⚲

Short Story in Hindi : एक सचाई ऐसी भी

Short Story in Hindi. ‘‘अरे, तु झे ढूंढ़तेढूंढ़ते तो मैं परेशान हो गया. जल्दी चल, तेरा कलूटा अब नहीं रहा.’’

रमिया के तेज रफ्तार से बरतन मांजते हुए हाथों की लय बीच में ही टूट गई. वह खबर पहुंचाने वाले आदमी का चेहरा अजीब नजरों से घूरने लगी.

‘‘अब चल भी, मुझे ही घूरती रहेगी क्या?’’ उस आदमी ने रमिया को  िझड़की दी और बाहर निकल गया.

लेकिन रमिया के हाथ आधे गंदे पड़े हुए बरतनों पर घूमने लगे. पारुल ने उस को मना किया और घर जाने को कहा, लेकिन रमिया ने तो जैसे कुछ सुना ही नहीं. वह अपने काम में लगी रही.

पारुल से अब बरदाश्त नहीं हो रहा था. उस के भीतर कुछ उबलने लगा. वह गुस्से में भर कर बोली, ‘‘तु झे कोई दुख नहीं रमिया? तेरा आदमी मर गया. इतनी बड़ी बात हो गई और तू बरतन नहीं छोड़ रही है. लानत है तुझ जैसी औरत पर.’’

रमिया जवाब में चीखचीख कर कहना चाह रही थी, ‘सुखदुख तो तुम बड़े लोगों का होता है बहूजी. हम छोटे लोगों का क्या है, हम तो निरे जानवर हैं,’ लेकिन उस के मुंह से सिर्फ सिसकियां निकलीं. उस की आंखें तो जैसे पत्थर की हो गईं. आंसू का एक भी कतरा नहीं गिरा.

पारुल के लफ्ज रमिया को बुरी तरह चुभे. खैर, काम खत्म कर के वह चुपचाप अपने घर की ओर चल दी.

घर पर पहले से ही पूरी बिरादरी जमा थी. रमिया को देखते ही भीड़ में एक हलचल सी पैदा हो गई. सब लोग आपस में न जाने क्या खुसुरफुसुर कर रहे थे.

तभी रमिया की भाभी की तीखी आवाज ने सब का ध्यान अपनी तरफ खींचा, ‘‘कहां थीं महारानीजी, इतनी देर से? अरे, इसे अपने मर्द से कोई मोह तो था नहीं, क्योंकि इस के नाजनखरे उठाने को दूसरा मर्द जो बैठा है.’’

इस के बाद तो जैसे सब को बोलने का मौका मिल गया. जिस के दिल में जो आता, उलटासीधा बोलता जाता.

रमिया सिर  झुकाए, खामोशी से सबकुछ सुनती रही. कलूटे को मरे हुए 5 घंटे हो रहे थे, लेकिन रमिया की बेइज्जती करने के अलावा बिरादरी का एक भी आदमी कफन लाने के लिए नहीं उठा.

तभी मैकू वहां आया और लाश से लिपट कर रोने लगा. बिरादरी के लोग उसे ही रमिया का दूसरा मर्द कहते थे. वहां पर जमा लोगों ने उसे भी नहीं छोड़ा, लेकिन वह पत्थर बना सब की बातें सुनता रहा.

अगर मैकू चाहता तो एकएक को मुंहतोड़ जवाब दे सकता था, सब की इज्जत का परदाफाश कर देता. लेकिन वह बिना कुछ कहे कलूटे की शव यात्रा के लिए सामान खरीदने बाजार जाने के लिए उठ खड़ा हुआ.

अचानक रमिया मैकू के सामने आ गई. अपने आंचल में बंधे हुए कुछ मुड़ेतुड़े नोटों को उस के हाथ में रख कर रमिया बोली, ‘‘जब आज तक मैं ने किसी का कोई एहसान नहीं लिया, तो इस वक्त भी नहीं लूंगी.’’

इस के साथ ही रमिया की आंखों से आंसुओं की धारा जैसे बांध तोड़ कर बहने लगी.

मैकू अपनी जगह पर जड़ सा हो गया. वह इस औरत की खुद्दारी देख रहा था, जो इतनी आंधियों के बाद भी अपनी जगह पर कायम थी.

शाम होतेहोते लोग रमिया के आदमी की लाश को उठा कर श्मशान घाट की तरफ चल पड़े. सब के बारबार कहने पर भी रमिया ने सुहाग की निशानियों को नहीं मिटाया. कुछ हाथ उस को मारने के लिए उठे ही थे कि उसी वक्त पारुल वहां पहुंच गई और उसे अपने घर ले गई.

