प्राइवेट स्कूलों पर भारी है सराकरी स्कूल!

आमतौर पर समझा यही जाता है कि आईआईटी, मेडिकल कालेजों, इंजीनियङ्क्षरग कालेजों में पढ़ाई के दरवाजे सिर्फ प्राइवेट इंग्लिश मीडियम स्टूडेंट्स के लिए खुली हैं. दिल्ली के सरकारी स्कूलों के 2200 से ज्यादा सरकारी स्कूलों के युवाओं ने नीट, जेईई मेन व जेईई एडवांस एक्जाम क्वालीफाई करके साबित किया है कि स्कूल या मीडिया नहीं स्कूल चलाने बालों की मंशा ज्यादा बड़ा खेल खेलती है.

अरङ्क्षवद केजरीवा की आम आदमी पार्टी जो एक तरफ धर्मभीरू है, भाजपा की छवि लिए घूमती है, दूसर और भाजपा की केंद्र सरकार और उस के  दूत उपराज्यपाल के लगातार दखल से परेशान रहती है, कुछ चाहे और न करे, स्कूलों का ध्यान बहुत कर रही है. सरकारी स्कूलों के एक शहर के इतने सारे युवा इन एक्जाम में पास हो जाएं जिन के लिए अमीर घरों के मांबाप लाखों तो कोङ्क्षचग में खर्च करते हैं, बहुत बड़ी बात है.

यह पक्का साबित करता है कि गरीबी गुरबत और ज्ञान न होना जन्मजात नहीं, पिछले जन्मों के कर्मों का फल नहीं, ऊंचे समाज की साजिश है. एक बहुत बड़ी जनता को गरीबी में ही नहीं मन से भी फटेहाल रख कर ऊंचे लोगों ने अनपढ़ सेवकों की एक पूरी जमात तैयार कर रखी है जो मेहनत करते हैं, क्या करते हैं पर उस में स्विल की कमी है, लिखनेपढऩे की समझ नहीं हैै.

सरकारी स्कूल ही उन के लिए एक सहारा है पर गौ भक्त राज्यों में ऊंची जातियों के टीचर नीची जातियों के छात्रों के पहले दिन से ऊंट फटका कर निकम्मा बना देते हैं कि उन में पढऩे का सारा जोश ठंडा पड़ जाता है और वे या तो गौर रक्षक बन डंडे चलाना शुरू कर देते हैं या कांवड ढोने लगते हैं. केजरीवाल की सरकार के स्कूलों में उन्हें पढऩे की छूट दी, लगातार नतीजों पर नजर रखी. ये लोग चाहे जैसे भी घरों से लाए, पढऩे की तमन्ना थी और जरा सा हाथ पकडऩे वाले मिले नहीं कि सरकारी स्कूलों ने 2000 से ज्यादा को इंजीनियङ्क्षरग और मेडिकल कालेजों की खिड़कियां खोल दीं.्र

यह अपनेआप एक अच्छी बात है और यदि सही मामलों में देश में लोकतंत्र आना है तो जरूरी है कि स्कूली शिक्षा सब के एि एक समान हो, चाहे जिस भी भाषा में हो पर अंग्रेजी में न हो, प्राईवेट कोङ्क्षचग स्कूली शिक्षा के दौरान न हो.

सत्ता में बराबर की भागीदारी चाहिए तो वोटरों को खयाल रखना होगा कि जो पौराणिक तरीके चाहते हैं उन्हें सत्ता में रखे या जो पुराणों में बनाई गई ऊंची खाईयों को पाटने वालों को वोट दें. वोट से पढ़ाई का स्टैंडर्ड बदला जा सकता है. यूपी, मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों को हाल क्या है, इस को दूसरों राज्यों के स्कूलों से मुकाबला कर के देखा जा सकता है कि जयश्रीराम का नारा काम का है. ज्ञानविज्ञान और तर्क का नारा.

ऊंची जाति के लोग गरीबों को मानते है गटर

दलितों, गरीबों, पिछड़ों को ऊंची जातियों के लोग किस तरह से गटर की और गंदे नाले की तरह का मानते हैं, यह एक बहुत ही बेचैन करने वाले वीडियो से समाने आया, मध्यप्रदेश के भारतीय जनता पार्टी केदारनाथ शुक्ला के एक वर्कर परवेश पर आरोप है कि उस ने खुलेआम चुपचाप बैठे एक आदिवासी लडक़े…..करा और उस दौरान आराम से सिगरेट के कश लगाता रहा. यह किस ने वीडियो में कैच कर के जगजाहिर कर दिया, वह असल में सिटिजन जर्नलस्टि अवार्ड का हकदार है क्योंकि आमतौर पर ऊंची जातियों के लोग अक्सर पिछड़ों, दलितों और गरीबों पर ही नहीं, अपनी ही जाति की औरतों को  बेइज्जत करने के लिए करते रहते हैं पर कोई रिकार्ड नहीं रहता.

यह तो नहीं कहा जा सकता कि पार्टी की नीति ऐसी है कि खुलेआम आदिवासियों के इस कदर बेइज्जत किया जाए पर यह पक्का है कि जो सनातन धर्म का नाम ले कर पौराणिक कहानियों में भरोसा ही नहीं करते, कुछ ऐसा सा करने वालों की पूछा करते है और आज सरकारें उन्हें पैसा और सुविधाएं दोनों दे रही हैं.

हमारे धर्म ग्रंथ ऐसी कहानियों से भरे हैं जिस में तरहतरह के श्राप औरतों और नीची जातियों के लोगों को दिए जाते हैं या उन्हें नीचा दिखाने के लिए पाप योनि का हकदार धर्मग्रंथों के हिसाब से माना जाता है, जो पिछड़े और दलित है वे मानते हैं कि उन्होंने पिछले जन्मों में कुछ पाप किए होंगे इसलिए वे इस जन्म में बूढ़े से भी गएबीते हैं. 75 साल के संविधान और 200 साल की पढ़ाई और साइंस की जानकारी भी देश की बड़ी जनता को इस दलदल से निकाल नहीं पाई.

ङ्क्षहदी फिल्म ‘श्री इडियट’ में रैङ्क्षगग के दौरान एक लडक़े का दूसरे नए लडक़े के कमरे के दरवाजे पर भूलना भी इसी सोच का नतीजा है. पुलिस थानों में नीची जातियों के अपराधियों पर अक्सर इस तरह पेशाब करने के किस से छपते रहते हैं.

जो समाज गौमूत्र की पावन मानता हो, उस के मन में कहीं बैठ जाता है कि वह नीची जाति के जने पर पेशाब कर के बड़ा गलत काम नहीं कर रहा. पिछड़ी और निचली जातियों के लोगों को अपने घरों की दीवारों पर पेशाब करना पड़ता है क्योंकि और जगह नहीं होतीं. समाज ने पेशाब को इस तरह का ढांचा बनाया है कि कुछ आदमी जानवरों की तरह अपने ही मलमूत्र में पड़े रहने के आदी हो जाएं.

एक नई, चुनी हुई, साइंस के गुणगान करने वाली, अपने को विश्वगुप्त बनाने वाली सरकार के मुंह पर ही मध्य प्रदेश के सघि जिले का यह वीडियो एक तमाचा है पर जिस बेफ्रिकी से वह भक्त पेशाब करता है, साबित करता है कि एक ताकतवर कौम किस तरह देश के गरीबों की बेइज्जती करना अपना पैदाइशी हक समझती है.

