Politics : अंबेडकर को सिर्फ मूर्ति बनाने की साजिश

Politics. उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने डाक्टर भीमराव अंबेडकर की विरासत को सम्मानित करने और दलित मतदाताओं के बीच पैठ मजबूत करने के लिए ‘डाक्टर अंबेडकर मूर्ति विकास योजना’ बनाई है. इस योजना के तहत उत्तर प्रदेश की हर विधानसभा में अंबेडकर की प्रतिमाओं का सौंदर्यीकरण करना, मूर्तियों के ऊपर छत्र और बाउंड्री वाल बनवाना शामिल है.

सरकार ने इस के लिए 403 करोड़ रुपए का बजट पास किया है. इस से उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों के हर क्षेत्र में 10-10 स्मारकों का विकास किया जाएगा.

इस योजना में अंबेडकर के साथ ही साथ दलितों के साथ जुड़े संत रविदास, कबीर, ज्योतिबा फुले और महर्षि वाल्मीकि जैसे महापुरुषों के स्मारकों के विकास को भी शामिल किया गया है.

उत्तर प्रदेश सरकार के इस कदम को 2027 के विधानसभा चुनाव से जोड़ कर देखा जा रहा है. पार्टी इस के जरीए दलित वोटर को जोड़ना चाह रही है. हर विधानसभा को करीबकरीब एक करोड़ रुपए इस काम के लिए मिलेंगे.

उत्तर प्रदेश की सरकार ने तय किया है कि प्रदेशभर में जहां कहीं भी  अंबेडकर की प्रतिमा होगी, वहां पर प्रतिमा के ऊपर छत्र लगाने का काम कराया जाएगा. जहां पर अंबेडकर की प्रतिमा स्थापित होगी वहां पर जो पार्क होगा. उस की बाउंड्री वाल का निर्माण और उस के सुंदरीकरण का काम भी सरकार अपने पास ले रही है.

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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के ऐशबाग में 50 करोड़ रुपए की लागत से ‘भारत रत्न’ भीमराव अंबेडकर मैमोरियल एंड कल्चरल सैंटर का निर्माण होगा. पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 28 जून को इस की आधारशिला रखेंगे. इस में अंबेडकर की 45 फुट ऊंची प्रतिमा लगेगी और अंबेडकर की पुण्यतिथि 6 दिसंबर पर इस का उद्घाटन करवाए जाने की तैयारी है.

‘भारत रत्न’ अंबेडकर के नाम पर बनने वाले मैमोरियल सैंटर में अंबेडकर की प्रतिमा के साथ ही डिजिटल लाइब्रेरी, म्यूजियम और शानदार एडिटोरियम भी बनाया जाएगा. स्मारक में पूरे साल कल्चरल प्रोग्राम का आयोजन किया जाएगा. छात्रों के लिए सैमिनार के आयोजन किए जाएंगे. यहां छात्रों को अंबेडकर पर शोध करने के लिए जरूरी चीज मुहैया करवाएगी.

यहां बनने वाली लाइब्रेरी को काफी बड़ी होगी. उस में अंबेडकर से जुड़ी किताबों का संग्रह होगा.

मूर्तियां होंगी दलित वोट का सहारा

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की नजर से दलित वोट काफी खास माने जा रहे हैं. साल 2024 के लोकसभा चुनाव में यही दलित वोट भाजपा से खिसक गया था, जिस की वजह से उत्तर प्रदेश में पार्टी को 33 सीटों का नुकसान हुआ था. ऐसे में अब भाजपा दलित वोटरों को काफी अहम मान रही है.

साल 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दलित वोट पर हर पार्टी की नजर है. उत्तर प्रदेश में तकरीबन 22 फीसदी दलित वोट हैं. यहां विधानसभा की आरक्षित 86 सीट में 84 दलितों के लिए हैं.

उत्तर प्रदेश की लगभग 150 विधानसभा सीटों पर दलित वोट ही हारजीत तय करते हैं. उत्तर प्रदेश में 4 बार मुख्यमंत्री रही मायावती दलितों की सब से बड़ी नेता मानी जाती रही हैं. 1995, 1997, 2003 और 2007 वे उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थीं. साल 2007 बसपा की बहुमत से सरकार बनी थी.

इस के बाद धीरधीरे मायावती की ताकत कम होती गई. बसपा को लगातार 2012, 2017 और 2022 में हार का सामना करना पड़ा है. विधानसभा में बसपा से सिर्फ एक विधायक है. वहीं लोकसभा में एक भी सांसद बसपा का नहीं है. बसपा को अभी भी 9 फीसदी वोट मिलते हैं.

क्यों नहीं लग पाई पेरियार की मूर्ति

मायावती जब उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने प्रदेश के अलगअलग हिस्सों में अंबेडकर की प्रतिमाएं लगवाई थीं. अंबेडकर की पत्नी रमा बाई के नाम पर लखनऊ में एक बड़ा स्मारक भी बनवाया गया था.

मायावती ने तब लखनऊ में अपनी मूर्तियां भी लगवाई थीं, जिस को ले कर खुद भाजपा ने ही सवाल खड़े किए थे. मायावती लखनऊ में जिन दलित महापुरुषों की मूर्तियां लगवाना चाहती थी उन में एक नाम पेरियार ईवी रामास्वामी नायकर का भी था. भाजपा को ब्राह्मण विरोधी पेरियार के नाम से नफरत थी.

