Hindi Story: हिसाब

Hindi Story: पिता का साया उठते ही मुन्नी का बचपना अचानक बालिग हो गया. परिवार पालने के लिए वह आर्केस्ट्रा में डांसर बनी जहां साहिल ने उस की देह भोगी. भाई भी उसे पसंद नहीं करता था. क्या मुन्नी के बलिदान का हिसाब हुआ?

मुन्नी को कभी यह एहसास ही नहीं हुआ कि वह कब बड़ी हो गई. उस के जीवन में उम्र का बढ़ना किसी उत्सव की तरह नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की तरह आया, बिना पूछे, बिना रुके. मुन्नी घर की बड़ी बेटी थी. छोटे भाई की बड़ी बहन और मां के लिए एक ऐसा सहारा जो बचपन में ही बालिग बना दिया गया. जब मुन्नी 12 साल की थी, तभी पिता का साया उठ गया. प्राइवेट नौकरी थी उन की, कोई पैंशन नहीं, कोई जमीनजायदाद नहीं.

पिता की मौत के बाद सरकार की अनुकंपा पर मां को नौकरी तो मिली, पर इतनी मामूली कि उस से घर का गुजारा ही बड़ी मुश्किल से हो पाता था. घर में शोक था, पर उस से भी बड़ा बोझ जिम्मेदारी का था. पिता के जाने के कुछ महीनों बाद ही मुन्नी की किताबें धीरेधीरे बंद होने लगीं. 8वीं जमात के बाद स्कूल जाना छूट गया. मां ने कहा नहीं था कि पढ़ाई छोड़ दो, पर हालात ने कह दिया था. किसी ने जोर नहीं डाला, किसी ने रोका भी नहीं. समाज में यह तय था कि लड़की की पढ़ाई रुके तो चलेगा, पर लड़कों की नहीं. मुन्नी ने चुपचाप यह नियम स्वीकार कर लिया.

किशोरावस्था मुन्नी के जीवन में आई ही नहीं. जब उस की सहेलियां सपने बुन रही थीं, तब वह सुबह चूल्हा जलाती, भाई को स्कूल भेजती और मां की थकी आंखों में झांक कर समझ जाती कि शिकायत का कोई मतलब नहीं. वह खुद को भूले चली गई. 18 की उम्र, वही उम्र जब लड़कियां खुद को खोजती हैं, सजती संवरती हैं और भविष्य के सपने देखती हैं, लेकिन मुन्नी के लिए यह उम्र एक डर बन कर आई. समाज की बेरहम नजरें, महल्ले की फुसफुसाहट और हर दिन बढ़ता बोझ.

एक डाक्टर के यहां सेविका की नौकरी मिली, 5,000 रुपए महीना. यह नौकरी मुन्नी के लिए सम्मान नहीं, मजबूरी थी. सुबह से शाम तक काम, फिर घर लौट कर वही जिम्मेदारियां. शरीर थक जाता, मन उस से पहले. यहीं मुन्नी की मुलाकात साहिल से हुई. साहिल सिक्योरिटी गार्ड था, स्मार्ट, आत्मविश्वासी और बातों में चालाक. उस ने मुन्नी से वैसे बात की, जैसे अब तक किसी ने नहीं की थी. दया, आदेश, बस अपनापन.
मुन्नी के जीवन में पहली बार किसी ने उस से पूछा था, ‘‘तुम थक जाती हो ?’’

यह सवाल मुन्नी को भीतर तक छू गया. धीरेधीरे वह साहिल की बातों पर भरोसा करने लगी. उस ने मुन्नी को समझाया कि उस की मेहनत की सही कीमत नहीं मिल रही. उस ने शहर की एक नामी आर्केस्ट्रा कंपनी में काम करने का सुझाव दिया, जहां एक रात में 1,000 से 1,200 रुपए मिलते थे. खाना अलग.
‘‘इस से घर की हालत सुधर जाएगी,’’ साहिल ने कहा. मुन्नी ने ज्यादा नहीं सोचा. वह सोच भी कैसे पाती? उसे बचपन से यही सिखाया गया था कि वह दूसरों के लिए जिए. मां और भाई को बताया गया कि नाइट ड्यूटी है. सच आधा था, झूठ पूरा.

