जंजाल – भाग 1 : मां की आशिकी ले डूबी बेटी को

पटेल चौक पर सुबह मजदूरों की भीड़ रहती थी. लोग दूरदराज के इलाकों से शहर में मजदूरी करने आते थे. केशव भी एक मजदूर था. वह भी पटेल चौक पर सुबह आ कर खड़ा हो जाता था. इस आस से कि किसी बाबू के पर घर मजदूरी का काम मिल जाए.

केशव की बीवी सुहागी घरों में बाई का काम करती थी. वह कसे हुए बदन की खूबसूरत औरत थी. उसे देख कर कोई नहीं कह सकता था कि उस की एक जवान बेटी भी है.

सुहागी की बेटी सोनम 10वीं जमात में पढ़ती थी. 16 साल की सोनम बड़ी खूबसूरत लड़की थी. उस के नैननक्श तीखे थे. उस की कजरारी आंखें बरबस ही लोगों को अपनी तरफ खींच लेती थीं. वह जवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी थी, जिस से उस का रंगरूप निखर चुका था.

हर रोज इलाके की पतली गलियों से हो कर सोनम स्कूल जाती थी. आसपास के घरों में ज्यादातर लोग मजदूर तबके

के थे, जो मजदूरी कर के अपना पेट पालते थे.

केशव की मजदूरी से तो घर चलाना मुश्किल था. सुहागी दूसरों के घरों में बाई का काम कर के केशव से ज्यादा पैसा कमा लेती थी. इस बात का उसे गुमान भी था.

दूसरे मजदूरों की औरतें केशव पर ताना मारतीं, ‘सुहागी रोज सिंगार कर के कहां जाती है? किसी यार से मिलने जाती होगी. तुझे कोई परवाह नहीं है.’

अनपढ़, जाहिल औरतों के तानों से केशव परेशान हो जाता था. वह सुहागी से ताने सुनने की बात कहता था, पर सुहागी इस से नाराज नहीं होती थी. वह केशव को ही समझाने लगती, ‘‘क्या ये औरतें रुपए कमा कर मुझे देंगी? अरे, गाल बजाने और कमाने में बड़ा फर्क होता है.’’

केशव चुप लगा जाता.

सुहागी महेश के घर बाई का काम करती थी. महेश बिजनैस करता था. उस की बिजली के सामान की बड़ी दुकान थी. उस के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी. लेकिन पिछले साल उस की बीवी गुजर गई थी, जिस से उस की जिंदगी बेरंग हो गई थी.

महेश जिंदगी की बोरियत दूर करने के लिए सुहागी के करीब आ गया था. महेश जैसा मालदार आदमी सुहागी को मिला था. वह महेश का दिल बहलाने लगी थी. बदले में वह कभी साड़ी, तो कभी रुपए सुहागी को दे देता था.

उस दिन आसमान में काले बादल छाए थे. महेश दुकान जाना चाह रहा था कि झमाझम बारिश होने लगी. सुहागी का काम खत्म हो चुका था. वह बारिश में भीग कर घर जाने लगी.

महेश ने उसे रोक दिया, ‘‘अरे सुहागी, इस बारिश में भीग जाओगी. जब बारिश रुक जाएगी, तब चली जाना.’’

‘‘साहब, भीगने से मुझे कुछ नहीं होगा,’’ कह कर सुहागी जाने लगी.

‘‘अरे, रुको भी,’’ महेश ने सुहागी का हाथ पकड़ कर रोक लिया.

झमाझम बारिश हो रही थी. बिजली कड़क रही थी. बरसाती हवा फिजाओं में शोर मचा रही थी. महेश का दिल इस तूफानी मौसम में बहक गया. वह सुहागी को बांहों में भर कर चूमने लगा.

सुहागी भी महेश की बांहों में सिमट गई. पलभर में दोनों बिछावन पर थे. जिस्म की आग भड़क चुकी थी. उस ने सुहागी के कपड़े उतार दिए. उस के उभार महेश पर कहर बरपाने लगे.

महेश सुहागी पर झपट पड़ा. वह सैक्स करने लगा. वह भी चिपक कर उस का साथ देने लगी.

थोड़ी देर में जब जिस्म की आग ठंडी हुई, तो वे दोनों अलग हुए. जोरदार बारिश अब थम चुकी थी.

‘‘अच्छा साहब, अब मैं चलती हूं,’’ सुहागी ने कहा.

‘‘ये 1,000 रुपए हैं, रख लो,’’ महेश ने कहा. सुहागी ने रुपए ले लिए. वह मुसकरा कर कमरे से बाहर निकल गई.

सुहागी महेश साहब के दिए हुए कपड़े, साड़ी वगैरह अपनी बेटी सोनम को दिखाती थी. वह सोचती थी कि महेश साहब के दिए हुए गिफ्ट देख कर सोनम खुश होगी.

लेकिन सोनम बच्ची नहीं थी. वह 16 साल की जवान लड़की थी. उसे समझते देर नहीं लगी कि मां और महेश साहब के बीच गलत संबंध हैं. उस के बापू में क्या कमी है, यही न कि वे एक मजदूर हैं. लेकिन बापू मेहनत से जो कमा कर लाते हैं, उस से घर की दालरोटी चलती है.

केशव की मजदूरी की अलग दुनिया थी, जिस में वह हर दिन पिसता रहता था. उसे सुहागी के चालचलन को देखने की फुरसत कहां थी. घर का खर्चा चल जाए, उसे यही चिंता रहती थी.

सोनम मां के बननेसंवरने का राज जान गई थी. वह जान गई थी कि मां महेश साहब के साथ क्या गुल खिला रही है. उस के जवान होते मन पर अजीब सा असर पड़ रहा था.

सोनम भी अपने लिए बौयफ्रैंड की तलाश करने लगी. वह खूबसूरत थी. भला उस की ओर कौन नहीं खिंचता.

