Heart Touching Story : सफर में छूटा प्यार

Heart Touching Story. शाम धीरेधीरे अपने आंचल को फैलाती जा रही थी. आसमान में धूप की हलकी पड़ती किरणें जैसे किसी बिछड़ते रिश्ते की आखिरी चमक बन कर ठहर गई थीं.

रेलवे स्टेशन पर हलचल थी, आवाजें थीं, चाय वालों की पुकार थी, कुलियों की भागदौड़ थी, लेकिन इस शोर के बीच भी अर्जुन के भीतर एक ऐसा सन्नाटा था, जिसे कोई सुन नहीं सकता था.

प्लेटफार्म नंबर 3 पर खड़ी ट्रेन जैसे केवल यात्रियों को नहीं, बल्कि यादों को भी अपने साथ ले जाने के लिए तैयार थी. अर्जुन हाथ में टिकट लिए खड़ा था, लेकिन उस की उंगलियां हलकेहलके कांप रही थीं.

वह बारबार भीड़ में झांकता, जैसे किसी खोई हुई चीज को ढूंढ़ रहा हो. उस की आंखों में एक बेचैनी थी… वह बेचैनी जो केवल उस इनसान के आने से खत्म हो सकती थी, जिस के बिना उस की दुनिया अधूरी थी. और फिर वह दिखी. नैना.

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हलके गुलाबी सूट में, खुले बालों के बीच उस का चेहरा वैसा ही था… मासूम, शांत, लेकिन आज उस में एक गहरा दर्द भी छिपा हुआ था. वह धीरेधीरे उस की ओर बढ़ रही थी, जैसे हर कदम उसे अर्जुन से नहीं, बल्कि खुद से दूर कर रहा हो.

दोनों आमनेसामने थे, लेकिन शब्द कहीं खो गए थे. उन के बीच केवल खामोशी थी और वह खामोशी ही सब से ज्यादा बोल रही थी.

‘‘तुम आ गई…’’ अर्जुन ने जैसे अपने ही भीतर से आवाज निकालते हुए कहा.

नैना ने हलका सा सिर हिलाया, ‘‘नहीं आती तो शायद जिंदगीभर खुद को माफ नहीं कर पाती,’’ उस की आवाज में एक कंपन था, जो सीधे अर्जुन के दिल तक उतर गया.

कुछ पल दोनों चुप रहे, फिर नैना ने धीरे से पूछा, ‘‘सच में जा रहे हो?’’  यह सवाल नहीं था, एक शिकायत थी. एक उम्मीद थी कि शायद वह कह दे, ‘‘नहीं.’’

अर्जुन ने उस की आंखों में देखा. वह जानता था कि यह जवाब उस के अपने दिल को भी तोड़ देगा, लेकिन सच से भागना अब मुमकिन नहीं था.

‘‘हां, जाना पड़ेगा.’’ नैना की आंखों में आंसू भर आए, ‘‘इतनी आसानी से?’’ ‘‘आसानी से?’’ अर्जुन की आवाज अचानक भारी हो गई, ‘‘अगर यह आसान होता, तो मैं यहां खड़ा नहीं होता नैना. मैं तो कब का चला गया होता.’’

नैना ने नजरें झुका लीं, ‘‘तो फिर क्यों जा रहे हो? क्यों नहीं रुक जाते?’’

यह सवाल सीधा था, लेकिन उस का जवाब बहुत पेचीदा. अर्जुन ने गहरी सांस ली, ‘‘क्योंकि कभीकभी जिंदगी में हम जो चाहते हैं, वह नहीं कर पाते. हमें वह करना पड़ता है, जो जरूरी होता है.’’

‘‘और हमारा प्यार?’’ नैना ने तुरंत पूछा. अर्जुन कुछ पल चुप रहा, फिर उस ने धीमे से कहा, ‘‘प्यार कभी जरूरी नहीं होता नैना, प्यार बस होता है.’’