पारुल ने पहले रमिया को पानी पिलाया, फिर उसे सम झाने लगी, ‘‘तू क्यों जिद करती है… उतार दे इन सब को… जब तेरा आदमी ही नहीं रहा, तो यह सब बनावसिंगार किस के लिए?’’

बारबार यही बात सुनने के चलते रमिया मानो फट पड़ी. गुस्से में वह अपने को रोक नहीं पाई और बोली, ‘‘बहूजी, आप के मन में जो भी आता है, कह डालिए. वह कैसा आदमी था, मेरे दिल से पूछिए. मु झ से पैसे मांगमांग कर शराब पीता था और मेरी हड्डियां तोड़ता, सो अलग.

‘‘मैं कमाकमा कर उस के खर्चे पूरे करती. जब मेरा बड़ा बेटा हुआ, तो मैं कई दिनों तक काम पर नहीं जा सकी. तभी इसी कलूटे ने मु झे मैकू के हाथों बेच दिया…’’

रमिया अपने में ही खोई बोले चली जा रही थी और पारुल को लग रहा था, जैसे ये लफ्ज कहीं दूर से उस के पास आ रहे हैं.

पारुल सोच रही थी, ‘कितनी अजीब बात है. कितना कड़वा सच है. कहीं कोई बनावट नहीं है. इस ने अपने चेहरे पर कोई मुखौटा नहीं चढ़ाया है.’

थोड़ी देर बाद पारुल ने पूछा, ‘‘फिर क्या हुआ?’’

‘‘बहूजी, मेरे बदन को 1 नहीं, बल्कि 2-2 गिद्ध नोचते… फर्क सिर्फ इतना था कि मैकू ने आज तक मु झ पर हाथ नहीं उठाया और मेरे घर का खर्चापानी सब वही उठाता है. लेकिन कलूटे का खर्च, दवादारू, सब मैं ही करती रही. मैकू मु झे अपनी बीवी की तरह रखता है.

‘‘अब आप ही बताइए, मैं किसे अपना आदमी मानूं… उस हड्डी तोड़ने वाले कलूटे को या भरपेट खाना देने वाले इस मैकू को?’’

पारुल के पास रमिया के सवाल का कोई जवाब नहीं था. उस की दुखभरी कहानी सुन कर पारुल का नजरिया बदल गया था. रमिया उस की नजरों में ऊंची उठ गई थी, क्योंकि न तो उस ने कलूटा को ही छोड़ा और न ही खुद कहीं गई.

पारुल सोच रही थी, ‘अगर ऐसा कुछ हमारे समाज में होता, तो अब तक न जाने कब का तलाक हो चुका होता या जिंदगी की खौफनाक सचाई से डर कर मौत को गले लगा लिया होता. लेकिन रमिया पता नहीं किस मिट्टी की बनी है. हम लोगों के  झूठे मुखौटे वाले आदर्श से परे इस की सचाई कितनी मासूम है.’

इस के बाद पारुल ने रमिया से कुछ भी नहीं कहा. रमिया के हाथ पहले की तरह जूठे बरतनों पर फिसलने लगे थे.  Short Story in Hindi

-शिखा सुनील

Story in Hindi : ऐलान ए जग

Story in Hindi. ‘‘जल्दी चलो,’’ वह बोला.

‘‘मैं तो तुम्हारे पीछेपीछे ही आ रही हूं. तुम्हारे ही पैर नहीं उठ रहे हैं. मुड़मुड़ कर पीछे क्या देख रहे हो? दिल में कुछ है क्या?’’

‘‘कुछ नहीं, गांव छूट रहा है न… संगीसाथी… अपने लोग… छूट गए एक ही  झटके में. दर्द तो होगा ही. बहुत मजबूरी में गांव छोड़ रहा हूं.’’

‘‘एक बार फिर सोच लो, अभी कोई ज्यादा दूर नहीं आए हैं,’’ वह ठिठक कर खड़ी हो गई.

‘‘अब क्या सोचना है. हम तो अब ऐसे रास्ते पर निकल चुके हैं, जहां से वापस लौटना नामुमकिन है. मैं इस घटना को कमजोरी नहीं बनाना चाहता हूं. एक जंग की शुरुआत हो चुकी है.’’