गंगा किनारे की झोंपड़पट्टी में रवि रहता था. वह गाडि़यों की साफसफाई का काम करता था. गैराज में वह क्लीनर था. उस का पहनावा किसी बाबू से कम नहीं था. वह काली पैंट के साथ चैक की लाल शर्ट पहनता था. वह चोरी की मोटरसाइकिल औनेपौने दाम पर खरीद कर बेच देता था. उस पैसे से वह ऐश करता था.

सोनम जब स्कूल जाती, तो रवि उस का पीछा करता था. सोनम उसे देख कर मुसकरा देती थी. उस की मुसकराहट रवि की चाहत को और बढ़ा देती थी.

एक दिन सोनम ने स्कूल से लौटते समय चर्च के पास रवि को मोटरसाइकिल पर बैठा देखा. वह ठिठक कर रुक गई.

हिम्मत कर के सोनम ने पूछ लिया, ‘‘मेरा पीछा क्यों करते हो?’’

‘‘मुझे तुम अच्छी लगती हो,’’ रवि ने कहा.

‘‘अगर कोई हम लोगों को देख लेगा, तो क्या सोचेगा…’’ सोनम ने कहा.

‘‘यही कि हम दोनों दोस्त हैं,’’ रवि ने कहा.

यह सुन कर सोनम मुसकरा दी. शह पा कर रवि ने कहा, ‘‘चलो, चौक तक तुम्हें छोड़ देता हूं. वहां से घर चली जाना.’’

सोनम रवि की मोटरसाइकिल पर बैठ गई. रवि के मन की मुराद पूरी हो गई थी. उस ने सोनम को मोटरसाइकिल से चौक तक छोड़ दिया. रास्ते में दोनों ने एकदूसरे का नाम पूछ लिया था.

रवि हर रोज सोनम को स्कूल जाने के रास्ते में मिल जाता था. वह सोनम को मोटरसाइकिल पर घुमाने लगा. होटल में खाना खाने और मौल में मूवी देखने का शौक सोनम का पूरा होने लगा था.

रवि सोनम के दिलोदिमाग पर छा गया. सोनम कमसिन थी. वह दुनिया के फरेब को जानती नहीं थी. वह रवि को दिलोजान से चाहने लगी. लेकिन रवि शातिर था. उस ने सोनम को अपने प्रेमजाल में फांस लिया था. उस की निगाह तो सोनम के जिस्म पर थी. वह उस के जिस्म को पाने के जुगाड़ में लग गया. वह उस से प्यार का नाटक करने लगा.

एक दिन रवि और सोनम पार्क में बैठे हुए थे. उन दोनों के सिवा वहां कोई नहीं था. रवि ने सोनम का हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘हम लोगों को घर से भाग कर शादी कर लेनी चाहिए. इस तरह मिलनाजुलना ठीक नहीं है.’’

‘‘मैं शादी के लिए मां और बापू

को मनाने की कोशिश करूंगी,’’ सोनम ने कहा.

‘‘तुम्हारे मांबापू शादी के लिए नहीं मानेंगे. उलटे तुम्हारा स्कूल जाना छुड़ा कर घर में बंद कर देंगे. हम लोगों को जल्दी ही घर से भाग कर शादी कर लेनी चाहिए,’’ रवि ने कहा.

सोनम घबरा गई. एकबारगी उस के जेहन में मांबापू का चेहरा घूम गया.

‘‘घर से भाग कर शादी… अभी नहीं, मैं सोच कर बताऊंगी,’’ सोनम ने कहा.

दिन बीत रहे थे. सोनम की मुहब्बत रवि पर परवान चढ़ती जा रही थी. उस की उम्र नासमझी की थी. वह पढ़ाई से दूर होने लगी.

इस बीच रवि सोनम से घर से भागने की जिद करता रहा. वह उस की जिद के आगे टूट गई और घर से भागने को राजी हो गई.

एक सांकल सौ दरवाजे- भाग 1: क्या हेमांगी को मिला पति का मान

19 साल की लड़की 43 साल की स्त्री को भला क्या समझेगी, ऐसा सोच कर मेरी समझ पर आप की कोई शंका पनप रही है तो पहले ही साफ कर दूं कि जिस स्त्री की चर्चा करने जा रही हूं, उस की यात्रा का एक अंश हूं मैं. उसी पूर्णता, उसी उम्मीद की किरण तक बढ़ती हुई, चलती हुई हेमांगी की बेटी हूं मैं.

43 साल की हेमांगी व्यक्तित्व में शांत, समझ की श्रेष्ठता में उज्ज्वल और कोमल है. वह विद्या और सांसारिक कर्तव्य दोनों में पारंगत है. तो, हो न. तब फिर क्यों भला मैं उस की महानता का बखान ले कर बैठी? यही न, इसलिए, कि 19 साल की उस की बेटी अपने जीवनराग में गहरी व अतृप्त आकांक्षाएं देख रही है, एक छटपटाहट देख रही है अपने जाबांज पंख में, जो कसे हैं प्रेम और कर्तव्य की बेजान शिला से. यह बेटी साक्षी है दरवाजे के पीछे खड़े हो कर उस के हजारों सपनों के राख हो कर झरते रहने की.

तो फिर, नहीं खोलूं मैं सांकल? नहीं दूं इस अग्निपंख को उड़ान का रास्ता?

आइए, समय के द्वार से हमारे जीवनदृश्य में प्रवेश करें, और साक्षी बनें मेरे विद्रोह की अग्निवीणा से गूंजते प्रेरणा के सप्तस्वरों के, साक्षी बनें मेरे छोटे भाई कुंदन के पितारूपी पुरुष से अपनी अलग सत्तानिर्माण के अंतर्द्वंद्व के, मां के चुनाव और पिता के असली चेहरे के.

