सिर पर बड़ी बड़ी गठरियां, चेहरे पर मायूसी और बच्चों को पीठ पर लादे पलायन करते दिल्ली में मजदूरों की तसवीरें आप भूले नहीं होंगे. ये वही मजदूर हैं, जिन से शहरों को गति मिली, सङकें और अस्पताल बन कर तैयार हुए पर जब मुसीबत आई तो दिल्ली बेबस दिखी. नेता घरों में रामायण और महाभारत देखने में व्यस्त रहे. बस कुछ बचा था तो डर और अफवाहों का माहौल, जिस की गिरफ्त में आए मजदूरों के दुखदर्द को सुनने वाला शायद कोई नहीं था.

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