Editorial: गहरी पैठ – जनता को उलझाने के लिए धर्म है न

Editorial: पैट्रोल की बचत के नारे पर जनता ने मंत्रियों के लंबे काफिलों पर हल्ला मचाया तो 2-4 दिन मंत्रियों ने काफिला छोटा कर लिया और गरीब मूर्ख जनता समझा कि वह जीत गई. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने युवाओं को कौकरोच कह दिया तो किसी ने कौकरोच जनता पार्टी सोशल मीडिया पर बना डाली और लाखों फौओलर्स हो गए तो जनता ने सोचा कि वह जीत गई.

नरेंद्र मोदी ने अपील की कि लोग सोना न खरीदें तो लोगों ने बीसियों सुनारों की दुकानों पर चाय बेचते हुए ज्वैलर्स की रील्स बना दीं और उन के लाखों व्यूज हो गए तो जनता ने सोचा कि वह जीत गई. नरेंद्र मोदी ने अमीरों को विदेश न जाने की सलाह दी और अमीरों के अखबारों में देशी टूर्स के इश्तिहार छपने लगे पर जब नरेंद्र मोदी ने खुद विदेश जा कर पैसा बरबाद किया तो सोशल मीडिया पर खूब खिल्ली उड़ी. जनता ने मजाक बनाकर समझा कि वह जीत गई.

यह सब बहकावा है. जनता कहीं नहीं जीती है. जनता से जो वसूलना है वह वसूला जा रहा है, जाएगा, जाता रहेगा. जनता तो सरकार और सरकार के पिट्ठुओं के लिए काम हमेशा करती रही है और करती रहेगी. जनता को उलझाए रखने के लिए सरकार और ऊंचे लोगों के पास आखिर धर्म है न, मंदिर हैं न, पूजापाठ है न, हिंदूमुसलमान हैं न. इन का सहारा ले कर जो भी मजाक उड़ाया जा रहा है वह 4 दिन में गंदी नाली में बहा दिया जाएगा और फिर इसी पानी में जनता को नंगे पांव चलने पर मजबूर होना होगा.

आज देश के सामने खाड़ी में लड़ाई की वजह से तेल का जो संकट आया है यह तो कोढ़ में खाज की तरह है. यह तो 2-4 सप्ताह में खत्म हो जाएगा क्योंकि अमेरिका ईरान से ज्यादा दिन लड़ नहीं सकता. सुलह तो करनी ही होगी. उस के बाद तेलगैस मिलेगी, सस्ती मिलेगी पर तब तक सरकार बाजार में महंगा बेच चुकी होगी और दाम घटेंगे नहीं.

आज जनता की आवाज को घंटोंघडि़यालों ने इसी तरह से दबा दिया है जैसे पहले हिंदू राजाओं ने पुरोहितों के कहने पर दबाया था, फिर खैबर दर्रे से आने वाले घुड़सवारों ने तलवारों से दबाया था और उस के बाद गोरों ने नावों में आ कर दबाया था. आज जनता की आवाज ही नहीं, उस के हाथपैर भी बांध दिए गए हैं.

सोशल मीडिया पर जो दिख या सुन पड़ रहा है यह परेशान जनता की चीख है, सिसकियां हैं, इन रील्स में मजाक चाहे जितना हो, यह बूढ़ी विधवा के बेटों को कोसने से ज्यादा नहीं है क्योंकि इन रील्स और कौकरोच पार्टियों में सत्ता नहीं बदलने वाली. सत्ता बदल भी गई तो नए लोग वैसे ही होंगे, क्योंकि जनता अपनी आजादी मांग ही नहीं रही.

जनता की मांग रिश्वत उगलने वाली नौकरियां हैं, जनता की मांग 200 यूनिट सस्ती बिजली है, जनता की मांग तो मसजिद तोड़ना है, जनता की मांग तो सिर्फ खाते में मुफ्त के एकदम 2,000 रुपए आ जाने चाहिए की है. ऐसी जनता के सोशल मीडिया पर हल्ले से कोई नहीं डरने वाला. सरकारी चाबुक से अकाउंट ही बंद हो जाएंगे और जनता के रोने की आवाज भी मोबाइल से नहीं निकलेगी.Editorial

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