कमजोर होती भाजपा

खेमेबाजी हमारे देश के हर गांव की एक खासियत है. 1000 घरों के गांव में 4.5 खीमे होना आम बात है और जाति, धर्म, काम, पैसे के नाम पर बने ये खेमे एकदूसरे से लड़ते ज्यादा रहते हैं, गांव की देखभाल, आम जगहों को बनवाने, सिक्योरिटी पर कम ध्यान देते है. हर खेमा दूसरे से लड़ता रहता है और दूसरे में सेंध लगाना रहता है कि कैसे उसे कमजोर किया जाए. गांव के भले की सोचने की फुर्सत किसी को नहीं होती.

हमारी राजनीति में यह अर्से से चल रहा है पर 2014 में वादा किया गया था कि भारतीय जनता पार्टी को मिली भारी भरकम जीत के बाद दलबदल खत्म हो जाएगा क्योंकि देश की कट्टर हो चुकी ङ्क्षहदू जनता के बड़े हिस्से ने नरेंद्र मोदी को वोट दिया था.

अफसोस यही है कि 2014 के बाद सुॢखयों नहीं बनती हैं कि भाजपा ने सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल दूसरी पाॢटयों को तोडऩे और अपने में मिलाने में किया और ङ्क्षहदूङ्क्षहदू करते हुए भी उस के हाथ से सत्ता फिसलती नजर आती रही.

उस की वह जनता के पास जा कर नहीं, खेमों में सेंध लगा कर या पुलिस को दूसरे खेमों के सरगनों को परेशान करने में लगाती रही. देश का कल्याण तो हवा हो गया है, पार्टी का कल्याण ही अकेला मकसद बच गया है.

महाराष्ट्र में 2 साल पहले जब पुराने साथी शिवसेना के उद्धव ठाकरे से समझौता नहीं हुआ और शिवसेना ने नेशनल कांग्रेस और इंडियन कांग्रेस के साथ मिल कर सरकार बना ली तो बजाए अगले चुनाव तक इंतजार करने के उस ने खीज में आ कर तीनों पाॢटयों के विधायकों की खरीद शुरू कर दी. पहले एकनाथ ङ्क्षशदे को शिवसेना को तोड़ा और अब एनसीपी के अजीत पंवार को तोड़ कर एक टेढ़ीमेढ़ी ऊंची इमारत बना ली.

ऐसा काम पहले ही वह कर्नाटक व मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों और गोवा, मेघालय, मिजोरम, अरुणांचल में कर चुकी है.

यह साबित करता है भाजपा के खेमे की हवेली चाहे कितनी बड़ी दिखती हो, उस के सामने से गुजरने वाले चाहे चप्पल को बगल में दबा कर और सलाम कर के गुजरते हो, मन में लोगों को कोई भरोसा नहीं है कि खेमेदार कुछ भला करेगा. इसलिए भाजपा के खेमेदारों को लाठी और पैसे के दम पर हमारे खेमों में तोडफ़ोड़ करनी पड़ रही है.

यह भारतीय जनता पार्टी की कमजोरी दिखाती है कि उसे केंद्र में भारी सीटें मिलने के बावजूद राज्यों में दलबदलूओं के सहारे सरकारें चलाना पड़ रहा है. मतलब यह है कि पार्टी को जनता से डर  लगता है जीते हुए विधायकों और सांसदों से नहीं.

महाराष्ट्र में जो हुआ वह वैसे पौराणिक युकों से ङ्क्षहदू राजा करते आए हैं पर हमेशा उन्होंने छल से राज्य किया है. अमृत मंथन में भी दस्युओं को मिला कर देवताओं ने अमृत निकाला पर बजाए बांटने के सारा हड़प गए. यही आज हो रहा है.

देश की गरीबी

इस देश की गरीबी की वजह इस को मुगलों या अंगरेजों का लूटना नहीं है जो आज भी हमारे नेता कहते रहते हैं. असली वजह तो निकम्मापन है और अपना कीमती समय बेमतलब के कामों में बिताना है. खाली बैठे खंभे पर चढ़ना और उतरना ही यहां काम कहा जाता है और यह समाज, घर और सरकार में हर समय दिखता है.

जहां इन में किसी भी नई चीज का पहले शिलान्यास शामिल है और फिर भूमि पूजन, महीनों में बनने वाली चीज में बरसों लगाना और फिर उद्घाटन करना और आखिर में बारबार मरम्मत करने के लिए बंद करना भी शामिल है. 2,000 के 2016 में चालू किए नोट सिर्फ 7 साल में बदलने का हुक्म इसी निकम्मेपन की निशानी है. पूरे देश को 2016 की तरह फिर फिरकनी की तरह घुमा दिया है कि अपने बक्सों को खंगालो कि कहीं कोई 2,000 का मुड़ातुड़ा नोट इधरउधर न पड़ा हो और उसे बदलवाओ.

गनीमत यह अखंड 100 दिन का जागरण थोड़े कम पैमाने पर है. इसलिए नहीं कि सरकार समझदार हो गई है, इसलिए कि नोट कम हैं और काफी महीनों से नोट बैंकों से ही नहीं दिए जा रहे थे. पूरे देश का कितना समय इस पूरे पागलपन में बरबाद होगा, इसे गिनना असंभव है पर यह देश तो वह है जहां एक जेसीबी चलती है तो देखने वाले 100-200 खाली बैठे लोग मिल जाते हैं. यहां बेकार, बेरोजगार, धर्म के नाम पर घंटों वही लाइनें किसी मूर्ति के सामने आंख बंद कर के बैठने वालों के लिए इस समय की कीमत कैसी है, यह जांचना मुश्किल है.

सरकार ने पहले 2,000 के नोट थोपे, जब जरूरत नहीं थे और अब वापस लिए जब यह भी जरूरी नहीं थे. हाल के सालों में करोड़ों की रिश्वतें भी 500 रुपए के नोटों से लीदी जा रही थीं. सोशल मीडिया पर टैक्स अफसरों द्वारा जारी फोटो इस बात का सुबूत हैं कि 500 रुपए के नोटों में रिश्वत का पैसा रखना ही एक परंपरा बन गई थी. अब महीनों तक कई करोड़ नोटों को बेमतलब में घरों से बैंकों तक, बैंकों से वाल्टों तक, वाल्टों से रिजर्व बैंक तक और रिजर्व बैंक में इन्हें संभालने में लोग लगे रहेंगे.

गरीब देश के लोगों के आटे में पानी जबरन डाल दिया गया है कि अब उसे सुखाओ, फिर सड़े को छांटो और फिर दोबारा पीसो. यह सरकार निकम्मी है यह तो मालूम है पर पूरे देश को भी निकम्मा मानती है इस का एक और उदाहरण है. निकम्मों को बेबात में काम पर लगाना इस देश में बहुत आता है और इसी वजह से इस देश का आम आदमी अमेरिकी से  30-32 गुना कम पैसे वाला है. चीनी भी भारतीय से आज 8 गुना अमीर हैं, जबकि 1960 के आसपास दोनों बराबर थे.

यह ऐसे ही नहीं हो रहा. इस के लिए सरकार तरहतरह से मेहनत करती है. सूबों की परीक्षा 2 बार ली जाने लगी है, एक बोर्ड की और एक क्यूट की. पेपर लीक हो गया कह कर बारबार परीक्षा टाली जाती है, फिर दोबारा साल 2 साल में होती है. अदालतों में मामले 10 साल से कम तो चलते ही नहीं. टूटीगंदी सड़कों पर ध्यान तब जाता है जब टैंडर से पैसा निकलवाने की साजिश हो और वहां भी सड़क जो 4 दिन में बननी चाहिए 4 महीने में बनती है, फिर कोई और विभाग तोड़ने आ  जाता है.