आर्केस्ट्रा कंपनी में मुन्नी की शुरुआतबैक डांसरके रूप में हुई. पहले दिन मंच पर चढ़ते समय उस के पैर कांप रहे थे. तालियों की आवाज अजनबी थी, नजरें और भी ज्यादा. धीरेधीरे उसे तालियों की आदत पड़ गई. फिर कपड़े छोटे हुए, कदम तेज हुए और आत्मसम्मान कहीं पीछे छूटा चला गया. एक साल के भीतर मुन्नी फ्रंट लाइन में थी. आमदनी बढ़ी, पर कीमत भी. पैसा घर जा रहा था, भाइयों की पढ़ाई चल रही थी, इसी ने उसे चुप रखा. साहिल से नजदीकियां बढ़ीं. मुन्नी ने पहली बार भविष्य के सपने देखेशादी, सम्मान, एक सामान्य जीवन. लेकिन हर बार जब वह शादी की बात करती, साहिल टाल देता.

साहिल के लिए मुन्नी कभी सिर्फ एक लड़की नहीं थी, बल्कि वह उस के लिए सुविधा थी, सहारा थी और बिना जवाबदेही का रिश्ता. उसे मुन्नी से वह सब मिला, जिस के लिए किसी भी मर्द को समाज के सामने कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती. मुन्नी के बढ़ते पैसों से साहिल की जिंदगी आसान होती गई. कभी मोबाइल रिचार्ज, कभी कपड़े, कभी दोस्तों के साथ शराबछोटीछोटी जरूरतों के नाम पर वह उस का पैसा लेता रहा और मुन्नी देती रही, क्योंकि उसे यह सिखाया गया था कि प्रेम में हिसाब नहीं होता. जिस देह को साहिल सार्वजनिक मंच पर नाचते देखता था, उसी देह को निजी कमरों में वह बिना किसी वचन, बिना किसी भविष्य के भोगता था.

सब से बड़ा फायदा यह था कि साहिल को कुछ भी साबित नहीं करना पड़ता था. शादी का दबाव, जिम्मेदारी का बोझ, समाज का डर, क्योंकि समाज का नियम सीधा है कि अगर रिश्ता टूटेगा, तो सवाल औरत से होंगे. साहिल जानता था कि मुन्नी  के पास जाने को कोई सुरक्षित रास्ता नहीं है. उस की मजबूरी ही साहिल की ताकत थी. जब तक मुन्नी उस के लिए उपयोगी थी, भावनात्मक रूप से भी, आर्थिक रूप से भी, तब तक साहिल मुसकराता रहा. और जिस दिन मुन्नी ने सम्मान मांगा, शादी की बात की, भविष्य में बराबरी चाही, उसी दिन साहिल ने समाज का सब से पुराना हथियार उठायाचरित्र.

‘‘तुम जैसी लड़कियों से शादी नहीं की जाती,’’ यह कहते समय साहिल यह भूल गया या जानबूझ कर अनदेखा कर गया कितुम जैसी लड़कीउस ने खुद बनाई थी, अपने फायदे के लिए, अपनी सुविधा के लिए. यह एक वाक्य नहीं था. यह समाज का फैसला था, साहिल के मुंह से निकला हुआ. मुन्नी को लगा जैसे किसी ने उस के भीतर सालों से जमा आत्मसम्मान को एक झटके में कुचल दिया हो. उसे याद आया वही साहिल, जिस ने उसे इस रास्ते पर चलने की सलाह दी थी. वही साहिल, जिस ने उस की देह को चाहा, उस के पैसों से सुविधा पाई और उस के त्याग को चुपचाप इस्तेमाल किया.

आज वही साहिल उसेतुम जैसी लड़कीकह रहा था. उस पल मुन्नी को पहली बार साफ दिखा कि समाज और मर्द, दोनों की नैतिकता एकजैसी होती है. जरूरत पड़ने तक चुप्पी और जरूरत खत्म होते ही चरित्र का सवाल. आर्केस्ट्रा में नाचते समय जिन हाथों ने तालियां बजाई, उन्हीं हाथों ने अब उंगलियां उठाईं. दिन में वही लोग उसे गिरी हुई कहते थे और रात में उसी पर नोट उड़ा कर खुद को सभ्य समझते थे. मुन्नी ने महसूस किया कि उस ने कभी कोई गलत चुनाव नहीं किया, उस के सामने बस गलत औप्शन रखे गए थे. उस की सब से बड़ी गलती यह थी कि उस ने भरोसा किया और इस समाज में एक औरत का भरोसा ही उस का सब से बड़ा अपराध होता है.

उस रात मुन्नी देर तक आईने के सामने बैठी रही. उस आईने में उसे नर्तकी दिखी, प्रेमिका बस एक औरत दिखी, जिसे हर किसी ने अपनी सुविधा के हिसाब से परिभाषित किया था. मुन्नी को समझ गया कि औरत की देह जब तक जरूरत है, तब तक मौन स्वीकृति है और जैसे ही वह सम्मान मांगती है, उसे उस के अतीत से सजा दी जाती है. मुन्नी इस दुनिया से निकलना चाहती थी. लेकिन पैसों की कमी, भाई की पढ़ाई और घर का खर्च, सब ने उस के पैरों में बेडि़यां डाल रखी थीं. मुन्नी की उम्र 30 के पार पहुंची. काम मिलने लगा कम. भाई बड़ा हो गया था. उसे सबकुछ समझ आने लगा था, पर उस ने भी आंखें बंद कर लीं. सच देखना आसान नहीं होता खासकर जब सच आप के आराम की कीमत पर हो.

मां की मौत के बाद मुन्नी पूरी तरह अकेली रह गई. मुन्नी का भाई सबकुछ जानता था. वह इतना मासूम था कि सच समझ पाता, इतना नासमझ कि हालात से अनजान रहता. भीतर ही भीतर उसे बहन के काम से नफरत थी, ऐसी नफरत जो बोलती नहीं, बस जलाती रहती है. लेकिन वह चुप रहा. इसलिए नहीं कि उसे सच स्वीकार था, बल्कि इसलिए कि वही सच उन के भविष्य की सीढ़ी बन चुका था. मुन्नी की कमाई से भाई की पढ़ाई चली, किताबें आईं, कपड़े बदले, सपने बड़े हुए. वह घर में उस की ओर
देखता कम था, उस के पैसों की ओर ज्यादा. जब पड़ोस में बातें होतीं, सिर झुका लेता. विरोध नहीं, बस बचाव. क्योंकि विरोध की कीमत होती है और उस कीमत को चुकाने की हिम्मत उस में नहीं थी.

भाई ने अपना घर बसा लिया था. जिस के लिए मुन्नी ने सबकुछ दांव पर लगाया था, वही उस से दूरी बनाने लगा. अब उसे उस के पैसों की जरूरत नहीं थी और समाज में एक औरत की कीमत अकसर उस की जरूरत तक ही होती है. वह उस समय चाहता था कि बहन इस दलदल से बाहर आए, लेकिन बिना यह पूछे कि बाहर आने के बाद वह जिएगी कैसे. उस की चुप्पी में नाराजगी भी थी, अपराधबोध भी, पर उस से ज्यादा सुविधा थी. और यह सुविधा नैतिकता की सब से बड़ी कमजोरी बन गई. आज जब मुन्नी अपने घर में सम्मान से बैठी है, तब उस की चुप्पी और भी गहरी हो गई है. अब बोलने से सिर्फ एक ही सवाल उठेगा किजब तुम्हें नफरत थी, तब तुम ने आवाज क्यों नहीं उठाई?’

मुन्नी उसी एक कमरे में रह गई, खामोश, अकेली, थकी हुई. आज वह समझ रही है कि औरत का जीवन अकसर कर्तव्य औरचरित्रके बीच पिसता है. अगर वह परिवार के लिए जिए, तो त्याग की देवी. अगर अपने लिए कुछ चाहे, तो चरित्र पर सवाल. नाचने वाली औरत को हर मर्द भोगता है, चाहे वह प्रेमी के रूप में हो, भाई के रूप में या समाज के रूप में. आज मुन्नी किसी मंच पर नहीं नाचती. अब उस के जीवन में तालियां नहीं हैं, सिर्फ सन्नाटा है. वह उसी एक कमरे में रहती है, जहां दीवारों पर अब भी बीते सालों की आवाजें टकरा कर लौट आती हैं. कभी मां की थकी सांसें, कभी भाई की पढ़ाई की चिंता, कभी साहिल की मीठी और फिर कड़वी बातें.

