Social Media Influence: दो कौड़ी के इन्फ्लुएंसर्स करोड़ों कचरा फौलोअर्स

Social Media Influence: जो इन्फ्लुएंसर्स सोशल मीडिया पर सिर्फ कचरा फैलाते हैं उन के करोड़ों फौलोअर्स कैसे हो जाते हैं? लोग घंटों रील्स देखने में लगा देते हैं लेकिन उन्हें कुछ हासिल नहीं होता फिर भी वे क्यों जोंक की तरह फोन से चिपके रहते हैं?

आजकल कई बड़े सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के पास मिलियंस व्यूज और फौलोअर्स हैं लेकिन उन का कंटैंट इतना घटिया, टौक्सिक और बेकार है कि उन के व्यूअर्स पर तरस आता है. लोगों के पास कितना फालतू समय है जो ऐसे कंटैंट देखते हैं. ऐसे इन्फ्लुएंसर्स दर्शकों का कीमती समय तो बरबाद करते ही हैं, उन की मानसिकता भी खराब करते हैं.

एल्विश यादव को यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर करोड़ों व्यूज मिलते हैं और फौलोअर्स भी मिलियंस में हैं. बिग बौस जीतने के बाद यह बंदा और ज्यादा उद्दंड हो गया. औरतों के बारे में कुछ भी बोलता है. एल्विश का ज्यादातर गालीगलौज, बेवकूफीभरा चैलेंज और सनसनी फैलाने वाला कंटैंट बनाता है. यह सब देख कर युवा घंटों स्क्रौल करते हैं, हंसते हैं, लेकिन बाद में उन्हें कुछ हासिल नहीं होता. न कोई स्किल, न ज्ञान, न प्रेरणा. एलविश को फौलो करना, बस, समय की बरबादी है.

सवाल यह है कि इस तरह के इन्फ्लुएंसर्स, जो सोशल मीडिया पर सिर्फ कचरा फैलाते हैं, के करोड़ों फौलोअर्स कैसे हो गए? इस का कारण है डोपामीन. शौर्ट वीडियो, ड्रामा और सनसनी तुरंत खुशी देती है. ब्रेन इसे ‘फास्ट फूड’ की तरह एडिक्टिव मान लेता है. कई लोग तो बिना सोचे फौलो करते हैं कि ‘सब देख रहे हैं तो ठीक होगा.’ वे नहीं पाते कि इस से उन की लाइफ में क्या वैल्यू ऐड हो रही है.

कुछ नौजवान, रियल लाइफ की टैंशन, पढ़ाई, जौब या प्रौब्लम्स से भागने के लिए ऐसे कंटैंट का शिकार होते हैं. लगता है, मजा आ रहा है लेकिन साल बीतने पर पछतावा होता है कि समय कहां गया?

इसे फोमो यानी फेयर औफ मिसिंग आउट कहते हैं. अगर नहीं देखा तो पीछे रह जाऊंगा जबकि हकीकत में ये इन्फ्लुएंसर्स खुद का प्रोडक्ट बेच रहे हैं न कि आप का भला कर रहे हैं. जब सब फौलो कर रहे हैं तो लगता है सही होगा लेकिन भीड़ में शामिल होना ही समय की सब से बड़ी बरबादी है.

समय आप की सब से बड़ी संपत्ति है. अगर आप इन से दूर रह कर किताब पढ़ें, स्किल सीखें या असल रिश्ते बनाएं तो जिंदगी कहीं बेहतर हो सकती है. ऐसे इन्फ्लुएंसर्स को अनफौलो कर के आप खुद को समय और मानसिक शांति दे सकते हैं. या फिर बने रहिए बेवकूफ.

आप जैसे बेवकूफ फौलोअर्स की वजह से ही ऐसे फालतू क्रिएटर्स करोड़पति बन रहे हैं. स्क्रीन पर कोई भी फालतू इंसान, जो न पढ़ालिखा है, न स्किल्ड है और न ही वह समाज को कोई वैल्यू देता है, बस गालीगलौज करता है, बेवकूफीभरे चैलेंज करता है या ‘अल्फा मेल’ बन कर मर्दानगी बेचता है उस के पास लाखोंकरोड़ों फौलोअर्स इकट्ठा हैं. यूट्यूब पर मिलियंस व्यूज, इंस्टाग्राम पर रील्स वायरल, एक्स पर ट्रैंडिंग. क्यों, क्योंकि बेवकूफ लोग ऐसे क्रिएटर्स की गंदगी में डूबते रहते हैं.