निकम्मेपन को थोपने वाली सरकार को बारबार वोट मिलते हैं. पहले कांग्रेस को मिलते रहे, अब भाजपा को मिल रहे हैं. 2,000 के नोटों को वापस लेना निकम्मेपन की पटेल जैसी मूर्ति बनाना है. गुजरात के पटेल जैसी सैकड़ों मूर्तियां देशभर में बन रही हैं. उतनी बड़ी नहीं, पर खासी वही और सब 2,000 के नोटों के बदलने वाली बेमतलब की निकम्मी सोच की निशानी हैं.

किरन रिजिजू : न्यायपालिका मजबूत केंद्र कमजोर

एक कहावत बन गई है -” आर एस एस और भाजपा कभी कच्ची गोटिया नहीं खेलते.” प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी के स्नेह पात्र देश के कानून मंत्री किरण रिजिजू के मामले में देश में यही प्रतिक्रिया आई है कि नरेंद्र दामोदरदास मोदी की सरकार के संपूर्ण कार्यकाल की यह घटना अपने आप में अनोखी और अलग है .

कानून मंत्री के रूप में किरन रिजिजू जिस तरह कुछ ज्यादा सक्रिय थे वह अपने आप में एक इतिहास है. न्यायपालिका से टकराव लेकर उन्होंने जिस तरह भाजपा की नीतियों को आगे बढ़ाया वह तो शाबाशी के लायक था मगर मिल गया दंड!

संपूर्ण घटनाक्रम को देखा जाए तो देश हित में यह अच्छा हुआ है. यह संदेश चला गया है कि न्यायपालिका नरेंद्र दामोदरदास मोदी के शासन में भी सर्वोच्च स्थान रखती है अन्यथा जिस तरह देश के कानून मंत्री के रूप में किरण रिजिजू ने खुलकर घेरा बंदी की थी वह सीधे-सीधे सरकार और न्यायपालिका और केंद्र के टकराव को दर्शाती थी. ऐसा महसूस होता था मानो किरण रिजिजू जो बोल रहे हैं वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सहमति से ही क्योंकि इसी तरह उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ भी बीच-बीच में शिगूफा छोड़ते रहते है . यही कारण है कि एक मामला भी अवमानना का उच्चतम न्यायालय में दर्ज हो कर चल रहा है. ऐसे में अचानक कानून मंत्री को पद से हटाना यह संदेश देता है कि देश की नरेंद्र मोदी सरकार न्यायालय का सम्मान करती है और किसी भी तरह टकराव का संदेश नहीं देना चाहती. यह सकारात्मकता देश के लिए एक अच्छा संदेश लेकर आया है. क्योंकि आर एस एस की भावनाओं को अमलीजामा पहनाने वाली भारतीय जनता पार्टी सरकार ने अगर यू-टर्न लिया है तो यह देश हित में माना जा सकता है. इसके साथ ही हम एक बड़ा यक्ष प्रश्न भी उठाने जा रहे हैं जो आज देश के सामने है नरेंद्र मोदी सरकार जल्दी से बैकफुट पर नहीं जाती अपनी किसी भी गलती को मानने को तैयार नहीं होती अपने विशिष्ट सहयोगी की गलती को भी मानने को तैयार नहीं होती और न ही आसानी से यू टर्न लेती है इसका सबसे ज्वलंत मामला है दिल्ली के जंतर मंतर में बैठी महिला पहलवान बेटियों का जो कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष और सांसद बृजभूषण सिंह का इस्तीफा और कार्रवाई के लिए लंबे समय से आंदोलनरत हैं मगर केंद्र सरकार मानो आंखें मूंदकर बैठी हुई है. ऐसे में किरण रिजिजू का कानून मंत्री से इस्तीफा लेकर मंत्रालय बदल देना एक बड़ी घटना है जो संकेत देती है कि अगर नरेंद्र दामोदरदास मोदी ऐसा नहीं करते तो आने वाले समय में मुसीबत बढ़ जाती और नरेंद्र मोदी सरकार को जवाब देना भी मुश्किल पड़ जाता.

केंद्र का यूं टर्न और देश हित

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने अप्रत्याशित रूप से बड़ा बदलाव करते हुए किरेन रिजिजू से कानून मंत्रालय वापस ले लिया. उनकी जगह अब अर्जुन राम मेघवाल को कानून मंत्रालय का जिम्मा दिया गया है.

दरअसल,अब यह कहा जा रहा है यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने में देरी, न्यायपालिका से सार्वजनिक टकराव ऐसी कई चीजें थीं, जिसे लेकर प्रधानमंत्री उनके लिए नाराज थे. केंद्र सरकार कॉमन सिविल कोड को लेकर गंभीर है. इसे लेकर कई बैठकें भी हो चुकी हैं. बीजेपी शासित राज्यों में इसे लागू भी किया जा रहा है. इस कानून को देशव्यापी लागू करने का जिम्मा कानून मंत्रालय को सौंपा गया था जिसमें लगातार देरी हो रही थी. माना जा रहा है कि इस बात को लेकर प्रधानमंत्री काफी नाराज थे. यही नाराजगी किरन रिजिजू को भुगतना पड़ी.

कहा जा जा रहा है कि न्यायपालिका और कानून मंत्री के बीच सार्वजनिक टकराव और क़ानून मंत्री के न्यायपालिका को लेकर दिये गए बयानों से सरकार में “उच्च स्तर” पर नाराजगी थी. सरकार नहीं चाहती थी कि न्यायपालिका के साथ टकराव सार्वजनिक रूप से दिखे. मगर यह भी सच है कि इसे बहुत पहले ही नरेंद्र मोदी सरकार को रोक देना चाहिए था.

दरअसल, तकरीबन डेढ़ महीने पहले कानून मंत्री के न्याय पालिका को लेकर दिए गए एक सार्वजनिक बयान ने “सरकार” को नाराज कर दिया . तब ही तय हो गया था कि किरण रिजिजू को कानून मंत्रालय से हटाया जाएगा, लेकिन कर्नाटक चुनाव को वजह से रिजिजू को कुछ दिनों का जीवन दान मिल गया था.
15 दिन पहले ये तय हो गया था कि कर्नाटक चुनाव के बाद किरण रिजिजू से कानून मंत्रालय ले लिए जाएगा. अब, रिजिजू को भू-विज्ञान मंत्रालय दिया गया है. अब कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि कानून मंत्री के रूप में किरण रिजिजू ने जो क्षति पहुंचाने का काम किया है उसके बरक्स उन्हें कोई भी दूसरा मंत्रालय नहीं दिया जाना चाहिए था. जिससे यह संदेश जाता कि देश की सर्वोच्च न्यायपालिका के खिलाफ बुलंदी के साथ कानून मंत्री के रूप में प्रदर्शन करने वाले किरण रिजिजू को दंड मिला है. कपिल सिब्बल से लेकर की अनेक कानून विदो ने किरण रिजिजू की आलोचना की है जो जायज कही जाएगी. मगर हमारा सवाल यह है कि कानून मंत्री का पद तो ले लिया गया मकर उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का क्या होगा. क्या सरकार उन पर भी कोई एक्शन ले सकने की स्थिति में है.

कर्नाटक में रिजर्वेशन एक अहम मुद्दा

रिजर्वेशन से पहले दलितों का और बाद में ओवीसी कास्यों का हाल सुथरा हो ऐसा नहीं है पर फिर भी जो थोड़ी भी सीटें उन जातियों की मिली. इन जातियों को हमारे पौराणिक ग्रंथ बारबार पाप का फल कहते रहते हैं और यही ङ्क्षहदू सोच की जड़ में है कि ये खुद अपनी बुरी हालत के लिए जिम्मेदार हैं. हालत तो यह है कि सदियों की पढ़ाई पट्टी की वजह से पिछड़ी व अछूत जातियां खुद को दोषी मान कर जोरशोर से पूजापाठ करती है ताकि अगले जन्म में वे इस जंजाल में न फंसे.