भाजपा और अन्य दक्षिणपंथी संगठनों ने पेरियार की मूर्ति का कड़ा विरोध किया था. उन का मानना था कि पेरियार राम विरोधी थे, जबकि असल में वे ब्राह्मण विरोधी थे. उन के विचार हिंदू देवीदेवताओं के खिलाफ थे.

मायावती के तीसरे कार्यकाल 2002-2003 के दौरान जब मूर्ति लगाने का प्रस्ताव था. तब बसपा भाजपा के सहयोग से सरकार चला रही थी. भाजपा ने मूर्ति स्थापना का विरोध करते हुए सरकार से हटने की धमकी दी थी, जिस के कारण मायावती को यह योजना स्थगित करनी पड़ी थी.

उस समय मूर्ति न लगने का कारण यह बताया गया था कि पेरियार दक्षिण भारत के समाज सुधारक थे, इसलिए उन की मूर्ति उत्तर प्रदेश में नहीं लगनी चाहिए. मूर्ति न लगने देने का कारण पेरियार के ईश्वर विरोधी और तर्कवादी विचारों को धार्मिक भावनाओं खिलाफ माना गया था.

मायावती भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनी थीं तो उन्होंने भाजपा के दबाव को माना और पेरियार की मूर्ति लगाने की योजना को टाल दिया.

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पेरियार की नीतियों का मतलब था मंदिरों की दुकानदारी खत्म होना और पंडों को किए जाने वाले दान की बचत होना. दोनों बातें जनता के लिए लाभदायक हैं, पर धर्म का प्रचार इतना जबरदस्त है कि मायावती भी कुछ न कर पाईं और कांशीराम की नीतियां भी राजनीति का शिकार हो गईं.

क्या अंबेडकर की मूर्ति से होगा लाभ

भारतीय जनता पार्टी लगातार दलित और पिछड़ी जातियों से जुड़े महापुरुषों को अपने साथ जोड़ने की योजना पर काम कर रही है. अंबेडकर के अलावा सरदार वल्लभ भाई पटेल की सब से ऊंची मूर्ति गुजरात में लगाई. उन के जन्मदिन को ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ घोषित किया. बिहार के बड़े ओबीसी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को साल 2024 में ‘भारत रत्न’ दिया.

इस का लाभ भाजपा को साल 2025 के विधानसभा चुनाव में मिला. ?ारखंड के बिरसा मुंडा के जन्मदिवस को ‘जनजाति गौरव दिवस’ घोषित किया.

इसी तरह से संत रविदास का भी महिमामंडन किया. साल 2023 में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव को भारत का दूसरा सब से बड़ा सम्मान ‘पद्म विभूषण’ दिया. निषादराज गुहा और सुहेलदेव राजभर जैसे बड़े महापुरुषों का भी भाजपा ने महिमामंडन किया.

भाजपा दूसरे विचारों के महापुरुषों का सम्मान दे कर अपनी अलग पैठ बनाने का काम कर रही है. यह बात और है कि जमीनी लैवल पर वह जातीय भेदभाव को खत्म नहीं कर पा रही है.

दूसरी ओर नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के आंकड़ों से पता चलता है कि भाजपा शासन के दौरान दलित उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ी हैं. एनसीआरबी की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 की तुलना में 2022 में अनुसूचित जातियों के विरुद्ध अपराधों में 13.1 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई.

सब से अधिक मामले भाजपा शासित उत्तर प्रदेश में 15,368, राजस्थान में 8,752, मध्य प्रदेश में 7,733 और बिहार में 6,509 दर्ज किए गए थे. देश की कुल दलित उत्पीड़न की 76 फीसदी घटनाएं 5 भाजपा शासित राज्यों में हुईं.

औरतों के साथ अन्याय भी लगातार बढ़ रहा है. पढ़ीलिखी औरतों को नौकरियां नहीं मिल पा रही हैं और घरों में उन के साथ होने वाला भेदभाव एक नई शक्ल में सामने आ रहा है.

अंबेडकर के संविधान को कितना मानती है भाजपा

सब से बड़ा सवाल यह है कि भारतीय जनता पार्टी अंबेडकर की मूर्तियां तो लगवा रही है पर उन के बनाए संविधान का कितना पालन करती है? भाजपा पर चुनाव में धांधली, संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग, घरों को बुलडोजर से गिराने और फर्जी एनकांउटर के तमाम आरोप हैं. इस को ले कर कोर्ट तक ने टिप्पणियां की हैं.

इलाहाबाद हाईकोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि कानून के शासन में ‘बुलडोजर न्याय’ की कोई जगह नहीं है. कोर्ट ने कहा कि ‘सरकार या प्रशासन बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए किसी का घर नहीं तोड़ सकते हैं. केवल एफआईआर में नाम आने से कानूनी अधिकार नहीं हासिल हो जाता. सजा देने का अधिकार केवल कोर्ट को है सरकार या प्रशासन को नहीं.’

इसी मसले पर कोर्ट ने कहा कि नोटिस और सुनवाई जरूरी है. प्रभावित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का समय देना चाहिए. तुरंत बदले की कार्रवाई गलत है. अगर अवैध निर्माण के आधार पर यह हो रहा हो तो सब के साथ होना चाहिए. किसी एक का चुनाव करना कानून सम्मत नहीं है. घर तोड़ना केवल संपत्ति का नुकसान नहीं है, यह संविधान की धारा 21, जीवन और गरिमा से जुड़ा मामला होता है.

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में जावेद मोहम्मद का घर अवैध कह कर गिरा दिया गया. जावेद 2022 के सरकार विरोधी प्रदर्शन का हिस्सा थे. 2022 का ही दूसरा मामला दिल्ली का था. वह भी 2022 के प्रदर्शन के कारण किया गया था.

लोकसभा में संविधान पर चर्चा के दौरान भाजपा ने और गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि ‘अभी एक फैशन हो गया है… अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर… इतना नाम अगर भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता.’ यह अमित शाह द्वारा संविधान निर्माता अंबेडकर का अपमान माना गया था. अब भाजपा उन्हीं अंबेडकर के सम्मान में उतर आई है. भाजपा सरकार के मंत्री रहे ब्राह्मण वर्ग से आने वाले पत्रकार से नेता बने अरुण शौरी ने अपनी किताब ‘वर्शिपिंग फाल्स गौड्स’ में अंबेडकर की आलोचना की थी.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अंबेडकर के विचारों में काफी मतभेद रहे हैं. अब भाजपा इन को ‘जोड़ने’ करने की कोशिश कर रही है. अंबेडकर समानता यानी इक्वैलिटी पर जोर देते थे. दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समरसता की बात करता है. इन दोनो के विचारो में अंतर है.

इक्वैलिटी यानी समानता और समरसता यानी हार्मोनी के बीच जो अंतर है, वही अंतर अंबेडकर और संघ के बीच भी है. संघ वर्चस्व के उद्देश्य के लिए सद्भाव की अवधारणा का उपयोग करता है, जबकि अंबेडकर समानता की अवधारणा का उपयोग आजादी के लिए करते थे.

अंबेडकर की अवधारणा में समानता में जीवन को सम्मान के साथ समान अधिकारों की वकालत की गई है. अंबेडकर का समता का लक्ष्य और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की समरसता को एकसमान नहीं माना जा सकता है. समरसता का मतलब है एक होना और समता का मतलब है एकसमान होना है. समरसता कायम करने के लिए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समानता पहली शर्त है.

भाजपा इस का कहीं पालन करते नहीं दिखती है. अंबेडकर का अंतिम लक्ष्य धर्मांतरण नहीं, जाति उन्मूलन था. उन्होंने 1935 में हिंदू धर्म छोड़ने की घोषणा की और 1956 में बौद्ध धर्म अपना लिया था.

अब भाजपा अंबेडकर की मूर्तियों पर छत्र लगा कर उन को छत्रपति बनाना चाहती है. हिंदू धर्म में छत्र का अपना महत्त्व है. इस को ब्राह्मण, राजा और शंकराचार्य ही धारण करते हैं. छत्र के सहारे बाबा साहब को धार्मिक चोले में रखने की तैयारी  की जा रही है.

दलित समाज के नौजवानों को नौकरी और कारोबार करना है, ऐेसे में केवल बड़े महापुरुषों का महिमामंडन करने से वह वोट नहीं देने वाला है. उसे समानता चाहिए जहां उस के साथ जाति का भेदभाव और उत्पीड़न न हो सके. केवल अंबेडकर की मूर्तियां लगाने से वह वोट नहीं देने जा रहा है. Politics

नरेंद्र दामोदरदास मोदी सदैव सत्ता में रहने के मुगालते में क्यों हैं

लोकतंत्र हो अथवा       राजतंत्र कभी भी कोई स्थाई नहीं रहता, मगर भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी शायद यह समझते हैं कि वह सदैव सत्ता में रहेंगे यह मुगालता दोनों के लिए है भारी पड़ेगा . भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से जद्दोजहद करने के बाद अब अपने चरमोत्कर्ष पर है. उन्होंने जो मुद्दे देश के सामने रखे थे चाहे वह राम मंदिर हो या धारा 370 का अथवा हिंदुत्व का यह सब देश ने देखा है.इसी बिनाह पर भारतीय जनता पार्टी अब यह मानने लगी है कि साम दाम दंड भेद करके वह सदैव सत्ता में रहेगी और चाहे उसके लिए कुछ भी करना पड़े नरेंद्र मोदी अमित शाह और आने वाले भारतीय जनता पार्टी के हाथ और दिमाग यह करते रहेंगे मगर यह भ्रम से ज्यादा कुछ भी नहीं है क्योंकि सत्ता कभी किसी की मुट्ठी में कैद नहीं हो सकती. लोकतंत्र का मतलब है 5 वर्ष का चुनाव और परिणाम कभी दाएं तो कभी बांएं. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने विदेश में कहा है -भाजपा को यह मानना अच्छा लगता है कि भारत में हमेशा वही सत्ता में रहेगी, लेकिन ऐसा है नहीं. ब्रिटेन यात्रा पर पहुंचे राहुल गांधी ने  चैथम हाउस थिंक टैंक में एक संवाद सत्र के दौरान दावा किया कि उनके फोन में इजराइल के साफ्टवेयर पेगासस को डाला गया  क्योंकि उन्होंने सत्तारूढ़ भाजपा पर भारत में असंतोष की आवाज दबाने की कोशिश करने का आरोप लगाया था.

राहुल गांधी ने कहा -” अगर आप आजादी से लेकर आज तक के समय को देखेंगे तो कांग्रेस अधिकतर समय सत्ता में रही.” राहुल गांधी ने कहा -” भाजपा के 10 साल तक सत्ता में रहने से पहले हम 10 साल तक सत्ता में थे. भाजपा को यह मानना अच्छा लगता है कि वह भारत में सत्ता में आई हैं और हमेशा वही सत्ता में बनी रहेगी, हालांकि ऐसा नहीं है. हम ग्रामीण क्षेत्र पर काफी ध्यान केंद्रित कर रहे थे और शुरुआत में हम शहरी क्षेत्रों को लेकर चूक गए. यह एक तथ्य है, लेकिन यह कहना वास्तव में हास्यास्पद है कि भाजपा सत्ता में है और कांग्रेस का समय खत्म हो गया है.” चैथम हाउस संवाद के दौरान गांधी ने कहा – कांग्रेस के अलावा, विदेशी मीडिया भी इस बात को उजागर कर रहा है कि भारतीय लोकतंत्र के साथ गंभीर समस्या है. उन्होंने कहा – भाजपा इस तरह जवाब देती है, उसे चर्चा में कोई दिलचस्पी नहीं है.