पहले  इन फालतू क्रिएटर्स के फौलोअर्स इतने ज्यादा क्यों हैं? तुम्हारा ब्रेन डोपामीन का जंकफूड खा रहा है. शौर्ट वीडियो, ड्रामा,  गालीगलौज ये सब 15-30 सैकंड में तुम्हारे दिमाग को खुशी का तुरंत शौट देते हैं. असल में ये तुम्हारे अंदर की मोरैलिटी को नीचे गिराने वाले कंटैंट हैं लेकिन तुम्हारा ब्रेन इसे रिवार्ड  है. तुम्हें लगता है, बस, एक और वीडियो, और फिर घंटों बीत जाते हैं. ये क्रिएटर्स जानते हैं कि तुम्हारी एकाग्रता 8 सैकंड से ज्यादा नहीं चलती, इसलिए वे लगातार क्लिकबेट डालते रहते हैं. थंबनेल ऐसे ही क्लिक किए बिना न रह पाओ लेकिन यह भ्रम की दुनिया है, बरबादी का रास्ता है. बच सकते हो तो बच जाओ.

लोगों की कमजोरी का फायदा उठाता है एल्गोरिदम

यूट्यूब, टिकटौक, इंस्टाग्राम जैसे तमाम प्लेटफौर्म्स को ज्यादा वाच टाइम चाहिए. अगर तुम किसी वीडियो पर रुकते हो, लाइक करते हो, कमैंट करते हो, शेयर करते हो तो वह कंटैंट और लोगों तक पहुंचता है. फालतू क्रिएटर जानबू?ा कर विवाद पैदा करते हैं क्योंकि विवाद से ज्यादा इंगेजमैंट मिलती है. ज्यादा इंगेजमैंट से ज्यादा रीच मिलती है और ज्यादा रीच मिलने से ज्यादा फौलोअर्स पैदा होते हैं. तुम्हारी हर हाहा या ‘भाई सही कहा’ कमैंट उन के लिए पैसा है.

तुम्हें एस्केप की जरूरत है और वे उसे बेच रहे हैं. पढ़ाई/जौब/लाइफ में मेहनत करने के बजाय तुम इन के चक्कर में पड़ जाते हो क्योंकि इन का कंटैंट आसान है, सोचने की जरूरत नहीं. बस, हंसो, गुस्सा करो या कूल फील करो. ये तुम्हें सिस्टम के खिलाफ होने का नशा देते हैं जबकि असल में ये तुम्हारा समय चूस रहे होते हैं.

जब सब फौलो कर रहे हैं तो तुम भी सोचते हो, शायद कुछ तो होगा, फोमो यानी फियर औफ मिसिंग आऊट तुम्हें खींचता है. अगर मैं नहीं देखूंगा तो पीछे रह जाऊंगा. हकीकत में तुम पीछे ही रह जाते हो. लाइफ में, कैरियर में और स्किल्स में भी.

बेवकूफ फौलोअर्स की वजह से ही ये लोग करोड़ों कमा रहे हैं, लग्जरी कारें दिखा रहे हैं. वे अपने फौलोअर्स को सपने बेच रहे हैं, फौलोअर्स को कोई वैल्यू नहीं मिल रही. क्या ऐसे फौलोअर्स की जिंदगी का कोई मकसद है? या बस इन फालतू इंसानों के ड्रामे में जी रहे हैं ये लोग?

फौलोअर्स को यह बात  होगी कि उम्र का सब से कीमती समय बरबाद हो रहा है. ऐसे क्रिएटर्स दिमाग को सुन्न और सुस्त कर रहे हैं. क्रिटिकल थिंकिंग खत्म हो रही है. ध्यान खत्म, प्रोडक्टिविटी जीरो.

