आई एम नाॅट ब्लाइंड : प्रेरणा दायक कथा

रेटिंगः ढाई स्टार

निर्माता: मदारी आर्ट्स

लेखक व निर्देशक: गोविंद मिश्रा

कलाकार: आनंद गुप्ता, शिखा इतकान, अमित घोष, विनय अम्बष्ठ,कृष्णा नंद तिवारी, गोपा सान्याल, उपासना वैष्णव व अन्य.

अवधिः एक घंटा 41 मिनट

ओटीटी प्लेटफार्मः एम एक्स प्लेअर

शारीरिक अपंगता के शिकार लोगों के साथ समाज दया का भाव रखता है. वह उनकी क्षमता को देखने का प्रयास ही नही करता. पर अब फिल्मकार गोविंद मिश्रा एक फिल्म ‘‘आई एम नाॅट ब्लाइंड’’ लेकर आए हैं, जो कि‘‘हमारी दिव्यांगता को नही हमारी क्षमता को देखिए’’का संदेश देने वाली प्रेरणा दायक फिल्म है.आंखों से दिव्यांग एक इंसान के सफल आई ए एस अफसर बनने की कहानी वाली यह फिल्म छह सितंबर से ओटीटी प्लेटफार्म‘‘एम एक्स प्लेअर’’पर देखी जा सकती है.

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यह फिल्म अमरीका के फिल्म फेस्टिवल ‘ग्रेट सिनेमा नाउ‘ में दूसरे नंबर पर थी. विश्व के कई फिल्म फेस्टिवल में इसे सराहा जा चुका है. अमरीका के एक फेस्टिवल निदेशक निक मिल्स ने इस फिल्म को अमेरिका में प्रदर्शन करने की बात की थी, पर इस फिल्म के निर्माता पहले इसे भारत में प्रदर्शन करना चाहते थे,जो कि अब ओटीटी प्लेटफार्म ‘एम एक्स प्लेअर’पर आयी है.

किसी इंसान का अंधापन उसकी क्षमता को नष्ट नहीं करता.बल्कि आंख से न देख पाने के बावजूद वह इंसान काफी प्रगति करता है. यह कटु सत्य है. हमारे देश में राजेश कुमार सिंह,अजय अरोड़ा,रवि प्रकाश गुप्ता और प्रांजली पाटिल सहित तकरीबन डेढ़ दर्जन दिव्यांग आई ए एस अफसर हैं,जो कि आॅंखांे से देख नहीं सकते, मगर आई ए एस अफसर के रूप में बेहतरीन काम कर रहे हैं.

कहानीः

यह एक सत्य कथा पर आधारित फिल्म है.इसकी कहानी शुरू होती है छत्तीसगढ़ के एक गाॅंव से,जहां एक विधवा अपने दो बेटों विमल कुमार(आनंद गुप्ता )  और पंकज के साथ रहती है.उसने अपने बेटों को अपनी तरफ से अच्छी शिक्षा दिलाने की कोशिश की. विमल कुमार जन्म से ही अंधे हैं, जिसकी वजह सेे 12वीं कक्षा के बाद उनकी शिक्षा बंद हो गयी, जबकि वह पढ़ लिखकर आई ए एस अफसर बनने का सपना देख रहे हैं. उधर पंकज अय्याश है और उसे अपना बड़ा भाई विमल फूटी आंख नहीं सुहाता.

एक दिन जब पंकज के बीमार मौसा को देखने दूसरे गांव के अस्पताल पंकज की मां जाती है,जबकि उस वक्त विमल कुमार एक मंदिर में भजन में शामिल होने गया होता है,तो पंकज उसे मंदिर से वापस लेने जाने की बजाय घर में ताला डालकर पूरी रात अपने दोस्त के साथ अय्याशी करने चला जाता है.विमल कुमार परेशान होकर सड़क किनारे रात गुजारते हैं. सुबह वहां से गुजर रही ‘शीतल फाउंडेशन’ की शीतल (शिखा इतकान) की नजर पडती है, तो वह पूरी कहानी जानकर विमल को लेकर अपने फांउडेशन में जाती है.

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जहां वह उसकी पढ़ाई आगे शुरू करवाती है. इस बीच शीतल को विमल कुमार से प्यार हो जाता है.मगर शीतल के पिता को यह बात पसंद नहीं आती. वह एक डाॅन को दो लाख रूपए देकर विमल कुमार को रास्ते से हटाने के लिए कहते हैं.डाॅन के कहने पर विमल कुमार आई ए एस का इंटरव्यू नहीं देना चाहता, मगर एक दूसरा इंसान उसे समझाता है और वह इंटरव्यू देता है.

जब शीतल को सच पता चलता है,तो वह अपने पिता से सवाल करती है- ‘‘अगर आपकी मर्जी के युवक से मैं शादी कर लूं, और शादी के बाद उसकी आंखें चली जाएं,तो क्या आप उसे छोड़ने के लिए कहेंगे?’ तब शीतल के पिता उसकी शादी विमल कुमार से करा देते हैं.विमल कुमार आई ए एस अफसर के रूप में अपने काम को अंजाम देना शुरू करते हैं,जनता उनके काम से खुश होती है.

लेखन व निर्देशनः

एक बेहतरीन प्रेरणा दायक सत्यकथा पर लेखक व निर्देशक गोविंद मिश्रा ने यथार्थ परक फिल्म बनाने का बीड़ा तो उठा लिया,मगर वह पटकथा पर मेहनत नही कर पाए.परिणामतः फिल्म धीमी गति से आगे बढ़ती है.इसके अलावा फिल्मकार ने एक आंखों से अंधे दिव्यांग के जीवन में आने वाली छोटी छोटी कठिनाइयों, उसने आई एस एस की पढ़ाई के दौरान किस तरह की मुसीबतें झेली, आदि पर ज्यादा रोशनी डालने की बजाय प्रेम कहानी को महत्व दिया,मगर वह रोमांस को भी ठीक से चित्रित नही कर पाए. शायद वह फिल्म को यथार्थ परक बनाने के चक्कर में सिनेमा की जरुरत के बीच तालमेल नही बैठा पाए.

फिल्म के कुछ संवाद अवष्य बेहतर बन पाए हैं..मसलन-‘‘‘हमारी दिव्यांगता को नही हमारी क्षमता को देखिए.’’ अथवा ‘‘मेहनत करके हार जाना अच्छी बात है,लेकिन विना मेहनत के हार नही माननी चाहिए.’’

फिल्म को बेहतरीन लोकेशन पर फिल्माया गया है.

कुछ कमियों के बावजूद यह फिल्म न सिर्फ प्रेरणा दायक है,बल्कि हर दिव्यांग के हौसले को भी बढ़ाती है.

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अभिनयः

आंखों से दिव्यांग विमल कुमार के किरदार में आनंद गुप्ता ने शानदार अभिनय किया है.आनंद गुप्ता ने निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के आर्थिक संकट और अंध व्यक्तियों के लिए स्कूलों द्वारा अपनाए जाने वाले उपेक्षापूर्ण रवैए के चलते अपनी शिक्षा को जारी न रख पाने की बेबसी को अपने चेहरे के आव भाव से बेहतर तरीके से उकेरने में सफल रहे हैं.शीतल के किरदार में शिखा इतकान भी प्रभावित करती हैं. अन्य कलाकारों ने ठीक ठाक अभिनय किया है.

लूटकेस: रबर की तरह खींची गयी कहानी

रेटिंग: 2 स्टार

निर्माता: फॉक्स स्टार स्टूडियो

निर्देशक: राजेश कृष्णन

कलाकार: कुणाल केमू , रसिका दुग्गल, गजराज राव, विजय राज, रणवीर शोरी,आकाश दभाड़े, मनुज शर्मा, नीलेश दिवाकर, प्रीतम जायसवाल व अन्य

अवधि: 2 घंटे 12 मिनट

ओटीटी प्लेटफॉर्म: डिजनी हॉटस्टार

नेताओं और अपराधियों के गठजोड़ के बीच एक आम इंसान के फंस जाने पर क्या स्थिति होती है, उसके साथ साथ यदि हर दिन आर्थिक हालात के संकट से जूझ रहे आम इंसान के हाथ 10 करोड़ रुपए लग जाए तो वह क्या करेगा? इसी के इर्द गिर्द घूमने वाली हास्य व अपराध कथा वाली फिल्म ‘लूटकेस’ फिल्मकार राजेश कृष्णन लेकर आए हैं. अफसोस इस कहानी को रबर की तरह इतना खींचा गया है कि दर्शक को हंसी नहीं आती .बल्कि वह बोर होकर अपने सिर के बाल नोचने लगता है.

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कहानी :

कहानी शुरू होती है एक अपराधी जमील की हत्या से. इससे उमर और बाला राठौर (विजय राज) आमने सामने आ जाते हैं .उमर को राज्य के मंत्री पाटिल (गजराज राज) का वरद हस्त हासिल है.एक दिन पाटिल, उमर को बुला कर उसे 10 करोड़ रुपए और एक फाइल से भरे लाल रंग के सूटकेस को संशाधन मंत्री त्रिपाठी तक पहुंचाने की जिम्मेदारी देते हैं. बाला राठौर अपने गुर्गे राजन को आदेश देता है कि वह उमर से यह सूटकेस हासिल कर ले. घाटकोपर में पाइप लाइन के पास दोनों गुट के बीच गोलीबारी शुरू होती है, तभी पुलिस आ जाती है. उमर के आदमी उस सूटकेस को वहीं छिपाकर कर भाग खड़े होते हैं .

एक प्रिंटिंग प्रेस में कार्य करने वाला आम इंसान नंदन (कुणाल केमू) अपनी पत्नी लता (रसिका दुग्गल) और बेटे आयुष के साथ रहता है. आर्थिक संकट है. मकान का किराया भी नहीं दे पा रहा है. रात में दो बजे नौकरी से लौटते समय नंदन के हाथ यह सूटकेस लग जाता है. वह सूटकेस को अपने घर ले आता है . पत्नी से सच छिपाता है. सूटकेस के पैसे कई जगह छिपाकर रख देता है.अब  जिंदगी सही गुजरने लगती है.

उधर मंत्री पाटिल परेशान होकर पुलिस इंस्पेक्टर कोलटे (रणवीर शोरी) को सूटकेस की तलाश करने की जिम्मेदारी सौंपते हैं . बाला राठौड़ अब कोलटे के पीछे अपने आदमी लगा देते हैं . कोलटे,  नंदन तक पहुंच जाता है मगर घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. कोलटे ,उमर व बाला सभी मारे जाते हैं. नंदन को फिर से सूटकेस व पूरी रकम मिल जाती है.

लेखन निर्देशन:

यदि इंसान के अंदर लेखन और निर्देशन की क्षमता का अभाव हो, तो वह किस तरह बेहतरीन कथानक का भी सत्यानाश कर देता है, इसी का उदाहरण है राजेश कृष्णन की यह फिल्म ‘लूटकेस’ .एक आम इंसान के हाथ 10 करोड़ रुपए लगने के बाद उसकी कार्यशैली से हास्य के बेहतरीन पल गढ़े जा सकते थे, पर निर्देशक बुरी तरह से मात खा गए. फिल्म में राजनीति और अपराधियों के गठजोड़ को भी ठीक से चित्रित नहीं किया गया.एक काबिल  पुलिस इंस्पेक्टर किस तरह मंत्री के हाथ खिलौना बन कर रह जाता है,इसे भी सही ढंग से उभारने में वह असफल रहे. बल्कि बेवजह के घटनाक्रमों से फिल्म को इतना खींचा गया कि दर्शक बोर हो जाता है .इसे एडिटिंग टेबल पर  कसने की भी जरूरत थी. क्लाइमेक्स भी प्रभावित नहीं करता.

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अभिनय :

लेखक और निर्देशक के बाद कुणाल केमू इसकी सबसे कमजोर कड़ी हैं. कुणाल केमू ने एक बार फिर साबित कर दिखाया कि वह मल्टीस्टारर फिल्म में ही ठीक है.आम इंसान के आर्थिक संकट से जूझने और फिर करोड़ों रुपए हाथ आ जाने पर जिस तरह के हाव-भाव होने चाहिए थे, उसे वह अपने अभिनय से नहीं ला पाते. रसिका दुग्गल एक सशक्त अदाकारा हैं, मगर इस फिल्म में उनकी प्रतिभा को जाया किया गया है.  कुटिल व कपटी मंत्री पाटिल के किरदार में गजराज राव ने शानदार अभिनय किया है. विजय राज एक नए अवतार में हैं, मगर उनके चरित्र को ठीक से लिखा नहीं गया, इसलिए वह प्रभाव नहीं डाल पाते. रणवीर शोरी भी निराश करते हैं.

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