 

राहुल गांधी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को एक कट्टरपंथी, फासीवादी संगठन बताया और कहा- उसने देश के संस्थानों पर कब्जा करके भारत में लोकतांत्रिक चुनाव की प्रकृति को बदल दिया है. विदेशी दर्शकों के लिए इसे स्पष्ट रूप से समझाने को मुश्किल हो जाएगी. राहुल गांधी ने कहा  आप इसे एक सीक्रेट सोसाइटी कह सकते हैं. यह मुस्लिम ब्रदरहुड की तर्ज पर बनाया गया है और इसका मकसद है कि सत्ता में आने के लिए लोकतांत्रिक चुनाव का इस्तेमाल किया जाए और फिर बाद में लोकतांत्रिक चुनाव को खत्म कर दिया जाए.  विदेश नीति पर राहुल गांधी ने रूस- यूक्रेन संघर्ष  पर 2,000 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र पर कब्जा करने का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा  लेकिन हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि वह (चीन) वहां नहीं हैं. भारत-पाकिस्तान संबंध पर उन्होंने कहा – उनका मानना है कि पड़ोसी देशों के साथ अच्छे संबंध हो यह महत्त्वपूर्ण है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा- यह पाकिस्तानियों की कार्रवाई पर निर्भर कर है. उन्होंने कहा – अगर पाकिस्तान, भारत आतंकवाद को बढ़ावा देता है, तो काफी मुश्किल हो जाएगी.

दरअसल,राहुल गांधी की एक-एक बात आज पूरा भारत देश और दुनिया सुन रही है और उनकी बातें गूंज रही है. यह सबसे ज्यादा तकलीफ भारतीय जनता पार्टी को दे रही हैं. सत्ता में बैठे नेताओं को दे रही है. उन्हें चुभ रही है क्योंकि राहुल गांधी की बातों में सत्यता है. नीर क्षीर विवेक से देखा जाए तो भारतीय लोकतंत्र को क्षति इन 8 वर्षों में हुई है वह उल्लेखनीय है. आज चुनाव आयोग हो या फिर देश का उच्चतम न्यायालय, कार्यपालिका हो या फिर अन्य कोई संवैधानिक संस्था सब पर भारतीय जनता पार्टी सत्ता के माध्यम से अंकुश लगाने का काम कर रही है जो सीधे-सीधे लोकतंत्र के लिए खतरे का संकेत है

गोरखधंधा: जनहित याचिकाएं बनाम संघ का एजेंडा

भारतीय जनता पार्टी के नेता और वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय आजकल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडा को देशभर में लागू कराने के लिए सड़क  से ले कर सुप्रीम कोर्ट तक जोर लगा  रहे हैं. कभी उन्हें हिंदुओं के अल्पसंख्यक हो जाने का डर सताता है, तो कभी मुसलिम ज्यादा बच्चे पैदा कर रहे हैं, इस बात का शक होने लगता है. कभी वे कोर्ट से राष्ट्रीय औसत के बजाय राज्य में किसी समुदाय की आबादी के आधार पर उसे ‘अल्पसंख्यक’ परिभाषित करने के लिए दिशानिर्देश जारी करने की गुजारिश करते हैं, तो कभी वे हिंदुओं की तादाद बचाने के लिए धर्मांतरण को रोकना चाहते हैं.

इतना ही नहीं, कभी वे आबादी पर कंट्रोल के लिए याचिका ले कर कोर्ट पहुंच जाते हैं, तो कभी मुसलिमों में प्रचलित निकाह, हलाला और बहुविवाह प्रथाओं को खत्म करने के लिए याचिका दाखिल कर मांग करते हैं कि मुसलिम समाज में प्रचलित इन प्रथाओं को असंवैधानिक करार दिया जाए.

देश में आबादी के कंट्रोल के लिए  2 बच्चों के मानदंड समेत कुछ उपायों पर अमल के लिए भी उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. यह याचिका उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर की थी. हालांकि इस पर भी कोर्ट ने साफ कह दिया था कि कानून बनाना अदालत का नहीं, बल्कि संसद और विधानमंडल का काम है.

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हालिया याचिका अश्विनी कुमार उपाध्याय ने धर्मांतरण को रोकने के लिए डाली है. उन्हें लगता है कि तरहतरह के लालच और टोनेटोटकों के जरीए हिंदुओं को बहका कर उन का धर्म बदला जा रहा है. दरअसल, ये तमाम परेशानियां वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की कोई निजी परेशानियां नहीं हैं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडा में जितनी बातें हैं, वही उन की ‘जनहित याचिकाओं’ में नजर आती हैं.

वे अदालतों को औजार की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं और चाहते हैं कि धर्मनिरपेक्ष देश भारत को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की इच्छा के मुताबिक एक  हिंदू देश में बदलने के  लिए जो चीजें होनी जरूरी हैं, उन पर देश की सब से बड़ी अदालत अपनी मोहर लगा दे.