‘‘हम गरीब मजदूर हैं, मेहनत के सिवा हमारे पास कुछ भी नहीं है. इतनी बड़ी लड़ाई हम कैसे लड़ेंगे? आने वाली परेशानियों को सोच कर डर गए, तो हम मुसीबत में आ सकते हैं, इसलिए हमें जल्दीजल्दी चलना चाहिए. समय नहीं है.’’

‘‘अभी बहुत समय है. स्टेशन कौन सा दूर है. गांव के लोग रात में दुबके पड़े होंगे. इस समय कौन आता है इधर?’’

‘‘यह रात हमारी दुश्मन बन गई है.’’

‘‘हमारा कुछ भी अपना नहीं है… हमारी इच्छाएं, हमारी खुशियां दूसरों के हाथों में होती हैं. हम मशीन हो कर रह जाते हैं. सामंत लोग हमें इनसान सम झते ही कहां हैं?

‘‘जब अपने ही दुश्मन बन जाएं, तो दूसरे रास्ते तलाशने पड़ते हैं. तुम अपने गांव को बहुत प्यार करते हो न?’’

‘‘हां, पर अब हम गांव छोड़ चुके हैं, यह अब फांसी का फंदा बन चुका है.’’

‘‘जहां जाएंगे, वहां ठीक से रह पाएंगे क्या?’’   ‘‘समय हर जख्म को भर देता है.’’

‘‘अगर ऐसा नहीं हुआ तो…’’ ‘‘कुछ नहीं होगा. नई माटी… नई गंध… नए लोगों के साथ नई जिंदगी बसाएंगे.’’

‘‘वह दिन जिंदगी का सब से अच्छा दिन होगा. जो कुछ हुआ, उस में तुम कहीं मु झे कुसूरवार तो नहीं मानते?’’

‘‘नहीं.’’   ‘‘वजह तो मैं ही थी.’’

‘‘तुम कुसूरवार नहीं हो. कोई भी हमारे बीच आया, तो उस का भी यही हाल होगा.’’

‘‘मैं बहुत खुश हूं कि तुम अपने गांव से इतना प्यार करते हो. एक न एक दिन इस गांव में तुम्हारे साथ जरूर वापस आऊंगी.

‘‘यह मेरी भी तो ससुराल है. जिस ने मेरी ससुराल… मेरा सुखचैन छीना, उस का सबकुछ छीन कर रहूंगी. मैं बदले की आग में जल रही हूं.’’

‘‘तुम्हारी बातों में बड़ी ताकत है. मु झे बहुत अच्छा लगता है, जब तुम बोलती हो. हमारे हालात बिगड़ गए हैं. हर कदम संभल कर उठाना है. कुछ छूटता है, तो कुछ मिलता भी है. यह तो जिंदगी में चलता ही रहता है.’’

‘‘औरत अपने को हर हाल में महफूज रखना चाहती है. कुछ गलत कदम भी उठ जाते हैं, जिस का नतीजा उसे शैतान के खूनी पंजों तक पहुंचा देता है. हर जगह औरत का शोषण होता है… वह बारबार टूटती है… जुड़ती है… उजड़ती है… बसती है.

‘‘मैं जिंदा रहना चाहती हूं, मैं बेइज्जती बरदाश्त नहीं कर सकती. औरत की बेइज्जती कुदरत की बेइज्जती है.’’

‘‘मैं तुम्हारी बहुत इज्जत करता हूं. इसीलिए तो इतना बड़ा काम कर दिया.’’

‘‘इसे हम जश्न के रूप में लेंगे… हम ऐसे जश्न हर रोज मनाएंगे… अपने साथ… औरों के साथ…’’

‘‘हम अपराधी हो गए हैं… कानून की नजरों में… गांव की नजरों में.’’

‘‘तुम अपराधी नहीं हो. तुम ने वही किया, जो हर पति करता. सच से कहीं भाग तो नहीं रहे हो न?’’

‘‘भाग कर जाऊंगा कहां? रहना तो यहीं है. हम ने इस तरह की जिंदगी सोची नहीं थी.’’

‘‘किस ने सोचा था? तुम ने सोचा था कि तुम्हारी बीवी के साथ चौधरी इतनी गिरी हरकत… बलात्कार करेगा आज रात? सोचने भर से ही जी कांप जाता है. वह बाप की उम्र का था. उस ने वह कर दिया… बेशर्म था.’’

‘‘उसे काट भी तो दिया.’’ ‘‘हम दोनों भी तो सजा के भागीदार हो गए?’’