ऐसे फालतू क्रिएटर्स के ज्यादातर फौलोअर्स वे लोग हैं जिन्होंने कभी किताब नहीं पढ़ी, कोई कोर्स नहीं किया या जिंदगी में कभी असली मेहनत नहीं की.

तुम इन के लिए प्रोडक्ट हो. ये तुम्हें एड दिखा कर स्पौंसरशिप ले कर पैसा कमा रहे हैं. तुम उन के लिए सिर्फ एक नंबर हो. अगर तुम्हें मजा चाहिए तो किताब पढ़ो, स्किल सीखो, जिम जाओ, असली दोस्तों से मिलो, सोशल बनो. लेकिन असल में सोशल बनने के लिए सोशल मीडिया से दूर होना होगा वरना जिंदगीभर पछताओगे कि वह समय कहां गया?

अगर तुम सच में बदलना चाहते हो तो आज ही शुरू करो. वरना ये फालतू क्रिएटर्स तुम्हारे जैसे लाखों लोगों से ही अमीर होते रहेंगे और तुम गरीब से गरीब बने रहोगे. ये क्रिएटर तुम्हारा समय, दिमाग और आत्मसम्मान सब बरबाद कर देंगे.

सोशल मीडिया की दुनिया में एक तरफ वे लोग हैं जो सालों की मेहनत से कुछ सार्थक कंटैंट बनाते हैं और दूसरी तरफ कुछ दो कौड़ी के इन्फ्लुएंसर्स हैं जिन के वीडियो देख कर ऐसा प्रतीत होता है कि ये समाज को खोखला करने वाले दीमक हैं, फिर भी इन दीमकों के फौलोअर्स की संख्या करोड़ों में है.

दरअसल इंस्टाग्राम, टिकटौक या यूट्यूब जैसे तमाम सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स के एल्गोरिदम क्वालिटी पर नहीं बल्कि इंट्रस्ट पर बेस्ड होते हैं. जो इन्फ्लुएंसर्स जानते हैं कि एल्गोरिदम को कैसे अपने पक्ष में करना है, वे एल्गोरिदम का इस्तेमाल अच्छी तरह कर लेते हैं. एल्गोरिदम को सच्चाई नहीं बल्कि सैंसेशनल कंटैंट चाहिए. ये झूठे और अफवाहजनक थम्बनेल बना कर मूर्खों की भीड़ इकट्ठा करते हैं और ऐसे दो कौड़ी के इन्फ्लुएंसर्स के वीडियो वायरल होते हैं व फौलोअर्स बढ़ते जाते हैं.

-शकील

 

 

Bhojpuri Celebrity Interview: किरदार बनावटी-न हो अनूप अरोरा

Bhojpuri Celebrity Interview: भोजपुरी सिनेमा के शानदार और संजीदा एक्टरों में शुमार अनूप अरोरा ने अपनी एक्टिंग से एक अलग पहचान बनाई है. उन्होंने अब तक सैकड़ों फिल्मों में अलगअलग किस्म के किरदार निभा कर यह साबित किया है कि वे केवल एक एक्टर नहीं हैं, बल्कि एक्टिंग के प्रति समर्पित कलाकार हैंअदाकारी के प्रति उन का जुनून और अनुशासन ही उन्हें भीड़ से अलग बनाता है. 7वें सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स शो के दौरान उन से बातचीत हुई. पेश हैं, उस के खास अंश :

इतने
लंबे समय तक भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में टिके रहना, आप इसे कैसे देखते हैं?
यह एक लगातार चलने वाला सफर है. यहां हर दिन खुद को साबित करना पड़ता है, वरना लोग बहुत जल्दी भूल जाते हैं.

भोजपुरी सिनेमा की मौजूदा दशा और दिशा को आप कैसे देखते हैं?
आज हमारे पास प्लेटफार्म और पहुंच दोनों हैं, लेकिन कंटैंट की सोच कमजोर हो रही है. हमें अच्छे कंटैंट से जुड़ना होगा. भोजपुरी में कम बजट में भी दमदार फिल्में बन सकती हैं. भोजपुरी सिनेमा के कुछ ऐसे चेहरे हैं, जो दर्शकों के दिल और दिमाग में बसते हैं. उन्हीं चुनिंदा लोगों में आप का नाम शामिल है.