इस रिजर्वेशन के बावजूद ऊंची जातियां आज भी देश, समाज, सरकारी, व्यापारों, पढ़ाई, सेना, शासन, पुलिस, सेना में सब से ऊंचे स्थान पर बैठी है. दिक्कत यह है कि कहने को ये लोग पढ़ेलिखे हैं, मेरिट वाले हैं पर यही ऐसा भारत बना रहे हैं जो हर पैमाने पर ओवीसी देशों से भी गया गुजरा है.

कर्नाटक के चुनावों में रिजर्वेशन एक बड़ा मुद्दा रहा है क्योंकि मुसलमानों को मिलने वाला 4′ रिजर्वेशन हटा कर भारतीय जनता पार्टी कट्टर ङ्क्षहदू वोटरों को कह रही है कि लो तुम्हारे लिए 2 पुष्पक विमान उतार दिया है. उन्हें भरोसा दिलाया जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी को वोट करते रहो तो बाकि 50′ रिजर्वेशन भी एक न एक दिन खत्म हो जाएगा और पौराणिक आदेश की जन्म के हिसाब से ही पद मिलेंगे, ऊंचे घरों वाले खुद ब खुद ऋषिमुनि बन जाएंगे, राजाओं के पुत्र राजा बन जाएंगे और दासों के पुत्र दास रह जाएंगे और सब की औरतें पापों की गठरियों की तरह मानी जाती रहेंगी.

अगर मेरिट वाले 50′ लोगों ने कुछ किया होता तो यह देश हर पैमाने पर पिछड़ा न होता. आगे उन्होंने कुछ किया होा तो देश के 2 बड़े शहर दिल्ली और मुंबई झुग्गीझोपडिय़ों के यहां नहीं होते जहां न पानी है, न सीवर न वर्षा से बचाव, न गरर्मी की तड़प से बचाव.

अगर मेरिट से आए 50′ लोगों ने सरकार चलाते हुए ढंग से देश चलाया होता तो लाखों भारतीयों को भाग कर दूसरे देशों में जाना नहीं पड़ता. हालत तो यह है कि भूख और बेकारी के कारण भारत के लोग अफ्रीका के गरीबों में गरीब देश सूडान तक पहुंचा रहे हैं कि 2 रोटी का इंतजाम हो सके और आजकल सूडान के लोगों की आपसी लड़ाई में फंसे हुए हैं.

मेरिट की दुहाई की वजह से देश का मीडिया गोदी मीडिया बन कर मोदी मीडिया बना हुआ है. गोदी मीडिया को ङ्क्षहदूमुसलिम, मोदी वाह, भाजपा वाह इसलिए करना अच्छा लगता है कि शायद इस तरह वे रिजर्वेशन को खत्म कर सकें. गोदी मीडिया, चाहे टीवी वाला हो या ङ्क्षप्रट वाला कभी पिछड़ों, दलितों और मुसलमानों व सिखों के नेताओं की बात नहीं करता क्योंकि वे सब रिजर्वेशन को सही मानते हैं.

रिजर्वेशन के बावजूद जनरल कर वालों के 50′ से ज्यादा पदों पर बैठे लोग में जनरल कास्ट की आधी औरतें क्यों नहीं है. क्यों उन्होंने अपनी ही कास्ट की औरतों को मौका नहीं दिया. वे इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी, ममता बैनर्जी, जयललिता, मायावती अपने बलबूते पर कुछ बनीं पर सरकारी पदों पर औरतों की गिनती न के बराबर है क्यों.

जो लोग मेरिट की दुहाई देते हैं वे अपने ही घरों की औरतों को जब बरावर का मौका, बरावर की इज्जत नहीं दे सकते वे भला कैसे पिछड़े शूद्रों और दलित अछूतों को ओबीसी व एएसी कोर्ट की जगह दे सकते हैं.

रिजर्वेशन पाने के बाद कुछ का हाल सुथरा पर उन के हाथ इतने बंधे हैं और रिजर्वेशन पा कर कुछ बने अपने को इतना हन समझते हैं कि वे अपने लोगों के लिए कुछ करते दिखना भी नहीं चाहते. रामनाथ कोङ्क्षवद हो, द्रौपदी मुर्मू, के.आर. नारायण, ये एक पूजापाठी रहे हैं और वर्ण व्यवस्था को मानने वाले जो दूसरे दलिलों पिछड़ों आदिवासियों के लिए कुछ भी करने को तैयार नहीं रहे या हैं. इसी वजह से रिजर्वेशन के बावजूद व दलितों, पिछड़ों का हाल सुधरा है न देश का.

हकीकत: आदिवासी को गरीब रखने की चाल

9अप्रैल, 2023 की सुबह मैं अपने एक ठेकेदार दोस्त के साथ भोपाल के अशोका गार्डन इलाके के चौराहे पर था. यह चौराहा मजदूरों के लिए मशहूर है. सुबह 7 बजे से मजदूर यहां जमा होने लगते हैं और 8-9 बजे तक पूरे इलाके में वही नजर आते हैं. कुछ झुंड बना कर खड़े रहते हैं, तो कुछ अकेले अलगथलग, जिस से आने वालों की नजर उन पर जल्दी पड़ सके.

ठेकेदार साहब मुझे समझाते रहे कि देखो, अभी ये लोग 500 रुपए मजदूरी दिनभर की मांगेंगे, लेकिन जैसे ही 10 बज जाएंगे, इन के भाव कम होते चले जाएंगे.

ठेकेदार को अपनी साइट पर काम करने के लिए 4-5 मजदूर चाहिए थे, लेकिन उन की निगाहें लगता था कि खास किस्म के मजदूरों को ढूंढ़ रही थीं. पूछने पर उन्होंने बताया कि वे आदिवासी मजदूरों को खोज रहे हैं, क्योंकि वे बहुत मजबूत, मेहनती और ईमानदार होते हैं. शहरी मजदूरों की तरह निकम्मे और चालाक नहीं होते, जिन्हें हर 2 घंटे बाद खानेपीने के लिए एक ब्रेक चाहिए. कभी उन्हें हाजत होने लगती है, तो कभी बीड़ीसिगरेट की तलब लग आती है. लंच भी वे लोग

2 घंटे तक करते रहते हैं. कुल जमा सार यह है कि शहरी मजदूरों से काम करा पाना आसान काम नहीं, क्योंकि वे कामचोर होते हैं.

फिर आदिवासी मजदूरों की खूबियां गिनाते हुए ठेकेदार बताने लगे कि वे कामचोरी नहीं करते और 200 रुपए की दिहाड़ी पर काम करने को तैयार हो जाते हैं, जबकि शहरी मजदूर 400 रुपए से कम में हाथ भी नहीं रखने देते.

आदिवासी मजदूर को शाम को घर जाने के समय चायसमोसा खिला कर एक घंटे और काम कराया जा सकता है. और तो और लंच में उन्हें अचार और कटी प्याज के साथ सूखी रोटियां दे दो, तो वे एहसान मानते हुए मुफ्त में ऐक्स्ट्रा काम भी कर देते हैं.

इन ठेकेदार साहब की बातों और चौराहे का माहौल देख साफ हो गया कि आदिवासी वाकई में सीधे होते हैं और दुनियादारी से न के बराबर वाकिफ हैं. 400 रुपए का काम वे 200 रुपए में करने को तैयार हो जाते हैं, तो यह उन की मजबूरी भी है और जरूरत भी.