हम मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के रामनगर कालोनी के पैतृक घर में रहते हैं. इस एकमंजिले मकान में 2 कमरे, एक सामान्य आकार का डाइनिंग हौल और एक ड्राइंगरूम है. बाहर छोटा सा बरामदा और 4र सीढ़ी नीचे उतर कर छोटेछोटे कुछ पौंधों के साथ बाहरी दरवाजे पर यह घर पूरा होता है.

48 साल के मेरे पापा अजितेश चौधरी सरकारी नौकरी में हैं. उन का बेटा कुंदन यानी मेरा भाई अभी 10वीं में है. मैं, कंकना, उन की बेटी, स्नातक द्वितीय वर्ष की छात्रा. हम दोनों भाईबहनों का शारीरिक गठन, नैननक्श मां की तरह है. सधे हुए बदन पर स्वर्णवर्णी गेहुंएपन के साथ तीखे नैननक्श से छलकता सौम्य सारल्य. यह है हमारी मां हेमांगी. 43 की उम्र में जिस ने नियमित व्यायाम से 32 सा युवा शरीर बरकरार रखा है. हमेशा मृदु मुसकान से परिपूर्ण उस का चेहरा जैसे वे अपनी विद्वत्ता को विनम्रता से छिपाए रहती हो.

मेरी ममा हम दोनों भाईबहनों के लिए हमेशा खास रही. ममा को हम मात्र स्त्री के रूप में ही नहीं समझते बल्कि एक पूर्ण बौद्धिक व्यक्तित्व के रूप में.

सुबह 9 बजे का समय था. कालेज के लिए निकल रही थी मैं. घर में रोज की तरह कोलाहल का माहौल था.

पापा सरकारी कार्यालय में सहायक विकास अधिकारी थे. वे अपने बौस के अन्य 10 मातहतों के साथ उन के अधीन काम करते थे. लेकिन घर पर मेरी ममा पर उन का रोब किसी कलैक्टर से कम न था.

‘हेमा, टिफिन में देर है क्या? यार, घर पर और तो कुछ करती नहीं हो, एक यह भी नहीं हो रहा है, तो बता दो,’ पापा बैडरूम से ही चीख रहे थे.

‘दे दिया है टेबल पर,’ ममा ने बिना प्रतिक्रिया के सूचना दी.

‘दे दिया है, तो जबान पर ताले क्यों पड़े थे?’

‘चाय ला रही थी.’

‘लंचबौक्स भरा बैग में?’

‘रख रही हूं.’

‘सरकारी नौकरी है, समझ नहीं आता तुम्हें? यह कोई चूल्हाचौका नहीं है. मिनटमिनट का हिसाब देना पड़ता है.’

ममा टिफिन और पानी की बोतल औफिस के बैग में रख नियमानुसार पापा की कार भी पोंछ कर आ गई थी. और पापा टिफिन के लिए बैठे रहे थे.

यह रोज की कहानी थी, यह जतलाना कि मां की तुलना में पापा इस परिवार के ज्यादा महत्त्वपूर्ण सदस्य हैं. उन का काम ममा की तुलना में ज्यादा महत्त्व का है. यह दृश्य हमारे ऊपर विपरीत ही असर डालता था. इस बीच भाई और हम अपना टिफिन ले कर चोरों की तरह घर से निकल जाते.

रात को पापा की गालीगलौज से मेरी नींद उचट गई. रात 12 बजे की बात होगी. मैं शोर सुन ममा की चिंता में अपने कमरे के दरवाजे के बाहर आ कर खड़ी हो गई. ममा पापा के साथ बैडरूम में थी. ममा शांत लेकिन कुछ ऊंचे स्वर में कह रही थी- ‘आप के हाथपैर अब से मैं नहीं दबा पाऊंगी.

‘आप की करतूतों ने बरदाश्त की सारी हदें तोड़ दी हैं. आप की जिन किन्हीं लड़कियों और महिलाओं से संपर्क हैं, वे आप की कमजोरियों का फायदा उठा रही हैं. आप अपने औफिस की महिला कलीग को अश्लील वीडियो साझा करते थे, मैं ने सहा. किस स्त्री को क्या गिफ्ट दिया, बदले में आप को क्याक्या मिला, मैं ने अनदेखा किया और चुप रही. लेकिन अब आप सीमा से आगे निकल कर उन्हें घर तक लाने लगे हैं. क्या संदेश दे रहे हैं हमें? घर पर ला कर उन महिलाओं के साथ आप का व्यवहार कितना भौंडा होता है, क्या बच्चों से छिपा है यह?’

आज पहली बार ममा ने हिम्मत कर अपना विरोध दर्ज कराया था. पहली बार उस ने पापा के हुक्म को अमान्य कर के अपनी बात रखी थी. लेकिन यह इतना आसान नहीं था.परिणाम भयंकर होना ही था. मेरे पापा ऐसे व्यक्ति थे जो उन की गलती बताने वाले का बड़ा बुरा हश्र करते थे, और तब जब उन के कमरे में ममा का सोना उन की सेवा के लिए ही था.

झन से जिंदगी कांच की तरह टूट कर बिखर गई. आशा, भरोसा, उम्मीद का दर्पण चकनाचूर हो गया.

पापा ने ममा को जोरदार तमाचे मारे, ममा दर्द से बिलख कर उन्हें देख ही रही थी कि पापा ने ममा के पेट पर जोर का एक पैर जमाया. ममा ‘उफ़’ कह कर जमीन पर बैठ गई.

मैं जानती हूं यह दर्द उस के शरीर से ज्यादा मन पर था. आत्मसम्मान और आत्महनन की चोट वह नहीं सह पाती थी.

‘अब एक भी आवाज निकाली तो जबान खींच लूंगा. मैं कमाता हूं, तुम लोग मेरे पैसे पर ऐश करते हो, औकात है नौकरी कर के पैसे घर लाने की? जिस पर आश्रित हो, उसी को आंख दिखाती हो? जो मरजी होगी वह करूंगा मैं. अफसर हूं मैं. तुम क्या हो, एक नौकरी कर के दिखाओ तो समझूं.’