गौरतलब है कि ऊंची जाति के हाथों शोषित और मनुवादी व्यवस्था से उकता चुके दलित और आदिवासी लोग बीते कई सालों से बौद्ध, ईसाई या मुसलिम धर्म की ओर खिंच रहे हैं. उन्हें हिंदू धर्म में रोके रखने की कोशिश संघ और भाजपा की है.

यही वजह है कि चुनाव के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह दलितों की ?ांपडि़यों में नजर आने लगते हैं. कहीं उन के पैर पखारते दिखते हैं, तो कहीं उन के साथ पत्तल में खाना खाते नजर आते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही दलित फिर उन के लिए अछूत हो जाते हैं.

इन पाखंडों को अब दलित और आदिवासी समाज अच्छी तरह समझने लगा है. बीते कुछ सालों में बड़ी तादाद में दलितों ने बौद्ध धर्म अपना लिया है. संघ और भाजपा इस बात को ले कर चिंतित हैं और उन की चिंता का हल निकालने के लिए अश्विनी कुमार उपाध्याय जैसे वकील ‘जनहित याचिका’ के जरीए कोर्ट और सरकार के डंडे का इस्तेमाल कर के हिंदू धर्म को बचाने की बेढंगी कोशिशों में जुटे हैं.

यह कैसी ट्रैजिडी है कि सब से बेहतर धर्म को बचाने के लिए अब सरकारी डंडे की जरूरत आ पड़ी है. कोर्ट से गुजारिश की जा रही है कि वह सरकार को निर्देश दे कि वह हिंदू को हिंदू बनाए रखने के लिए कानून बनाए और सजा का प्रावधान करे, लेकिन क्या ऐसा मुमकिन है? बिलकुल नहीं.

अश्विनी कुमार उपाध्याय सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं. उन की हालिया याचिका काला जादू, अंधविश्वास और जबरन धर्मांतरण को ले कर थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 9 अप्रैल, 2021 को यह कह कर खारिज कर दिया कि यह किस तरह की याचिका है?

अश्विनी कुमार उपाध्याय हमेशा उन मुद्दों पर जनहित याचिका दायर करते हैं, जो उन की पार्टी के एजेंडा में सब से ऊपर हैं, जैसे योग, वंदे मातरम, निकाह, हलाला, धर्मांतरण रोकना वगैरह.

सुप्रीम कोर्ट ने 9 अप्रैल, 2021 को अश्विनी कुमार उपाध्याय की जो याचिका खारिज की है, उस में उन्होंने कोर्ट से गुजारिश की थी कि केंद्र और राज्यों को काले जादू, अंधविश्वास और धार्मिक रूपांतरण को कंट्रोल करने, धमकाने, धमकी देने और उपहारों और  पैसे से फायदा पहुंचाने के जरीए कंट्रोल करने के लिए निर्देश देने का कष्ट करें, मगर सुप्रीम कोर्ट में 3 जजों जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऋषिकेश रौय की पीठ ने न सिर्फ उन की याचिका खारिज कर दी, बल्कि वह इस से काफी नाखुश भी दिखी और कह बैठी कि यह किस तरह की याचिका है?

अश्विनी कुमार उपाध्याय चाहते थे कि धर्म का गलत इस्तेमाल रोकने के लिए एक कमेटी बना कर धर्म बदलने से जुड़ा कानून बनाने की संभावना का पता लगाने के लिए निर्देश देने का कष्ट सुप्रीम कोर्ट करे.
उन की याचिका में कहा गया था कि लालच और जोरजबरदस्ती से धर्मांतरण किया जाना न केवल अनुच्छेद 14, 21 और 25 का उल्लंघन है, बल्कि यह संविधान के मूल ढांचे के अभिन्न अंग धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के भी खिलाफ है और जादूटोना, अंधविश्वास और छल से धर्म बदलने पर रोक लगाने में
नाकाम रहे हैं, जबकि अनुच्छेद 51 ए के तहत इस पर रोक लगाना उन की जिम्मेदारी है.

समाज की कुरीतियों के खिलाफ ठोस कार्यवाही कर पाने में नाकामी का आरोप लगाते हुए याचिका में कहा गया कि केंद्र एक कानून बना सकता है, जिस में 3 साल की कम से कम कैद की सजा हो, जिसे 10 साल की सजा तक बढ़ाया जा सकता है और जुर्माना भी लगाया जा सकता है.

अश्विनी कुमार उपाध्याय चाहते हैं कि केंद्र राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भी धार्मिक समूहों के मामलों से निबटने और उन के बीच धार्मिक भेदभाव का गहराई से स्टडी कराने के लिए हक दे.
याचिका में विधि आयोग को जादूटोना, अंधविश्वास और धर्मांतरण पर 3 महीने के भीतर एक रिपोर्ट तैयार करने के लिए निर्देश देने की भी गुजारिश की गई थी. उन का मानना है कि  जनसंख्या विस्फोट और छल से धर्मांतरण के चलते 9 राज्यों और केंद्र शासितप्रदेशों में हिंदू अल्पसंख्यक हो गए हैं और दिनोंदिन हालात और खराब होते जा रहे हैं.

इस याचिका के खारिज होने के बाद से ही सोशल मीडिया पर अश्विनी कुमार उपाध्याय के खिलाफ कई कड़ी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं और मिलें भी क्यों न, जिस देश का कानून देश के हर नागरिक को बालिग होने के बाद उस का धर्म और जीवनसाथी चुनने की आजादी देता है, उसे कंट्रोल करने का आदेश भला सुप्रीम कोर्ट कैसे दे सकता है?

