फिर क्यों: क्या था दीपिका का फैसला – भाग 1

विक्रम से शादी कर दीपिका ससुराल आई तो खुशी से झूम उठी. यहां उस का इतना भव्य स्वागत होगा, इस की उस ने कल्पना भी नहीं की थी.

सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक ससुराल में रस्में चलती रहीं. इस के बाद वह कमरे में आराम करने लगी. शाम करीब 4 बजे कमरे में विक्रम आया और दीपिका से बोला, ‘‘मेरा एक दोस्त बहुत दिनों से कैंसर से जूझ रहा था. उस के घर वालों ने फोन पर अभी मुझे बताया है कि उस का देहांत हो गया है. इसलिए मुझे उस के घर जाना होगा.’’

दीपिका का ससुराल में पहला दिन था, इसलिए उस ने पति को रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन विक्रम उसे यह समझा कर चला गया, ‘‘तुम चिंता मत करो, देर रात तक वापस आ जाऊंगा.’’

विक्रम के जाने के बाद उस की छोटी बहन शिखा दीपिका के पास आ गई और उस से कई घंटे तक इधरउधर की बातें करती रही. रात के 9 बजे दीपिका को खाना खिलाने के बाद शिखा उस से यह कह कर चली गई कि भाभी अब थोड़ी देर सो लीजिए. भैया आ जाएंगे तो फिर आप सो नहीं पाएंगी.

ननद शिखा के जाने के बाद दीपिका अपने सुखद भविष्य की कल्पना करतेकरते कब सो गई, उसे पता ही नहीं चला.

दीपिका अपने मांबाप की एकलौती बेटी थी. उस से 3 साल छोटा उस का भाई शेखर था. वह 12वीं कक्षा में पढ़ता था. पिता की कपड़े की दुकान थी.

ग्रैजुएशन के बाद दीपिका ने नौकरी की तैयारी की तो 10 महीने बाद ही एक बैंक में उस की नौकरी लग गई थी.

2 साल नौकरी करने के बाद पिता ने विक्रम नाम के युवक से उस की शादी कर दी. विक्रम की 3 साल पहले ही रेलवे में नौकरी लगी थी. उस के पिता रिटायर्ड शिक्षक थे और मां हाउसवाइफ थीं.

विक्रम से 3 साल छोटा उस का भाई तुषार था, जो 10वीं तक पढ़ने के बाद एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करने लगा था. तुषार से 4 साल छोटी शिखा थी, जो 11वीं कक्षा में पढ़ रही थी.

पति के जाने के कुछ देर बाद दीपिका गहरी नींद सो रही थी, तभी ननद शिखा उस के कमरे में आई. उस ने दीपिका को झकझोर कर उठाया. शिखा रो रही थी. रोतेरोते ही वह बोली, ‘‘भाभी, अनर्थ हो गया. विक्रम भैया दोस्त के घर से लौट कर आ रहे थे कि रास्ते में उन की बाइक ट्रक से टकरा गई. घटनास्थल पर उन की मृत्यु हो गई. पापा को थोड़ी देर पहले ही पुलिस से सूचना मिली है.’’

यह खबर सुनते ही दीपिका के होश उड़ गए. उस समय रात के 2 बज रहे थे. क्या से क्या हो गया था. पति की मौत का दीपिका को ऐसा गम हुआ कि वह उसी समय बेहोश हो गई.

कुछ देर बाद उसे होश आया तो अपने आप को उस ने घर के लोगों से घिरा पाया. पड़ोस के लोग भी थे. सभी उस के बारे में तरहतरह की बातें कर रहे थे. कोई डायन कह रहा था, कोई अभागन तो कोई उस का पूर्वजन्म का पाप बता रहा था.

रोने के सिवाय दीपिका कर ही क्या सकती थी. कुछ घंटे पहले वह सुहागिन थी और कुछ देर में ही विधवा हो गई थी. खबर पा कर दीपिका के पिता भी वहां पहुंच गए थे.

अगले दिन पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने विक्रम का शव घर वालों को सौंप दिया था. तेरहवीं के बाद दीपिका मायके जाने की तैयारी कर रही थी कि अचानक सिर चकराया और वह फर्श पर गिर कर बेहोश हो गई. ससुराल वालों ने उठा कर उसे बिस्तर पर लिटाया. मेहमान भी वहां आ गए.

