Genz: जेनजी-टैक जीनियस, स्किल में जीरो

जेनजी ऐसी पीढ़ी है जिस की बुद्धि स्मार्टफोन की तरह है लेकिन विवेक एयरोप्लेन मोड पर है. यह वह पीढ़ी है जिस के पास हर सवाल का जवाब एक गूगल क्लिक पर मौजूद है लेकिन जीवन में क्या करना है, स्ट्रगल किसे कहते हैं और अनुशासन किस चिडि़या का नाम है? ये जरूरी सवाल जेनजी की जिंदगी से कोसों दूर हैं.

ज  नरेशन जेड या जेनजी एक ऐसी पीढ़ी है जिसे भ्रम है कि वह टैक्नोलौजी को उंगलियों पर नचाती है. सच तो यह है कि यह पीढ़ी टैक्नोलौजी के इशारों पर नाच रही होती है. सोशल मीडिया ने इस पीढ़ी को इतना कनैक्टेड बना दिया कि इस पीढ़ी का असली दुनिया से कनैक्शन ही टूट गया. यह वह पीढ़ी है जो 15 सैकड के शौर्ट वीडियोज में टिपिकल डांस को कौपी कर लेती है लेकिन 15 मिनट की मीटिंग में बोर हो जाती है. जेनजी वह पीढ़ी है जो स्क्रीन पर ग्लोबल सिटिजन बन जाती है लेकिन घर में पेरैंट्स को नहीं पहचान पाती.

टैक्नोलौजी में अव्वल लेकिन स्किल्स में पिछड़े हुए चैंपियन हैं ये युवा. जेन जेड को देख कर लगता है जैसे ये लोग जन्म से ही एआई और रील्स के साथ पैदा हुए हों. डिलौयट की 2025 रिपोर्ट के मुताबिक, 74 प्रतिशत जेन जेड मानते हैं कि दुनिया में जीने के लिए सिर्फ सोशल मीडिया का साथ काफी है. धूमकेतु आ जाए, सुनामी आ जाए या 12 स्केल का भूकंप आ जाए, जेन जी के हाथों से मोबाइल नहीं छूट सकता. यही वजह है कि दुनिया के 70 प्रतिशत बिजनैस लीडर्स यह मानते हैं कि जेन जी में कम्युनिकेशन स्किल्स जीरो है. 41 प्रतिशत बिजनैस लीडर्स कहते हैं जेन जेड ग्रेजुएट्स वर्कफोर्स के लिए तैयार ही नहीं है. गार्टनर के अनुसार, 51 प्रतिशत जेन जेड खुद मानते हैं कि वे रियल जौब के लिए तैयार नहीं हैं.

असल में इस पीढ़ी को सोशल मीडिया ने अपंग बनाया है. यह जहर धीमेधीमे नसों में समा चुका है. मांबाप भी दोषी हैं. शुरुआत में परवा नहीं की. मोबाइल में घंटों बिताते रहे पेरैंट्स को लगा कि चलो, बच्चा कहीं तो बिजी है. लेकिन यही मोबाइल की लत धीरेधीरे जहर बन गई. ऐसा जहर जिस ने जेन जी के दिमाग को पूरी तरह खोखला बना दिया. स्क्रौलिंग, शौर्ट वीडियो और 2× स्पीड ने ध्यान का स्पैन इतना छोटा कर दिया कि 51 प्रतिशत युवाओं का फोकस ही खत्म हो गया.

प्यू रिसर्च 2025 की रिपोर्ट कहती है, 48 प्रतिशत टीनऐजर्स के पीयर्स पर सोशल मीडिया नैगेटिव असर डाल रहा है. नतीजा? सौफ्ट स्किल्स, एम्पैथी, लीडरशिप में जीरो हो गए. जेन जी को ये सब बूढ़ों की बातें लगती हैं. समय की कोई कीमत नहीं, स्क्रीन ही सबकुछ है. हालत यह है कि औसतन जेनजी रोज 4 से

9 घंटे स्क्रीन पर बिताता है. साइबर स्माइल 2025 रिपोर्ट के अनुसार, 60 प्रतिशत जेन जेड 4 घंटे से ज्यादा सोशल मीडिया पर बिताते हैं. जबकि सर्जन जनरल की चेतावनी है कि 3 घंटे से ज्यादा स्क्रीनटाइम हो तो डिप्रैशन व एंग्जाइटी का रिस्क डबल हो जाता है.