आप इस उपलब्धि को कैसे देखते हैं?
मेरे लिए यह किसी अवार्ड से कम नहीं है. दर्शकों के दिल और दिमाग में जगह बनाना बहुत बड़ी जिम्मेदारी भी है और खुशी भी. मैं ने हमेशा कोशिश की है कि जो भी किरदार करूं, उस में सच्चाई हो, बनावटीपन हो. कलाकार वही होता है जिसे लोग स्वीकार करें.

अगर आप को किसी फिल्म में पूरी तरह लीड रोल चुनने का मौका मिले, तो आप किस तरह की कहानी और किरदार को चुनेंगे?
हर कलाकार के अंदर कहीं कहीं एक सपना होता है कि वह ऐसा किरदार निभाए जो दर्शकों के दिल में लंबे समय तक जिंदा रहे. अगर लीड रोल चुनने का मौका मिले, तो मैं ऐसी कहानी करना चाहूंगा, जो समाज से जुड़ी हो, जिस में मनोरंजन के साथसाथ एक मजबूत संदेश भी हो. किरदार की बात करूं तो मैं एक आम इनसान की असाधारण कहानी निभाना चाहूंगा, जो हालात से लड़ कर अपनी पहचान बनाता है. ऐसा रोल जिस में इमोशन, एक्शन और ग्रे शेड्स तीनों हों.                             

कौमेडियन को अलग पहचान मिले – रोहित सिंह ‘मटरू’
भोजपुरी फिल्मों में जब भी परदे पर हंसी की फुहार छूटती है, तो अकसर उस के पीछे किसी कौमेडियन की मेहनत छिपी होती है. लेकिन सच्चाई यह भी है कि कौमेडियन को अकसर उतना सम्मान नहीं मिलता जितना किसी हीरो या विलेन को मिलता है.
भोजपुरी फिल्मों के चर्चित हास्य कलाकार रोहित सिंहमटरूइस सच्चाई को खुल कर स्वीकार करते हैं. अपनी देशी शैली, सहज संवाद और सटीक कौमिक टाइमिंग से दर्शकों को हंसाने वालेमटरूसे पटना में हुई मुलाकात में हुई लंबी बातचीत में उन्होंने सिर्फ अपने संघर्षों की कहानी सुनाई, बल्कि भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री की कई अनकही बातों पर भी बेबाक राय रखी. पेश हैं, उसी के खास अंश :

आप की पहचान आज एक कौमेडियन के रूप में बन रही है. लेकिन इस की शुरुआत कैसे हुई?
सच कहूं तो मैं ने कभी प्लान कर के कौमेडियन बनने का फैसला नहीं किया था. बचपन से ही मेरी आदत थी कि माहौल गंभीर हो जाए तो मैं कोई मजाक कर देता था. परिवार वाले कहते थे कि तुम जहां जाते हो, वहां हंसी का माहौल बन जाता है. धीरेधीरे लगा कि अगर यही काम लोगों को खुशी देता है, तो इसे ही अपना रास्ता क्यों बनाया जाए. बस, वही आदत आज मेरा पेशा बन गई. अकसर कहा जाता है कि

भोजपुरी फिल्मों में कौमेडियन को सिर्फ हलके मनोरंजन के लिए रखा जाता है. आप क्या सोचते हैं?
यह बात काफी हद तक सच है. कई फिल्में ऐसी होती हैं जहां कौमेडियन को सिर्फ 2-3 सीन दे कर कहा जाता है कि बस लोगों को हंसा देना. लेकिन कौमेडी करना इतना आसान नहीं है. एक कौमेडियन पूरी फिल्म का मूड बदल सकता है. अगर कहानी में सही तरीके से कौमेडी जोड़ी जाए, तो फिल्म और भी मजबूत हो सकती है.