डाक्टर को बुलाया गया. चैकअप के बाद डाक्टर ने बताया कि दीपिका 2 महीने की प्रैग्नेंट है. पर वह बेहोश कमजोरी के कारण हुई थी.

2 सप्ताह पहले ही तो दीपिका बहू बन कर इस घर में आई थी तो 2 महीने की प्रैग्नेंट कैसे हो गई. सोच कर सभी लोग परेशान थे. दीपिका के पिता भी वहीं थे. वह सकते में आ गए.

दीपिका को होश आया तो सास दहाड़ उठी, ‘‘बता, तेरे पेट में किस का पाप है? जब तू पहले से इधरउधर मुंह मारती फिर रही थी तो मेरे बेटे से शादी क्यों की?’’

दीपिका कुछ न बोली. पर उसे याद आया कि रोका के 2 दिन बाद ही विक्रम ने उसे फोन कर के मिलने के लिए कहा था. उस ने विक्रम से मिलने के लिए मना करते हुए कहा, ‘‘मेरे खानदान की परंपरा है कि रोका के बाद लड़की अपने होने वाले दूल्हे से शादी के दिन ही मिल सकती है. मां ने आप से मिलने से मना कर रखा है.’’

विक्रम ने उस की बात नहीं मानी थी. वह हर हाल में उस से मिलने की जिद कर रहा था. तो वह उस से मिलने के लिए राजी हो गई.

शाम को छुट्टी हुई तो दीपिका ने मां को फोन कर के झूठ बोल दिया कि आज औफिस में बहुत काम है. रात के 8 बजे के बाद ही घर आ पाऊंगी. फिर वह उस से मिलने के लिए एक रेस्टोरेंट में चली गई.

उस दिन के बाद भी उन के मिलनेजुलने का कार्यक्रम चलता रहा. विक्रम अपनी कसम देदे कर उसे मिलने के लिए मजबूर कर देता था. वह इतना अवश्य ध्यान रखती थी कि घर वालों को यह भनक न लगे.

एक दिन विक्रम उसे बहलाफुसला कर एक होटल में ले गया. कमरे का दरवाजा बंद कर उसे बांहों में भरा तो वह उस का इरादा समझ गई.

दीपिका ने शादी से पहले सीमा लांघने से मना किया लेकिन विक्रम नहीं माना. मजबूर हो कर उस ने आत्मसमर्पण कर दिया.

गलती का परिणाम अगले महीने ही आ गया. जांच करने पर पता चला कि वह प्रैग्नेंट हो गई है. विक्रम का अंश उस की कोख में आ चुका था. वह घबरा गई और उस ने विक्रम से जल्दी शादी करने की बात कही.

‘‘देखो दीपिका, सारी तैयारियां हो चुकी हैं. बैंक्वेट हाल, बैंड वाले, बग्गी आदि सब कुछ तय हो चुके हैं. एक महीना ही तो बचा है. घर वालों को सच्चाई बता दूंगा तो तुम ही बदनाम होगी. तुम चिंता मत करो. शादी के बाद मैं सब संभाल लूंगा.’’

पलटवार : स्वरा के भरोसे पर किस ने लगाई सेंध -भाग 1

‘‘दीदी.’’ स्वरा चौंक उठी, अरे, यह तो श्रेया की आवाज है. वह उल्लसित मन से छोटी बहन की ओर लपकी, ‘‘अरे तू, आने की सूचना भी नहीं दी, अचानक  कैसे आना हुआ?’’

‘‘कुछ न पूछो दीदी, कंपनी का एक सर्वे है, उसी के लिए मुझे 2 माह तक यहीं रहना है. बस, मैं तो बहुत ही खुश हुई, आखिर इतने दिन मुझे अपनी बहन के साथ रहने को मिलेगा,’’ कह कर श्रेया अपनी दीदी स्वरा के गले में झूल गई. स्वरा को भी खूब खुशी हो रही थी, आखिर श्रेया उस की दुलारी बहन जो थी.

‘‘स्वरा, एक कप चाय देना,’’ अमित ने गुहार लगाई.

जी, अभी लाई, कह कर स्वरा चाय ले जाने को तत्पर हो गई.