‘‘बिना काटे भी तो मैं सजा का भागीदार बन जाता… अपनी नजरों में… तुम्हारी नजरों में?’’

‘‘खुश तो हो?’’ ‘‘दुखी नहीं हूं. मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता.’’

‘‘मैं ही कहां चाहती हूं तुम्हें खोना? इतना ही होता, तो मैं चौधरी को कटने नहीं देती. मौजमस्ती करती, उस के साथ और तुम फावड़ा ले कर खेत में काम करते. मु झे पसंद नहीं है यह सब… घिन आती है.’’

‘‘मैं खुश हूं तुम्हारा खून पानी नहीं हुआ है.’’

‘‘सच बताओ, तुम को कभी ऐसा लगता था क्या?’’ ‘‘नहीं.’’

‘‘हम और मजबूत हो गए.’’ ‘‘हर मोरचे पर मैं तुम्हारे साथ आगेआगे चलूंगी.’’

‘‘इसे बरकरार रखना है… हम जरूर कामयाब होंगे.’’

‘‘तुम सुल झे हुए हो. यह कामयाबी की पहली शर्त है.’’

‘‘हमें निराश नहीं होना पड़ेगा.’’

‘‘मुझे यहां का रास्ता नहीं मालूम है. कोई छोटा रास्ता पकड़ो. आम रास्ते से चलना अब ठीक नहीं होगा.’’

‘‘रात को इधर कौन आएगा?’’ ‘‘पूछ कर नहीं आएगा.’’

‘‘तेज चलो. समय बहुत कम है.’’

‘‘हम बहुत नजदीक आ गए हैं. मेरा मूड आज नाचने… गाने… मौजमस्ती करने का था. टेपरेकौर्डर में आज ही नई बैटरी लगवाई थी.’’   ‘‘मु झे मालूम है.’’

‘‘दिल को चोट लगी है… कह नहीं पा रही हूं?’’ उस का गला भर आता है. दोनों चुपचाप कुछ दूर तक चलते रहे.

‘‘बात करने से रास्ता जल्दी कट जाता है,’’ वह खामोशी तोड़ता है.

‘‘खामोश जिंदगी भी कोई जिंदगी है. मु झे बात करने में बहुत मजा आता है. बात करने से जी हलका होता है.’’

‘‘हमारी खुशी चौधरी ने छीन ली.’’

‘‘तुम्हारा यह रूप मु झे बहुत प्यारा लगा.’’ ‘‘मैं कमजोर नहीं रहूंगा.’’

‘‘कमजोर मर्द को औरत पसंद नहीं करती.’’

‘‘अविश्वास ही इनसानी रिश्ते को कमजोर बनाता है.’’

‘‘गलती करने का समय नहीं है. जिंदगी अंधेरे में चली जाएगी.’’

‘‘मैं भावुक हूं, लेकिन बेवकूफ नहीं. हालात की नाजुकता को सम झता हूं.’’

‘‘वह जो खेत में नीम का पेड़ है न, वहीं चल कर थोड़ी देर बैठते हैं. वहां से स्टेशन भी साफ दिखेगा. सिगनल हुआ कि दौड़ कर गाड़ी पकड़ लेंगे.

‘‘स्टेशन जाना अभी ठीक नहीं है. वहां गांव का कोई आदमी मिल गया, तो बहुत मुश्किल हो जाएगी.’’

दोनों आम रास्ता छोड़ खेत की मेंड़ पकड़ कर टेढ़ेमेढ़े रास्ते से होते हुए नीम के पेड़ के नीचे पहुंचे.

सुघरी ने बैग से निकाल कर एक नई चादर बिछा दी.

‘‘कितनी अच्छी है?’’ जमना ने उसे छू कर देखा.

‘‘मेरी भाभी मुंबई से लाई थीं… मेरी सुहागरात के लिए…’’

‘‘यहीं हमारी सुहागरात मनेगी,’’ कह कर वह हंसा.

‘‘आज जितना मिलेगा, उतने में ही हम अपना अच्छा समय बिताएंगे.’’

‘‘तु झे डर नहीं लगता है.’’  ‘‘नहीं. डरना क्या है? हर हालात से मुकाबला करने को तैयार रहना है. डरडर कर जीना कोई जीना नहीं रह जाता. हमें जिंदगी को अपने हिसाब से जीना है.’’

‘‘लोग बड़े गुनाह करते हैं और मजे से जीते हैं.’’ ‘‘हां, तुम ठीक कहते हो.’’