यह सुन कर नैना की आंखों से आंसू बह निकले, ‘‘अगर प्यार बस होता है तो फिर उसे छोड़ कर कैसे जा सकते हो?’’ अर्जुन ने उस की ओर देखा. उस की आंखों में दर्द था, लेकिन साथ ही एक मजबूरी भी.

‘‘मैं तुम्हें छोड़ कर नहीं जा रहा, मैं बस इस शहर को छोड़ कर जा रहा हूं.’’ ‘‘और मैं?’’ नैना की आवाज टूट गई, ‘‘मैं भी तो इसी शहर में हूं.’’

अर्जुन के पास कोई जवाब नहीं था. उस ने बस इतना कहा, ‘‘तुम हमेशा मेरे साथ रहोगी यहां,’’ उस ने अपने दिल पर हाथ रखा. नैना हलकी सी मुसकराई… एक दर्दभरी मुसकान. ‘‘दिल में रह कर क्या होगा अर्जुन? जिंदगी को तो साथ जिया जाता है.’’

यह बात अर्जुन के दिल में तीर की तरह चुभ गई. उसे याद आया… वह पहली मुलाकात. कालेज का वह पहला दिन जब नैना लाइब्रेरी के कोने में बैठी थी और वह अनजाने में उसी टेबल पर जा कर बैठ गया था.

‘‘यह सीट खाली है?’’ अर्जुन ने पूछा था. नैना ने बिना ऊपर देखे कहा था, ‘‘अब नहीं है.’’

और उस एक जवाब ने उस की जिंदगी बदल दी थी. धीरेधीरे बातें शुरू हुईं, दोस्ती हुई और फिर वही दोस्ती कब प्यार में बदल गई, यह दोनों को पता ही नहीं चला. वे साथ चलते थे, साथ हंसते थे, छोटीछोटी बातों पर झगड़ते थे और फिर एकदूसरे को मनाते भी थे.

नैना अकसर कहती, ‘‘अगर कभी तुम मुझ से दूर गए न, तो मैं एक पल भी जी नहीं पाऊंगी.’’ और अर्जुन हंस कर कहता, ‘‘मैं कहीं नहीं जाऊंगा. मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगा.’’

लेकिन आज वही अर्जुन जा रहा था. वादा टूट रहा था और उस के साथ एक सपना भी. ट्रेन की सीटी ने उन्हें वर्तमान में लौटा दिया. समय जैसे हाथ से फिसल रहा था.

अर्जुन ने बैग उठाया. उस के कदम भारी हो गए थे पर जाना जरूरी था. वह एक अति पिछड़े घर का गरीब लड़का और नैना साधारण आमदनी वाले ब्राह्मण परिवार की लड़की. दोनों को जल्दी एहसास हो गया था कि यह मिलन न जाने कितने दिन का है.

अर्जुन ने हाथपैर मारे तो कई हजार किलोमीटर दूर एक जगह नौकरी किसी ने दिलाई. शहर में तो उसे सही नजर से भी कम ही लोग देखते थे.

नैना ने अचानक उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘मत जाओ.’’

उस एक वाक्य में इतनी ताकत थी कि अर्जुन का दिल एक पल के लिए सच में रुक गया. उस ने नैना की ओर देखा. उस की आंखों में विनती थी, डर था और सब से ज्यादा… प्यार था.

‘‘अगर तुम कहो तो मैं नहीं जाऊंगा,’’ अर्जुन ने लगभग फुसफुसाते हुए कहा.

नैना चौंक गई. यह वही पल था जब वह चाहती थी कि वह रुक जाए, लेकिन वह यह भी जानती थी कि उस के रुकने की कीमत बहुत बड़ी होगी.

नैना ने धीरेधीरे अपना हाथ छोड़ दिया, ‘‘नहीं जाओ,’’ उस की आवाज कांप रही थी, ‘‘मैं तुम्हें रोक कर तुम्हारे सपनों को नहीं तोड़ सकती.’’