‘‘लाओ दीदी, मैं जीजू को चाय दे आती हूं,’’ कह कर श्रेया ने बहन के हाथ से चाय की ट्रे ले ली और अमित के कमरे की ओर बढ़ी. कमरा खुला था, परदे पड़े थे. उस ने झांक कर देखा, अमित की पीठ दरवाजे की ओर थी. वह अपना कोई प्रोजैक्ट तैयार कर रहा था. श्रेया ने चाय साइड टेबल पर रख दी और अमित की आंखों को अपने हाथों से बंद कर दिया. अमित हड़बड़ा गया, ‘‘क्या है स्वरा, आज बड़ा प्यार आ रहा है. क्या दिल रंगीन हो रहा है. अरे भई, दरवाजा तो बंद कर लो.’’ अमित ने श्रेया को स्वरा समझ कर अपनी ओर खींच लिया, श्रेया भरभरा कर अमित की गोद में आ गिरी.

‘‘हाय, जीजू क्या करते हैं, मैं आप की पत्नी नहीं, बल्कि श्रेया हूं, आप की इकलौती साली. क्यों, चौंक गए न,’’ श्रेया संभलती हुई बोली.

‘‘हां, चौंक तो गया ही, चलो कोई बात नहीं, आखिर साली भी तो आधी घरवाली होती है,’’ अमित ने ठहाका लगाया.

‘‘क्या बात है, बड़े खुश हो रहे हो,’’ स्वरा भी वहीं आ गई.

‘‘हां भई, खुशी तो होगी ही. अब इतनी सुंदर साली को पा कर मन पर काबू कैसे रखा जा सकता है. दिल ही तो है, मचल गया,’’ अमित ने शोखी से कहा.

‘‘हुं, ज्यादा न मचलें, थोड़ा काबू रखो. मेरी बहन कोई सेंतमेत की नहीं है, जो किसी का भी दिल मचल जाए,’’ स्वरा ने अमित को छेड़ा और दोनों बहनें हंसती हुई कमरे से बाहर आ गईं.

दिन के साढ़े 10 बजे रहे थे. श्रेया को सर्वे के लिए निकलना था. वह तैयार होने चली गई. अमित भी औफिस के लिए तैयार होने चला गया. दोनों साथ ही निकले. श्रेया आटो के लिए सड़क की ओर बढ़ने लगी कि तभी अमित ने पीछे से आवाज दी, ‘‘रुको साली साहिबा, तुम्हारी प्रोजैक्ट साइट मेरे औफिस के रास्ते में ही है, मैं तुम्हें ड्रौप कर दूंगा.’’ स्वरा ने भी हां में हां मिलाई और श्रेया लपक कर अमित की बगल वाली सीट पर बैठ गई.

अमित ने कहा, ‘‘बैल्ट लगा लो श्रेया, यहां ट्रैफिक रूल्स बहुत सख्त हैं.’’

श्रेया ने बैल्ट लगाने की कोशिश की लेकिन वह लग नहीं रही थी. शायद कहीं फंसी हुई थी. उस ने बेबसी से अमित की ओर देखा. अमित समझ गया और थोड़ा झुक कर बैल्ट को खींचने लगा कि अचानक बैल्ट खुल गई. श्रेया झटका खा कर अमित की ओर लुढ़क गई. ‘‘सौरी,’’ उस ने धीरे से कहा. ‘‘ओके, जरा ध्यान रखा करो.’’ अमित ने गाड़ी बढ़ाते हुए कहा.

अब यह प्रतिदिन का नियम बन गया था. अमित श्रेया को उस की साइट पर छोड़ता और शाम को लौटते हुए उसे साथ में ले भी लेता था. वैसे तो यह एक सामान्य बात थी. जब दोनों का समय और रास्ता भी एक ही था तो साथ आनेजाने में कोई बड़ी बात नहीं थी लेकिन यह प्रतिदिन का जो साथ था, वह बिना किसी रिश्ते के एक अनजाने रिश्ते की ओर बढ़ रहा था.

अमित युवा था और उस का दिल सदैव उन्मत्त रहता था. रूपसी पत्नी के साहचर्य ने उसे और भी अधिक शोख बना दिया था. सुंदर स्त्रियों के साथ उसे आनंद आता था. अब हर समय उसे स्वरा का साथ तो उपलब्ध नहीं होता था तो वह अकस्मात ही अन्य स्त्रियों की ओर आकर्षित होने लगता था. वह सोचता भी था कि यह गलत है, किंतु आंखें? उन का क्या, उन्हें बंद तो नहीं किया जा सकता था. उन्हें देखने से कोई कैसे रोक सकता था.