आप की कौमिक टाइमिंग की काफी तारीफ होती है. इस का राज क्या है?
कौमेडी में सब से जरूरी चीज टाइमिंग है. अगर संवाद एक सैकंड पहले या बाद में बोल दिया, तो पूरा मजाक खराब हो सकता है. मैं हमेशा कोशिश करता हूं कि सीन को महसूस करूं. जब कलाकार सीन को जीता है, तब ही असली कौमेडी निकलती है.
आप को सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स जैसे मंच पर सम्मान मिलता है तो आप को कैसा लगता है?
अवार्ड मिलना हर कलाकार का सपना होता है. अगर ऐसा सम्मान मिलता है तो निश्चित रूप से खुशी होती है. लेकिन सच कहूं तो जब कोई दर्शक मिल कर कहता है कि आप की वजह से हम हंसे, तो वह मेरे लिए किसी भी ट्रौफी से बड़ा पुरस्कार होता है.

आने वाले समय में आप का सपना क्या है?
मैं चाहता हूं कि भोजपुरी फिल्मों में कौमेडी को अलग पहचान मिले. हमारे यहां इतने अच्छे कौमेडियन हैं, लेकिन उन्हें सही मौके नहीं मिलते. अगर उन्हें अच्छे किरदार और मजबूत कहानी मिले, तो भोजपुरी कौमेडी पूरे देश में लोकप्रिय हो सकती है. आज की जिंदगी में तनाव बहुत बढ़ गया है. अगर मेरी कौमेडी से किसी के चेहरे पर दो मिनट की मुसकान जाती है, तो लगता है कि मेरा मकसद कामयाब हो गया है.                        

Film: रवि गोसाईं-अदाकारी का अलहदा सफर

Film: गुल आप अपनी शुरुआती जिंदगी के बारे में बताइए. मैं मूल रूप से दिल्ली का रहने वाला हूं. मेरी पढ़ाई लिखाई जैसे स्कूलकालेज सबकुछ दिल्ली से ही हुआ. मेरे मातापिता पंजाब से थे, लेकिन आज अगर पहचान की बात करूं, तो मैं खुद को पूरी तरह मुंबई का मानता हूं. यही शहर है जहां मैं ने अपने सपनों को जिया और उन्हें पूरा होते देखा.


आप की एक्टिंग और डांस की शुरुआत कैसे हुई?
बचपन से ही मुझे एक्टिंग और डांस का बेहद शौक था. पहले मैं ने प्रोफैशनल डांसिंग शुरू की और साथसाथ थिएटर वर्कशौप्स करने लगा. इसी दौरान नुक्कड़ नाटक किए, जिस से एक्टिंग की समझ और जमीन से जुड़ाव मिला.

आप को मुंबई आने का पहला बड़ा ब्रेक कैसे मिला?
मेरे कालेज के एक सीनियर दोस्त थे, जो डायरैक्टर गिरीश मलिक के साथ काम कर रहे थे. वे एक टीवी शो में लीड रोल कर रहे थे और उसी शो के लिए एक और किरदार कास्ट होना बाकी था. उन्होंने मेरा नाम डायरैक्टर साहब को दिया और मुझे मुंबई बुलाया गया. वह शो थापरवरिश’, जो जी टीवी पर आया और जिस में किरण कुमार मेरे पिता के रोल में थे.


आप का फिल्म की दुनिया में आगे का सफर कैसा रहा?
इस के बाद मैं केतन मेहता के असिस्टैंट प्रशांत नारायणन के साथ पृथ्वी थिएटर में एक्टिंग वर्कशौप्स करने लगा. उन्हीं के जरीए मुझे फिल्मओह डार्लिंग, ये है इंडियामें काम मिला. फिर मेरी जिंदगी का एक बेहद अहम मोड़ आया, जब मेरा दोस्त भूपिंदर, जो उस वक्त मेरा फ्लैटमेट भी था, ने मुझे गुलजार साहब की फिल्ममाचिसके बारे में बताया और उन से मुलाकात तय कराई. पहली ही मीटिंग में गुलजार साहब ने मुझे पसंद कर लिया. उन के साथ काम करना हर एक्टर का सपना होता है और मेरा सपना अचानक सच हो गया.