किराए की झुग्गी में रह रहे ऐसे ही एक गोंड आदिवासी परिवार से बात करने पर पता चला कि वे लोग बालाघाट से भोपाल काम की तलाश में आए थे और 6 महीने से बिल्डरों के यहां मजदूरी कर रहे हैं, लेकिन नकद जमापूंजी के नाम पर कुल 800 रुपए हैं.

पूछने पर 35 साल के जनकलाल धुर्वे ने बताया, ‘‘हम पतिपत्नी और विधवा मां मजदूरी करते हैं. मुझे रोज 300 और उन दोनों को 200-200 रुपए मिलते हैं. इन पैसों से जैसेतैसे गुजर हो जाती है, लेकिन पैसे बचते नहीं हैं. मेरे 2 बच्चे भी हैं, लेकिन स्कूल नहीं जाते, क्योंकि यहां कोई दाखिला देने को तैयार नहीं है.

‘‘हर स्कूल में बर्थ सर्टिफिकेट और आधारकार्ड और पक्का पता वगैरह मांगा जाता है. आधारकार्ड तो हमारे पास है, लेकिन दूसरे जरूरी कागजात नहीं हैं, जिस के चलते सरकारी स्कूल वाले यह कहते हुए टरका देते हैं कि वहीं बालाघाट जा कर बच्चों का एडमिशन किसी सरकारी स्कूल में करा दो.’’

लेकिन जनकलाल धुर्वे गांव वापस नहीं जाना चाहता, क्योंकि वहां काम ही नहीं है. और जो है भी, वह तकरीबन बेगार वाला है. दिनभर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद मुश्किल से 100 रुपए मिलते हैं. कभीकभार सरकारी योजना के तहत मुफ्त राशन मिल जाता है, पर उस का कोई ठिकाना नहीं और उस से हफ्तेभर ही पेट भरा जा सकता है.

इसलिए गरीब हैं

आदिवासियों के पास पैसा क्यों नहीं है और वे गरीब क्यों हैं? यह सवाल सदियों से पूछा जा रहा है, जिस का जवाब जनकलाल धुर्वे जैसे आदिवासियों की कहानी में मिलता है कि ये लोग पढ़ेलिखे नहीं हैं, जागरूक नहीं हैं, जरूरत के मारे हैं. और भी कई वजहें हैं, जिन के चलते इस तबके की माली हालत आजादी के 75 साल बाद भी बद से बदतर हुई है.

भोपाल के एक आदिवासी होस्टल में रह कर बीकौम के पहले साल की पढ़ाई कर रहे बैतूल के प्रभात कुमरे की मानें, तो आदिवासी बहुल इलाकों में शोषण बहुत है, लेकिन उस से निबटना कैसे है, यह कोई नहीं बताता.

हम आदिवासियों को ले कर खूब हल्ला मचता है, करोड़ों की योजनाएं बनती हैं, सरकार उन का खूब ढिंढोरा भी पीटती है, पर हकीकत में होताजाता कुछ नहीं है. आदिवासी तबका पहले से ज्यादा गरीब होता जा रहा है, क्योंकि उस के खर्चे बढ़ते जा रहे हैं और आमदनी कम हो रही है.

प्रभात कुमरे बहुत सी बातें बताते हुए आखिर में यही कहता है कि जो आदिवासी पढ़लिख कर सरकारी नौकरियों में लग गए हैं, वे ही चैन और सुकून से रह पा रहे हैं और उन्हीं के बच्चे अच्छा पढ़लिख पा रहे हैं. ऐसे लोग भी नौकरी मिलने के बाद अपने समाज की गरीबी दूर करने की कोई कोशिश या पहल नहीं करते हैं.

प्रभात कुमरे के मजदूर पिता जैसेतैसे उसे पढ़ा पा रहे हैं, क्योंकि उन के पास 2 एकड़ जमीन भी है. प्रभात कालेज पूरा करने के बाद किसी भी सरकारी महकमे में क्लर्क बन जाना चाहता है और यह आरक्षण के चलते उसे मुमकिन लगता है. इतने गरीब हैं

जनकलाल धुर्वे और प्रभात कुमरे की बातों से एक बात यह भी साफ हो जाती है कि पैसा गांवों में भी है और शहरों में भी है, लेकिन वह कम से

कम आदिवासियों के लिए तो बिलकुल नहीं है.

आदिवासियों के पास खेतीकिसानी की जमीन न के बराबर है और जो है, कागजों में वे उस के मालिक नहीं हैं. जिन जमीनों के पट्टे सरकारों ने आदिवासियों को दिए हैं, उन का रकबा इतना नहीं है कि वे आम किसानों की तरह उस से गुजर कर सकें.

मध्य प्रदेश में सब से ज्यादा कुल आबादी के 21 फीसदी आदिवासी हैं, जो तादाद में एक करोड़, 53 लाख के आसपास हैं. इस लिहाज से राज्य का हर 5वां आदमी आदिवासी है.

इन में से 85 फीसदी के आसपास खेतिहर मजदूर हैं, जो जंगलों में रह कर रोज कुआं खोद कर पानी पीने को मजबूर हैं. इन की आमदनी जान कर हैरत होती है कि इतने कम पैसों में ये गुजर कैसे कर लेते हैं.

कोई अगर यह सोचे कि भला धर्म, जाति और लिंग का आमदनी से क्या ताल्लुक, तो उसे एक रिपोर्ट पढ़ कर अपनी यह गलतफहमी दूर कर लेनी चाहिए.

दुनियाभर से भेदभाव दूर करने का बीड़ा उठाने वाली संस्था ‘औक्सफेम इंडिया’ की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, सवर्णों की मासिक आमदनी एससी यानी दलित और एसटी यानी आदिवासियों से औसतन 5,000 रुपए ज्यादा है.

इस रिपोर्ट के मुताबिक, शहरों में एससी और एसटी तबकों की नियमित कर्मचारियों की औसत कमाई 15,312 रुपए है, जबकि सामान्य तबके के लोगों की कमाई 20,346 रुपए है. यह फर्क तकरीबन 33 फीसदी है.

अगर दलित और आदिवासी अपना खुद का काम करते हैं, तो उन की औसत कमाई 10,533 रुपए रह जाती है, जबकि खुद का काम करने वाले सामान्य तबके के लोगों की कमाई उन से एकतिहाई ज्यादा यानी 15,878 रुपए महीना होती है.

यह रिपोर्ट उन दावों की कलई भी खोलती है, जिन के हल्ले के तहत यह माना जाता है कि आदिवासियों को तो सरकार मुफ्त के ब्याज पर खूब कर्ज देती है, जबकि रिपोर्ट खुलासा करती है कि खेतिहर मजदूर होने के बाद भी आदिवासियों को खेतीकिसानी का लोन आसानी से नहीं मिलता और जिन्हें जैसेतैसे मिल भी जाता है, तो वह सामान्य तबके के लोगों के मुकाबले एकचौथाई होता है.

ज्यादातर आदिवासियों के पास चूंकि जमीन के पक्के और पुख्ता कागज नहीं होते, इसलिए उन्हें सरकारी योजनाओं का फायदा भी नहीं मिल पाता. ‘कर्जमाफी’ या ‘किसान सम्मान निधि’ के हकदार ये लोग नहीं हो पाते.

पीढि़यों से वनोपज बीनबीन कर बेचने वाले आदिवासी अपनी मेहनत के वाजिब दाम कभी नहीं ले पाए. जो महुआ, चिरौंजी और तेंदूपत्ता ये लोग बीनते हैं, उस की बाजार में कीमत अगर एक रुपया होती है, तो इन्हें 15 पैसे ही मिलते हैं यानी दलाली सरकारी ही नहीं, बल्कि गैरसरकारी तौर पर भी इन की कंगाली की बड़ी वजह है. दूसरे, शराब की लत की भी कीमत आदिवासी चुका रहे हैं, जो इन से छूटती नहीं.