माथे पर तिलक लगाने वाले, पत्नी समेत मंदिरमंदिर जा कर पूजा करने वाले, बाबाओं और संतों की संगत करने वाले, उन के आध्यात्मिक विचारों (जिन का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता) से प्रभावित रहने वाले भाजपा नेता और वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय किसी दूसरे को उस की आस्था, उस के विश्वास और उस की पसंदनापसंद पर पाबंदी लगाने के लिए कैसे मजबूर कर सकते हैं, यह बात कोर्ट के जेहन में भी जरूर आई होगी.

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दरअसल, अश्विनी कुमार उपाध्याय भाजपा और संघ के एजेंडा को कानूनी जामा पहनाने की कोशिश में हैं, ताकि भविष्य की राजनीति में उन का सिक्का भी चल निकले, मगर हालिया याचिका पर उन की काफी भद्द पिट रही है.

याचिका खारिज होने के बाद वे अपने फेसबुक पेज पर लिखते हैं, ‘काला जादू, अंधविश्वास और साम, दाम, दंड और भेद द्वारा धर्मांतरण के खिलाफ मेरी पीआईएल खारिज नहीं हुई है, बल्कि मैं ने वापस ली है. मैं अब गृह मंत्रालय, कानून मंत्रालय और विधि आयोग को विस्तृत प्रार्थनापत्र दूंगा. अगर 6 महीने में सरकार ने धर्मांतरण के खिलाफ कानून नहीं बनाया, तो मैं फिर सुप्रीम कोर्ट जाऊंगा.’

अश्विनी कुमार उपाध्याय की इस पोस्ट के जवाब में काफी लोगों ने उन की आलोचना की है. सूर्य विक्रम सिंह लिखते हैं, ‘उपाध्यायजी कभी जिंदगी की मूलभूत जरूरतों पर ध्यान दें, तो कितना अच्छा लगे. मगर, सत्ता की तरह आप भी गुमराह करने में लगे हैं.’

दीपक नागर कहते हैं, ‘हां, हम जानते हैं कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने आप की पीआईएल खारिज कर दी है और कहा है कि 18 साल का बालिग इनसान अपने लिए कोई भी धर्म चुन सकता है, यह उस का मूलभूत अधिकार है और इस तरह की पीआईएल सिर्फ ‘चीप पब्लिसिटी’ (घटिया प्रचार) के लिए की जाती है.’
कोरोना काल में देश की स्वास्थ्य व्यवस्था बिलकुल चरमरा गई है, अस्पतालों में मरीजों के लिए बिस्तर, दवाएं, इंजैक्शन नहीं हैं, श्मशान घाटों पर लाशों के ढेर लग रहे हैं, डाक्टर खुद बीमार हो रहे हैं, क्योंकि खुद
को बचाने के लिए जरूरी सुरक्षा किट नहीं हैं.

यह अश्विनी कुमार उपाध्याय को नहीं दिखता. 10 करोड़ लोगों को वैक्सीन देने के बाद अब वैक्सीन का भी टोटा पड़ने लगा है, बेरोजगारी की मार से जनता कराह रही है, नौकरीकारोबार सब ठप हो चुके हैं, प्लेन चलाने वाला पायलट डिलीवरी बौय बन गया है, शिक्षक मनरेगा में मजदूरी कर रहा है, बड़ीबड़ी पोस्ट पर काम कर चुके लोग सब्जी का ठेला खींच रहे हैं, चाय का खोखा खोलने को मजबूर हैं… आखिर देश को इस गड्ढे से निकालने के लिए सरकार क्या कर रही है, क्या इस पर भी कोई जनहित याचिका अश्विनी कुमार उपाध्यायजी डालेंगे?

भाजपा की नई चाल: मूर्ति में सिमटी मंदिर की राजनीति

अयोध्या में शिव सेना का ‘संत सम्मान’ और भारतीय जनता पार्टी की ‘धर्म संसद’ खत्म हो चुकी है. इस बीच अयोध्या का जनजीवन पूरी तरह से ठप हो गया था. सब से ज्यादा बुरा असर स्कूली बच्चों पर पड़ा. निजी स्कूलों और कई सरकारी स्कूलों में पढ़ाई बंद रही.

शिव सेना के ‘संत सम्मान’ में उद्धव ठाकरे पूरे परिवार के साथ हावी रहे. अयोध्या में पहली बार शिव सेना प्रमुख आए थे. इस के बाद भी जनता का समर्थन उन को नहीं मिला.

शिव सेना ने हमेशा से ही मुंबई में उत्तर भारतीयों का विरोध किया है. ऐसे में उत्तर प्रदेश के लोगों ने शिव सेना को अपना समर्थन नहीं दिया.

‘धर्म संसद’ का आयोजन वैसे तो विश्व हिंदू परिषद का था, पर इस में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा की पूरी ताकत लगी थी. संतों से ज्यादा भाजपा नेताओं और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ऊपर सब की नजर थी.

‘धर्म संसद’ में राम मंदिर को ले कर कोई ठोस बात नहीं हुई. उत्तर प्रदेश की सरकार ने अयोध्या में राम की मूर्ति लगाने का ऐलान किया. ऐसे में राम मंदिर की बात को राम की मूर्ति में बदल दिया गया.

उत्तर प्रदेश सरकार ने 800 करोड़ रुपए की लागत से 221 मीटर ऊंची मूर्ति बनाने की बात कही. इस काम को करने में साढ़े 3 साल का समय बताया गया है.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने राम मंदिर को हाशिए पर रखा था, पर देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति लगाने की बात कही थी.