सीरियल ‘परवरिश’ के बाद टीवी में आप का सफर कैसे आगे बढ़ा?
फिल्ममाचिसके बाद जब मैं अलगअलग डायरैक्टर्स से मिलने लगा, तो संजीव भट्टाचार्य और रवि राय के पास अकसर जाता था. एक दिन मुझे संजीव भट्टाचार्य का फोन आया और उन्होंने कहा, ‘अब तो तुम्हारी फिल्म इतनी बड़ी हिट हो गई है, क्या अब भी मेरे साथ टीवी में काम करोगे?’ मैं ने बिना सोचेहांकर दी.
मैंअमानतसीरियल मेंचंदरका रोल करना चाहता था, लेकिन संजीव भट्टाचार्य ने कहा, ‘वह रोल तो कोई भी कर सकता है, लेकिननिगोड़ेके लिए मुझे एक मंझा हुआ, पुख्ता एक्टर चाहिए. इस किरदार में बहुत शेड्स हैं, जैसे यह हंसाता भी है, रुलाता भी है.’उस एक लाइन ने मुझे क्लीन बोल्ड कर दिया और वही किरदार मेरे लिए यादगार बन गया.


फिल्म ‘शूटआउट एट लोखंडवाला’ आप के लिए क्यों खास थी?
शूटआउट एट लोखंडवालामेरी जिंदगी की बेहद अहम फिल्म है. भले ही मेरा एक बड़ा सीन छोटा हो गया था, लेकिन किरदार बहुत असरदार था. सब से बड़ी बात यह रही कि मुझे फिल्म के पोस्टर में जगह मिली. प्रीमियर शो के दौरान मेरा कटआउट अमिताभ बच्चन साहब के साथ लगा हुआ था. वह पल मेरे लिए यादगार था. और जब फिल्म सुपरहिट हो जाए, तो फायदा तो होता ही है.


आप की महेश भट्ट के साथ जुड़ने की कहानी काफी चर्चित है. क्या था वह किस्सा?
हां, यह बिलकुल सच है. महेश सर अकसर नए एक्टर्स को सीधे फोन कर लेते हैं. एक पंजाबी फिल्मशेरा क्रैकके लिए गिरीश धमीजा के कहने पर उन्होंने मुझे चुना और खुद फोन किया. मैं उस समय सो रहा था. नींद में ही बोला, ‘कौन है यार, सो रहा हूं…’ उधर से आवाज आई, ‘मैं महेश भट्ट बोल रहा हूं. जब तुम सो रहे थे, तुम्हारी किस्मत जाग रही थी. उठ कर औफिस जाना.’ फोन रखते ही 5 मिनट बाद मुझे होश आया और मैं दौड़ पड़ा उन से मिलनेऔर मुझेशेरा क्रैकमिल गई.


आप का ‘द गांधी मर्डर केस’ फिल्म में इंटरनैशनल एक्टर्स के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
उस फिल्म में मुझे हौलीवुड के शानदार कलाकारों के साथ काम करने का मौका मिला, जिन में स्टीफन लैंग भी शामिल थे. साथ ही, ओम पुरी के साथ तकरीबन एक महीना बिताने का मौका मिला.


फिलहाल आप किन प्रोजैक्ट्स पर काम कर रहे हैं?
हाल ही मेंमेहंदी वाला घरऔरमेघा बरसेंगेसीरियल खत्म हुए हैं. इस के बाद वर्टिकल शोज की
एक लाइन सी लग गई हैअब तक मैं 6 सीरीज कर चुका हूं.इस समय मैं सन टीवी के बेहद हिट शोनंदिनी पार्ट 2 (राजनंदिनी)’ की शूटिंग कर रहा हूं, जो अप्रैल महीने तक वडोदरा में चलेगी. इस में मैं भास्कर का मेन नैगेटिव किरदार निभा रहा हूं. एक ऐसा इनसान, जो 2 अलगअलग रूपों में जी रहा है.