अर्जुन की आंखों में आंसू आ गए, ‘‘और हमारे सपने?’’ उस ने पूछा. नैना ने मुसकराने की कोशिश की, ‘‘कुछ सपने पूरे होने के लिए नहीं होते. कुछ सपने बस महसूस करने के लिए होते हैं.’’

अर्जुन अब और कुछ नहीं कह पाया. वह ट्रेन में चढ़ गया. खिड़की के पास खड़ा हो कर वह नैना को देख रहा था. नैना वहीं खड़ी थी, जैसे समय ने उसे जकड़ लिया हो.

ट्रेन धीरेधीरे चलने लगी. नैना दौड़ी. उस ने हाथ बढ़ाया, ‘‘अर्जुन…’’ उस की आवाज इस बार बाहर आ गई.

अर्जुन ने भी हाथ बढ़ाया, लेकिन उन के बीच की दूरी हर पल बढ़ती जा रही थी. कुछ ही क्षणों में हाथ हवा में रह गए.

और फिर ट्रेन प्लेटफार्म छोड़ गई. नैना वहीं रुक गई. उस की सांसें तेज थीं, आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे. वह धीरेधीरे उसी बैंच पर बैठ गई, जहां वे कभी साथ बैठा करते थे. उस ने अपनी आंखें बंद कीं और अर्जुन की आवाज उस के कानों में गूंजने लगी, ‘‘मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगा.’’

उस ने धीमे से खुद से कहा, ‘‘झूठ,’’ लेकिन उसी पल उस के होंठों पर एक हलकी मुसकान भी आ गई, क्योंकि वह जानती थी, वह झूठ नहीं था. बस अधूरा सच था.

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Sarita

उस रात स्टेशन की भीड़ खत्म हो गई. रोशनी धीमी पड़ गई, लेकिन नैना वहीं बैठी रही. उस के भीतर एक सफर शुरू हो चुका था. एक ऐसा सफर जिस में कोई मंजिल नहीं थी, सिर्फ यादें थीं.

और उन यादों में एक प्यार था, जो सफर में छूट गया था, लेकिन दिल से कभी नहीं उतरा.

कहते हैं, समय हर घाव भर देता है, लेकिन कुछ घाव ऐसे होते हैं, जिन्हें समय केवल ढकता है, मिटाता नहीं.

अर्जुन और नैना की जिंदगी में भी समय बीतता रहा… दिन महीनों में, महीने सालों में बदलते गए, लेकिन जो उस एक शाम प्लेटफार्म नंबर 3 पर छूट गया था, वह वहीं का वहीं ठहरा रहा.

नैना अब शहर के एक छोटे से स्कूल में बच्चों को पढ़ाती थी. उस के चेहरे पर एक शांत मुसकान रहती थी, लेकिन उस की आंखों में एक गहराई थी… एक ऐसा खालीपन, जिसे कोई बच्चा, कोई साथी, कोई रिश्तेदार भर नहीं पाता था.

वह बच्चों को कहानियां सुनाती थी… राजकुमार और राजकुमारी की, अधूरी प्रेम कहानियों की, बिछड़ते लोगों की. और हर कहानी के आखिर में उस की आवाज थोड़ी धीमी हो जाती.

एक दिन एक बच्चे ने पूछ लिया, ‘‘मैम, क्या सच में प्यार कभी अधूरा रह जाता है?’’

नैना कुछ पल के लिए चुप रह गई, फिर उस ने मुसकरा कर कहा, ‘‘हां, कभीकभी प्यार पूरा हो कर भी अधूरा रह जाता है.’’

बच्चे समझ नहीं पाए, लेकिन उस की आंखों की नमी ने उस जवाब को और गहरा बना दिया. स्कूल से लौटते समय वह अकसर उसी रास्ते से गुजरती, जहां कभी वह और अर्जुन साथ चला करते थे. हर मोड़, हर पेड़, हर चाय की दुकान… सब उसे उस की याद दिलाते.