4 साल में गुजरात में सरदार सरोवर बांध के पास वल्लभभाई पटेल की 182 मीटर ऊंची मूर्ति लगाई गई. राम की मूर्ति इस से भी बड़ी होगी.

बेअसर रही अयोध्या

अयोध्या की जनता इसे बेमकसद की कवायद बताती है. यहां के लोग मानते हैं कि भीड़ जुटाने से कोर्ट के फैसले पर कोई असर नहीं पड़ता है. इस से केवल अयोध्या में रहने वालों को परेशानी होती है.

इसी तरह साल 1992 के पहले कई साल तक कारसेवा के बहाने भीड़ जुटाई जाती थी. अब फिर से मंदिर के नाम पर भीड़ जुटाई जा रही है. इस से अयोध्या के रामकोट महल्ले में रहने वाले लोगों को अपने घरों में आनेजाने में परेशानी का सामना करना पड़ता है.

अयोध्या में रहने वाले व्यापारी भी इस तरह की बंदी से काफी परेशान होते हैं. इन दिनों यहां कारोबार ठप पड़ जाता है. कारोबारी नेता मानते हैं कि अयोध्या के नाम पर पूरे देश में राजनीति होती है, पर इस का बुरा असर केवल अयोध्या के कारोबार पर पड़ता है.

अयोध्या के विनीत मौर्य मानते हैं

कि अयोध्या अब धार्मिक नहीं बल्कि राजनीतिक मुद्दा बन कर रह गया है. मंदिर पर राजनीति अब बंद होनी चाहिए.

साफ दिख रहा है कि भाजपा का मकसद मंदिर मुद्दे को साल 2019 के आम चुनावों तक गरम बनाए रखने का है. अयोध्या के बाद ऐसे आयोजन दिल्ली और प्रयाग में भी होंगे.

जनवरी, 2019 में प्रयागराज में कुंभ का आयोजन हो रहा है. यह मार्च, 2019 तक चलेगा. इसी दौरान अदालत में मंदिर मुद्दे की सुनवाई भी चलेगी. इस से समयसमय पर अयोध्या मुद्दा आम लोगों की जिंदगी पर असर करता रहेगा.

हिंदुत्व की राजनीति करने वाले लोग इस का फायदा लेना चाहेंगे, जबकि मंदिर के मुद्दे को देखें तो भाजपा और उस के साथी संगठनों ने मंदिर को ले कर केवल होहल्ला ही मचाया है, कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं.

इस बार मंदिर मुद्दे पर विरोधी दलों की राजनीति बदली हुई है. वे खामोश रह कर भाजपा की शतरंजी चालों को देख रहे हैं.

साल 1998 के बाद भाजपा के नेता अटल बिहारी वाजपेयी 2 बार देश के प्रधानमंत्री बने थे. उन के समय में भी मंदिर बनाने की दिशा में कोई ठोस काम नहीं हुआ था. उस समय भाजपा ने कहा था कि अटल सरकार बहुमत की सरकार नहीं है, इसलिए मंदिर बनवाने की दिशा में कोई कानून नहीं बनाया जा सकता.

लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद नरेंद्र मोदी की अगुआई में तो केंद्र में भाजपा की बहुमत वाली सरकार बन गई है. इस के बाद भी 4 साल से ज्यादा का समय बीत चुका है और अब जब 2019 के लोकसभा चुनाव आने वाले हैं तो उसे राम मंदिर की याद आई है. उस ने राम मंदिर बनाने की जगह पर फैजाबाद जिले का नाम बदल कर अयोध्या कर दिया. अब वह राम मंदिर से दूर सरयू नदी के किनारे राम की मूर्ति लगानेकी बात कर रही है. ऐसे में साफ दिखता है कि भाजपा के लिए राम मंदिर एक चुनावी मुद्दे से ज्यादा कुछ नहीं है.

मंदिर और अदालत

राजनीतिक फायदे की नजर से अयोध्या राजनीति के केंद्र में है. भाजपा मंदिर मुद्दे पर जनता को ऐसा बताती है कि जैसे सुप्रीम कोर्ट में यह मुकदमा मंदिर बनाने के लिए है. कोर्ट में मंदिर को ले कर केवल हिंदूमुसलिम ही आमनेसामने हैं.

यह सच नहीं है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का मुकदमा इस बात के लिए है कि विवादित जगह किस की है.

दरअसल, इस मुकदमे के 3 पक्षकार हैं. इन में से 2 पक्षकार रामलला विराजमान और निर्मोही अखाड़ा हिंदुओं की पार्टी है. मुकदमे की तीसरी पक्षकार सुन्नी वक्फ बोर्ड ही मुसलिम पक्षकार है.

सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला होगा, वह इन तीनों पक्षकारों में से ही किसी के हक में होगा. अगर मंदिर के पक्ष में भी फैसला हो गया तो 2 हिंदू पक्षकारों को राजी करना होगा.

समझने वाली बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी या विश्व हिंदू परिषद ने साल 2010 में हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद भी रामलला विराजमान और निर्मोही अखाड़े से बात करने की कोशिश नहीं की है.

अगर हालिया केंद्र सरकार दोनों हिंदू पक्षकारों से ही बात कर उन्हें एकजुट कर लेती तो भी लगता कि मंदिर बनाने की दिशा में उस ने सही कदम उठाया है.

भाजपा जिस संत समाज की बात कर रही है उस में भी बड़ी तादाद ऐसे संतों की है जो विश्व हिंदू परिषद के विरोधी हैं. ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि मंदिर बनाने में भाजपा का क्या रोल होगा?