ये लोग समय को स्टोरी सम?ाते हैं. 24 घंटे में 24 स्टोरी पोस्ट लेकिन इन के पास पेरैंट्स के लिए 24 मिनट भी नहीं होते. असल में सोशल मीडिया ने समय को इतना सस्ता कर दिया कि जेन जेड को लगता है कि लाइफ एक इन्फिनिटी स्क्रौल है और पैसा फोमो. सो, खर्च करो, कल देखेंगे.

हैल्पेज इंडिया और दूसरी स्टडीज दिखाती हैं कि जेन जेड अपने पेरैंट्स को ‘आउटडेटेड’ मानता है, इसलिए पेरैंट्स के साथ इंटरैक्शन जीरो है. 52 प्रतिशत भारतीय जेन जेड पेरैंट्स से बात करने के बजाय चैटजीपीटी से पूछ लेते हैं. हालांकि भारत में 82 प्रतिशत जेन जी घर में रहते हैं और पूरी तरह पेरैंट्स की कमाई पर निर्भर हैं. फिर भी रिस्पैक्ट के नाम पर बस इतना काफी है कि वो पौकेटमनी देते हैं. पेरैंट्स की सुनें क्यों? क्योंकि मेरी जिंदगी मेरी मरजी. सोशल मीडिया ने इन्हें इतना आत्मकेंद्रित बना दिया है कि परिवार सैकंडरी हो गया है.

जेनजी वह पीढ़ी है जिस में इंटैलिजैंस तो भरपूर है लेकिन बेसिक व्यावहारिक ज्ञान से वह कोसों दूर है. ये युवा किसी भी ऐप को 47 सैकंड में क्रैक कर लेते हैं. एआई से बेहतर प्रौम्प्ट लिख देते हैं, 15 सैकंड की रील में पूरी फिलौसफी समझा देते हैं लेकिन समझदारी थोड़ी बफरिंग में अटकी हुई है. बुद्धि तेज है बिलकुल 5जी वाली लेकिन समझदारी अभी 2जी नैटवर्क पर है. कुल मिला कर बात यह है कि जेनजी वह पीढ़ी है जो दुनिया बदलने की क्षमता तो रखती है लेकिन पहले यह तय करना भूल जाती है कि बदलाव किस दिशा में करना है. गलतियां ये इतनी तेजी से करते हैं कि सीखने की स्पीड स्लो हो जाती है.

बरबाद पीढ़ी जेनजी
जेनजी टैक्नोलौजी में अव्वल है, इस बात में कोई शक नहीं लेकिन स्किल्स, सम्मान, व्यावहारिकता, समय और पैसे के मामले में यह पीढ़ी पूरी तरह बरबाद है. यह पीढ़ी स्क्रीन के पीछे परफैक्ट लाइफ जी रही है लेकिन असल में एंग्जाइटी, शौर्ट अटैंशन और इमोशनल डिसकनैक्ट का शिकार है. सोशल मीडिया ने इन्हें कनैक्टेड जरूर बनाया लेकिन खुद से, परिवार से और रियलिटी से सब से जरूरी कनैक्शन तोड़ दिया है. सब से बड़ा सवाल यह है कि जेनजी खुद जागेगी या स्क्रौल करतेकरते नैक्स्ट जनरेशन को भी यही विरासत देगी?

लेखक  शकील प्रेम

Reader Problem: सच्ची सलाह

Reader Problem: मैं 28 साल की लड़की हूं और उत्तर प्रदेश के एक गांव में रहती हूं. मेरा छोटा भाई मोबाइल फोन पर इतना ज्यादा समय बिताता है और रील बनाता है कि हम सब उस से परेशान हो गए हैं. उस की उम्र अभी 24 साल है और वह यही राग गाता है कि रील बना कर पैसे कमाएगा.