मुन्नी अब किसी से शिकायत नहीं करती. शायद इसलिए नहीं कि दर्द कम हो गया है, बल्कि इसलिए कि वह समझ चुकी है कि इस समाज में औरत की पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं, जब तक वह मनोरंजन बने.
मुन्नी अपनेआप से पूछती है कि क्या उस का त्याग कभी किसी खाते में दर्ज हुआ? क्या उस की जवानी, उस का श्रम, उस का मौन किसी रजिस्टर में लिखा गया? या फिर औरत का बलिदान हमेशा स्वाभाविक मान कर भुला दिया जाता है? मुन्नी को याद आता है कि जब वह कमाती थी, तब सब चुप थे. जब उस ने सवाल किया, तब सब ने चरित्र देखा. समाज ने उस से कभी यह नहीं पूछा कि उस ने क्या खोया, बस यह गिना कि उस ने क्यागलतकिया.

मुन्नी को इस बात का दुख नहीं है कि उस ने सब के लिए जिया, दुख इस बात का है कि किसी ने यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि वह भी इनसान थी. आज उस का भाई अपने बच्चों को अच्छे संस्कार सिखाता हैं. उन्हें नाचती औरतें बुरी लगती हैं. मुन्नी यह सोच कर मुसकरा देती है कि शायद उस के जीवन का बलिदान अगली पीढ़ी के लिए उदाहरण बन गया, लेकिन उस के लिए कभी इंसाफ नहीं बन सका. मुन्नी अब यह नहीं पूछती, ‘‘मेरे लिए कौन जिएगा?’’ अब मुन्नी एक और सवाल पूछती है, ‘‘कब तक औरत का बलिदान बिना हिसाब के चलता रहेगा?’’ शायद अब यही  सवाल मुन्नी की नई शुरुआत बने और उसे कुछ सुकून दे.     

पाकिस्तानी हौकी खिलाडि़यों ने आस्ट्रेलिया में धोए बरतन पाकिस्तान की नैशनल हौकी टीम के कप्तान इमाद बट ने आस्ट्रेलिया से लौटने के बाद लाहौर हवाई अड्डे पर मीडिया से बात करते हुए कहा कि आस्ट्रेलिया में नैशनल टीम के खिलाडि़यों से रसोई, बरतन, कपड़े और बाथरूम साफ करवाए जाते थे. वे अपना खाना खुद पकाते थे और सड़कों पर रहते थे

बरतन धोने और सफाई करने के बाद खिलाड़ी मैच में कैसा प्रदर्शन करेंगे? कप्तान इमाद बट ने पाकिस्तान हौकी फैडरेशन के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए और कहा कि वे मौजूदा टीम मैनेजमैंट के साथ आगे नहीं बढ़ सकते. दरअसल, पिछले कुछ दिनों से आस्ट्रेलिया में खेल रही पाकिस्तानी हौकी टीम के खिलाडि़यों की तसवीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे थे, जिन में उन्हें अपना खाना पकाते और बरतन साफ करते हुए देखा जा रहा था. कई तसवीरों में वे बैग के साथ सड़क किनारे बैठे हुए भी नजर रहे थे.

मुनीष भाटिया

 

Hindi Story: मुआवजा

Hindi Story: जिस्मफरोशी के धंधे से जुड़ी मगनाबाई एक जुलूस में शामिल हो कर मुख्यमंत्री के पास इंसाफ मांगने जा रही थी. क्या  नाइंसाफी हुई थी उस के साथ?

जुलूस शहर की बड़ी सड़क से होता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था. औरतों के हाथों में बैनर थे, जिन में से एक पर मोटेमोटे अक्षरों में लिखा हुआ था, ‘हम जिस्मफरोश नहीं हैं. हमें भी जीने का हक है. औरत का जिस्म खिलौना नहीं है…’


लोग उन्हें पढ़ते, कुछ पढ़ कर चुपचाप निकल जाते, कुछ मनचले भद्दे इशारे करते, तो कुछ मनचले जुलूस के बीच घुस कर औरतों की छातियों पर चिकोटी काट लेते. औरतें चुपचाप सहतीं, बेखबर सी नारे लगाती आगे बढ़ती जा रही थीं.


वे सब मुख्यमंत्री के पास इंसाफ मांगने जा रही थीं. इंसाफ की एवज में अपनी इज्जत की कीमत लगाने, अपने उघड़े बदन को और उघाड़ने, गरम गोश्त के शौकीनों को ललचाने. शायद इसी बहाने उन्हें अपने दर्द का कोई मरहम मिल सके.


उन के माईबाप सरकार को बताएंगे कि उन की बेटी, बहन, बहू के साथ कब, क्या और कैसे हुआ? करने वाला कौन था? उन की देह को उघाड़ने वाला, नोचने वाला कौन था? औरतों के जिस्म का सौदा हमेशा से होता रहा है और होता रहेगा. ये वे अच्छी तरह जानती हैं, लेकिन वे सौदे में नुकसान की हिमायती नहीं हैं.


घर वाले बतातेबताते यह भूल जाएंगे कि शब्दों के बहाने वे खुद अपनी ही बेटियोंऔरतों को चौराहों पर, सभाओं में या सड़कों पर नंगा कर रहे हैं. उन की इज्जत के चिथड़े कर रहे हैं, लेकिन जुलूस वालों की यह सोच कहां होती है? उन्हें तो मुआवजा चाहिए, औरत की देह का सरकारी मुआवजा.


अखबार के पहले पेज पर मुख्यमंत्रीजी के साथ छपी तसवीर ही शायद उन के दर्द का मरहम हो. चाहे कुछ भी हो, लेकिन लोग उन्हें देखेंगे, पढ़ेंगे और यकीनन हमदर्दी जताने के बहाने उन के घर कर उन के जख्म टटोलतेटटोलते खुद कोई चीरा लगा जाएंगे. भीड़ में इतनी सोच और सम? कहां होती है.


पर मगनाबाई इतनी छोटी सी उम्र में भी सब सम?ाने लगी थी. लड़की जब एक ही रात में औरत बना दी जाती है, तब सम? में आने वाली बातें भी सम? में आने लगती हैं. मर्दों के प्रति उस का नजरिया बदल जाता है. 15 साल की मगनाबाई 8 दिन की बच्ची को कंधे से चिपकाए जुलूस में चल रही थी.

उस के साथ उस जैसी और भी लड़कियां थीं. किसी की सलवार में खून लगा था, कपड़े फटे और गंदे थे. किसी के गले और मुंह पर खरोंचों के निशान साफ नजर रहे थे. अंदर जाने कितने होंगे. किसी का पेट बढ़ा था. क्या ये सब अपनीअपनी देह उघाड़ कर दिखाएंगी? कैसे बताएंगी कि उस रात कितने लोगों ने
मगनाबाई का गला सूखने लगा. कमजोरी के चलते उसे चक्कर आने लगे. लगा कि कंधे से चिपकी बच्ची छूट कर नीचे गिर जाएगी और जुलूस उस को कुचलता हुआ निकल जाएगा. जो कुचली जाएगी, उस के साथ किसी की भी हमदर्दी नहीं होगी.


मगनाबाई ने साथ चलती एक औरत को पकड़ लिया. उस औरत ने मगनाबाई पर एक नजर डाली, उस की पीठ थपथपाई, ‘‘बच्ची, जब इतनी हिम्मत की है, तो थोड़ी और सही. अब तो मंजिल के करीब ही गए
हैं. भरोसा रख. कहीं कहीं तो इंसाफ मिलेगा…’’ कहने वाली औरत को मगनाबाई ने देखा. मन हुआ कि हंसे और पूछे, ‘भला औरत की भी कोई मंजिल होती है? किस पर भरोसा रखे? भेडि़यों से इंसाफ की उम्मीद तुम्हें होगी, मु? नहीं,’ नफरत से उस ने जमीन पर थूक दिया.


कंधे से चिपकी बच्ची रोए जा रही थी. मगनाबाई का मन हुआ कि जलालत के इस मांस के लोथड़े को पैरों से कुचल जाने के लिए जमीन पर गिरा दे. उसे लगा कि बच्ची बहुत भारी होती जा रही है. उस के कंधे बो? उठाने में नाकाम लग रहे थे. जुलूस के साथ पैरों ने आगे बढ़ने से मना कर दिया था.


मगनाबाई कुछ देर वहीं खड़ी रही. जुलूस को उस ने आगे बढ़ जाने दिया. सड़क खाली हुई, तो उस की नजर सड़क के किनारे लगे हैंडपंप पर पड़ी. उस ने दौड़ कर किसी तरह बच्ची को गोद में उठाए ही पानी पीया. फिर वह एक बंद दुकान के चबूतरे पर रोती बच्ची को लिटा कर दीवार की टेक लगा कर बैठ गई.
बच्ची ने लेटते ही रोना बंद कर दिया. मगनाबाई को भी सुकून मिला. कुनकुनी धूप उसे भली लगी. वह भी बच्ची के करीब लेट गई. उस की आंखें मुंदने लगीं.