‘‘अब हम जोरजुल्म बरदाश्त नहीं करेंगे. अभी तो शुरुआत है… बहुतकुछ करना बाकी है.’’ ‘‘हक की लड़ाई लड़ेंगे.’’

‘‘यह काम पहले हो गया होता, तो आज हमारी यह हालत नहीं होती?’’ ‘‘हम ने सही राह पकड़ ली है.’’

‘‘थोड़ी और धार की जरूरत है.’’

‘‘गांव में सब से ज्यादा तुम्हारा ही परिवार चौधरी का शिकार हुआ है. जो उस ने मेरे साथ करने की कोशिश की, वह उस के जोरजुल्म की अगली कड़ी थी. किसी ने उस के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं की, उन की आंखों के सामने ही उन की बहूबेटियों की इज्जत लुटती रही और वे सबकुछ देखते रहे.

‘‘तुम्हारे बाबा ने आवाज उठाई थी. सामंतों ने उन की इतनी पिटाई की कि जिंदगीभर चारपाई से उठ नहीं सके. इस भयानक नतीजे को देख कर फिर किसी ने हिम्मत नहीं की.

‘‘चौधरी को जाना था, उस ने आग को सीने से लगाने की कोशिश की. तुम्हारे अंदर तुम्हारे बाबा की आग थी, राख से ढकी हुई… वक्त की हवा लगते ही ज्वाला बन गई. इतिहास रच गया.’’

‘‘तुम तो एकदम नेता हो गई हो.’’ ‘‘जुल्म के पैरों तले कुचली गई

एक औरत हूं, जिस की सुहागरात खून में रंग गई.’’

‘‘मु झे तुम्हारी बातें कुछ अलग सी लगती हैं.’’

‘‘तुम खुश तो हो न? जो काम तुम ने किया, वह मैं ने किया होता तो मैं बहुत खुश होती.’’

‘‘मैं खुश हूं, तभी तो तुम्हारे साथ हूं. सुनते हैं, प्यार में लोग कमजोर हो जाते हैं.’’

‘‘एकदम  झूठ. वे प्यार नहीं करते होंगे. तुम खुद सोचो न.’’

‘‘तुम ठीक कहती हो. मैं ही कभीकभी गड़बड़ा जाता हूं. तुम ने चौधरी को काट दिया. तुम मु झ से बहुत ज्यादा प्यार करती हो. कितना खुश हूं आज मैं.’’

‘‘चौधरी शैतान था. मैं ने बहुत कोशिश की उसे बहलानेफुसलाने की, पर उस पर तो शैतान सवार था. उसे आदत पड़ गई थी. वह मु झे उसी अंदाज में इस्तेमाल करना चाहता था.

‘‘मैं उस नरक की जिंदगी से मरना ज्यादा पसंद करती हूं. वह मु झ पर एकदम हावी हो गया था. तुम समय पर नहीं आए होते, तो वह अपनी मनमानी कर लेता. फिर उस की नहीं, मेरी लाश वहां पड़ी होती.’’

‘‘ऐसी बातें मत करो.’’

‘‘तुम ने मु झे बचाया है इसलिए कि मैं तुम्हारी बीवी हूं. जिसे तुम जीजान से प्यार करते हो. अपनी प्यारी चीज पर जब खतरा आया दिखता है, तो इनसान उस से मुकाबला करने के लिए अपनी पूरी ताकत  झोंक देता है.

‘‘तुम्हीं सोचो, तुम मु झे उस हालत में देख कर आंखें बंद कर के ऊपर वाले को याद करते, तो क्या हो जाता? तुम्हारे ऊपर वाले के आने के पहले तुम्हारी बीवी की इज्जत चौधरी लूट चुका होता और तुम नामर्द बने खड़ेखड़े आंसू बहाते रहते.

‘‘मैं खुश हूं… तुम को पति के रूप में पा कर. मैं तो तुम्हारी यादों में खोई हुई थी कि तभी चौधरी आ टपका, हमारी जिंदगी में जहर बन कर.

‘‘उसे देख कर मेरे मन में कुछ शक तो हो ही गया था. फिर भी मैं ने हिम्मत जुटा ली थी किसी भी हालात से निबटने के लिए.

‘‘मैं ने मन बना लिया था कि थोड़ा इधरउधर की बातें कर के उसे टरका दूंगी. वह मालिक है, यह तो याद ही रखना था. उस ने तुम से कहा और तुम आज्ञाकारी नौकर की तरह बोरिंग चालू करने खेत में चले गए.