इस चक्कर में वह एक दिन अपना मोबाइल फोन ले कर पेड़ पर चढ़ गया और मधुमक्खी का छत्ता छेड़ दिया. इस के बाद मधुमक्खियों ने उस का इतना बुरा हाल किया कि वह पेड़ से नीचे जा गिरा. मोबाइल फोन टूटा, सो अलग. पर इस बात से भी उस ने कोई सबक नहीं लिया. उस के दोस्त भी ऐसे ही हैं. रील बनाने में ऊटपटांग हरकतें करते हैं और अपनी जिंदगी बरबाद कर रहे हैं. मुझे ऐसा क्या करना चाहिए कि मेरे भाई को अक्ल जाए?


अब आप के भाई का सुधरना मुश्किल है, क्योंकि रील बनाने का नशा किसी ड्रग के नशे से कम नहीं होता. फिर भी ये उपाय आजमा कर देखें, शायद कुछ बात बने:
* उसे रील बनाने से रोकने के लिए सख्ती करें और ही डांटेपीटें. इस से वह या कोई सुधरता होता तो दुनिया से यह रोग कभी का खत्म हो जाता.
* उस की बनाई रील्स में दिलचस्पी लें. उस से पूछें कि यह रील बनाने का उस का मकसद क्या था और दर्शकों को इस से क्या मिलेगा.
* उसे रील बनाने के लिए कुछ आइडिया दें, जिन में ज्यादा मेहनत
लगनी हो.
* उसे समझाएं कि फिल्मों की तरह एक अच्छी रील बनाने से पहले उस की स्क्रिप्ट लिखें तो रील में जान जाएगी. इस से उस में लिखने का शौक पैदा होगा.
* कुछ दिन यह सब करने के बाद उस की रील्स की तारीफ करते हुए उसे बताएं कि रील बनाना कोई हर्ज की बात नहीं, लेकिन इस का टाइम फिक्स होना चाहिए. इस से आदत कम हो सकती है. फिर उसे समझाएं कि रील बनाने से जिंदगी नहीं चलती. इस से सिवा समय और पैसे की बरबादी के कुछ हासिल नहीं होता.
  
मेरी उम्र 37 साल है. मैं कानपुर की एक प्राइवेट कंपनी में काम करता हूं. चूंकि मैं मूल रूप से दक्षिण भारत का रहने वाला हूं, तो मुझे कानपुर वालों की एक बात बिलकुल भी अच्छी नहीं लगती कि ज्यादातर लोग पान
और पान मसाले का सेवन करते हैं और सड़क पर ही थूक देते हैं.
सरकारी दफ्तरों के आसपास भी पान की पीक के लाल निशान देखे जा सकते हैं.
प्रशासन ने इस पर जुर्माना भी तय किया हुआ है, पर लोग मानते ही नहीं हैं. ऐसा लगता है कि पूरा कानपुर ही पानमसाले से लाल हो गया है.
इस सब के चलते मुझे रात को नींद नहीं आती है और मैं तनाव में रहता हूं. मैं क्या करूं?
पान गुटखा खा कर कहीं भी पीक थूकना कानपुर का जैसे कल्चर है. इसे बदल पाना मुश्किल है. अकेले आप तो कुछ नहीं कर सकते, लेकिन अपने दफ्तर घर के आसपास के लोगों को समझा सकते हैं.
इन दिनों स्वच्छता अभियान का बड़ा जोर है. अपने लैवल पर इस का प्रचार करें और सोशल मीडिया पर मुहिम चलाएं कि हम कानपुर वाले स्वच्छता
के मामले में इंदौर को पीछे क्यों नहीं छोड़ सकते.
कानपुर पान मसाला, खैनी बनाने का भी गढ़ है, इसलिए भी वहां के लोग यहांवहांपिचपिचकरते रहते हैं और इस पर उन्हें शर्म नहीं आती, बल्कि गर्व होता है.
तो आप इस आदत पर मन ही मन लानत भेजते रहिए और दूसरों के किए गए तनाव को मत पालिए. इस पर भी तनाव कम हो, तो किसी दूसरे शहर में ट्रांसफर करवा लीजिए.          


सच्ची सलाह के लिए कैसी भी परेशानी टैक्स्ट या वौइस मैसेज से भेजें. मोबाइल
नंबर : 08826099608  

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