ऊपर बैठे हैं ऊंची जाति वाले

हकदार तो बहुत सी योजनाओं के लिए आदिवासी इसलिए भी नहीं हो पाते, क्योंकि नीचे से ले कर ऊपर तक इन से ताल्लुक रखते महकमों में वे ऊंची जाति वाले हिंदू विराजमान हैं, जो हमेशा से इन्हें हिकारत और नफरत से देखते आए हैं.

धर्म और समाज दोनों आदिवासियों को जानवरों से ज्यादा कुछ नहीं समझते. इन की बदहाली की वजह पिछले जन्म के कर्म माने जाते हैं, इसलिए ये ऊपर वाले और ऊपर वालों की ज्यादती के शिकार हमेशा से ही रहे हैं.

पटवारी से कलक्टर और उस से भी ऊपर के ओहदों पर सवर्ण अफसरों का दबदबा है. मिसाल मध्य प्रदेश की लें,

तो आदिवासी वित्त एवं विकास निगम में प्रबंध संचालक जैसे अहम पद पर 25 सालों से ज्यादातर सवर्ण और उन में भी ब्राह्मण अफसर काबिज हैं, जिन की दिलचस्पी आदिवासियों के न तो वित्त में है और न ही हित में है.

इन अफसरों को न तो जनकलाल धुर्वे जैसों को कम मिल रही मजदूरी से मतलब है और न ही ये प्रभात जैसे नौजवानों से कोई सरोकार रखते हैं, जिन्हें कभीकभी फीस भरने और खानेपीने तक के लाले पड़ जाते हैं.

इन अफसरों ने आदिवासियों की जिंदगी भी नजदीक से नहीं देखी होगी कि वे एकएक कागज के लिए दरदर सालोंसाल भटकते रहते हैं, लेकिन उन की कहीं भी सुनवाई नहीं होती.

रही बात आदिवासियों से ताल्लुक रखते महकमों की, तो हाल यह है कि घूसखोर मुलाजिम इन गरीबों का खून चूसने में खटमलों की तरह चूकते नहीं.

11 अप्रैल, 2023 को मध्य प्रदेश के ही रतलाम जिले के गांव भूतपाड़ा में एक पटवारी सोनिया चौहान ने रमेश नाम के एक आदिवासी को फर्जी पावती टिका दी और हैरत की बात यह कि उस के भी बतौर घूस एक लाख, 90 हजार रुपए झटक लिए.

कैसे सीधेसादे आदिवासी सरकारी सिस्टम, जिस पर सवर्णों का कब्जा है, की मार झेल रहे हैं और कैसे देशभर में सरकारी जमीनों को प्राइवेट करने का फर्जीवाड़ा फलफूल रहा है, यह इस मामले से भी उजागर होता है.

रमेश जब जमीन के खाते और खसरे की नकल लेने तहसील पहुंचा तो पता चला कि जो जमीन उस के नाम दर्ज की गई है, वह तो सरकारी निकल रही है. उस की शिकायत पर पटवारी साहिबा के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गई है, जिस ने किस्तों में घूस लेने के अलावा रमेश से अपने घर मेहनतमजदूरी भी कराई थी.

प्रभात कुमरे की कही बात मानें, तो आदिवासियों के ज्यादातर काम सरकारी महकमों से ही होते हैं. लेकिन मजाल है कि ये बाबू और साहब लोग बिना रिश्वत लिए कोई काम कर दें. जाति प्रमाणपत्र बनवाने से ले कर किसी भी सरकारी योजना का फायदा बिना दक्षिणा चढ़ाए नहीं मिलता.

अशिक्षा है वजह

आदिवासी वित्त एवं विकास निगम के ही एक ऊंची जाति वाले क्लर्क की मानें, तो आदिवासी जब तक अशिक्षित रहेंगे, तब तक गरीब ही रहेंगे, क्योंकि वे अपने हक ही नहीं जानते, इसलिए कहीं भी ज्यादती का विरोध नहीं कर पाते. सरकार इन के भले की योजनाओं पर जो अरबों रुपए खर्च कर रही है, उस का

90 फीसदी तो घोटालों और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है. यहां यानी भोपाल से सरकार अगर पोल्ट्री फार्म उन्हें भेजती है, तो उन तक एक अंडा ही पहुंचता है और यह हकीकत नीचे से ऊपर तक सभी जानते हैं. मतलब, योजनाएं आदिवासियों के भले के लिए नहीं, बल्कि नेताओं, अफसरों और मुलाजिमों के कल्याण के लिए बनती हैं. अनपढ़ और अशिक्षित रहने से नुकसान क्या होते हैं, यह आदिवासियों को समझाने वाला कोई नहीं है, जिन के 99 फीसदी से भी ज्यादा नौजवान कालेज का मुंह नहीं देख पाते.

प्राइमरी स्कूलों में टीचरों का न जाना अब मीडिया के लिए भी हल्ला मचाने की बात नहीं रही, क्योंकि उन्होंने भी धर्म के शातिर ठेकेदारों की तरह मान लिया है कि आदिवासी ऐसे ही थे और ऐसे ही रहेंगे, इन के लिए आंसू बहाने से कोई फायदा नहीं.

उत्तर प्रदेश: पुजारी बन गए सरकारी अफसर

साल 2024 के लोकसभा चुनाव का प्रचार अभियान उत्तर प्रदेश में शुरू हो चुका है. भारतीय जनता पार्टी की केंद्र में मोदी सरकार को तकरीबन 10 साल और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को 6 साल पूरे हो चुके हैं. इस के बाद भी चुनाव में वह पार्टी राम के नाम के सहारे ही जाना चाहती है.

इसी के तहत चैत्र महीने के नवरात्र में उत्तर प्रदेश सरकार ने अयोध्या में राम जन्मोत्सव मनाने का काम किया और पूरे नवरात्र प्रदेशभर में धार्मिक आयोजन हुए. इन आयोजनों का मकसद केवल जनता का ध्यान अपराध, महंगाई, बेरोजगारी जैसे गंभीर मुद्दों से हटाने का था.

उत्तर प्रदेश में विकास के नाम पर टूटी सड़कें हैं, जिन को ले कर भारतीय जनता पार्टी के विधायक योगेश शुक्ला ने ही अपनी शिकायत दर्ज कराई थी. ऐसे तमाम बड़े मुद्दों पर लोगों का ध्यान न जाए, इस वजह से ही पूजापाठ का सहारा लिया गया.

जिन जिलाधिकारियों को जिले के विकास और कानून व्यवस्था का काम देखना था, वे मंदिरों में पूजापाठ की व्यवस्था देखने का काम करते रहे. पूजापाठ के लिए वे गाने वालों और देवीदेवताओं का रूप धरने वालों को तलाश करते रहे. यही नहीं, संस्कृति विभाग के अफसरों समेत तमाम दूसरे अफसर इस की देखरेख में लगे रहे. ‘रामचरितमानस’ का विरोध करने वाली समाजवादी पार्टी इस पर खामोश रही और कांग्रेस की आवाज नक्कारखाने में तूती की तरह साबित हुई.

डीएम साहब के हवाले इंतजाम

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को ‘पूजापाठ वाली सरकार’ कहा जाता है. उन के तमाम फैसले इसी तरह के होते हैं. कांवड़ यात्रा के दौरान यात्रियों पर हैलीकौप्टर से फूल बरसाने, सड़कों की धुलाई करने के साथसाथ अयोध्या में हर साल दीवाली के समय दीपोत्सव करना उस का साल दर साल रिकौर्ड बनाना खासतौर पर याद किया जाता है. इस सिलसिले में नया काम नवरात्र के दिनों में जिला लैवल पर ‘रामायण पाठ’ और ‘दुर्गापाठ’ कराना जुड़ गया.