60 साल की कानूनी लड़ाई के बाद अयोध्या में राम मंदिर का फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच ने 30 सितंबर, 2010 को सुनाया था. यह फैसला 3 जजों की स्पैशल बैंच द्वारा 8189 पन्नों में सुनाया गया था. फैसला देने वालों में जस्टिस सुधीर अग्रवाल, जस्टिस एसयू खान और जस्टिस धर्मवीर शर्मा शामिल थे.

सब से बड़ा फैसला जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने सुनाया था. 5238 पन्नों के फैसले में उन्होंने कहा था, ‘विवादित ढांचे का मध्य गुंबद हिंदुओं की आस्था और विश्वास के अनुसार राम का जन्मस्थान है. यह पता नहीं चल सका कि मसजिद कब और किस ने बनाई लेकिन यह मसजिद इसलाम के मूल सिद्धांतों के खिलाफ बनी है, लिहाजा मसजिद का दर्जा नहीं दिया जा सकता.’

2666 पन्नों के फैसले में जस्टिस धर्मवीर शर्मा ने कहा था, ‘पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के नतीजों से साफ है कि विवादित ढांचा पुराने निर्माण को गिरा कर बनाया गया था. एएसआई ने साबित किया है कि यहां पर पहले हिंदुओं का बड़ा धार्मिक ढांचा रहा है यानी यहां हिंदुओं का कोई बड़ा निर्माण था.’

285 पन्नों के फैसले में जस्टिस एसयू खान ने कहा, ‘जमीन पर हिंदू, मुसलमान और निर्मोही अखाड़े का बराबर हक है. इसे तीनों में बराबर बांटा जाना चाहिए. अगर किसी पार्टी का हिस्सा कम पड़ता है तो उस की भरपाई केंद्र सरकार द्वारा अधिगृहीत जमीन से दे कर करनी चाहिए.’

अदालत के फैसले के बाद रामलला विराजमान पक्ष को अधिकार मिला कि रामलला जहां पर हैं वहीं विराजमान रहेंगे. जहां रामलला की पूजाअर्चना हो रही है वह स्थल राम जन्मभूमि है.  रामलला को एकतिहाई जमीन भी दी गई.

निर्मोही अखाड़े को रामचबूतरा और सीता रसोई दी गई. साथ ही, एकतिहाई जमीन भी दी गई.

इसी तरह मुकदमे के तीसरे पक्ष सुन्नी वक्फ बोर्ड को भी एकतिहाई जमीन दी गई है. कोर्ट ने सुन्नी वक्फ बोर्ड की अपील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि 1949 में जब मूर्तियां वहां पर रखी गईं, तब मुकदमा दाखिल क्यों नहीं किया गया?

अयोध्या का यह फैसला जितना रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़े और सुन्नी वक्फ बोर्ड के लिए अहम है उस से ज्यादा अहम राजनीतिक दलों के लिए भी है. ऐसे में चुनाव के समय यह राजनीतिक मुद्दा बन जाता है.

अयोध्या मामला: एक नजर में

1528: मुगल बादशाह बाबर ने मसजिद बनवाई. हिंदुओं का दावा है कि इस जगह पर पहले राम मंदिर था.

1859: ब्रिटिश अफसरों ने एक अलग बोर्ड बना कर पूजा स्थलों को अलगअलग कर दिया. अंदर का हिस्सा मुसलिमों को और बाहर का हिस्सा हिंदुओं को दिया.

1885: महंत रघुवर दास ने याचिका दायर कर राम चबूतरे पर छतरी बनवाने की मांग की.

1949: मसजिद के भीतर राम की प्रतिमा प्रकट हुई. मुसलिमों का कहना है कि प्रतिमा हिंदुओं ने रखी.  सरकार ने उस जगह को विवादित बता कर ताला लगा दिया.

1950: मालिकाना हक के लिए गोपाल सिंह विशारद ने पहला मुकदमा दायर किया. अदालत ने प्रतिमा को हटाने पर रोक लगा कर पूजा की इजाजत दी.

1959: निर्मोही अखाड़े ने भी मुकदमा दाखिल किया. उस ने सरकारी रिसीवर हटाने और खुद का मालिकाना हक देने की बात कही.

1961: उत्तर प्रदेश सुन्नी सैंट्रल बोर्ड औफ वक्फ भी विवाद में शामिल हुआ.

1986: फैजाबाद जिला अदालत ने मसजिद के फाटक खोलने और राम दर्शन की इजाजत दी. मुसलिमों ने बाबरी मसजिद ऐक्शन कमेटी बनाई.

1989: विश्व हिंदू परिषद ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुकदमा दायर कर मालिकाना हक राम के नाम पर ऐलान करने की गुजारिश की. फैजाबाद जिला कोर्ट में चल रहे सारे मामले इलाहाबाद हाईकोर्ट भेजे गए.

इसी साल विश्व हिंदू परिषद ने विवादित जगह के पास ही राम मंदिर का शिलान्यास किया.

1990: विश्व हिंदू परिषद की अगुआई में कारसेवकों ने विवादित जगह पर बने राम मंदिर में तोड़फोड़ की. मुलायम सरकार ने गोलीबारी की.

1992: विवादित जगह पर कारसेवकों ने तीनों गुंबद ढहा दिए.

2002: अदालत ने एएसआई को खुदाई कर यह पता लगाने के लिए कहा कि विवादित जगह के नीचे मंदिर था या नहीं. इसी साल हाईकोर्ट के 3 जजों ने मामले की सुनवाई शुरू की.

2010: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच ने विवादित जगह को 3 हिस्सों में बांटने का आदेश दिया.

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