वह चाहती तो उन रास्तों को बदल सकती थी, लेकिन उस ने नहीं बदला, क्योंकि वह जानती थी, यादों से भागने से वे खत्म नहीं होतीं, वे और गहरी हो जाती हैं.

उधर अर्जुन, वह अब एक बड़े शहर में एक बड़ी कंपनी में काम कर रहा था. उस के पास सबकुछ था… अच्छी नौकरी, एक घर, नाम, पहचान लेकिन रात को जब वह अपने कमरे में अकेला होता, तो उस की सारी उपलब्धियां उस के सामने छोटी पड़ जातीं.

उस के कमरे की एक दीवार पर एक छोटी सी तसवीर लगी थी, नैना की. वह फोटो कालेज के दिनों की थी… जब नैना हंस रही थी, बेफिक्र, खुश और अर्जुन उस तसवीर को घंटों देखता रहता.

‘‘तुम अभी भी वैसे ही हंसती हो क्या?’’ वह अकसर खुद से पूछता.

लेकिन जवाब में केवल खामोशी मिलती. कई बार उस ने कोशिश की आगे बढ़ने की, किसी और को अपनी जिंदगी में लाने की, लेकिन हर बार उसे लगता, जैसे वह किसी और के साथ नहीं, बल्कि अपने ही दिल के साथ धोखा कर रहा हो.

उस ने खुद को काम में डुबो दिया. दिनरात, बस काम, लेकिन जब भी वह थक कर रुकता, तो उस की यादें फिर उसे उसी प्लेटफार्म पर ले जातीं, जहां उस ने अपना सबकुछ छोड़ दिया था. उस ने नैना के पास लौटने का सपना देखना छोड़ दिया था, क्योंकि कई साल बीत गए थे उसे अपने पैरों पर खड़ा होने में.

एक दिन, अचानक उसे उसी शहर में एक प्रोजैक्ट के सिलसिले में जाना पड़ा. वही शहर जहां उस की मुहब्बत अब भी सांस ले रही थी.

ट्रेन से उतरते ही उस का दिल तेजी से धड़कने लगा. हर चीज जानीपहचानी थी, लेकिन अब उस में एक अजनबीपन भी था. उस ने खुद को रोकने की कोशिश की, ‘‘नहीं, वहां नहीं जाना चाहिए.’’

लेकिन दिल दिल कहां मानता है? उस के कदम खुद ब खुद उसी दिशा में बढ़ने लगे. प्लेटफार्म नंबर 3. वह जगह, जहां से उस की जिंदगी 2 हिस्सों में बंट गई थी, पहले और बाद में.

वह धीरेधीरे उस बैंच की ओर बढ़ा, वही बैंच जहां नैना आखिरी बार बैठी थी. उस ने हाथ बढ़ा कर उस बैंच को छुआ, जैसे वह उस पल को फिर से महसूस करना चाहता हो.

‘‘तुम अभी भी यहां आते हो?’’ अचानक पीछे से आई आवाज ने जैसे उस की धड़कनें रोक दीं.

वह आवाज, जिसे वह हजारों आवाजों में भी पहचान सकता था. अर्जुन ने धीरेधीरे पीछे मुड़ कर देखा… नैना. समय जैसे थम गया. वह वहीं खड़ी थी, सालों बाद भी वैसी ही. बस, उस की आंखों में अब और गहराई थी और शायद थोड़ा और दर्द भी.

‘‘नैना,’’ अर्जुन के होंठों से बस इतना ही निकल पाया. दोनों कुछ पल तक बस एकदूसरे को देखते रहे, जैसे सालों की दूरी उन की आंखों के रास्ते पिघल रही हो.

‘‘तुम बदल गए हो,’’ नैना ने धीमे से कहा. अर्जुन हलका सा मुसकराया, ‘‘तुम नहीं बदली.’’

‘‘बदली हूं,’’ नैना ने धीरे से कहा, ‘‘पहले थोड़ा कम रोती थी.’’ दोनों हलका सा हंसे, लेकिन उस हंसी में भी दर्द था. कुछ देर दोनों चुप रहे. फिर अर्जुन ने हिम्मत जुटाई, ‘‘कैसी हो?’’

‘‘ठीक हूं.’’ नैना ने वही पुराना जवाब दिया. अर्जुन ने सिर हिलाया, ‘‘झूठ बोल रही हो.’’

नैना ने उस की आंखों में देखा, ‘‘तुम भी.’’ दोनों फिर मुसकरा दिए. एक ऐसी मुसकान, जो केवल वही समझ  सकते थे.

अर्जुन ने धीरे से पूछा, ‘‘शादी?’’ नैना ने उस की बात पूरी होने से पहले ही सिर हिला दिया, ‘‘नहीं.’’

‘‘क्यों?’’ अर्जुन की आवाज में हलकी सी उम्मीद थी.

नैना ने गहरी सांस ली, ‘‘क्योंकि मैं ने किसी और को उस जगह बैठाने की कोशिश ही नहीं की, वह जगह अब भी तुम्हारी है.’’

अर्जुन की आंखें भर आईं, ‘‘मैं ने भी नहीं,’’ उस ने धीरे से कहा. नैना ने उस की ओर देखा, ‘‘क्यों?’’

अर्जुन ने हलकी सी मुसकान दी, ‘‘क्योंकि मुझे  कभी लगा ही नहीं कि तुम गई हो.’’

यह सुन कर नैना की आंखों से आंसू बह निकले. वह कुछ पल तक कुछ नहीं बोल पाई, फिर उस ने धीमे से कहा, ‘‘तो फिर हम इतने साल अलग क्यों रहे?’’

यह सवाल बहुत गहरा था. अर्जुन ने आसमान की ओर देखा, ‘‘शायद क्योंकि हमें समझना था कि प्यार केवल साथ रहने का नाम नहीं है. प्यार किसी के बिना भी उसे महसूस करने का नाम है.’’

नैना ने सिर झुका लिया. ‘‘मैं ने हर दिन तुम्हें महसूस किया है. अब मेरे मांबाप नहीं रहे. मैं हूं और तुम्हारे बोल.’’

उस ने धीमे से कहा, ‘‘हर सुबह, हर शाम, हर रात.’’ अर्जुन ने एक कदम आगे बढ़ाया, ‘‘मैं ने भी.’’

दोनों के बीच की दूरी अब बहुत कम रह गई थी, लेकिन उन के दिलों की दूरी तो कभी थी ही नहीं. ट्रेन की सीटी फिर गूंजी. दोनों ने एकसाथ उस ओर देखा.

नैना ने हलकी मुसकान के साथ कहा, ‘‘फिर से सफर?’’ अर्जुन ने उस की ओर देखा और कहा, ‘‘हां, लेकिन इस बार मैं अकेला नहीं जाऊंगा.’’

नैना चौंकी, ‘‘मतलब?’’ अर्जुन ने धीरे से उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘इस बार मैं तुम्हें अपने साथ ले जाऊंगा, अगर तुम चलो तो.’’

नैना की सांसें तेज हो गईं, ‘‘इतने साल, इतने फासले, क्या सबकुछ फिर से शुरू हो सकता है?’’

अर्जुन ने उस की आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘प्यार कभी खत्म नहीं हुआ.’’

‘‘तो फिर उसे फिर से शुरू करने की जरूरत ही क्या है?’’ नैना रो पड़ी. उस ने अर्जुन को कस कर पकड़ लिया, जैसे वह उसे फिर कभी खोना नहीं चाहती.

‘‘मैं थक गई हूं,’’ उस ने सिसकते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे बिना जीतेजीते.’’ अर्जुन ने उस के सिर पर हाथ रखा, ‘‘अब और नहीं. अब हम साथ चलेंगे.’’

ट्रेन खड़ी थी, लेकिन इस बार कोई जल्दी नहीं थी. इस बार कोई छूट नहीं रहा था.

नैना ने धीरे से कहा, ‘‘शायद कुछ सफर ऐसे होते हैं, जो अधूरे रह कर ही पूरे हो जाते हैं.’’

अर्जुन ने मुसकरा कर कहा, ‘‘और कुछ प्यार जो छूट कर भी कभी छूटते नहीं.’’

दोनों साथ खड़े थे, हाथों में हाथ लिए. इस बार, सफर शुरू हुआ था, लेकिन कोई पीछे नहीं छूटा था. छूटा था तो वह लिजलिजा सामाजिक ढांचा जिस ने 2 धड़कते दिलों को मिलने नहीं दिया था.

-डा. गोपालदास नायक

Love Story : रंग इश्क का

Love Story. होली के दिन ज्यादातर स्टाफ छुट्टी पर था, जिस कारण सुहाना को ओवरटाइम ड्यूटी करनी पड़ रही थी. स्टेशन से गुजरती ट्रेन की बाहरी दीवारों पर रंग और कीचड़ के छींटे देख कर वह अनायास ही 3 साल पहले की होली में लौट गई, अपनी शादीशुदा जिंदगी की पहली होली में.

सुबह उठते ही जब सुहाना ने आईने में चेहरा देखा था, तो वह डर गई थी. चेहरा काले रंग से पूरी तरह पुता हुआ था. आईने के कोने में लिपस्टिक से लिखा था, ‘हैप्पी होली डियर.’ सुहाना समझ गई थी कि यह उस के पति प्रतीक की शरारत है, जो उस पर होली की रंग चढ़ा कर मौर्निंग शिफ्ट की ड्यूटी के लिए सैक्शन निकल चुका था.

बाथरूम में नहाने के लिए जैसे ही सुहाना ने शौवर खोला, लाल रंग की बौछार ने पूरे बदन को रंगीन कर  दिया. सुहाना को गुस्सा भी आया और प्यार भी.

शाम को प्रतीक बाजार से गुझिया ले कर लौटा था. अपने हाथों से ‘हैप्पी होली’ कहते हुए जब उस ने गुझिया  खिलाई, तो गुझिया के भीतर पीली गुलाल भरी थी. प्रतीक के इस प्रैंक में छिपे प्यार और शरारत भरे मजाक पर सुहाना ने उस की छाती पर हलके से हाथ मारते हुए नाराजगी जताई और फिर हंस पड़ी.

‘‘मैम, बेगूसराय की एक टिकट’’ एक मुसाफिर की आवाज ने सुहाना को वर्तमान में लौटा दिया. वह कुरसी पर बैठ कर यूटीएस से टिकट काटने लगी. वैसे भी होली के चलते मुसाफिरों की तादाद नाममात्र की थी. समस्तीपुर की रहने वाली सुहाना के मातापिता ने 3 साल पहले भारतीय रेलवे के दानापुर डिवीजन में इंजीनियरिंग सैक्शन के सुपरवाइजर पद पर नौकरी कर रहे प्रतीक से उस की शादी तय कर दी थी.

दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के बाद मुखर्जी नगर में रह कर सिविल सेवा की तैयारी कर रही सुहाना की शादी में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी. वह यूपीएससी क्रैक कर आईएएस बनना चाहती थी. उस ने विरोध भी किया, पर घर वालों के भावनात्मक दबाव में झुक गई.

शुरुआत में मन में खटास रही, पर शादी के बाद सुहाना की शादीशुदा जिंदगी धीरेधीरे आसान होती चली गई. उस का जीवन रंगोली सा सज गया था. चांदी सी सफेद सुहाना की सिंदूरी मांग, हरी चूडि़यों की खनक, आंखों में काजल, होंठों पर लाली, गुलाबी गालों पर पीली हया… कुलमिला कर कुदरत के सारे रंग उस की जिंदगी में उतर आए थे.

प्रतीक की माता बचपन में ही गुजर चुकी थीं और 2 साल पहले पिता की मौत के बाद प्रतीक का सुहाना के अलावा कोई अपना नहीं था. वह जितना अपनी विभागीय जिम्मेदारियों के प्रति सजग था, उतनी ही निष्ठा से शादीशुदा जिंदगी भी निभाता था. हर 6 महीने में रेलवे पास पर वह सुहाना के साथ पर्यटक स्थलों पर घूमने निकल जाता.

त्योहारों पर उस का प्यार खुल कर सामने आता, दीवाली में अनार जलाना, करवाचौथ पर लोटे से जल पिलाना, दशहरे में कन्या भोज… सबकुछ साथसाथ. सभी मौकों पर प्रतीक का सुहाना के प्रति प्यार रेलवे कालोनी वालों को भी दिख जाता था.

धीरेधीरे सुहाना भी गृहस्थी में रम गई. 2 साल बाद बेटी सुप्रिया ने उस की जिंदगी को जैसे पूरा कर दिया. सबकुछ ठीक चल रहा था कि पिछले साल दिसंबर महीने की दूसरी तारीख को घटित एक घटना ने सुहाना की जिंदगी में उथलपुथल मचा दी.

2 दिसंबर की घने कोहरे वाली सुबह सुहाना की जिंदगी में धुंध बन कर छा गई. रेलवे ट्रैक के रखरखाव के दौरान प्रतीक की ट्रौली सामने से आ रही ट्रेन से टकरा गई. ट्रौली पर सवार ट्रैकमैन को तो मामूली चोटें आईं, लेकिन रेलवे ट्रैक के पास रखी कंक्रीट स्लीपर से सिर टकराने के चलते प्रतीक की मौके पर ही मौत हो गई.

यह खबर सुनते ही सुहाना टूट गई. एक पल में उस की दुनिया उजड़ गई. कुछ समय बाद अनुकंपा के आधार पर उस की नियुक्ति दानापुर स्टेशन पर टिकट बुकिंग क्लर्क के रूप में हो गई. वह बिजी रहना चाहती थी, पर प्रतीक की कमी हर पल सालती रहती थी. ड्यूटी के दौरान सुप्रिया और रेलवे कर्मियों के साथ किसी तरह समय गुजर जाता, किंतु रात का अकेलापन और प्रतीक की यादें उसे काटने को दौड़तीं. उस की जिंदगी की रंगोली पर विधवा होने की सफेदी पूरी तरह जम गई थी.

टिकट देने के बाद सुहाना अपनी बेटी सुप्रिया के साथ प्लेटफार्म के शैड के नीचे बैठ कर फर्श को निहारती हुई यादों में खो गई. थोड़ी देर में प्लेटफार्म नंबर 2 पर इंटरसिटी एक्सप्रैस ट्रेन आ कर रुकी. कुछ मुसाफिर उतरे और कुछ चढ़े. ‘‘मैम, बिहटा वाली ट्रेन कितने बजे आएगी?’’ सैनिक की वरदी में ट्रेन से उतरे एक जवान की आवाज ने सुहाना का ध्यान भंग किया.

‘‘तकरीबन 2 बजे, एक घंटा देर से चल रही है,’’ अनमना सा जवाब देते हुए जैसे ही सुहाना ने नजर उठाई, वह चौंक गई, ‘‘अरे, वैभव… तुम?’’  ‘‘सु… सुहाना…’’ दिल्ली कालेज के दिन जैसे दानापुर स्टेशन पर लौट आए. वैभव सुहाना का पुराना दोस्त था.

वाराणसी के वैभव और समस्तीपुर की सुहाना की पहचान दिल्ली कालेज में हुई थी. दोनों बैचमेट थे और समय के साथ अच्छे दोस्त बन गए थे. दोनों एकदूसरे को पसंद भी करते थे, पर कभी किसी ने इजहार नहीं किया.

ग्रेजुएशन के बाद वैभव का चयन इंडियन एयरफोर्स में हो गया और वह ट्रेनिंग में चला गया, जबकि सुहाना यूपीएससी की तैयारी में लग गई. इसी बीच संपर्क टूट गया और उस की शादी भी हो गई. ‘‘अरे यार, तुम दानापुर में कैसे?’’ सुहाना ने वैभव के कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा. ‘‘दरअसल, मेरी पोस्टिंग अगले 3 साल के लिए बिहटा एयरफोर्स स्टेशन पर हो गई है. वहीं योगदान देने जा रहा हूं. सहयात्री ने बताया कि दानापुर से बिहटा के लिए पैसेंजर ट्रेन मिल जाती है, इसलिए यहां उतर गया. और बताओ… यूपीएससी छोड़ कर यह रेलवे की नौकरी कब कर ली?’’ वैभव ने हैरानी से भरी खुशी से पूछा.

सुहाना ने मुखर्जी नगर से दानापुर तक की पूरी दास्तान वैभव को सुनाई. उस की कहानी सुन कर वैभव की आंखें नम हो गईं. वैभव ने सुहाना के पास बैठी सुप्रिया के सिर पर हाथ फेर कर हिचकिचाते हुए कहा, ‘‘सुहाना, अगर बुरा न मानो, तो कुछ कहना चाहता हूं… मैं 5 साल से एक बात दिल में दबाए बैठा हूं. कालेज के दिनों में कई बार कहने की कोशिश की, लेकिन कह नहीं पाया आई लव यू.’’

वैभव की बात सुन कर सुहाना खामोश रह गई. कालेज के दिनों में वह भी वैभव को पसंद करती थी, लेकिन प्रतीक से जुड़ने के बाद उन भावनाओं को उस ने कभी याद नहीं किया. ‘‘सुहाना, मेरा यकीन करो. मैं तुम्हें और सुप्रिया को हमेशा खुश रखूंगा. सच कहूं तो तुम्हारे लिए ही मैं ने अब तक शादी नहीं की. सोचा था ट्रेनिंग से लौट कर तुम्हें प्रपोज करूंगा, लेकिन लौटने पर तुम से संपर्क नहीं हो पाया. बहुत ढूंढ़ा, सोशल मीडिया पर भी सर्च किया, लेकिन कोई जानकारी नहीं मिली. बस इतना पता था कि तुम समस्तीपुर से हो.

‘‘बिहार में रह कर तुम्हें तलाश सकूं, इसलिए बिहटा पोस्टिंग की रिक्वैस्ट डाली. और देखो, तुम मिल भी गईं मुझ से शादी करोगी? ‘‘बोलतेबोलते वैभव का गला रुंध गया. ‘‘सुहाना, इस की बात मान लो,’’ यह आवाज स्टेशन मास्टर की थी, जो अनजाने में उन की बातें सुन चुके थे. उन की आवाज सुन कर सुहाना और वैभव दोनों चौंक गए.

‘‘सुहाना, प्रतीक मुझे सर या बड़ा बाबू के बजाय हमेशा ‘अंकल’ पुकारता था. वह हमेशा तुम्हें हंसते हुए देखना चाहता था. लेकिन उस के जाने के बाद तुम मुसकराना ही भूल गई. महीनों बाद आज तुम फिर मुसकरा रही हो. ‘‘इस लड़के में मुझे प्रतीक सा अपनापन और सच्चाई दिखती है. एक अभिभावक के रूप में मेरी यही सलाह है कि इसे स्वीकार कर लो और अपनी बदरंग जिंदगी में फिर से रंग भर लो.’’

स्टेशन मास्टर इस बात से सुहाना की आंखों में आंसू थे और होंठों पर मुसकान. उस ने आंसू पोंछते हुए वैभव को गले लगा लिया.  Love Story

लेखक : विनोद कुमार विक्की

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