योगी सरकार ने नवरात्र में देवी मंदिरों में दुर्गा सप्तशती और रामनवमी पर अखंड रामायण पाठ का आयोजन कराने का आदेश दिया. सरकार ने प्रदेश के हर जिले में जिला, तहसील और ब्लौक स्तरीय समितियों का गठन कर के नवरात्र में देवी मंदिरों में दुर्गा सप्तशती और रामनवमी पर अखंड रामायण पाठ का आयोजन किया.

योगी सरकार ने चैत्र नवरात्र और रामनवमी पर प्रदेश के देवी मंदिरों और शक्तिपीठों में 22 मार्च से 30 मार्च तक दुर्गा सप्तशती का पाठ और देवी गायन जागरण के कार्यक्रम आयोजित किए. इन कार्यक्रमों में महिलाओं और बालिकाओं को खासतौर से जोड़ा गया.

संस्कृति विभाग ने उठाया जिम्मा

प्रमुख सचिव, संस्कृति, मुकेश कुमार मेश्राम की ओर से इस बारे में सभी मंडलायुक्तों और जिलाधिकारियों को शासनादेश जारी किया गया था. इस आयोजन के लिए हर जिले में जिला, तहसील और ब्लौक स्तरीय समितियों का गठन किया गया.

इन कार्यक्रमों को पेश करने वाले कलाकारों के मानदेय भुगतान के लिए संस्कृति विभाग ने हर जिले को जिला पर्यटन एवं सांस्कृतिक परिषद की ओर से एक लाख रुपए की धनराशि मुहैया कराई गई. आयोजन की दूसरी व्यवस्थाएं कराने के लिए जिला प्रशासन को कहा गया.

सभी कार्यक्रम दुर्गा की महिमा के अनुरूप आयोजित कराए जाने का निर्देश दिया गया था. हर जिले में चयनित देवी मंदिरों और शक्तिपीठों में होने वाले कार्यक्रमों के लिए कलाकारों का चयन जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित समिति ने किया, जिस का समन्वय संस्कृति और सूचना एवं जनसंपर्क विभागों द्वारा किया गया. इन कार्यक्रमों में स्थानीय जनप्रतिनिधियों को भी शामिल होने के लिए कहा गया.

शक्तिपीठों और देवी मंदिरों में पर्यटन व अन्य विभागों द्वारा कराए गए विकास कार्यों का सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के माध्यम से प्रिंट व इंटरनैट मीडिया पर प्रचारप्रसार किया गया.

सभी देवी मंदिरों के प्रांगण में होर्डिंगें भी लगाई गईं. हर आयोजन स्थल पर सफाई, पेयजल, सुरक्षा, ध्वनि, प्रकाश और दरी बिछावन आदि की व्यवस्था जिला प्रशासन ने कराई. सभी आयोजन स्थलों पर सक्षम स्तर से अनापत्ति प्रमाणपत्र प्राप्त करते हुए कार्यक्रमों का आयोजन भी तय किया गया.

प्रदेश स्तरीय इस कार्यक्रम में समन्वय के लिए शासन और निदेशालय स्तर से एकएक अधिकारियों को नोडल अधिकारी भी नामित किए गए थे.

इस के साथ ही साथ यह भी निर्देश था कि महत्त्वपूर्ण देवी मंदिरों और शक्तिपीठों का चयन करते हुए मंदिर का पता, फोटो, जीपीएस लोकेशन और मंदिर प्रबंधक का संपर्क नंबर, कलाकारों के नाम, पते व मोबाइल नंबर समेत कार्यक्रम के आयोजन की पूरी तैयारियों का ब्योरा 21 मार्च की शाम तक संस्कृति विभाग को भेज दिया गया. सभी जिलों में होने वाले कार्यक्रमों की सूचनाएं भी प्रतिदिन जिल नोडल अधिकारी की ओर से संस्कृति विभाग के पोर्टल पर अपडेट करने को कहा गया.

  समाजवादी पार्टी खामोश

योगी सरकार के इस कदम पर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ट्वीट कर के कहा कि ‘रामनवमी मनाने के लिए जिलाधिकारियों को एक लाख रुपए दिए जाने के प्रस्ताव का स्वागत है, पर इतनी रकम से क्या होगा, कम से कम 10 करोड़ रुपए देने चाहिए, जिस से सभी धर्मों के त्योहारों को मनाया जा सके.’

उन्होंने भाजपा सरकार से मांग की थी कि ‘वह त्योहारों पर रसोई गैस के मुफ्त सिलैंडर दे और इस की शुरुआत रामनवमी से हो.’

  कांग्रेस ने उठाए सवाल

कांग्रेस के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष ब्रजलाल खाबरी ने कहा कि ‘योगी और भाजपा सरकार महंगाई, बेरोजगारी, अडाणी और अंबानी के सवालों से लोगों का ध्यान हटाने के लिए इस तरह के आयोजन कर रही है. अब जनता इन के सच को समझ चुकी है. ये लोगों का ध्यान भटकाने और आवाज को दबाने का काम कर रहे हैं.

‘जनता लोकसभा के चुनाव में इस का जवाब देगी. हम जब भी विरोध प्रदर्शन करते हैं, हमें पुलिस का डर दिखाया जाता है. यह लोकतंत्र में अधिकारों का हनन है.’

नशे से छुटकारा दिलाने के नाम पर देशभर में खुली दुकानें

नशे से छुटकारा दिलाने के नाम पर देशभर में नशा छुटकारा दुकानेें कुकुरमुत्तों की तरह उगने लगी हैं. दीवारों पर अब पोस्टर, पेंङ्क्षटग, लिखाई दिखने लगी हैं. जिन में नशे से छुटकारा दिलाने के लिए फोन नंबर लिखे होते हैं. नशेडिय़ों के घर वाले घर में नशा करने वाले से इस कदर परेशान रहते हैं कि  वे उन से छुटकारा पाने के लिए इन को मिलते हैं और जैसे भी हो, पैसा दे कर अपने घर के नशेड़ी को ठीक करने के लिए सौंप देते हैं.

अब पता चल रहा है कि इन में से ज्यादातर सिर्फ नीमहकीम होते हैं जिन्हें नशे की वजह और इलाज के बारे में कुछ नहीं मालूम होता और आमतौर पर सिर्फ अपने क्लिनिक को जेल की तरह अपडेट करते हैं जहां नशेड़ी को बांध कर रखा जाता है और उस के चीखनेचिल्लाने के बाद उसे मारपीट कर सुधारा जाता है. इस दौरान नशेड़ी के मातापिता, बेटा या पत्नी आते हैं तो सिर्फ पैसा या खाना देने के लिए.

नशे का इलाज आसान नहीं है क्योंकि इस की लत इस तरह पड़ती है कि नशा न मिलने पर रोगी बुरी तरह तड़पता है, चीखता है, अपने को मारतापीटता है. उस पर उस समय काबू लाना मुश्किल होता है. नशे के व्यापार के फलनेफूलने की वजह ही यह है कि एक बार जिसे नशा अच्छा लगने लगे वह सबकुछ बेचबाच कर नशे के लिए एक और डोज लेेने को तैयार हो जाता है.

