Social Story in Hindi : असली चेहरा

Social Story in Hindi .‘‘सपना… ओ सपना… कहां मर गई. सुनील के लिए एक कप चाय बना दे. 2 परांठे भी सेंक देना,’’ मां सुनील की ओर लाड़ से देख कर बोलीं.

सपना जल्दी से घड़े से एक गिलास पानी निकाल कर चुपचाप रख गई. थोड़ी देर में वह नीची नजरों से दुपट्टा ठीक करती हुई परांठे, अचार और चाय ले कर आई.

सुनील ने चाय पकड़ने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया और नजरें बचा कर उस के हाथ को धीरे से दबा दिया. सपना ने कसमसा कर धीरे से हाथ खींच लिया और वहां से चली गई.

सपना सुनील की हरकतों से परेशान थी, लेकिन बाबूजी से कैसे कहे? मां कुछ समझना ही नहीं चाहतीं.

सपना संकोची स्वभाव की दब्बू लड़की थी. जब से उस का भाई नीरज मां के गहने ले कर भागा था, तब से घर का माहौल बहुत खराब हो गया था. रहीसही कसर किराएदार सुनील ने पूरी कर दी.

एक बार सपना ने मां से कहा भी था, ‘अम्मां, मुझे  सुनील अच्छा नहीं लगता.’ इस पर मां चिल्ला पड़ी थीं, ‘क्यों, क्या वह तुझे खा जाएगा?’

मां निर्मला अपनी नासमझ  बेटी सपना की अक्ल पर तरस खाती थीं कि कैसे समझाएं इसे. वे सोचतीं, ‘बेवकूफ लड़की, फंसा ले इस लड़के को, नहीं तो सारी उम्र कुंआरी रह जाएगी. तेरा बाप तो तेरी शादी जिंदगीभर नहीं कर पाएगा.’

सपना के पापा नरेश एक प्राइवेट दुकान में सेल्समैन थे. छोटी सी तनख्वाह में किसी तरह गुजरबसर हो जाती थी. जब से बेटी सपना बड़ी हो गई थी, तब से उस के ब्याह के लिए वे थोड़ा चिंतित रहते थे.

निर्मला अपने पति नरेश की कम कमाई के चलते हमेशा नाराज रहतीं. किसी से भी झगड़ा करना उन का शगल था. वे लौटरी की टिकटें खरीदतीं. हर समय लखपति होने के ख्वाब देखतीं.

जब से सपना बड़ी हुई, तब से रसोईघर की जिम्मेदारी उस पर आ पड़ी. अम्मां का दिमाग तो केवल सजनेसंवरने में लगा रहता. कभी पति से साड़ी की फरमाइश करतीं, तो कभी लिपस्टिक की. नरेश उन्हें खूब समझाते, पर वे आदत से मजबूर थीं.

रोजरोज की बकबक से परेशान हो कर नरेश किसी दूसरी दुकान में सुबह के समय लिखापढ़ी का काम करने लगे.

नीरज निर्मला का बिगड़ैल शहजादा था. पढ़नेलिखने से उस का दूर का रिश्ता था. छोटा था तो सवेरा होते ही महल्ले के लड़कों के साथ क्रिकेट के मैदान में पहुंच जाता. खेलखेल में किसी न किसी से हाथापाई कर के आता. निर्मला का झगड़ालू स्वभाव उस की ढाल बन जाता.

निर्मला नीरज को बचपन से ही स्कूल जाने के लिए पैसे का लालच देती थीं. छोटी जमात में तो किसी तरह प्रमोशन से पास होता रहा, पर 10वीं जमात में उस की गाड़ी अटक गई.

नीरज को बाहर का चटपटा खाना खाने की आदत भी लग गई थी. अम्मां का दिया हुआ पैसा उसे कम पड़ने लगा था. जैसेजैसे वह बड़ा हुआ, उस का संगसाथ भी बदमाश लड़कों से हो गया. धीरेधीरे उस ने स्कूल जाना भी बंद कर दिया. अब वह यहांवहां उठाईगीरी करने लगा. जुआ खेलना तो उस का शौक बन गया था.

एक दिन नीरज के हाथ में नया मोबाइल फोन देख कर अम्मां ने उस से पूछा था, ‘यह कहां से आया?’

उस ने झट से पट्टी पढ़ा दी, ‘यह मेरा थोड़े ही है, मेरे दोस्त का है.’

अम्मां को कुछकुछ शक होने लगा था कि बेटा बिगड़ रहा है, पर उन का लाड़ आड़े आ जाता था.

