Films : हिंदी फिल्मों में मौडर्न लव स्टोरी

Films. फिल्में शीशे सी नाजुक भी हैं और हथौड़ा सी मजबूत भी. वे समाज की हकीकत दिखाती भी हैं और बहुत बार उस हकीकत पर असर डाल कर उसे बदलती भी हैं.

हिंदी फिल्मों में जब रोमांस की बात आती है, तो ज्यादातर फिल्में किसी प्रेम कहानी से शुरू हो कर लव मैरिज तक का सफर तय करती हैं. इन में 2 प्यार करने वाले, उन के परिवार, आपसी रिश्ते में उतारचढ़ाव पर पर इस तरह फोकस किया जाता है कि दर्शक किसी हिंडोले की सवारी का सा मजा लेते हैं.

मोटेतौर पर देखें तो पिछले कुछ सालों में आईं लव मैरिज वाली फिल्मों ने दर्शकों पर 4 बड़े असर डाले हैं. पहला, पौजिटिव असर. कह सकते हैं कि लव मैरिज को ले कर आम लोगों की सोच बदली है. 90 के दशक में लव मैरिज करना ‘विलेन’ जैसा नैगेटिव था, पर आज 2026 ‘हीरोहीरोइन’ जैसा स्वीट.

साल 1995 में हिंदी फिल्म ‘दिल वाले दुलहनिया ले जाएंगे’ में राज सिमरन के लिए विदेश से भारत आ जाता है और आखिरी में सिमरन की जिद उस के बाबूजी को ‘जा, सिमरन जा’ कहने पर मजबूर कर देती हैं. तब ऐसा लगा था कि यह फिल्म देख कर भारत के करोड़ों पापाओं के दिल पिघल गए होंगे.

दूसरा असर यह हुआ है कि लड़कियों की चौइस अब ‘पापा की परी’ से ‘अपनी मरजी’ तक आ गई है. ‘क्वीन’ और ‘राजी’ जैसी फिल्मों में हीरोइन को अपने फैसले खुद लेना सिखाया. वे प्यार में पहल करती हैं और अगर पार्टनर सही नहीं है, तो न बोल देती हैं.

तीसरा असर जो बहुत जरूरी था, जाति और धर्म की दीवार टूटी. इंटरकास्ट, इंटरफेथ को रोमांटिक बनाया. फिल्म ‘बौम्बे’ में हिंदूमुसलिम और फिल्म ‘2 स्टेट्स’ में पंजाबीतमिल जोड़े की लव कैमिस्ट्री हिट साबित हुई.

चौथा असर यह हुआ कि जो ‘लव’ शब्द पहले टैबू माना जाता था अब ड्राइंगरूम में डिस्कस किया जाने लगा. सूरज बड़जात्या की फैमिली फिल्म ‘हम आप के हैं कौन’ में भी हलकेफुलके तरीके से अरेंज बनाम लव पर अपनी बात रखी.

साल 2010 के बाद का ट्विस्ट

इस दौर में ‘भाग कर शादी’ से ‘सोच कर शादी’ करने के अलावा अब प्यार में ईएमआई, कैरियर, फैमिली ड्रामा, लिवइन सब आता चला गया. अब हीरो हीरोइन परफैक्ट मैच नहीं थे, बल्कि उन में खामियां भी दिखाई जाने लगीं. शादी का मतलब हैप्पी एंडिंग नहीं रहा. वे खुद प्यार का पंचनामा करने लगे. शादी ढंग से नहीं चल रही तो तलाक लेना ज्यादा बढि़या औप्शन लगा.

साल 2013 में आई फिल्म ‘शुद्ध देसी रोमांस में लिवइन, कमिटमैंट फोबिया, शादी जरूरी है क्या, जैसी बातों पर चर्चा हुई. फिल्म के तीनों मेन किरदार सैक्स से परहेज नहीं करते, पर शादी से भागते हैं.

फिल्म ‘लव आजकल’ के दोनों पार्ट में पुराना प्यार बनाम टिंडर वाला प्यार दिखाया गया और सवाल उठाया गया कि कैरियर पहले या प्यार?

साल 2015 में आई फिल्म ‘तमाशा’ में हीरो खुद की तलाश से जू?ाता है, तो फिल्म ‘गहराइयां’ में टौक्सिक रिलेशन, मैंटल हैल्थ से भरपूर लव स्टोरी पर बात हुई.

इतना ही नहीं, फिल्म ‘बरेली की बर्फी’, ‘शुभ मंगल सावधान’, ‘बधाई दो’, ‘लुकाछिपी’ में भी प्यार और शादी का तड़का अलग ही स्टाइल में लगाया गया.

कहने का मतलब है कि अब हिंदी फिल्में प्यार और शादी में कोरा रोमांस नहीं परोसती हैं, बल्कि वे नौजवानों की उन समस्याओं पर भी बात करती हैं, जो पहले दबी जबान में फुसफुसाई जाती थीं.  Films

नहीं करना चाहती है गदर 3 में अमीषा पटेल एक्टिंग! बताई ये वजह

गदर के बाद गदर 2 का रिस्पॉन्स अच्छा देखने को मिला है लोगों को फिल्म काफी पसंद आई है. इसलिए अबतक फिल्म 400 करोड़ का आकाड़ा पार कर चुकी है. फिल्म में तारा और सकीना को सक्रीन पर देख लोग काफी खुश हुए लेकिन इसकी सक्सेस के बाद जब अमीषा से गदर 3 के लिए पूछा गया तो उन्होने साफ इंकार कर दिया.

 

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हाल ही में अमीषा पटेल ने एक इंटरव्यू दिया जहां उनसे गदर 3 के बारे में कई सवाल किए गए. उन्होने कहा फैंस की भूख पूरी नही हुई वो सकीना और तारा को ओर देखना चाहते है.इस बार हमे एक्टर होने पर नि: स्वार्थ काम करना पड़ा.ऐसे में तारा और स्कीना को फिल्म पीछे रखा गया क्योकि हम कुछ अलग फिल्म बना रहे थे. फर्स्ट हाफ मेरा था बाकि तारा का था. हमे वरिष्ठ एक्टर होने के नाते कोई एतराज नहीं था.

 

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आपको बता दें, कि आगे जह अमीषा पटेल से पूछा गया कि वह गदर 3 करना चाहेगी तो उन्होने साफ इंकार कर दिया और कहा कि गदर3 में अगर उनका स्क्रीनटाइम कम रहा था तो वही नहीं करेंगी. मैं अपने फैंस को निराश नहीं कर सकती हूं. मुझे पता है कि फैंस को लगा है कि उन्हे हम कम दिखाई दिए है इसलिए उन्हे हम वो दिखाएंगे जो वो देखना चाहते है. आखिरकार, वो लोग तारा और सकीना के लिए ही सिनेमाघर आते है.आप केट विंसलेट और लियोनार्डो डी के बिना टाइटैनिक नहीं बना सकते है यही वजह है कि एनआरआई आडियंस ने पार्ट2 को पहले पार्ट की तरह नहीं देखा.

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