श्रेया भी युवा थी, अपरिमित सौंदर्य की स्वामिनी थी. उस का हृदय जबतब मचलता रहता था. पुरुषों की सौंदर्यलोलुप दृष्टि का वह आनंद उठाती थी. पुरुष साहचर्य की कामना भी करती थी परंतु अपनी मर्यादाओं को समझते हुए. एक बार उस की किसी नवविवाहिता सहेली ने उसे बताया था, ‘पुरुष का प्रथम स्पर्श बहुत ही मधुर होता है.’ यह सुन कर वह रोमांचित हो उठी थी.

उसे अमित का साथ अच्छा लगने लगा था. यद्यपि कि उसे अपने पर शर्म भी आती थी कि वह जो कुछ भी कर रही है, वह गलत है. अमित उस की ही बहन का सुहाग है. जिस की ओर देखना भी उचित नहीं है, किंतु मन, उस का क्या, उस पर तो किसी का वश नहीं चलता है.

अंतहीन: क्यों गुंजन ने अपने पिता को छोड़ दिया?

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Father’s Day Special: मुझे पापा कहने का हक है

एक के बाद एक कर अभ्यर्थी आते और जाते रहे. हालांकि चयन कमेटी में उन के अलावा 4 व्यक्ति और भी बैठे थे जो अपनेअपने तरीके से प्रश्न पूछ रहे थे. डा. राजीव बीचबीच में कुछ पूछ लेते वरना तो वह सुन ही रहे थे. अंतिम निर्णय डा. राजीव को ही लेना था.

आखिरी प्रत्याशी के रूप में आसमानी रंग की साड़ी पहने बीना को देख कर डा. राजीव एकदम चौंक पड़े. वही आवाज, वही रंगरूप, कहीं कोई परिवर्तन नहीं. अनायास ही उन के मुंह से निकल गया, ‘‘मधु, तुम?’’

‘‘कौन मधु सर? मैं तो बीना हूं,’’ हलकी सी मुसकराहट के साथ युवती ने उत्तर दिया.

‘‘सौरी,’’ डा. राजीव के मुंह से निकला.

चयन कमेटी के लोगों ने बीना से कई सवाल किए. बीना ने सभी प्रश्नों का शालीनता के साथ उत्तर दिया. सुबह से अब तक के घटनाक्रम ने एकदम नया मोड़ ले लिया. अभी भी डा. राजीव के मन में द्वंद्व था. सलेक्शन तो बीना का ही होना था सो हो गया. वाइस चेयरमैन यही चाहते थे. एक दुविधा से वह उबर गए, दूसरी अभी शेष थी. डा. राजीव खुद को संयत कर बोले, ‘‘बधाई हो बीना, तुम्हारा चयन हो गया है. बी.सी. साहब को खुशखबरी मैं दूं या तुम दोगी?’’

‘‘मुझे ही देने दें सर,’’ और सब को धन्यवाद दे कर बीना बाहर निकल गई. एकएक कर चयन कमेटी के लोग भी चले गए. सब से अंत में डा. राजीव बाहर आए. देखा तो बीना अभी किसी के इंतजार में खड़ी है.

‘‘किसी की प्रतीक्षा है?’’

‘‘आप का ही इंतजार कर रही थी सर.’’

‘‘मेरा क्यों?’’

‘‘आप से कोई वेटिंगरूम में मिलना चाहता है.’’

‘कौन होगा? कोई मुझ से क्यों मिलना चाहता है?’ सोचा उन्होंने, फिर बीना के पीछेपीछे चल दिए. बीना वेटिंगरूम के बाहर ही रुक गई. सामने मधु बैठी थी. अब चौंकने की बारी

डा. राजीव की थी.

‘‘मधु, तुम और यहां?’’

‘‘आप को धन्यवाद जो देना था सर.’’

‘‘लेकिन तुम्हें कैसे मालूम था कि साक्षात्कार मुझ को ही लेना है?’’

‘‘मुझे पता था.’’

‘‘अच्छा, और क्याक्या पता किया?’’

‘‘यही कि आप इलाहाबाद में हैं.’’