एक दिन नीरज के स्कूल से शिकायती चिट्ठी आई. उन्होंने अम्मांपापा को स्कूल में बुलाया था. यह देख अम्मां घबराई थीं, पर चूंकि वे घाघ थीं, इसलिए उन्होंने पति नरेश को कुछ नहीं बताया और नीरज से बोली थीं, ‘बेटा, तुम्हारे स्कूल से शिकायती चिट्ठी आई है. तुम्हारे पापा को बुलाया है. क्या बात है? क्या तुम ने कोई गड़बड़ की है?’

‘कुछ नहीं अम्मां… स्कूल में कई लड़के बहुत बदमाश हैं. वे मुझ से जलते हैं. उन्होंने मुझे फंसा दिया है.’

अम्मां नीरज की बातों पर यकीन नहीं कर पा रही थीं. वे अकेली ही स्कूल गईं. वहां प्रिंसिपल ने कड़े शब्दों में कहा, ‘आप का बेटा अकसर स्कूल से गायब रहता है. यह साल उस के लिए आखिरी मौका है. इस के बाद हम स्कूल से उस का नाम काट देंगे.’

अम्मां नीरज को समझाती रहीं, अपनी ममता का वास्ता देती रहीं, पर वह तो चिकना घड़ा था.

एक दिन पापा ने दुकान से छुट्टी ले रखी थी. उन्हें हलका सा बुखार था. वे घर में लेटे हुए आराम कर रहे थे कि अचानक बाहर जोर का शोर सुनाई पड़ा. वे गुस्से में बाहर आए तो देखा कि 10-15 लोग नीरज को घसीटते हुए ले कर आ रहे थे.

वे जोर से चिल्लाए, ‘क्या बात है? क्यों मार रहे हो मेरे बेटे को?’

यह सुन कर एक आदमी ने गुस्से में कहा, ‘आप के बेटे नीरज को जेब काटते हुए रंगे हाथ पकड़ा है. वह तो हम आप की भलमनसाहत के चलते इसे पकड़ कर यहां ले आए, नहीं तो इसे पुलिस के हवाले करने जा रहे थे.’

पापा को तो काटो तो खून नहीं. उन्होंने आव देखा न ताव, लहूलुहान बेटे को लातघूंसों से पीटना शुरू कर दिया. अम्मां बेटे की पिटाई देख न पाईं. उन्होंने पापा का हाथ पकड़ लिया और चिल्ला कर बोलीं, ‘क्या जान ही ले लेंगे इस की? बच्चा है, इस से गलती हो गई.’

यह सुन कर वे गरज पड़े, ‘यह सब तुम्हारी करतूतों का ही फल है. तुम ने लाड़प्यार में लड़के को बरबाद कर दिया है. आज से यह मेरे लिए मर चुका है.’

नीरज तो कब से इस मौके के इंतजार में था. एक रात जब सब सो रहे थे, तो उस ने चुपचाप अम्मां के जेवर व रुपयों को बटोरा और घर से भाग गया.

इन बातों को कई साल बीत गए थे. अब सपना 26 साल की हो गई थी. अम्मांपापा उस के लिए लड़का ढूंढ़ रहे थे, लेकिन दहेज के चलते कहीं बात नहीं बन रही थी.

इस वजह से अम्मां को पापा पर वार करने का नया मौका मिल जाता. वे गुस्सा हो कर कहतीं, ‘जाने कौन सी मनहूस घड़ी थी, जब मेरा ब्याह इस आदमी से हुआ था. बेटा तो घर छोड़ कर भाग चुका है, एक दिन बेटी भी किसी के साथ भाग जाएगी.’

अम्मां ने कहसुन कर पास के एक स्कूल में सपना की नौकरी लगवा दी, पर तनख्वाह के रुपए वे खुद ही पहली तारीख को ले आती थीं.

इस के बाद अम्मां ने जुगत भिड़ाई कि घर में एक कमरा खाली है, अगर इसे किसी लड़के को किराए पर दे दें, तो एक पंथ दो काज हो सकते हैं. बाद में सपना की शादी उसी लड़के से कर देंगे.

पापा ने अम्मां को समझाया कि लड़के को किराए पर घर में रखना ठीक नहीं है, क्योंकि सपना जवान लड़की है. उस की शादी हो जाने के बाद किसी को भी किराए पर रख लेना, पर जिद्दी अम्मां ने एक लड़के से किराएदारी तय कर ली.

किराएदार सुनील तकरीबन 30 साल का नौजवान था. उस ने बताया था कि वह यूनिवर्सिटी में एलएलबी में पढ़ता है और उस के मांबाप गांव में रहते हैं.