नशे के रोगी के एक इसी तरह के क्लिनिक में एक रोगी की बेवजह से मौत हो गई क्योंकि रोगी आप से बाहर हो कर पहलवान किस्म के अटैंडैंटों से लडऩे लगा. पुलिस ने इन अटैंडैंटों को गिरफ्तार किया है पर नशा करने वाले कम होने वाले हैं और न इस तरह धोखा देने वाले क्लिनिक बंद होने वाले हैं. रोगी के घर वालों के लिए ये ज्यादा सुरक्षित होते हैं क्योंकि इन में कम लोग होते हैं और उन की जगहंसाई कम होती है.

नशा करने वाले मानसिक बीमार भी हैं यह अभी भी सभी समझने को तैयार नहीं हैं. ज्यादातर तो पंडितों, ओझाओं, बंगाली बाबाओं की शरण में जाते हैं जहां और ज्यादा मामला खराब किया जाता है और भभूत और दवा में दूसरा नशा मिला कर मरीज को कुछ देर सुला दिया जाता है. रोगी के घर वाले इसे ही इलाज समझ लेते हैं.

नशे का व्यापार हर रोज बढ़ रहा है. नई मादक दवाएं बाजार में आ रही हैं. पानमसाले के जरीए इस की लत आसानी से डाली जा रही है. ड्रग्स अब हर कोने पर मिलने लगी है और सिर्फ एक बार टेस्ट करनेके नाम पर शुरू करने वाले जल्दी ही पक्के नशेड़ी बन कर घर वालों के लिए आफत बन जाते हैं. नशा करने वाली दवाएं शराब से भी ज्यादा खतरनाक हैं पर हर तरफ इन का मिलना आसान होता जा रहा है. पुलिस को इस में मोटा पैसा मिलता है इसलिए वह ऊपरऊपर से ही काम करती है.

इस जंजाल का आसान जवाब नहीं है. ये नीमहकीम वाले दुकानदार तो कतई इलाज नहीं कर सकते पर यही ज्यादातर को मिलेंगे.

नरेंद्र दामोदरदास मोदी और आवाम की खुशियां

अब जब आम चुनाव में तकरीबन एक वर्ष बचा रह गया है प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की केंद्र की सरकार की अगर हम भारत के आम लोगों की खुशियों के तारतम्य में विवेचना करें तो पाते हैं कि आम आदमी का जीवन पहले से ज्यादा दुश्वार  हो गया है. उसके चेहरे की खुशियां विलुप्त होती जा रही हैं. नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद सर्वप्रथम संसद के चौबारे पर मस्तक झुका करके देश की संसद के प्रति आस्था व्यक्त की थी इसका मतलब यह था कि देश की आवाम की खुशियों के लिए वह सतत प्रयास करेंगे और इसलिए श्रद्धानवत हैं. मगर इन 9 वर्षों में देश की आवाम और खास तौर पर आम आदमी के चेहरे की खुशियां विलुप्त होती चली गई है. आग्रह है कि आप जहां कहीं भी रहते हों, आप चौराहे पर निकलिए लोगों से मिलिए लोगों को देखिए आपको इस बात की सच्चाई की तस्दीक हो जाएगी.

अगर हम आज संयुक्त राष्ट्र वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट का अवलोकन करें तो पाते हैं कि 2023 की रिपोर्ट में भारत देश दुनिया के देशों में 125 में नंबर पर है जो यह बताता है कि देश का आम आदमी खुशियों से कितना  महरूम है. अगर देश का आम आदमी खुश नहीं है तो इसका मतलब यह है कि देश की सरकार अपने दायित्व को नहीं निभा पा रही है. अरबों खरबों  की अर्जित टेक्स और विकास की बड़ी बड़ी बातें करने के बाद अगर आम आदमी को खुशियां नहीं है तो फिर देश की केंद्र सरकार पर प्रश्न चिन्ह लगना स्वाभाविक हो जाता है.

 खुशियां ढूंढता आम आदमी   

दरअसल,  संयुक्त राष्ट्र वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2023 में फिनलैंड ने लगातार छठी बार दुनिया का सबसे खुशहाल देश का दर्जा हासिल कर लिया किया है. यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र सतत विकास समाधान नेटवर्क ने  जारी की है. व‌र्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2023 में 137 देशों को आय, स्वास्थ्य और जीवन के प्रमुख निर्णय लेने की स्वतंत्रता की भावना सहित कई मानदंडों के आधार पर रैंक किया गया है. 137 देशों की लिस्ट में भारत को 125वें स्थान पर रखा गया है.

2022 में भारत की रैंक 136 लें नंबर पर थी. दूसरी तरफ भारत अभी भी अपने पड़ोसी देशों जैसे नेपाल, चीन, बांग्लादेश आदि से नीचे है दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती तकलीफों और दिक्कतों के बीच भारत की स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती देश को आजादी दिलाने वाले वीर शहीदों ने शायद यह कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि आजादी के बाद भी देश का आम आदमी एक स्वतंत्र मनुष्य के रूप में एक अच्छे जीवन से महरूम रहेगा. आम आदमी के लिए मुश्किलें बढ़ती चली जा रही हैं सत्ता में बैठे हुए लोग की सुविधाएं बढ़ती चली जा रही हैं यह जबले कहां जा रहा है छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से प्रकाशित अखबारों में सुर्खियां है कि विधानसभा में विधेयक पारित कर के पूर्व विधायकों की पेंशन को 35000 से बढ़ाकर के 58000 रूपए  लगभग कर दिया गया है. देश की चाहे कोई भी विधायिका और संसद हो आम लोगों के खुशियों को बढ़ाने का काम नहीं बल्कि बड़े लोगों की सुविधाओं के लिए अब काम करने लगी है यही कारण है कि आम आदमी का जीवन मुश्किल तो मुश्किल चुनौतियों से घिरा हुआ है जिसका अक्स वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट में भी दिखाई दे रहा है.

 हजारों करोड़ों रुपए का घोटाला

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बीके शुक्ला के मुताबिक देश में आज आम आदमी आर्थिक स्थिति दयनीय हो चली है, देश के बड़े आदमी , उद्योगपति जिस तरह सत्ता के संरक्षण में हजारों करोड़ों रुपए का घोटाला कर रहे हैं उसका भुगतान ही आम आदमी कर रहा है.

दरअसल, वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स को तैयार करने में संयुक्त राष्ट छह प्रमुख कारकों का उपयोग करता है. इसमें  स्वस्थ जीवन की अनुमानित उम्र, सामाजिक सहयोग, स्वतंत्रता, विश्वास और उदारता शामिल हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि हैप्पीनेस इंडेक्स तैयार करने में औसत जीवन मूल्यांकन के लिए की फैक्टर माना गया है. इसमें फोविड-19 के तीन वर्ष (2020-2022) का औसत भी शामिल है. इस साल रिपोर्ट तैयार करने में इस बात का खास ध्यान रखा गया है कि कोविड- 19 ने जन कल्याण को कैसे प्रभावित किया है. लोगों के बीच परोपकार बड़ा है या घटा है लोगों के बीच विश्वास, परोपकार और सामाजिक संबंधों को भी प्रमुख पैमानों के तौर पर इस्तेमाल किया गया है.

उल्लेखनीय है कि एक साल ज्यादा समय से जंग लड़ रहा यूक्रेन और गंभीर आर्थिक संकट में फंसा पाकिस्तान रिपोर्ट के मुताबिक भारत से ज्यादा खुशहाल हैं. गैलप लुंड पोल जैसे स्रोतों के आंकड़ों के आधार पर बनी रिपोर्ट में नॉर्डिक देशों को शीर्ष स्थानों में सूचीबद्ध किया गया है. रिपोर्ट में फिनलैंड को लगातार छठी बार दुनिया का सबसे खुशहाल देश माना गया है. कुल मिलाकर के देश की आवाम को और सरकारों को मिलजुल कर के सकारात्मक दिशा में काम करना चाहिए.

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