‘‘खैर, यह सब छोड़ो, पहले यह बताओ कि तुम इतने दिन कहां रहीं? मैं ने तुम्हें ढूंढ़ने की कितनी कोशिश की. 2 बार आगरा भी गया लेकिन तुम्हारा पता मालूम न होने के कारण कोई जानकारी न हो सकी. घरपरिवार में सब कैसे हैं?’’

‘‘इतनी उत्सुकता ठीक नहीं सर, सारे सवाल एकसाथ अभी पूछ लेंगे. शाम को 4 बजे चाय पर घर आइए. शेष बातें वहीं होंगी,’’ कहते हुए मधु ने एक कागज पर अपना पता लिख कर दे दिया और हाथ जोड़ कर वेटिंगरूम से बाहर निकल आई.

डा. राजीव भ्रमित से, असहाय से मधु और बीना को जाते हुए देखते रहे. कितना कुछ उन के भीतर भरा पड़ा था. मधु के सामने संचित कोष सा उडे़लना चाहते थे लेकिन इस के लिए उन्हें अभी 4 घंटे और इंतजार करना है. कैसे कटेंगे ये 4 घंटे? फिर उन्हें हाथ में पकड़े कागज का ध्यान आया. सेक्टर-सी, कोठी नंबर-18 और वे सेक्टर बी में रहते हैं. दोनों सेक्टर आमनेसामने हैं, लेकिन मधु इस से पहले कभी दिखाई क्यों नहीं दी?

सोचतेसोचते डा. राजीव अपने घर तक आ गए.

आदमी अपनी जिंदगी में कितनी बार जन्म लेता है और कितनी बार उसे मरना पड़ता है, कभी बेमौत, कभी बेवक्त और कभी विवशताजन्य परिस्थितियों के कारण. अपने ही अथक प्रयासों से अथवा आत्मविश्वास के सहारे कितनी बार वह डगमगाने से बचे हैं और तब उन्हें कितनी आत्मिक शांति मिली है. उन्होंने जिंदगी में कभी कोई ऐसा समझौता नहीं किया जिस का बोझ आत्मा सह न पाती. बेदाग, सीधीसपाट, सम्मानजनक स्थिति को जीते हुए अपने विभाग में कार्यरत 25 साल निकल गए.

25 साल…सोचतेसोचते डा. राजीव अचानक चौंक उठे. 25 साल पूरे एक व्यक्तित्व के विकास के लिए कम तो नहीं होते. जाने कितना कुछ बदल जाता है. आदमी कहां से कहां पहुंच जाता है. पर वे जरा भी नहीं बदले. समय के साथसाथ उन के व्यक्तित्व में और भी निखार आया है. विद्वता की चमक चेहरे पर बनी  रहती है. बेदाग चरित्र जो उन का है.

मधु को याद करते ही डा. राजीव 25 साल पीछे लौट गए. इस महाविद्यालय में आने से  पहले वह आगरा के एक डिगरी कालिज में प्राध्यापक के पद पर नियुक्त हुए थे. वह उन की पहली नियुक्ति थी. पहली बार कक्षा में मधु को देखने के बाद बस, देखते रह गए थे. उन के मन को क्या हुआ, वे स्वयं नहीं समझ पाए. गुलाब सा खिला मासूम सौंदर्य, उस पर भी जब नाम मधु सुना तो मन अनजाने, अनचाहे किसी डोर से बंधने सा लगा. तब डा. राजीव ने इसे महज प्रमाद समझा और झटका दे कर इस विचार को निकाल फेंकना चाहा लेकिन वह अपनी इस कोशिश में नाकामयाब रहे. कक्षा में मधु को देख कर दर्शनमात्र से जैसे उन्हें ऊर्जा मिलती. मधु अभी कक्षा में न होती तो उन्हें एक प्रकार की बेचैनी घेर लेती. उस दिन वे सिरदर्द का बहाना बना कर कक्षा छोड़ देते. वे नहीं जानते थे कि जो अनुभव वह कर रहे हैं क्या मधु भी वही अनुभव करती है? वह मधु के बारे में और बहुतकुछ जानना चाहते थे पर किस से जानें? क्या प्राध्यापक हो कर अपनी छात्रा से कुछ पूछना अच्छा लगेगा. दिमाग कहता नहीं और वे वक्त का इंतजार करने लगे.