उस ने अम्मां की दुखती रग को पकड़ा. वह बोला, ‘अम्मांजी, मैं नीरज को जरूर ढूंढ़ कर लाऊंगा. मैं आप का बेटा हूं. आप अब किसी भी काम की फिक्र न करें. जब तक नीरज नहीं मिलता, तब तक मुझे  ही अपना नीरज समझो.’

पापा को सुनील एक आंख नहीं भाया था. उन्होंने अम्मां को एक बार आगाह जरूर किया था, ‘मुझे  यह लड़का ठीक नहीं लग रहा है. इस को ज्यादा मुंह मत लगाना,’ पर अम्मां के दिमाग में तो खुराफात घूमती रहती थी.

चालाक सुनील ‘अम्मांअम्मां’ कह कर अपना उल्लू साधने लगा. कुछ ही दिनों में वह अम्मां की रसोई में ही खाना खाने लगा. इस से सपना की जिम्मेदारी बढ़ गई, साथ ही मुसीबतें भी.

सुनील सपना से बात करने का मौका तलाशता रहता. एक दिन वह कान के छोटेछोटे बुंदे ले आया और बोला, ‘सपनाजी, आप इन्हें पहन लीजिए. ये आप पर खूब फबेंगे.’

सपना अम्मां के पास गई और गुस्से में पैर पटकती हुई बोली, ‘मुझे  यह सब पसंद नहीं है.’ अम्मां हंस कर बोलीं, ‘तू नाहक नाराज हो रही है. वह इतने प्यार से बुंदे लाया है, तो पहन ले.’

यह सुन कर सपना चुप हो गई. वह जानती थी कि अम्मां से बहस कर के कुछ हासिल नहीं होगा.

अम्मां की शह पा कर सुनील का तो हौसला बढ़ गया. वह रोज ही कभी सब्जी, कभी फल, तो कभी मिठाई ले कर आने लगा. लालची अम्मां छोटेमोटे सामान से खुश हो उठतीं. उन्हें अपनी योजना कामयाब होते दिख रही थी.

सुनील इतना चालबाज था कि उस ने धीरेधीरे पापा को भी आईने में उतार लिया था. मन ही मन पापा भी उसे अपनी प्यारी बेटी सपना के लिए उचित जीवनसाथी के रूप में देखने लगे थे.

धीरेधीरे सुनील सपना पर अपना हक समझने लगा था. वह जबरदस्ती अपना काम सपना से करवाता. अकेले में उस के साथ बेहूदा हरकतें करने से भी बाज न आता.

डरीसहमी सपना चुपचुप सी रहती थी. वह मन ही मन कभी जहर खाने की योजना बनाती, तो कभी नदी में डूब मरने के बारे में सोचती, लेकिन पापा का चेहरा उस के इरादों पर पानी फेर देता. वह अंदर ही अंदर घुलती रहती थी.

सपना के पीले पड़े चेहरे को देख पापा भी चिंतित हो उठे. एक दिन वे बोले, ‘सपना, कल मैं छुट्टी ले लूंगा. तुम मेरे साथ डाक्टर के यहां चलना. तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं लगती.’

यह सुन कर सुनील बोल उठा, ‘बाबूजी, आप छुट्टी मत लो. मेरी तो कल छुट्टी है. मैं सपना को डाक्टर के पास ले जाऊंगा.’

सपना जोर से बोली, ‘मुझे कहीं नहीं जाना. मैं एकदम ठीक हूं.’

तभी अम्मां बोल पड़ीं, ‘सुनील, तुम कल सपना को डाक्टर के पास दिखा लाना और कहीं घुमा भी लाना. घर से निकलेगी, तो इस का मन बदलेगा.’

सपना की हिचकिचाहट को देख सुनील उसे फुसलाने लगा. वह बोला, ‘तुम मुझ  से क्यों डरती हो? मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं. मैं तुम्हें रानी बना कर रखूंगा. तुम्हारी अम्मां और पापा की देखभाल करूंगा.’

अम्मां की घूरती निगाहों से डर कर सपना तैयार हो गई.

सुनील अपने किसी दोस्त से एक मोटरसाइकिल मांग कर ले आया और सपना को उस पर बैठा कर अपने साथ बाहर ले जाने में कामयाब हो गया.

सुनील सपना को कौफी पीने के बहाने एक होटल में ले गया और वहां उस का हाथ पकड़ कर प्यारभरी बातें करने लगा. चंद ही पलों में वह उसे एक कमरे में ले गया. जब वह दरवाजे की सिटकिनी बंद करने लगा, तो सपना उसे धकेल कर बाहर आ गई. मजबूरी में उसे घर आना पड़ा.