मगनाबाई इस जुलूस के साथ आना नहीं चाहती थी. गप्पू भाई और भोला चाचा ही उसे बिस्तर से घसीट कर जुलूस के साथ ले आए. उस की आंखों के सामने बस्ता ले कर स्कूल जाती चंपा, गंगा और जूही नाच उठीं, लेकिन अब उस का बस्ता छूट गया और बस्ते की जगह इस बच्ची ने ले ली. गप्पू भाई और भोला चाचा कहते थे कि मगनाबाई पहले की तरह स्कूल जा सकेगी. इस बच्ची को किसी अनाथालय में डाल देंगे. वह फिर पहले की तरह हो जाएगी. बस, मुख्यमंत्री से मुआवजा मिल जाए.


वे दोनों इन औरतों को दलदल से निकालने वाली संस्था के पैरोकार थे. जब भी पुलिस की रेड पड़नी होती थी, वे दोनों और उन की रखैलें इन औरतों के साथ बदसलूकी हो, इसलिए साथ होते. जब भी वे दोनों साथ होते, तो पुलिस वाले रहम से पेश आते थे. आमतौर पर प्रैस रिपोर्टर भी पहुंचे होते थे. वे दोनों कई बार गोरी चमड़ी वाली लड़कियों को भी लाते थे.


उन दोनों का खूब रोब था, क्योंकि दलालों को अगर डर लगता था, तो उन से ही. उन दोनों ने मुख्यमंत्री के सामने धरनेप्रदर्शन का प्रोग्राम बनाया था और पुलिस से मिल कर जुलूस का बंदोबस्त करा था. क्या मजाल है कि ये मिलीजुली जिस्म बेचने वाली थुलथुल लड़कियां इस तरह बाजार में निकल सकें. मगनाबाई को कहा गया था कि वे दोनों मुआवजा मांग रहे हैं. इस से स्कूल खुलवाएंगे.

इन की जिंदगी खुशहाल होगी. तभी मगनाबाई के विचारों को ?ाटका लगा. मुआवजा किस बात का? किसे मिलेगा? क्या इसलिए कि 9 महीने तक इस बच्ची को बस्ते की जगह पेट में लादे घूमती रही थी? बारीबारी से लोगों का वहशीपन सहती रही थी? या फिर मुआवजे के रूप में गप्पू और भोला की पीठ ठोंकी जाएगी कि उन्होंने बेटी और बहन को अपनी मर्दानगी से परिचित कराया? सरकार उस की भी पीठ ठोंकेगी कि वह स्कूल जाने की उम्र में मां बनना सीख गई?


क्या सरकार उस से पूछेगी कि उसे मां किस तरह बनाया गया? क्या वह बता पाएगी कि उस के भाई ने पहली बार उस के हाथपैर खाट की पाटियों से बांध कर उसे चाचा को सौंप दिया था? चाचा ने भी इस के बदले भाई को मुआवजा दिया था और फिर भाई ने भी चाचा की तरह वही सब उस के साथ दोहराया था.


यही सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा. उसे डर दिखाया जाता कि अगर किसी से इस बात का जिक्र किया, तो काट कर फेंक दिया जाएगा. मुआवजे के रूप में यह बच्ची उस की कोख में गई. पता नहीं, दोनों में से किस की थी? क्या इन तमाम औरतों के साथ भी इसी की तरहबच्ची दूध पी कर सो गई थी.
तभी किसी ने बाल पकड़ कर मगनाबाई को ?ाक?ोरा, ‘‘तो यहां है नवाबजादी?’’


मगनाबाई ने मुड़ कर देखा. भोला चाचा जलती आंखों से उसे देख रहा था.
‘‘मैं नहीं जाऊंगी. अब मु? से नहीं चला जाता,’’ मगनाबाई ने कहा.
‘‘चला तो तु? से अभी जाएगा. चलती है या उतारूं सब के सामने…’’
लोग सुन कर हंस पड़े. वे चटपटी बात सुन कर मजेदार नजारा देखने के इच्छुक थे. उसे लगा कि यहां मर्द नहीं, महज जिस्मफरोश हैं.


डरीसहमी मगनाबाई बच्ची को उठा कर धीरेधीरे उन के पीछे चल दी. भोला चाचा ने मगनाबाई को पीछे से जोरदार लात मारी. उस के मुंह से निकला, ‘‘हम जिस्मफरोश नहीं हैं. हमारी मांगें पूरी करोपूरी करो…’’ 

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