अब डा. राजीव मधु पर विशेष ध्यान देते. 1-2 बार अपने नोट्स भी उसे दिए. कुछ किताबें लाइब्रेरी से अपने नाम से निकलवाईं. मधु ने साल के अंत में महज धन्यवाद कह दोनों हाथ जोड़ कर किताबें लौटा दीं. डा. राजीव हाथ मलते रह गए. नया सेशन शुरू हुआ. मधु ने फिर दाखिला लिया. अच्छे अंक ला कर परीक्षा पास की थी. अब डा. राजीव मधु पर और भी ध्यान देने लगे.

इस बार एक विशेष बात डा. राजीव नोट कर रहे थे कि सामने आते ही मधु के गाल लाज से आरक्त हो उठते, आंखें झुक जातीं. इस का अर्थ वह क्या लगाएं, समझ ही नहीं पा रहे थे. क्या मधु भी उन्हीं की तरह सोचती है? रहरह कर यह सवाल उन के मन में उठता.

उस दिन कक्षा के बाद स्टाफरूम के पीछे के लौन में अकेले बैठे डा. राजीव दिसंबर की कुनकुनी धूप सेंक रहे थे. कई दिन से तबीयत भी कुछ ढीली चल रही थी. वह रूमाल से बारबार अपनी आंख, नाक पोंछ रहे थे.

‘‘सर, लगता है आप की तबीयत ठीक नहीं है. मैं यह किताब आप को लौटाने आई थी,’’ अचानक मधु की आवाज सुन कर वह चौंक उठे. बस, यंत्रचालित से हाथ आगे बढ़ गए. जैसे ही उन्होंने किताब ले कर सामने मेज पर रखी कि सर्द हवा के झोंके से किताब के पन्ने फड़फड़ाने लगे और उन के बीच से एक ताजा गुलाब का फूल नीचे आ गिरा. एकएक कर उस गुलाब की पंखुडि़यां कुरसी के नीचे बिखर गईं.

मधु जल्दी से नीचे झुकी, तभी डा. राजीव के हाथ भी झुके. दोनों की उंगलियां परस्पर टकरा गईं. फूल की कुछ पंखुडि़यां मधु के हाथ आईं, कुछ डा. राजीव के.

डा. राजीव ने एक भरपूर नजर मधु पर डाली. मधु चुपचाप दुपट्टे के कोने को अपनी उंगली में लपेटती वहां से चली गई.

आज पूरा एक गुलाब उन की मुट्ठी में कैद था. जिस स्पर्श को वे पाना चाहते थे आज वह स्वयं उन के मानस को सहला गया था. उन के विचारों को जैसे पंख लग गए.

डा. राजीव ने खुद इस बात को नोट किया कि मधु कक्षा में उन का व्याख्यान ध्यान से नहीं सुनती, केवल गौर से उन का चेहरा देखती रहती है. उन्हें अपने चेहरे पर हमेशा 2 मासूम प्यारी सी आंखें टकटकी लगाए देखती नजर आतीं. वह जब मधु की ओर देखते तो मधु नजरें झुका लेती मानो चोरी करते वह पकड़ी गई हो.

‘‘क्लास में मन पढ़ाई में लगाया करो.’’

‘‘जी, कोशिश करूंगी.’’

परीक्षा की तारीख निकट आ रही थी. प्रिप्रेशन लीव हो चुकी थी. मधु का कालिज आना बंद हो चुका था. उस दिन 5 मार्च था. मधु पुस्तकालय की पुस्तकें लौटाने आई थी. मधु को स्टाफरूम की तरफ आता देख कर वह वहां से निकल कर एकांत में टहलने लगे. किताबें जमा कर मधु उन की तरफ आई और एक लिफाफा डा. राजीव की ओर बढ़ा कर वापस लौट गई.

डा. राजीव हाथ में लिफाफा थामे लौटती हुई मधु को देखते रहे. कहना तो जाने क्याक्या चाहते थे पर कहने के अवसर पर वाणी अवरुद्ध हो जाती थी. वह केवल एक भक्त और एक पुजारी की तरह दर्शन कर रह जाते. अपने प्यार को याद के सहारे सींच रहे थे.

मधु के जाने के बाद हाथ में थामे लिफाफे का ध्यान आया. खोल कर देखा तो अचंभित रह गए. उन्हें तो खुद ही याद नहीं था कि आज उन का जन्मदिन है. याद भी तब रहता जब कभी मनाया जाता. पर मधु को कैसे मालूम हुआ? तभी उन्हें याद आया कि कालिज मैगजीन में उन का सचित्र परिचय छपा था. वहीं से मधु ने लिया होगा. कार्ड पर एक खिला गुलाब था और गुलाब की एक पंखुड़ी पर एक सूखी पंखुड़ी चिपकी हुई थी.

डा. राजीव ने गौर से देखा, यह तो उसी गुलाब की पंखुड़ी थी जो उस दिन किताब से गिरी थी. उन्होंने उलटपलट कर कार्ड देखा. मधु का पता कहीं भी नहीं लिखा था.

पढ़ाई का अगला सत्र शुरू हो कि उन की नियुक्ति इलाहाबाद विश्व-विद्यालय में हो गई. आगरा छोड़ते समय उन के मन में चाह थी कि एक बार मधु से मिल लेते, लेकिन मधु का पताठिकाना उन्हें मालूम न था.

प्यार का अंकुर विरह की व्यथा में तपने लगा. डा. राजीव को जब भी एकांत मिलता मधु का चेहरा सामने आ जाता. वे जहां कहीं भी खिले गुलाब को देखते, अपने होश खो बैठते. मधु और गुलाब, गुलाब और मधु एकदूसरे में जैसे विलीन हो जाते.

5 मार्च को फिर वैसा ही कार्ड मिला. वही एक सूखी पंखुड़ी, क्या अर्थ है, इस पंखुड़ी का? क्या मधु प्रतीक रूप में कहना चाहती है कि मैं भी ऐसे ही सूख रही हूं अथवा प्रतीक्षा का एक वर्ष पूरा हुआ. कई बार मन हुआ कि दौड़ कर पहुंच जाएं. एक बार मन के हाथों हार कर राजीव आगरा पहुंचे भी पर उन की यह यात्रा निरर्थक रही. मधु ने पढ़ना छोड़ दिया था. क्यों? यह कोई नहीं जानता.

लगातार 6 सालों तक गुलाब के फूल व सूखी पंखुड़ी वाले कार्ड हर 5 मार्च को मिलते रहे. अंतिम कार्ड में महज चंद शब्द लिखे थे, ‘गुलाब का फूल पूरा हो गया होगा. महज इतनी ही पंखुडि़यां तब समेट पाई थी इसलिए पूजा का अधिकार भी इतने ही दिन रहा.’

इस के बाद कोई भी कार्ड नहीं आया. कार्ड पर मधु के नाम व आगरा की मुहर के अलावा डा. राजीव को और कुछ हाथ न लगा. उन्होंने सारी पंखुडि़यां जमा कर के गिनीं तो पूरी 14 थीं. 7 उन के पास 7 मधु के पास. क्या गुलाब के फूल में 14 पंखुडि़यां ही होती हैं?

अचानक एक दिन यों ही डा. राजीव ने एक ताजा गुलाब की पंखुडि़यों को तोड़ कर गिना तो सचमुच 14 ही निकलीं. उन के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा. वह 7 कार्ड और 14 गुलाब की पंखुडि़यां

डा. राजीव के तीर्थस्थल बन गए. जब भी अपनी अलमारी खोलते एक मासूम सी गंध का झोंका उन्हें सहला जाता.

जीवन की यात्रा चलती रही. भावनाओं के अंकुर कर्तव्य के मार्ग में वहीं रुक गए, लेकिन उस के बाद वह अपना जन्मदिन न भूल सके. 5 मार्च को जब भी डाक आती डा. राजीव बड़ी उत्सुकता से एकएक चिट्ठी खोल कर देखते लेकिन जिस का वह इंतजार कर रहे थे वही नहीं मिल रही थी.

मुट्ठी में दबी ताजा गुलाब की पंखुडि़यों को सूंघते हुए अनमने से राजीव अपने निवास पर आ गए. आज पूरा अतीत उन्हें अपने में समेट लेना चाहता था. उन गुलाब की पंखुडि़यों के सहारे 30 साल गुजार दिए पर वह गृहस्थी का सुख न पा सके.

चौंक कर डा. राजीव ने घड़ी पर नजर डाली. 4 बजने में 5 मिनट शेष थे. यानी पूरे 4 घंटे अतीत की वादियों में घूमते रहे. बिस्तर से उठ कर बाथरूम में गए. मुंह धोया और डे्र्रसिंग टेबल के सामने खड़े हो कर बालों में कंघी घुमाई, कपड़े बदले और निकल पड़े. आज गाड़ी नहीं निकाली और निकाल कर भी क्या करते. कौन दूर जाना था उन्हें.