दोनों को जल्दी आया देख अम्मां ने पूछा, ‘तुम लोग बड़ी जल्दी आ गए. क्या हुआ?’

सुनील ने होशियारी से जवाब दिया, ‘अम्मां, डाक्टर नहीं मिला.’

कुछ देर बाद सपना अपने स्कूल चली गई. वहां उस की हमदर्द अमिताजी ने उस को देखते ही पूछा, ‘सपना क्या बात है? तुम बहुत घबराई हुई लग रही हो.’

सपना अपने को रोक न सकी और उन के गले लग कर फूटफूट कर रो पड़ी.

दरअसल, सपना ने अमिताजी को अपने घर और सुनील के बारे में सबकुछ बता रखा था. उस ने डाक्टर वाली घटना के बारे में भी उन्हें बता दिया.

अमिताजी ने उसे समजहया, ‘डरो मत, क्योंकि डरने वाले को दुनिया और ज्यादा डराती है. मजबूत बनो. हालात का सामना हिम्मत से करो. उस बदमाश लड़के का असली चेहरा अपनी मां को दिखाओ, तभी तुम उस के चंगुल से बच पाओगी.’

आज सुबह सुनील की हाथ दबाने वाली हरकत से परेशान सपना की रात पलकों में कटी. उस के मन में तरहतरह के खयाल आते रहे. आखिर में उस ने तय किया कि वह अम्मांपापा के सामने उस की असलियत खोल कर रहेगी.

अगली सुबह जब सपना उठी, तो सुनील से खूब घुलमिल कर बातें करने लगी. वह यह दिखावा करने लगी कि सुनील से शादी कर के वह बहुत खुश होगी.

अम्मां इस बदलाव को देख कर बहुत खुश हो गईं और बोलीं, ‘‘सुनील, तुम अपने पापा को फोन कर के यहां बुला लो या उन की मुझ से बात कराओ, हम तो बस चट मंगनी पट ब्याह कर के गंगा नहा लेंगे.’’

सुनील हांहां करता रहता. वह अम्मां को गोलमोल जवाब देता रहा कि अभी पापा मसरूफ हैं, अब अम्मां बीमार हैं वगैरह.

इस बीच वह सपना पर हक जमाते हुए कहता, ‘‘शादी के बाद तो तुम्हें सब करना ही है, अभी से आदत डाल लो.’’

एक दिन तो हद हो गई. वह सपना से जिस्मानी रिश्ता बनाने की कोशिश कर बैठा. सपना को उस के इरादों पर शक तो था ही, अब यह शक यकीन में बदल गया. वह उधेड़बुन में थी कि इस शातिर के नकली मुखौटे को कैसे हटाए.

अचानक उस के दिमाग में बिजली कौंधी. उस ने सुनील को इशारा कर के बता दिया कि आज रात तुम मेरे कमरे में आना.

सुनील तो खुशी से पागल हो उठा. उस के लिए पलपल भारी हो रहा था. उस की बेचैनी देख कर सपना मन ही मन मुसकरा रही थी, साथ ही घबरा भी रही थी.

सुनील उस के लिए खूबसूरत सा गजरा ले कर आया था. इधर सपना अपनी तैयारी में मसरूफ थी. वह रसोई से सरसों के तेल की भरी हुई बोतल ले आई. उस ने चारपाई के आसपास अच्छी तरह सरसों का तेल फैला दिया. नींद आज उस की आंखों से कोसों दूर थी.

रात गहराते ही मस्ती में गुनगुनाते हुए सुनील सपना के कमरे में घुसा और बिस्तर के पास आते ही धड़ाम की जोरदार आवाज के साथ जमीन पर चारों खाने चित हो कर गिर गया.

सुनील उठने की हड़बड़ी में फिसल कर फिर से गिर गया. उस के गिरने और चीखने की आवाज से अम्मांपापा दौड़तेभागते सपना के कमरे में आ गए.

सुनील की हड्डी टूट गई थी. वह वहां से उठने में नाकाम हो गया था. उस को देखते ही पापा चीख पड़े, ‘‘तुम यहां सपना के कमरे में क्या कर रहे हो?’’

इस के बाद वे अम्मां से बोले, ‘‘देख लो अपने होने वाले दामाद के असली चेहरे को.’’

वे तेल पर निगाह पड़ते ही बोले, ‘‘यह तेल यहां कैसे आया?’’

सपना अपने चेहरे को दोनों हाथ से छिपा कर सिसकती हुई बोली, ‘‘पापा, मेरी इज्जत खतरे में थी. इस के असली चेहरे को आप लोगों के सामने लाने का मुझे  यही उपाय सूझा,’’ कह कर वह पापा से लिपट गई.

पापा ने सपना को अपने से अलग किया और आधी रात को ही उन्होंने सुनील को बेतहाशा लातघूंसों से पीटना शुरू कर दिया. साथ ही, वे अम्मां पर गालियों की बौछार करते जा रहे थे.

Religion and Love: प्रेम विवाह करें तो घर और धर्म छोड़ें

Religion and Love: ‘‘हमारी बिटिया अब पापा किस को कहेगी…’’

22-23 साल की एक औरत अपनी गोद में डेढ़ महीने की बेटी को देखदेख कर रोते हुए बारबार यही कह रही थी. उस के पास एक और बूढ़ी औरत भी बैठी थी. वह भी रो रही थी. उन्हें देख कर लग रहा था कि वे दोनों शायद सासबहू हैं, क्योंकि जवान औरत बारबार घूंघट कर रही थी. मरने वाला उस डेढ़ महीने की बेटी का पिता होगा. उन के साथ कुछ दूरी पर एक बूढ़ा, एक लड़का और कुछ उन के साथी खड़े थे.

लखनऊ का पोस्टमार्टम हाउस अंदर से बंद था. बाहर खाली जगह पड़ी थी. वहां इंटरलौकिंग वाली ईंटों से बना फर्श था. पास में सीमेंट से बनी बैंच और एक प्लेटफार्म था. बैंच पर लोग बैठ कर किसी अपने की डैड बौडी का इंतजार करते थे.

सीमेंट से बना प्लेटफार्म डैड बौडी रखने के काम आता था. पूरे शहर से पोस्टमार्टम के लिए वहां वे डैड बौडी आती थीं, जिन में पुलिस केस दर्ज हो. पुलिस पोस्टमार्टम के जरीए यह जानने की कोशिश करती है कि डैड बौडी के साथ क्या हुआ होगा? उस को किस तरह से मारा गया होगा? मरने का क्या समय रहा होगा? पोस्टमार्टम के बाद जब सारी खानापूरी हो जाती है, तभी डैड बौडी घर वालों को सौंपी जाती है.

कुछ देर में एक आदमी हाथ में चाबी का गुच्छा ले कर आता है और पोस्टमार्टम हाउस के एक कमरे को खोलता है. दरवाजा खुलते ही एक अजीब सी गंध 12-15 फुट दूर तक बैठे लोगों तक आती है. वहां आसपास कुछ और लोग भी होते हैं. शायद उन के भी घरपरिवार का कोई वहां रहा हो. वे लोग भी किसी अपने की डैड बौडी का इंतजार कर रहे होंगे.

‘सनी रावत… थाना निगोहां…’ पोस्टमार्टम हाउस के कमरे में गए आदमी ने अंदर से ही आवाज लगाई.

यह सुनते ही उस रोतीबिलखती औरत की आवाज तेज हो गई. साथ वाली औरत भी रो रही थी. उन के पास खड़ा एक नौजवान तेजी से पोस्टमार्टम हाउस की तरफ बढ़ गया. उस के साथ 2 और लड़के भी गए और एक बूढ़ा आदमी लड़खड़ाते कदमों से आगे बढ़ रहा था.

अब तक तेजी से अंदर गए लड़के वापस आ रहे थे. उन के हाथ में काले रंग की पौलीथिन में बंधी एक डैड बौडी थी, जिसे उन लोगों ने उस सीमेंट से बने प्लेटफार्म पर रख दिया था.

पूरे परिवार के लोग रो रहे थे. एक लड़का अपने दुख को सहन करता हुए बाहर गेट की तरफ आया और वहां पहले से खड़ी गाड़ी को अंदर बुलाने लगा. ड्राइवर गाड़ी को मोड़ कर अंदर लाया.

एक बार लड़कों ने फिर डैड बौडी को उठाया और गाड़ी में रख दिया. उसी गाड़ी में घरपरिवार के सारे लोग बैठ गए. गाड़ी चल पड़ी.

यह डैड बौडी थाना मोहनलालगंज के शंकर बक्श खेड़ा गांव के मजरा रायभान खेड़ा के रहने वाले रामनरेश रावत के 24 साल के बेटे सनी रावत की थी. जिस औरत की गोद में 2 महीने की बेटी थी उस का नाम साधना था, जो मरने वाली की पत्नी थी. बूढ़ी औरत मरने वाली की मां इद्रानी और नौजवान का नाम राज बहादुर था, जो मरने वाले का भाई था.

सनी रावत 8 सितंबर, 2025 की शाम को 7 बजे घर से बाहर निकला था. इस के बाद वह घर वापस नहीं लौटा था. तब पिता ने उस के फोन नंबर पर बात की.

तब सनी ने बताया कि वह गोसाईंगंज के देवी खेड़ा के संतोष यादव के साथ है. कुछ देर में घर पहुंच जाएगा, पर देर रात तक जब वह घर नहीं पहुंचा तो पिता ने फिर से फोन किया, तो फोन उठा नहीं. इस के बाद घर वाले सोने चले गए.

अगली सुबह 5 बजे जब सब लोग उठे और सनी को वापस आया नहीं देखा, तो उसे फिर से फोन किया. इस बार फोन बंद था.

घर वाले सनी रावत की गुमशुदगी लिखाने थाना मोहनलालगंज पहुंचे. वहां पर सोशल मीडिया पर यह पता चला कि थाना निगोहां के गौतम खेड़ा गांव के पास बांका नाले में किसी नौजवान की लाश पड़ी है. परिवार के सभी लोग आननफानन में वहां के लिए निकल पड़े.

रामनरेश रावत ने लाश की शिनाख्त अपने बेटे सनी रावत के रूप में की. परिवार वालों का आरोप था कि सनी रावत की हत्या कर के लाश को नाले में फेंक दिया गया.

रामनरेश रावत की तहरीर पर निगोहां थाने में अपराध संख्या 174/2025 धारा – 103(1), 351(3) बीएनएस के तहत संतोष यादव निवासी देवी खेड़ा गोसाईंगंज, जीतू यादव और देवेश यादव के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया. फिर एक के बाद एक आरोपियों को पकड़ लिया गया.

इस के बाद जो खुलासा हुआ, वह एक दर्दनाक कहानी है.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट मे सनी रावत की मौत सिर पर लगी चोट और पानी में डूबने से हुई थी. सनी के घर से जहां उस की डैड बौडी मिली, वह जगह 15 किलोमीटर दूर थी. बांका नाले किनारे सनी कैसे पहुंचा? यह बड़ा सवाल था. जो उसे यहां लाया है, वही इस का जवाब दे सकता था. सनी के घर वालों के मुताबिक हत्या की वजह उस का साधना से प्रेम विवाह करना था.

3-4 साल पहले की बात है. सनी निगोहां थाना के मस्तीपुर गांव में अपनी ननिहाल में रहता था. उस के नाना के घर से कुछ दूरी पर ही जीतू यादव नामक नौजवान का घर था. सनी और जीतू यादव की आपस में दोस्ती हो गई. दोनों का एकदूसरे के घर आना भी हो गया. जीतू की बहन साधना से भी सनी की मुलाकात होने लगी. इस के बाद उन दोनों के बीच प्यार हो गया.

जब उन के प्यार की चर्चा गांव में फैलने लगी, तो जनवरी, 2004 में एक दिन दोनों ने घर से भाग कर लव मैरिज कर ली. इस से गुस्से में आए जीतू, उस के भाई देवेश और परिवार के दूसरे लोगों ने सनी के पिता रामनरेश और मां इद्रानी को मारपीट कर घर से भगा दिया. इन के घर में आग लगा दी.

राम नरेश अपनी पत्नी समेत अपने पुश्तैनी गांव शंकर बक्श खेड़ा में आ कर रहने लगे. सनी अपनी पत्नी साधना को ले कर मुंबई भाग गया. जब साधना पेट से हुई तो सनी उस को लेकर गोसाईंगंज आ गया, जो मोहनलालगंज कसबे के ही पास है.

2 साल बीत जाने के बाद भी साधना के भाई उस के पति को धमकी दे रहे थे. ऐसे में साधना और सनी छिपछिप कर रह रहे थे. डेढ़ महीना पहले ही साधना को बेटी हुई थी.

गांव के लोगों ने जीतू और उस के परिवार को ताना मारने के अंदाज में बधाई दी. इस से जीतू और उस के परिवार के लोगों के मन में लगे घाव हरे हो गए. अब जीतू ने तय कर लिया कि सनी को मार देना ही आखिरी इलाज है.

8 सितंबर, 2025 की शाम को जब सनी रावत जेल रोड के पास देशी शराब के ठेके के पास बैठा था, तो साधना के भाई जीतू यादव ने उस को अपनी स्कार्पियो गाड़ी में बैठा लिया. गाड़ी में उस का भाई देवेश यादव, साला संतोष यादव और दोस्त राज कपूर पहले से बैठे थे. गाड़ी सुनसान रास्तों में आगे बढ़ रही थी.

देवेश और जीतू ने सनी पर लोहे की रौड से वार कर के उसे मार दिया.

इस के बाद सनी की लाश को छिपाने के मकसद से वे लोग सिसेंडी रोड पर गौतमखेड़ा के पास बांका नाला के पास गए. सनी कहीं जिंदा न बच जाए, इस के लिए वहां रोड पर एक बार फिर लोहे की रौड से उसे मारा गया, फिर उस की लाश को नाले में फेंक दिया. इस के बाद वे सब अपनेअपने घर चले गए.

जब दूसरे दिन सनी रावत की लाश बरामद हुई और नामजद मुकदमा लिखा गया, तब पुलिस ने इन की धरपकड़ का अभियान चलाया. 11 सितंबर, 2025 को देवेश और संतोष को सिसेंडी रोड पर जंगल तिराहा के पास से पकड़ा गया.

उन की निशानदेही पर स्कार्पियो गाड़ी नंबर यूपी32 पीडब्ल्यू 6758, लोहे की रौड और खून से सना अंगोछा भी बरामद किया गया. पुलिस ने बरामद सामान जब्त कर पकड़े गए दोनों आरोपियों देवेश और संतोष को जेल भेज दिया.

पुलिस को अभी भी जीतू और राज कपूर की तलाश थी. 13 सितंबर, 2025 की शाम पुलिस को सूचना मिली कि जय सिंह और राज कपूर जबरौली के पास जंगल में छिपे हैं. पुलिस ने दोनों को पकड़ लिया.

आरोपी जेल पहुंच गए. डेढ़ महीने की बच्ची अनाथ हो गई. उस की 24 साल की मां साधना विधवा हो गई. पिता सनी बदले की भेंट चढ़ गया.

लाख कानून बन जाएं, लेकिन समाज अभी भी अपने हिसाब से चल रहा है. बेटी अभी भी पिता की जायदाद में हिस्सा नहीं ले पाती है. क्या साधना को अपने पिता की जायदाद में उस के भाइयों के बराबर हिस्सा मिलेगा? यह बड़ा सवाल है, जिस का जवाब अमूमन ‘न’ ही होता है. ऐसे में साधना अपनी बाकी जिंदगी कैसे काटेगी? अपनी छोटी बेटी का पालनपोषण कैसे करेगी? इस की वजह केवल इतनी थी कि साधना और सनी ने गैरजाति में प्रेम विवाह किया, जो उन के घर वालों को मंजूर नहीं था.

क्यों नहीं स्वीकारे जाते प्रेम विवाह

हमारे समाज में जाति और धर्म के रीतिरिवाजों की जड़ें इतने गहरे तक धंसी हैं कि उन से उबर पाना आसान नहीं है. जिंदगी के हर मोड़ पर कुछ न कुछ रीतिरिवाज होते हैं, जो धर्म से जुड़े होते हैं. अगर कहीं जन्मदिन भी मनाया जा रहा है, जिस में केक कटना है, जिस को हिंदू धर्म मानता नहीं है, वहां भी अब पूजापाठ होने लगी है. एक तरफ केक कटेगा, तो दूसरी तरफ पूजापाठ होगी.

धर्म को मानने वाले केवल हिंदू ही नहीं हैं, बल्कि जो ईसाई, मुसलिम यहां तक कि बौद्ध धर्म को मानते हैं, वे भी धार्मिक पाखंड का शिकार होते हैं. धर्म चलाने वालों को पता है कि जिस दिन जाति खत्म हो जाएगी, उस दिन धर्म और उस का पाखंड भी खत्म हो जाएगा.

धर्म और जाति की बात होती है, तो यह माना जाता है कि विवाद केवल जनरल, ओबीसी और एससी के होते हैं. असल में ऐसा नहीं है. जब भी प्रेम विवाह की बात होती है, तो जनरल में भी जातीय विभेद है. एससी और ओबीसी में भी अलगअलग जाति को ले कर भेदभाव है.

आजादी के बाद से 1980 तक जब तक राममंदिर आंदोलन का असर नहीं था, जाति के भेद मिटाने के कानून भी बने ठगे, जिन में स्पैशल मैरिज ऐक्ट सब से बड़ा उदाहरण है. उस समय ‘जाति तोड़ो’ का नारा भी दिया गया था और धर्म को ले कर विरोध हो रहा था.

पर बाद में धीरेधीरे यह विरोध खत्म हो गया. उस की वजह यह रही कि धर्म का प्रचार करने वाले को तो पैसा मिलता है, लेकिन उस के पाखंड का विरोध करने वाले को पैसा नहीं मिलता. उलटा धार्मिक भावनाओं को भड़काने के आरोप में कई मुकदमे कायम होने लगे. ऐसे में धर्म के पाखंड और जातीयता का विरोध करने वाले कमजोर होते गए. समाज का यह असर घरपरिवार के भीतर रसोईघर और बैडरूम तक पहुंच गया.