‘‘मैं अकेली हो गई थी एक खूंख्वार मांसभक्षी के सामने, जो मेरे अंगअंग को ऐसे देख रहा था, जैसे कोई कसाई बकरे को.

‘‘मैं कमरे में आ गई. वह भी मेरे पीछेपीछे आ गया. उसे चौकी पर बैठने को कहा. वह एक खतरनाक मुसकराहट के साथ बैठ गया.

‘‘मैं जैसे ही बाहर निकलने के लिए आगे बढ़ी कि उस ने बाज की तरह  झपट कर मु झे पकड़ लिया.

‘‘मैं ज्यादा कुछ सम झती, वह तब तक मु झ पर हावी हो चुका था. उस ने मेरे कपड़े नोच कर मु झे नंगा कर दिया था कि मैं बाहर निकल कर न भाग सकूं. उस की प्लानिंग सही थी. मेरा नंगा होना मेरी मजबूरी बन गई थी.

‘‘मैं उस से लड़तेलड़ते थक गई थी… सारी कोशिशें बेकार हो गई थीं. उसे तो बस अपनी आग शांत करने की जल्दी थी.

‘‘मु झे महसूस होने लगा कि मैं अपने को ज्यादा देर तक नहीं बचा सकती. वह भूखे भेडि़ए की तरह मेरे नंगे जिस्म को नोच रहा था.

‘‘वह चाहता था कि प्यार से ही काम हो जाए, लेकिन मैं कतई राजी नहीं थी. लिहाजा, वह पहले से भी ज्यादा खूंख्वार हो गया.

‘‘मैं उस के चंगुल से छूटने के लिए छटपटाने लगी. उस का शिकंजा कसता गया. मैं ने पूरी ताकत से लात मार कर उसे चौकी से नीचे गिरा दिया.

‘‘मैं जैसे ही साड़ी ले कर बाहर जाने को भागी, उस के हाथ में मेरा पैर आ गया. उस ने  झटके से मु झे कमरे में खींच लिया.

‘‘मैं ने जोर से चिल्लाना शुरू किया, ताकि तुम सुन कर आ जाओ… या वह मु झे अपनी बदनामी के डर से छोड़ दे.

‘‘मु झे मालूम था कि वहां और भी लोग होंगे, पर उस के ऊपर इस का कोई असर नहीं पड़ा. तब तक तो तुम आ ही गए. सबकुछ अपनी आंखों से देख लिया और चौधरी के ऊपर फावड़े से वार पर वार करने लगे.

‘‘उस के कितने टुकड़े हो गए थे… गिनना भी मुश्किल हो गया था. खून के फव्वारे से पूरा कमरा रंग गया था. तुम्हारे ऊपर भी खून के छींटे पड़े थे.

‘‘मैं कोने में खड़ी थरथर कांप रही थी. बहुत ही डरावना नजारा था. तुम ने फावड़ा एक तरफ रख कर मेरी तरफ देखा. मैं दौड़ कर तुम से लिपट गई.’’

‘‘मैं ने जो किया, उसे क्या कहेंगे?’’ जमना ने पूछा.

‘‘तुम ने मेरी इज्जत बचा ली थी. एक मर्द का काम किया,’’ सुघरी उस से लिपट कर बोली.

‘‘लेकिन मु झे लगता है, हम लोग अकेले पड़ गए हैं. कोई साथ नहीं देगा. सब गाली देते होंगे… घर वालों को लोग बहुत सताएंगे… मारपीट करेंगे,’’ जमना ने शक जाहिर किया.

‘‘ऐसा मत सोचो. हमारे साथ समाज के सताए लोग होंगे, उन की हमदर्दी होगी. जहां तक हमारे घर वालों को मारनेपीटने का सवाल है, उन की तरफ आंख उठा कर कोई देखेगा भी नहीं.

‘‘चौधरी की मौत से हमारा परिवार ताकतवर हो गया है. सब से ज्यादा खुश होेंगे तुम्हारे बाबा… अब कोई भी गांव की बहूबेटियों की तरफ बुरी नजर डालेगा, तो वह सोचेगा, कहीं कोई और जमना किसी चौधरी को फिर काट न दे?’’ सुघरी फख्र से बोली.

उन्होंने स्टेशन की तरफ देखा. गाड़ी आ चुकी थी और हरी बत्ती जल गई थी. जल्दीजल्दी दोनों ने सामान समेटा और स्टेशन की तरफ दौड़ पड़े. Story in Hindi

-उदय भानु राय

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें