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Entertainment : मेहुल कुमार की गोल्डन जुबली

Entertainment. भारतीय सिनेमा के इतिहास में 90 के दशक में डायरैक्टर और फिल्मकार मेहुल कुमार ने बड़ी ईमानदारी व निडरता के साथ अपनी फिल्मों के जरीए लोगों को संदेश दिया था कि देश को असली खतरा बाहरी दुश्मनों से बाद में है, पहले देश के भीतर बैठे उन गद्दारों, भ्रष्ट नेताओं, जमाखोरों और बिके हुए प्रशासनिक तंत्र से है जो लोकतंत्र की जड़ों को दीमक की तरह चाट रहे हैं.

मेहुल कुमार की फिल्मों को देखते समय सिंगल स्क्रीन थिएटरों में बैठा आम आदमी सिर्फ मनोरंजन नहीं कर रहा होता था, बल्कि उसे लगता था कि परदे पर चल रहा नायक उसी के हक की लड़ाई लड़ रहा है. यही वजह है कि आज 30 साल बाद भी मेहुल कुमार की सिस्टम से तीखे सवाल पूछने वाली ‘क्रांतिवीर’ और ‘तिरंगा’ जैसी फिल्में हर 15 अगस्त के मौके हर टीवी चैनल पर दिखाई जाती हैं.

गुजरात के जामनगर से ताल्लुक रखने वाले मेहुल कुमार का असली नाम मोहम्मद बलोच है. उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत पत्रकारिता और गुजराती नाटकों के लेखन से की थी. पत्रकारिता व नाटक के लेखन ने उन के अंदर समाज की नब्ज पकड़ने की गहरी सम झ पैदा की. उन्होंने 1970 के दशक में गुजराती सिनेमा में कदम रखा. 1977 में पहली गुजराती फिल्म ‘जनमजनम ना साथी’ बनाई, उस के बाद ‘मां विना सूनो संसार’ सहित 18 ब्लौकबस्टर गुजराती फिल्मों के जरीए उन्होंने साबित कर दिया कि वे दर्शकों की भावनाओं को परदे पर उतारने की कला में माहिर हैं.

गुजराती सिनेमा में तहलका मचा कर मेहुल कुमार ने हिंदी फिल्मों के निर्माण में कदम रखा. उन्होंने ‘अनोखा बंधन’, ‘मरते दम तक’ और ‘आसमान से ऊंचा’ जैसी फिल्मों के जरीए अपनी पहचान बनाई, लेकिन नब्बे के दशक में सिस्टम की चूलें हिला देने वाली ‘पौलिटिकल, एक्शन और सोशल ड्रामा’ के कौकटेल से फिल्में गढ़ कर उन्होंने खुद को अमर बना लिया.

साल 1993 में मेहुल कुमार ने  राजकुमार और नाना पाटेकर की ऐतिहासिक जुगलबंदी के साथ फिल्म ‘तिरंगा’ बनाई थी. यह फिल्म उस दौर में बनी थी जब मुंबई सांप्रदायिक दंगों और बम धमाकों की आग में  झुलस रहा था. ऐसे माहौल में देश को एकजुट करने और सिस्टम में दोबारा विश्वास जगाने के लिए मेहुल कुमार ने एक ऐसी कहानी चुनी जो आज भी देशभक्ति का कल्ट क्लासिक मानी जाती है.

फिल्म ‘तिंरगा में राजकुमार एक संवाद, ‘‘जानी… हम तुम्हें मारेंगे और जरूर मारेंगे, लेकिन वह बंदूक भी हमारी होगी, गोली भी हमारी होगी और वक्त भी हमारा होगा…’’ बहुत ज्यादा हिट हुआ था.

एक जगह नाना पाटेकर कहते हैं, ‘‘इस देश को किसी दुश्मन की जरूरत नहीं है… इस देश को खोखला करने के लिए यहां के भ्रष्ट नेता, काले धंधेबाज और तुम जैसे गद्दार ही काफी हैं. लेकिन जब तक इस वरदी में जान है, कानून का डंडा तुम जैसे कीड़ों के सिर पर पड़ता रहेगा.’’

एक साल बाद ही 1994 में मेहुल कुमार सिस्टम से तीखे सवाल करने वाली फिल्म  ‘क्रांतिवीर’ ले कर आ गए, जो सिस्टम के चेहरे पर करारा तमाचा रही. यह फिल्म आज के ‘नीट पेपर लीक’ या ‘छात्र आंदोलनों’ की भी बात करती है. इस फिल्म ने नाना पाटेकर को उन का पहला नैशनल अवार्ड दिलाया था.

फिल्म ‘क्रांतिवीर’ के क्लाइमैक्स को  भारतीय सिनेमा के इतिहास का सब से बेहतरीन और असरदार माना जाता है. प्रताप नाम का किरदार निभाने वाले नाना पाटेकर को अदालत द्वारा फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है. वह फांसी के फंदे के सामने खड़ा है और उस के सामने हजारों आम नागरिकों की भीड़ मूकदर्शक बनी खड़ी है. वहां खड़े हो कर नाना पाटेकर जो मोनोलौग (भाषण) देते हैं, वह आज भी जंतरमंतर पर बैठे आंदोलनकारी छात्रों या सड़कों पर इंसाफ मांगते आम आदमी के गुस्से को बयां करता है.

प्रताप भीड़ को देख कर कहता है, ‘‘आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने… मर्द बनने का इतना ही शौक है न, तो नपुंसकों की तरह तमाशा देखना बंद करो. आज मैं मर रहा हूं, कल तुम मरोगे, परसों तुम्हारी औलादें मरेंगी… और तुम लोग क्या करोगे? मोमबत्तियां जलाओगे? तालियां बजाओगे? सरकार को कोसोगे? कानून के रखवाले बिक चुके हैं, नेता देश को बेच रहे हैं और तुम लोग भेड़ों की तरह कतार में खड़े हो कर अपनी बारी का इंतजार कर रहे हो.’’

इस के 5 साल बाद साल 1999 में मेहुल कुमार ने सेना के भीतर के भ्रष्टाचार और आतंकवाद पर फिल्म ‘कोहराम’ बनाई, जिस में अमिताभ बच्चन और नाना पाटेकर पहली बार एकसाथ नजर आए. इस फिल्म में मेहुल कुमार ने दिखाया कि कैसे सेना के भीतर भी कुछ बड़े अफसर (कबीर बेदी का किरदार) चंद रुपयों और सत्ता के लिए आतंकवादियों से हाथ मिला लेते हैं. अमिताभ बच्चन का किरदार एक ऐसे आर्मी औफिसर का है जो सिस्टम से तंग आ कर खुद कानून अपने हाथ में लेता है और न्याय की नई परिभाषा गढ़ता है.

50 साल के फिल्मी कैरियर में मेहुल कुमार का सिनेमा कभी भी ‘सौफ्ट’ या ‘धीमा’ नहीं रहा. वे हमेशा स्पष्ट और मुखर सिनेमा बनाने में यकीन करते आए हैं.

अगर मेहुल कुमार की सभी फिल्मों पर गंभीरता से नजर दौड़ाई जाए तो एक बात साफतौर पर उभरती है कि उन के सिनेमा की सब से बड़ी ताकत लेखक केके सिंह द्वारा लिखे गए तीखे और कड़क संवाद. मेहुल कुमार ने अपनी फिल्मों में संवादों को केवल बातचीत का जरीया नहीं बनाया, बल्कि उन्हें एक ‘हथियार’ की तरह इस्तेमाल किया. उन के किरदारों के मुंह से निकलने वाला एकएक शब्द एक तोप के गोले की तरह रहा, जो सीधे सिस्टम की दीवारों पर जा कर लगता था.

आज जब फिल्मकार मेहुल कुमार बौलीवुड में अपने 50 साल पूरे कर रहे हैं, तो यह केवल एक इनसान की कामयाबी वर्षगांठ नहीं है, बल्कि यह हिंदी सिनेमा के उस गौरवशाली दौर का उत्सव है जब फिल्में सिर्फ पैसा कमाने की मशीन नहीं होती थीं. उन का सिनेमा एक सामाजिक जिम्मेदारी निभाता रहा है. यही असल माने में गोल्डन जुबली है. Entertainment

‘सूत्रधार’ के बहाने सत्ता का खेल

सुनील शर्मा

20 दिसंबर, 2021 को मराठी और हिंदी फिल्मों के कलाकार व डायरैक्टर चंद्रकांत दत्तात्रेय जोशी की 77 साल की उम्र में मौत हो गई थी. जब मैं ने उन के बारे में थोड़ा ज्यादा खंगाला तो मुझे उन से जुड़ी एक हिंदी फिल्म नजर आई, जिस का नाम ‘सूत्रधार’ है.

चंद्रकांत दत्तात्रेय जोशी ने इस फिल्म का डायरैक्शन किया था, जिस में स्मिता पाटिल, गिरीश कर्नाड और नाना पाटेकर जैसे दिग्गज कलाकारों ने बेहतरीन काम किया था.

इस फिल्म की कहानी का प्लौट इतना भर था कि एक कच्चेपक्के घरों के अति पिछड़े गांव में एक अमीर जमींदार गिरीश कर्नाड का एकछत्र राज चलता है, जिसे लोग डर कहें या इज्जत से ‘सरकार’ कहते हैं.

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वह ‘सरकार’ बच्चे नाना पाटेकर के सामने उस के पिता की अपने गुरगों से पिटाई करवाता है, जो नाना पाटेकर के बालमन पर छप जाती है. नाना पाटेकर के पिता का कुसूर इतना ही होता है कि वह अपनी जमीन पर कुआं खुदवा रहा होता है, पर उस ने ‘सरकार’ से इजाजत नहीं ली होती है.

बड़ा हो कर नाना पाटेकर पहले गांव में ही टीचर बनता है और गिरीश कर्नाड के फैसलों की काट करता है. इतना ही नहीं, बाद में नौकरी छोड़ कर उसी के खिलाफ सरपंच का चुनाव लड़ कर जीतता है और गिरीश कर्नाड की सत्ता के किले में सेंध लगा देता है, पर बाद में नाना पाटेकर राजनीति के खेल में इतना ज्यादा रम जाता है कि वह अपने परिवार, अपने उसूल, अपनी आक्रामकता को परे रख कर धीरेधीरे दूसरा गिरीश कर्नाड बन जाता है. फिल्म के आखिर में एक बच्चा नाना पाटेकर के खिलाफ हो जाता है और कहानी में एक नया सूत्र बंध जाता है.

चूंकि अब देश में चुनाव का माहौल है तो फिल्म ‘सूत्रधार’ का एक संवाद और भी मौजूं हो जाता है कि ‘कुरसी सबकुछ बिगाड़ देती है’. यह संवाद एक आम आदमी के मुंह से कहलवाया गया है, जो गांव का ही बाशिंदा है और वह गांव भी कोई भारत सरकार का ‘निर्मल गांव’ नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र का एक पिछड़ा हुआ गांव है, जहां नाना पाटेकर अपनी राजनीति की शुरुआत हरिजन टोले से करता है, जो ‘सरकार’ गिरीश कर्नाड के अहम पर पहली चोट होती है और चूंकि लोग अंदर ही अंदर ‘सरकार’ और उन के गुरगों से खार खाए बैठे होते हैं, लिहाजा नाना पाटेकर अपनी ईमानदार इमेज के चलते चुनाव जीत जाता है.

फिल्म ‘सूत्रधार’ साल 1987 में रिलीज हुई थी, मतलब आज से 35 साल पहले, पर अगर भारत में राजनीति के मौजूदा हालात की बात करें, तो तब से ले कर आज तक कुछ ज्यादा आंदोलनकारी बदलाव नहीं हुआ है.

नाना पाटेकर जैसे नएनवेले नेता अपने क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव के सपने दिखा कर सत्ताधारी पक्ष को हराने की नीयत से जनता के सामने जाते हैं और अपने लक्ष्य को पा भी लेते हैं, पर बाद में जनता को महसूस होता है कि यह तो पहले जैसा ही निकम्मा निकला. अब भी उन की समस्याएं जस की तस हैं, पर भ्रष्टाचार करने वालों के चेहरे बदल गए हैं.

अगर फिल्म ‘सूत्रधार’ के कथानक को देखें तो एक मास्टरपीस होने के गुण भले ही उस में न हों, फिर भी वह भारतीय राजनीति का ऐसा आईना है, जो आज भी जस की तस तसवीर दिखाता है.

‘सरकार’ गिरीश कर्नाड का दबदबा खत्म होते ही उन के कुछ पिछलग्गू नाना पाटेकर की तरफ हो जाते हैं यानी उन की निष्ठा जनता के प्रति नहीं होती है, बल्कि वे सत्ता पक्ष में बने रहना चाहते हैं, फिर ताकत किसी के पास भी क्यों न रहे.

यहां जनता भी कठघरे में खड़ी दिखाई देती है और उस के लिए चुनाव का मतलब प्रचार के समय अमीर नेताओं से कुछ दिन भरपेट स्वादिष्ठ भोजन मिल जाना, कंबलबरतन उपहार में लपक लेना भर होता है. और अगर किसी ‘खास गुरगे’ को कुछ ज्यादा मिल गया तो वह अपनी औकात के हिसाब से गोलमाल करता है.

इस फिल्म में यही छोटा भ्रष्टाचार बड़ी बारीकी से दिखाया गया है कि कैसे गांव वालों से दूध खरीदने वाली सहकारी समिति के ‘कर्ताधर्ता’ किसान महिलाओं को ‘छुट्टा नहीं है’ कह कर अठन्नी का भी घपला कर लेते हैं. मुरगी केंद्र का रखवाला रात को मुरगी पका कर खा जाता है और दोस्तों के साथ दारू पार्टी करता है और सब से कहता फिरता है कि रात को मुरगी चोरी हो जाती है.

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यहां ‘कुरसी सबकुछ बिगाड़ देती है’ संवाद की गहराई समझ में आती है कि जब किसी छोटी या बड़ी कुरसी पर बैठने वाले के दस्तखत की कीमत बढ़ जाती है, तो फिर जनता के बीच से गए जनता के नुमाइंदे ही खुद को खुदा से कम नहीं समझते हैं. खुद नाना पाटेकर उस ‘भाऊ’ नीलू फुले की शरण में चला जाता है, जिस का हाथ पहले ‘सरकार’ के सिर पर होता है. मतलब जो मक्कारी और मौकापरस्ती में ‘सरकार’ का भी बाप होता है.

यहां फिर ‘निष्ठा’ का सवाल खड़ा होता है कि नेता तो जैसे भी होते हों, जनता भी अपनी मक्कारी का ठीकरा नेताओं के सिर पर फोड़ कर अपना पल्ला झाड़ने में बड़ी माहिर होती है. वह अपनी गरीबी, गंदगी और गलीजपने को कभी नहीं देखती है.

घरपरिवार में ही देख लें, तो किसी बड़े और सयाने के फैसलों की ही कद्र घर के दूसरे लोग नहीं करते हैं. वे अपने छोटे फायदों में ही उलझे रहते हैं, जिस का नतीजा यह होता है कि वे दूसरों से हर मामले में पिछड़ जाते हैं. जब ऐसे लोगों की भरमार हो जाती है तो उन से बना पड़ोस, महल्ला, गांव, कसबा, शहर भी उन शातिरों की भेड़ बन जाता है, जिसे जहां मरजी हांकना सब से आसान काम होता है.

भारत, जो कई सौ साल से विदेशी आक्रांताओं का गुलाम रहा है, में हम भारतीयों की इसी ‘निष्ठा’ की कमी भी बहुत बड़ी वजह रही है. यह कमी हमारे मन में इतनी ज्यादा घर कर चुकी है कि आज के सियासी नेता भी ‘फूट डालो और राज करो’ नीति का सहारा ले कर कभी धर्म के नाम पर, तो कभी क्षेत्रवाद के नाम पर और जब बस नहीं चलता है तो जातियों में बांट कर अपना उल्लू सीधा करते हैं.

यही वजह है कि फिल्म ‘सूत्रधार’ का एक पिछड़ा हुआ गांव हो या फिर असली जिंदगी की कोई मैट्रो सिटी, जनता चुनाव के समय तमाशबीन बन जाती है. उसे अपने छोटेछोटे फायदे नजर आते हैं, फिर सामने फिल्मी ‘सरकार’ हो या असली का बाहुबली.

#MeToo: नाना-तनुश्री मामले में आया नया मोड़, ये एक्ट्रेस देगी गवाही

मीटू मामले में नाना पाटेकर की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. दरअसल तनुश्री और नाना पाटेकर के मामले में मुंबई पुलिस ने नोटिस भेजकर बौलीवुड एक्ट्रेस डेजी शाह को बुलाया है. डेजी का बयान दर्ज करने के लिए उन्हें बुलाया गया है. ओशिवार थाने की ओर से कहा गया है कि जब ये घटना घटी उस वक्त सेट पर डेजी शाह भी मौजूद थी. डेजी उस गाने की असिस्टेंट कोरियोग्राफर थी. वो गणेश आचार्य के साथ गाने में काम कर रही थी.

daisy shah to testimony

सदमे में थी तनुश्री

इस मामले में मीडिया से बात करते हुए डेजी ने बताया था कि, ‘मैंने तनुश्री के साथ 3 दिन तक गाने की प्रैक्टिस की थी. शुरुआती दो दिन बहुत अच्छे बीते किसी को कोई दिक्कत नहीं हुई. तीसरे दिन कुछ हुआ था, लेकिन क्या ये मुझे ठीक से नहीं पता और न ही मैं इसके बारे में कुछ भी जानती हूं.’ उन्होंने आगे कहा कि ‘इसके बाद तनुश्री ने 4 घंटे तक खुद को वैनिटी में बंद कर लिया था. उन्हें सेट से निकालने में भी दिक्कत हुई.’

दर्ज है नाना के खिलाफ मामला

आपको बता दें कि मीटू अभियान के तहत तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर पर सेक्शुअल हैरेसमेंट के आरोप लगाए थे. इस मामले में मुंबई ओशिवारा थाने में FIR दर्ज कराई गई थी. अपनी शिकायत में तनुश्री ने नाना के अलावा कोरियोग्राफर गणेश आचार्य और प्रोड्यूसर सामी सिद्दीकी, डायरेक्टर राकेश सारंग और महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (एमएनएस) के कुछ कार्यकर्ताओं के भी नाम लिए हैं. तनुश्री ने आईपीसी की धारा 354A और 509 के तहत केस दर्ज किया है.

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