‘मेरी नौकरी पर पाबंदी तो आप ने ही लगा रखी है?’

‘अच्छा? नौकरी करना क्यों चाहती हो मालूम नहीं है जैसे मुझे. सब बहाने हैं गुलछर्रे उड़ाने के. तुम्हें लगता है नौकरी के बहाने मैं मौज करता हूं, तो तुम भी वही करोगी?’ पापा के पास जबरदस्त तर्क थे, जिसे सौफिस्ट लौजिक कहा जा सकता है. ग्रीक दर्शन में सौफिस्ट तार्किक वाले वे हुआ करते थे, जो निरर्थक और गलत बौद्धिक तर्कजाल से सामने वाले को बुरी तरह बेजबान कर देते थे.

दोराहा – भाग 3 : क्या हुआ था उस रात

उधर मंगलू की मां सूरज उगने के साथ ही बंगले की साफसफाई, कपड़े, बरतन, खाना बनाने और फिर सेठानी की सेवा में जुट जाती. उतनी सुखसुविधाएं होने पर भी सेठानी हमेशा किसी न किसी बीमारी का शिकार रहतीं और उस की मां कभी सेठानी के पैर दबाती, कभी सिर दबाती और कभी पूरे बदन की मालिश करती.

मंगलू खुद जो शायद उन दिनों 8-9 साल से ज्यादा का नहीं था, हमेशा साए की तरह उस बंगले में मां के साथसाथ लगा रहता.

सेठानी तो दिनभर पलंग से नीचे पैर भी नहीं रखती थीं. दूसरी तरफ मंगलू की मां भागभाग कर काम करती. उस की मां का मुंह पीला पड़ जाता और हाथपांव थक कर जैसे टूटने लगते.

कई बार मंगलू सोचता था कि थोड़ा बड़ा होने पर वह भी मां को सेठानी की तरह आराम करवाएगा. लेकिन इस से पहले कि वह इन बातों का ठीक से मतलब समझ पाता, उस की जिंदगी का रुख ही बदल गया.

मंगलू हथकड़ी पहने पुलिस जीप में सवार शहर की उन्हीं पुरानी जानीपहचानी सड़कों से गुजर रहा था. यह सब उस के लिए नया नहीं था. फिर भी न जाने क्यों अजीब सी बेचैनी महसूस करते हुए बारबार उस का गला सूख रहा था.

बस्ती वालों को हमेशा खूंख्वार दिखने वाला मंगलू उस दिन अपने को अंदर से कुछ पिघलता हुआ महसूस

कर रहा था. तेज रफ्तार से दौड़ती जीप में आने वाली हवा में भी उसे पसीना छूट रहा था. चाहते हुए भी उस का दिमाग अपनी यादों की कड़ी से अलग नहीं हो पाया. उस की यादों में सेठ

के एकलौते बेटे नकुल का चेहरा

घूमने लगा.

सेठ दयालराम का बेटा नकुल… मंगलू को ठीक से याद था कि किस तरह बंगले में मां के काम में हाथ बंटाने के साथ उस का असली काम हुआ करता था नकुल के साथ खेलना. नकुल भी उसी की उम्र का था. किसी भी खेल में यदि नकुल हार जाता तो जीतने पर भी वह हार मंगलू को ही माननी पड़ती. उसे यह सब अच्छा नहीं लगता. फिर भी मां के समझाने पर उसे वैसे ही खेलना पड़ता.

एक रोज आंखमिचौली के खेल में जब नकुल बारबार हारने पर भी हार मानने को तैयार न हुआ, तो मंगलू चिढ़ कर अपनी मां के पास जाने लगा.

तब नकुल ने उसे रोक लिया. वह

अपने कमरे से कीमती कलम व

पैंसिलों का डब्बा ला कर खेल जारी रखने के लिए खुशामद के तौर पर देते हुए बोला, ‘‘लो मंगलू, यह डब्बा तुम ले लो.’’

‘‘तो क्या इसे मैं घर ले जा सकता हूं?’’

‘‘हांहां, अब से मैं ने यह तुम्हें

दे दिया,’’ जोर दे कर नकुल ने कहा और फिर खेलने के लिए चिरौरी

करने लगा.

एकाएक इतने सुंदर कलम और पैंसिल पा कर मंगलू बेहद खुश हुआ और खेल से पहले भाग कर उसे

अपनी मां के थैले में सब से नीचे छिपा कर रख आया.

शाम को ट्यूशन पढ़ाने आई नकुल की मास्टरनी को जब उस के बस्ते

में पैंसिल का डब्बा नहीं मिला तो

सब से पहला शक मंगलू पर ही किया गया और नकुल की मां के थैले

से पैंसिल बौक्स बरामद भी कर

लिया गया.

मंगलू के बारबार सचाई बताने पर भी सेठ ने उन सब को चोर कह कर खूब कोसा और साफ कह दिया कि अब से मंगलू मांबाप के साथ उन के बंगले में कभी न आए.

उस दिन सब से अधिक हैरानी

उसे इस बात पर हुई थी कि सबकुछ जानते हुए भी नकुल पास खड़ा

चुपचाप टुकुरटुकुर उसे देखता ही रहा. और वहीं से शुरू हुई थी मंगलू

की बरबादी.

मांबाप दोनों रात तक बंगले में काम करते और उधर मंगलू दिनभर इधरउधर गलियों में बेमकसद भटकता रहता. फिर कुछ आवारा लड़कों की सोहबत में पड़ कर उस ने छोटीमोटी जरूरत की चीजें चुरानी शुरू कर दीं. चोरी से मारपीट, नशाखोरी वगैरह का शिकार होते हुए वह कुछ ही सालों में बस्ती का एक नामी बदमाश बन गया.