1980 के धार्मिक काल के बाद समाज में गैरजाति और गैरधर्म में प्रेम विवाह का विरोध होने लगा. संविधान, कानून और कोर्ट के आदेशों के बाद भी प्रेम विवाह करने वालों की जिंदगी महफूज नहीं है.

ऐसे में एक ही उपाय है कि अगर प्रेम विवाह करना है, तो हर तरह का धर्म छोड़ना होगा. इस के अलावा अपना घर छोड़ कर अलग रहना पड़ेगा, तभी जिंदगी महफूज हो सकेगी. अगर इतना करने की ताकत या हिम्मत नहीं है, तो प्रेम और विवाह दोनों करने का हक नहीं है, क्योंकि प्रेम जाति और धर्म देख कर नहीं होता है. जहां इस तरह का काम होगा, वहां समाज और घरपरिवार विरोध में खड़ा होगा.

सनी रावत के बेटी होने पर जीतू यादव को मामा बनने की बधाई देते समय समाज के लोग अगर उसे ताने नहीं मारते, तो सनी रावत की हत्या होने से बच सकती थी. दोनों परिवार तहसनहस नहीं होते. सनी और साधना मुंबई से वापस नहीं आते, तो भी यह वारदात टल सकती थी.

ऐसे में अगर प्रेम विवाह करने का फैसला लिया है, तो घरपरिवार और धर्म छोड़ कर जिंदगी गुजारनी होगी. Religion and Love

Crime Story: औनर किलिंग-घर आए दामाद को दी दर्दनाक मौत

त्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का एक बहुत पौश इलाका है आशियाना, जहांऔनर किलिंगका ऐसा कांड किया गया कि सुनने और देखने वाली की रूह कांप गई. वहां के सैक्टरआई में मंगलवार, 17 मार्च, 2026 की रात एक एडवोकेट तीरथ राज सिंह ने अपनी बेटी साक्षी के प्रेम विवाह से नाराज हो कर अपने ही दामाद विष्णु यादव की बेरहमी से हत्या कर दी, जिस से पूरे इलाके में हड़कंप मच गया.

मिली जानकारी के मुताबिक, प्रतापगढ़ के सांगीपुर इलाके के रहने वाले 32 साल के विष्णु यादव ने महज 4 साल पहले एडवोकेट तीरथ राज सिंह की बेटी साक्षी से प्रेम विवाह किया था. पर तीरथ राज सिंह इस शादी के खिलाफ थे और तब से ही अपने दामाद और बेटी से  दुश्मनी पाल बैठे थे.विष्णु यादव और साक्षी अपनी 3 साल की बेटी अर्चिता के साथ प्रतापगढ़ में ही रहते थे. पर 17 मार्च को विष्णु यादव अपनी पत्नी साक्षी की जिद पर ससुराल में लखनऊ आए थे.

मंगलवार की रात को तकरीबन साढ़े 10 बजे विष्णु यादव और उन के ससुर तीरथ राज सिंह के बीच किसी बात को ले कर तीखी बहस शुरू हो गई और देखते ही देखते यह बहस हाथापाई में बदल गया.
घर के भीतर शोर सुन कर विष्णु यादव की सालियां और परिवार के दूसरे सदस्य भी वहां पहुंच गए. इसी बीच, गुस्से से तमतमाए तीरथ राज ने पास पड़ी चारपाई का पाया उठाया और विष्णु के सिर पर ताबड़तोड़ चोट कर दी, जिस से विष्णु का सिर फट गया और उस ने मौके पर ही दम तोड़ दिया. बीचबचाव करने साक्षी भी पिता के हमले में घायल हो गई.

इस हत्याकांड की सूचना मिलते ही पुलिस सुपरिंटैंडैंट (मध्य) विक्रांत वीर और एसीपी कैंट अभय प्रताप मल्ल भारी पुलिस बल और फोरैंसिक टीम के साथ मौके पर पहुंचे. पुलिस ने मौका वारदात
से हत्या में इस्तेमाल चारपाई का पाया बरामद कर लिया, जबकि फोरैंसिक टीम ने मौके से फिंगरप्रिंट्स और दूसरे तमाम सुबूत जुटाए. इतना ही नहीं, पुलिस ने तीरथ राज सिंह और उन की चार बेटियों को हिरासत में ले लिया. पुलिस सुपरिंटैंडैंट विक्रांत वीर ने बताया कि पुलिस यह भी जांच कर रही है कि क्या इस हत्याकांड की साजिश पहले से रची गई थी या यह अचानक हुए  का नतीजा है.   

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