निश्चित स्थान पर पहुंच कर कालबेल बजाई. फौरन दरवाजा खुल गया. मधु ने उन्हें एक बड़े से सुसज्जित ड्राइंगरूम में बैठाया और बोली, ‘‘अब आप अपनी शंकाओं का समाधान कर सकते हैं सर. मैं ही अपने बारे में बता देती हूं. आप शायद भूल रहे हैं कि 25 साल पहले आप के एक साथी थे

डा. सुशांत, जिन का विवाह के एक महीने बाद ही सड़क दुर्घटना में निधन हो गया था. आप यहां नएनए आए थे. परिचय भी कोई खास नहीं था. बीना उन्हीं की बेटी है और यह कोठी भी उन्हीं की है.’’

‘‘इतने पास रह कर भी कभी मिलने की कोशिश तुम ने नहीं की?’’

‘‘क्या कोशिश करती सर? आगरा और इलाहाबाद के बीच घूमती रही. जिसे भुलाना चाहा उसे भुला न सकी और जिस के साथ जिंदगी का सफर तय करना चाहा उस ने एक कदम साथ चल कर हमेशाहमेशा को अकेला छोड़ दिया.’’ दुखी हो उठी मधु. स्वयं को संभाला, हंसने का प्रयास करते हुए पूछा, ‘‘अपनी ही सुनाती रही, आप के बारे में नहीं पूछा, आप का घरपरिवार कैसा है, सर?’’

‘‘घरपरिवार बसा ही नहीं तो होगा कहां से?’’

‘‘मेरे कारण पूरा जीवन आप ने अकेले ही काट दिया,’’ हैरान रह गई मधु.

‘‘तुम से कहने का साहस नहीं हुआ और तुम्हारे अलावा किसी और को चाह न सका. क्या तुम मेरी एक बात मानोगी?’’

‘‘अब इस उम्र में आप क्या मनवाएंगे?’’

‘‘जो बात तब न कह सका, अब कहना चाहता हूं. पहले ही काफी देर हो चुकी है मधु, क्या यह सफर एक खूबसूरत मोड़ ले कर आगे नहीं बढ़ सकता?’’

हाथ में चाय की ट्रे लिए बीना ने ड्राइंगरूम में घुसते हुए कहा, ‘‘बढ़ सकता है अंकल. मैं आप के और मां के सफर को आगे बढ़ाऊंगी,’’ हाथ में पकड़ी चाय की ट्रे को सेंटर टेबल पर रख वह मां के पास आ कर बैठ गई और उन का हाथ अपने हाथ में ले लिया.

‘‘अंकल, मैं ने मां को कितनी ही बार आप का फोटो देखते देखा है. मैं जानती हूं कि मां आप को बहुत प्यार करती हैं. मैं भी पापा के प्यार को तरस रही हूं. जानती ही नहीं कि पापा कैसे होते हैं? बस, उन की तसवीर देखी है. दादी और दादाजी पुत्र शोक में जल्दी ही चल बसे. मैं भी ससुराल चली गई और मां अब बिलकुल अकेली रह गई हैं. आखिर मां को भी तो अपना दुखसुख बांटने वाला कोई चाहिए. आप और मां एक हो कर भी अलगअलग हैं. अब अलग नहीं रहेंगे.’’

‘‘तू जानती है, क्या कह रही है?’’ आंखें झर रही थीं मधु की.

‘‘सच बताना मां, तुम्हें इन आंसुओं की कसम, जो मैं चाहती हूं वह आप नहीं चाहतीं? अंकल, क्या आप को पापा कहने का हक है मुझे?’’ बीना ने दोनों से एक ही लफ्ज में अपना सवाल पूछ दिया.

डा. राजीव ने बीना को अपने कंधे से लगा कर उस का माथा चूम लिया, ‘‘सारी दुनिया की खुशियां आज अचानक मेरी झोली में आ गईं. पहली बार पापा बना हूं. पहली बार बेटी मिली है. मैं मना कर ही नहीं सकता,’’ डा. राजीव कहतेकहते भावविभोर हो उठे.

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