उसी वजह से सेठ दयालराम ने उस के मांबाप को भी काम से निकाल दिया था. सेठ के डर से उन्हें कहीं और भी काम न मिल सका.

मंगलू असहाय मांबाप के दुख से दुखी हो कर एक दिन नशे की हालत में सेठ को खूब खरीखोटी सुना आया. इस पर सेठ के आदमियों ने रात में आ कर मंगलू और उस के बाप की जम कर पिटाई की.

सेठ से बदला लेने की भावना मंगलू के मन में लगातार पनपती रही. पर सेठ की धनदौैलत व ताकत के सामने वह खुद को हमेशा छोटा व कमजोर पाता. इसी दिमागी बोझ व तनाव के साथ उस के कदम गलत

व गैरकानूनी कामों की दुनिया में

बढ़ते गए.

लेकिन पैरों पर गिरे गिड़गिड़ाते बाप को सेठ ने जिस तरह धक्का दे कर गालियां दीं, उस की याद आते ही उस का मन और कसैला हो गया. अंदर की सारी कड़वाहट से मंगलू के चेहरे व हाथपैर की नसें फूलने लगीं. वह सोचने लगा कि अगर एक बार उस की हथकडि़यां खुल जातीं तो वह चलती जीप से कूद कर सवेरे के छूट गए अधूरे काम को पूरा कर आता.

इस से कि वह और आगे सोचता, तेज झटके से जीप पुलिस स्टेशन के अहाते में जा कर रुक गई.

बगल में बैठे सिपाही ने बड़ी रुखाई से उसे नीचे उतरने को कहा. फिर उसे अंदर उस कमरे में ले जाया गया, जहां बयान देने के लिए सेठ दयालराम, नकुल और उस के दोस्त पहले से ही मौजूद थे.

चूंकि नकुल और उस के दोस्त उस घटना की चपेट में सीधे आए थे, इसलिए नकुल के दोस्त ने बयान दिया, ‘‘सुबह मैं और नकुल जब कालोनी के पीछे की सुनसान सड़क से गुजर रहे थे, तो तेजी से सामने से आते मंगलू ने हमारा रास्ता रोक लिया व जो कुछ हमारे पास था, दे देने के लिए कहा.

‘‘मैं ने उसे रास्ता छोड़ने को कहा और नकुल की तरफ इशारा करते हुए मेरे यह बताने पर कि जानते हो, तुम सेठ दयालराम के बेटे का रास्ता रोकने की गलती कर रहे हो, जोरजोर से गालियां बकते हुए इस ने चाकू निकाल लिया और नकुल पर जानलेवा वार किया.’’

आगे से टूटी हुई चप्पल से बाहर निकल रहे अंगूठे को फर्श पर रगड़ते हुए सामने खड़ा मंगलू उस बयान को सुनते हुए मन ही मन यह मान रहा था कि कहने को यह सबकुछ ठीक कह रहा है, पर मेरे हाथ से एक अच्छा मौका निकल गया.

अगर उस हाथापाई के वक्त वह कमबख्त कार न आ गई होती, जिस में सवार आदमियों से उन्होंने मदद मांगी थी, और मंगलू को वहां से भागना पड़ा था, तो मैं इस नकुल को इतना पीटता कि सेठ जिंदगीभर अपने बेटे की चोटों का हिसाब लगाता रहता.

नकुल ने अपने बयान में पहले तो वही सब दोहराया कि किस तरह सुनसान सड़क पर मंगलू ने उन का रास्ता रोका. फिर थोड़ा रुक कर सीधे मंगलू की तरफ देखते हुए उस ने कहा, ‘‘यह आया तो हमारे पास लूटने की नीयत से था, परंतु मुझे पहचानते ही इस का इरादा बदल गया और मेरे दोस्त के साथ कहासुनी में इस के खुले चाकू से मुझे यह हलकी सी चोट लग गई. वहां से भागते हुए भी इस ने बचपन के दोस्त को अनजाने में चोट लग जाने का अफसोस जाहिर किया था.’’

बयान संबंधी कार्यवाही से निबट कर गाड़ी में बैठते ही सेठ दयालराम ने तिलमिलाते हुए बेटे से गलत बयान देने की वजह पूछी. पहले तो नकुल ने बात को टालने की कोशिश की, लेकिन बारबार वही सवाल दोहराए जाने पर, बरसों से केवल मंगलू या उस के परिवार पर ही नहीं, बल्कि ऐसे कई लाचार व मजबूर लोगों पर अपने पिता के जुल्म को देखती नकुल की खामोश आंखों में गुस्से की चिनगारी अलाव बन कर धधक उठी.

वह चाह कर भी चुप न रह सका और बोला, ‘‘अपने हथकंडों के इस्तेमाल के लिए आप ने आज तक न जाने कितने गुंडों व गैरकानूनी काम करने वालों को पनाह दी. आप के द्वारा सताए जिस बेगुनाह ने भी विरोध करने की हिम्मत की, उसे आप ने कुसूरवार साबित करवा दिया. आप की नजर तो हमेशा अपने फायदे पर रहती है. किसी गुनाहगार और बेगुनाह में आप कभी अंतर देख ही नहीं पाए.

‘‘आप ही बताइए, अगर आज मैं ने आप की ही करनी से बने एक गुनाहगार को फिर से सुधारने की कोशिश की है, तो क्या गलत

किया है?’’

अपने सामने किसी की ऊंची आवाज तो क्या, ऊंचा देखने तक की इजाजत न देने वाले सेठ दयालराम को अपने बेटे की बातों का कोई जवाब नहीं सूझा. वे चुप लगा गए. उन्हें लगा, नकुल की आवाज में जैसे नई पीढ़ी की बगावत उभर रही है. बेटे की जगह कोई दूसरा होता तो अब तक उन के गुस्से का शिकार हो चुका होता. लेकिन वह तो उन का अपना खून था.

उधर मंगलू खाली पड़ी उन कुरसियों को जिन पर कुछ देर पहले नकुल और उस के दोस्त बैठे थे, हैरान सा देखते हुए समझ नहीं पा रहा था कि आखिर सेठ के बेटे ने उसे बचाने के लिए झूठा बयान क्यों दिया.

‘क्या वह डर गया है कि यहां से छूट कर कहीं मैं उस पर दोबारा हमला न कर दूं या फिर…? बरसों पहले की पैंसिल वाले डब्बे से जुड़ी वह सचाई, जिसे नकुल तब आप के डर से नहीं कह पाया. आज उस की कीमत झूठे बयान से चुका गया, जबकि मैं उसे आज जान से मारने के लिए उतारू था.’

‘‘ऐ खड़ा हो, कहां बैठ रहा है?’’ तभी दुत्कार कर उस की पीठ में डंडा चुभाते हुए सिपाही ने कहा.

अचानक मंगलू ने अपनेआप को उसी दोराहे पर पाया, जहां से उस की जिंदगी जुर्म भरी राह पर चल पड़ी थी. वह सोच रहा था कि अब चाहे उसे सजा हो या छूट जाए, पर वह अच्छा इनसान बनने की कोशिश करेगा. नकुल से अपनी गलती की माफी मांगेगा.

इन्हीं विचारों को समेट सिपाही के धक्कों के साथ मंगलू हवालात की ओर चल पड़ा. वह मंगलू जो शायद

नकुल के चलते जुर्म की राह पर चलने लगा था, उसी की वजह से ही सही डगर फिर से खोजने की कोशिश कर रहा था.

क्रेजी कल्चर – भाग 3

आज 11वें दिन फिर डाक्टर के पास जाना था.‘‘आज पता है ईशा क्या हुआ?’’ डाक्टर रमन जैन ने कहा.‘‘क्या हुआ…’’ ईशा ने पूछा.‘‘जब मैं क्लिनिक आ रहा था, तब एक डौगी मेरी गाड़ी के नीचे आतेआते बचा…’’ डाक्टर रमन जैन बोले.‘‘ओह…’’ ईशा के मुंह से निकला.

‘‘वह भूखा और कमजोर लग रहा था. मैं ने गाड़ी रोक कर उसे चाय की गुमटी से दूधब्रैड खिलाया…’’‘‘बेचारा…’’ ईशा बोली.‘‘उस को कहीं चोट भी लगी थी… पैर के पास ऊपर,’’ डाक्टर रमन जैन बोले, ‘‘लेकिन, उस का मुंह घाव तक जा सकता था, इसलिए वह चाटचाट कर उसे ठीक कर लेगा.’’‘‘कितने परेशान हो जाते हैं डौगी बेचारे…’’

ईशा के मुंह से निकला.‘‘बिलकुल. लेकिन, वे सुसाइड नहीं करते,’’ डाक्टर रमन जैन ने बात बदली.‘‘मतलब…?’’ ईशा चौंक गई.‘‘मतलब यह कि बहुत से जानवर गाड़ी के नीचे आ कर हाईवे पर कुचले जाते हैं, पर क्या कभी खुद जानवर किसी गाड़ी के नीचे जाते हैं मरने के लिए?’’ डाक्टर रमन जैन ने पूछा.‘‘नहीं, कभी नहीं,’’ ईशा बोली.भैया और मां चुपचाप देख रहे थे.‘‘तो क्या हम जानवरों से भी गएगुजरे हैं, जो संघर्ष को छोड़ कर मौत को गले लगा लें?’’

डाक्टर रमन जैन ने पूछा.‘‘पर, वह आशु…’’ ईशा की आंखों में आंसू भरने लगे.‘‘वह संघर्ष नहीं कर पाई अपने विचारों से और गलत राह पर चलने लगी. अगर किसी टैंशन में रहने लगी थी तो मातापिता से शेयर करती. समाधान जरूर मिलता,’’ डाक्टर रमन जैन ने कहा.‘‘लेकिन, सुखसुविधाओं की उम्मीद करना क्या बुरी बात है?’’ ईशा ने पूछा.‘‘कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन आशु का तरीका गलत था. जितने भी महान लोग हुए हैं, उन सब ने संघर्ष किया है. अच्छा यह बताओ कि जब से तुम बीमार हुई हो, परिवार ने कोई कमी की देखभाल करने में? मां के प्यार में कमी लगी? भैया ने कमी की?’’ डाक्टर रमन जैन ने पूछा.

 

‘‘नहींनहीं, सब प्यार करते हैं मुझे,’’ कह कर ईशा रोने लगी. मां उठने ही वाली थीं कि डाक्टर ने इशारे से मना कर दिया.थोड़ी देर के बाद डाक्टर रमन जैन फिर बोले, ‘‘कई बच्चे ऐसे भी होते हैं, जिन के जीवन में मातापिता का साया ही नहीं रहता. तुम्हारे साथ ऐसा नहीं है ईशा…

तुम्हारी कालेज की फीस, तुम्हारे दूसरे खर्चों में कोई कमी…?’’‘‘भैया ध्यान रखते हैं मेरा,’’ ईशा बोली.‘‘तो बेटा, परिवार का हक पहले है तुम पर. जिंदगी अनमोल है

. क्या हमारा शरीर आत्महत्या करने के लिए है?’’ डाक्टर रमन जैन ने पूछा.‘‘जी नहीं, बात तो ठीक है आप की,’’ ईशा बोली.‘‘सुधा चंद्रन, तसलीमा नसरीन, महाश्वेता देवी… सभी की जिंदगी में उतारचढ़ाव आए, पर इन्होंने संघर्ष का रास्ता अपनाया,’’ डाक्टर रमन जैन ने आगे बात बढ़ाई.‘‘पढ़ाई के अलावा ऐसा क्या करूं, जिस से मुझे सुकून मिले?’’ ईशा ने पूछा.‘‘तुम्हारी हौबी क्याक्या हैं?’’ डाक्टर रमन जैन ने पूछा.‘‘मतलब…?’’

ईशा बोली.‘‘तुम्हारे बाल खूबसूरत हैं. इन्हें हैल्दी रखने के टिप्स के वीडियो बनाओ और सोशल मीडिया पर अपलोड करो. पैसा भी मिल सकता है आगे जा कर…’’‘‘क्यों नहीं..’’ भैया बोले, ‘‘अब तुम्हारा गिफ्ट नया मोबाइल इंतजार कर रहा है घर पर…’’ यह सुन कर मां भी मुसकराईं.‘‘खूबसूरत बालों के टिप्स सब से पहले मैं सीखूंगी,’’ अंदर से आवाज आई और परदा हटा कर एक मौडर्न लड़की दाखिल हुई.‘‘मेरी बेटी… तुम्हारी पहली कस्टमर,’’ डाक्टर रमन जैन बोले.ईशा मुसकराने लगी. उस की जिंदगी से अंधेरा दूर हो रहा था और उम्मीदों की किरण जगमगाने लगी थी.

दर्द-भाग 3 : जिंदगी के उतार चढ़ावों को झेलती कनीजा

गनी ने अपने दोस्तों तथा दफ्तर के सहकर्मियों के लिए ईद की खुशी में खाने की दावत का विशेष आयोजन किया था. उस दिन कनीजा बी बहुत खुश थीं. घर में चहलपहल देख कर उन्हें ऐसा लग रहा था मानो दुनिया की सारी खुशियां उन्हीं के घर में सिमट आई हों.

गनी की ससुराल पास ही के शहर में थी. ईद के दूसरे दिन वह ससुराल वालों के विशेष आग्रह पर अपनी बीवी और बेटे के साथ स्कूटर पर बैठ कर ईद की खुशियां मनाने ससुराल की ओर चल पड़ा था. गनी तेजी से रास्ता तय करता हुआ बढ़ा जा रहा था कि एक ट्रक वाले ने गाय को बचाने की कोशिश में स्टीयरिंग पर अपना संतुलन खो दिया. परिणामस्वरूप उस ने गनी के?स्कूटर को चपेट में ले लिया. पतिपत्नी दोनों गंभीर रूप से घायल हो गए और डाक्टरों के अथक प्रयास के बावजूद बचाए न जा सके.

लेकिन उस जबरदस्त दुर्घटना में नन्हे नदीम का बाल भी बांका नहीं हुआ था. वह टक्कर लगते ही मां की गोद से उछल कर सीधा सड़क के किनारे की घनी घास पर जा गिरा था और इस तरह साफ बच गया था. वक्त के थपेड़ों ने कनीजा बी को अंदर ही अंदर तोड़ दिया था. मुश्किल यह थी कि वह अपनी व्यथा किसी से कह नहीं पातीं. उन्हें मालूम था कि लोगों की झूठी हमदर्दी से दिल का बोझ हलका होने वाला नहीं.

उन्हें लगता कि उन की शादी महज एक छलावा थी. गृहस्थ जीवन का कोई भी तो सुख नहीं मिला था उन्हें. शायद वह दुख झेलने के लिए ही इस दुनिया में आई थीं. रशीद तो उन का पति था, लेकिन हलीमा बी तो उन की अपनी नहीं थी. वह तो एक धोखेबाज सौतन थी, जिस ने छलकपट से उन्हें रशीद के गले मढ़ दिया था.

गनी कौन उन का अपना खून था. फिर भी उन्होंने उसे अपने सगे बेटे की तरह पालापोसा, बड़ा किया, पढ़ाया- लिखाया, किसी काबिल बनाया. कनीजा बी गनी के बेटे का भी भार उठा ही रही थीं. नदीम का दर्द उन का दर्द था. नदीम की खुशी उन की खुशी थी. वह नदीम की खातिर क्या कुछ नहीं कर रही थीं. कनीजा बी नदीम को डांटतीमारती थीं तो उस के भले के लिए, ताकि वह अपने बाप की तरह एक काबिल इनसान बन जाए.

‘लेकिन ये दुनिया वाले जले पर नमक छिड़कते हैं और मासूम नदीम के दिलोदिमाग में यह बात ठूंसठूंस कर भरते हैं कि मैं उस की सगी दादी नहीं हूं. मैं ने तो नदीम को कभी गैर नहीं समझा. नहीं, नहीं, मैं दुनिया वालों की खातिर नदीम का भविष्य कभी दांव पर नहीं लगाऊंगी.’ कनीजा बी ने यादों के आंसू पोंछते हुए सोचा, ‘दुनिया वाले मुझे सौतेली दादी समझते हैं तो समझें. आखिर, मैं उस की सौतेली दादी ही तो हूं, लेकिन मैं नदीम को काबिल इनसान बना कर ही दम लूंगी. जब नदीम समझदार हो जाएगा तो वह जरूर मेरी नेकदिली को समझने लगेगा. ‘गनी को भी लोगों ने मेरे खिलाफ कम नहीं भड़काया था, लेकिन गनी को मेरे व्यवहार से जरा भी शंका नहीं हुई थी कि मैं उस की बुराई पर अमादा हूं.

अब नदीम का रोना भी बंद हो चुका था. उस का गुस्सा भी ठंडा पड़ गया था. उस ने चोर नजरों से दादी की ओर देखा. दादी की लाललाल आंखों और आंखों में भरे हुए आंसू देख कर उस से चुप न रहा गया. वह बोल उठा, ‘‘दादीजान, पड़ोस वाली चचीजान अच्छी नहीं हैं. वह झूठ बोलती हैं. आप मेरी सौतेली नहीं, सगी दादीजान हैं. नहीं तो आप मेरे लिए यों आंसू न बहातीं. ‘‘दादीजान, मैं जानता हूं कि आप को जोरों की भूख लगी है, अच्छा, पहले आप खाना तो खा लीजिए. मैं भी आप का साथ देता हूं.’’

नदीम की भोली बातों से कनीजा बी मुसकरा दीं और बोलीं, ‘‘बड़ा शरीफ बन रहा है रे तू. ऐसे क्यों नहीं कहता. भूख मुझे नहीं, तुझे लगी है.’’

‘‘अच्छा बाबा, भूख मुझे ही लगी है. अब जरा जल्दी करो न.’’ ‘‘ठीक है, लेकिन पहले तुझे यह वादा करना होगा कि फिर कभी तू अपने मुंह से अपने अम्मीअब्बू के पास जाने की बात नहीं करेगा.’’

‘‘लो, कान पकड़े. मैं वादा करता हूं कि अम्मीअब्बू के पास जाने की बात कभी नहीं करूंगा. अब तो खुश हो न?’’ कनीजा बी के दिल में बह रही प्यार की सरिता में बाढ़ सी आ गई. उन्होंने नदीम को खींच कर झट अपने सीने से लगा लिया.

अब वह महसूस कर रही थीं, ‘दुनिया वाले मेरा दर्द समझें न समझें, लेकिन नदीम मेरा दर्द समझने लगा है.’

गुलदारनी – भाग 3 : चालाक शिकारी की कहानी

चौधरी राम सिंह को जब पता चला कि स्वाति प्रधानजी के साथ हरिद्वार घूम आई है तो उन की काटो तो खून नहीं वाली हालत हो गई. उन्हें उन की ‘गुलदारनी’ के बारे में सूचना मिली कि उस ने आज एक नया तगड़ा शिकार किया है.

उस रात 9 बजे चौधरी राम सिंह के पास स्वाति का फोन आया. वह उन से तुरंत मिलना चाहती थी. चौधरी सबकुछ भूल कर स्वाति के घर की ओर लपके, मानो उन्हें दुनिया की दौलत मिल गई हो.

नरदेव चौधरी राम सिंह को घर के अंदर ले गया. स्वाति गुलाबी गाउन पहने सोफे पर बैठी थी. उस ने चौधरी को भी सोफे पर ही बैठा लिया और कहा, ‘‘चौधरी साहब, हमारे तो बस आप ही हो. आप के कहे बिना तो हम एक कदम नहीं चलते.

‘‘आप ने प्रधानजी को मना लेने की बात कही थी, हम ने उन्हें मना लिया. अब बचा हरिया, उस से एक बार मिलाने का जुगाड़ बिठा दो, तो बात बन जाए.’’

आज रसोईघर में चाय नरदेव बना रहा था. स्वाति बेझिझक बोल रही थी, लेकिन चौधरी को समझ नहीं आ रहा था कि वे अपने मन की बात कहें कि स्वाति की बात का जवाब दें.

स्वाति के साथ अकेले बैठने का मौका, वह भी रात में उन्हें पहली बार मिला था. इस से पहले कि वे अपने मन की कुछ कह पाते, नरदेव चाय ले कर आ गया.

चौधरी राम सिंह मन मसोस कर रह गए. स्वाति की बात का जवाब देते हुए उन्होंने कहा, ‘‘हरिया, तुम्हारे घर तो आएगा नहीं, उसे किसी बहाने से मुझे अपने घर की बैठक पर ही बुलाना पड़ेगा.’’

‘‘चौधरी साहब, आप किसी बहाने से भी बस हरिया को अपनी बैठक पर बुला लो. बस, फिर मैं ने जानी या उस ने जानी.’’

चौधरी राम सिंह स्वाति की बात को कैसे टालते? उन्होंने अगले दिन ही शाम को हरिया को अपनी बैठक पर बुला लिया.

दिन तकरीबन ढल चुका था. हरिया के आते ही उन्होंने चुपके से स्वाति को फोन कर दिया.

स्वाति नरदेव के साथ चौधरी राम सिंह की बैठक पर पहुंची. हरिया को देखते ही वह भड़क गई, ‘‘क्यों रे हरिया, तू हमारी बहुत इज्जत उतारने में लगा है. बहुत पंचायत कराने में लगा है. बोल अभी उतारू तेरी इज्जत. अभी फाड़ूं अपना ब्लाउज और शोर मचाऊं कि हरिया ने मेरी इज्जत पर हाथ डाला है.’’

स्वाति का यह गुस्साया रूप देख कर हरिया तो हरिया चौधरी राम सिंह भी दंग रह गए. हरिया को लगा कि उस ने किस से पंगा मोल ले लिया. यहां तो लेने के देने पड़ने की नौबत आ गई. कहां तो वह नरदेव को जूते लगवाने की बिसात बिछा रहा था, कहां खुद जूते खाने की नौबत आ गई.

हरिया ने अपने बचाव का रास्ता ढूंढ़ते हुए कहा, ‘‘न जी न, मैं कोई पंचायत नहीं करवा रहा. मैं तो अपने घर जा रहा हूं.’’

उस दिन से गांव में हरिया की बोलती बंद हो गई. चौधरी के मन में भी डर बैठ गया कि जो हरिया को ऐसी धमकी दे सकती है, वह एक दिन उस के साथ भी ऐसा कर सकती है.

अगले दिन चौधरी राम सिंह को खबर मिली कि पिछली रात जंगल की ‘गुलदारनी’ ने एक पिंजरा और पलट दिया और पिंजरा लगाने वालों को भी घायल कर दिया.

चौधरी राम सिंह को स्वाति अभी भी बुलाती है, पर चौधरी या तो कोई बहाना बना देते हैं या फिर अपनी पत्नी के साथ ही स्वाति के घर जाते हैं. स्वाति अभी भी उन की खूब सेवा करती है. सुना है कि बिल्ली प्रजाति के जानवर अपने शिकार पर वापस लौटते हैं.

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