझे उम्मीद है ऐसा मुखलिस बंदा मुझे मिल जाएगा.’’
जुबेदा सब से मिल कर मजबूत कदमों से जिंदगी के नए सफर के लिए रवाना हो गई. एक खुशनुमा जिंदगी उस की मंतजिर थी.