सोशल मीडिया को आप कैसे देखते हैं?
अगर सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल किया जाए, तो यह बहुत पौजिटिव टूल है, लेकिन इस की एक लिमिट तय होनी चाहिए वरना यह समय भी खराब कर सकता है. आज इस के अच्छे और बुरे दोनों तरह के असर देखने को मिलते हैं.                                            

जानलेवा फर्जी डाक्टरों का जाल : बच कर रहें

हरियाणा के फरीदाबाद जिले में एक 12वीं पास नौजवान क्लिनिक खोल कर बच्चों की जान से खेल रहा था. इलाज के नाम पर वह झोलाछाप डाक्टर आरोपी बच्चों को स्टेरौयड दे रहा था. आरोपी ने कबूलनामे में बताया कि उस ने निजी अस्पतालों में काम करने के दौरान डाक्टरों से थोड़ाबहुत सीख कर होडल में अपना क्लिनिक खोल लिया था.

सोमवार, 13 मार्च, 2023 को फरीदाबाद की सीएम फ्लाइंग स्क्वाड ने बस स्टैंड के पास चल रहे उस क्लिनिक में छापेमारी कर फर्जी डाक्टर अमर सिंह को गिरफ्तार किया और उस के पास से भारी मात्रा में दवाएं भी बरामद कीं.

क्लिनिक में टीम के पहुंचते ही अमर सिंह से उस की डिगरी और दूसरे दस्तावेज मांगे गए तो उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. टीम और लोकल पुलिस ने फर्जी रजिस्ट्रेशन इस्तेमाल करने और दूसरी दवाएं अपने पास रखने के मामले में आरोपी अमर सिंह को गिरफ्तार कर लिया.

सीएम फ्लाइंग के डीएसपी राजेश चेची ने बताया कि इस क्लिनिक के बारे में कई बार शिकायत मिली थी. पुलिस ने पलवल सिविल अस्पताल के मैडिकल अफसर डाक्टर अक्षय जैन, ड्रग कंट्रोल अफसर, फरीदाबाद डाक्टर संदीप गहलान के साथ मिल कर यह छापेमारी की.

ड्रग कंट्रोल अफसर के मुताबिक, इस क्लिनिक में दवा के नाम पर छोटे बच्चों को स्टेरौयड दिए जा रहे थे, जो एक बार तो मरीज को ठीक कर देते हैं, लेकिन बाद में शरीर को काफी नुकसान पहुंचाते हैं. जांच के दौरान क्लिनिक के बाहर लगे बोर्ड पर ‘राहुल क्लिनिक नवजात शिशु एवं बाल रोग विशेषज्ञ’ के अलावा रजिस्ट्रेशन नंबर भी लिखा मिला.

पकड़े गए फर्जी डाक्टर अमर सिंह ने फ्लाइंग टीम को बताया कि वह 12वीं जमात तक पढ़ा है. उस ने पलवल में बच्चों के अस्पताल में काफी दिन तक काम किया था. इस के बाद उस ने अपना क्लिनिक खोल दिया.

पूरे भारत में ऐसे फर्जी डाक्टरों की कमी नहीं है, जो दिनदहाड़े प्रशासन की नाक के नीचे अपने गैरकानूनी क्लिनिक चला रहे हैं और जब कोई ‘डाक्टर’ बड़ा कांड कर देता है, तो हड़कंप मच जाता है, पर यह सब कुछ दिनों तक ही हलचल मचाता है और फिर सब नौर्मल हो जाता है.

क्या कहता है नर्सिंग होम ऐक्ट

नर्सिंग होम ऐक्ट के मुताबिक, परची या क्लिनिक के बोर्ड पर रजिस्ट्रेशन नंबर नहीं लिखना ऐक्ट का उल्लंघन है. पहली बार इस तरह की गलती मिलने पर 500 से 50,000 रुपए तक का जुर्माना हो सकता है.

बीएएमएस डिगरीधारी को नाम के आगे ‘आयुर्वेदाचार्य’ लिखना चाहिए. वह ‘डाक्टर’ शब्द नहीं लिख सकता. चिकित्सा शिक्षा संस्थान नियंत्रण अधिनियम 1973, 7 (ग) के तहत ‘डाक्टर’ शब्द का इस्तेमाल रजिस्टर्ड मैडिकल प्रैक्टिशनर ही कर सकता है. इस नियम का उल्लंघन पर 50,000 रुपए का जुर्माना व 3 साल तक की सजा हो सकती है.

उत्तराखंड में हुई हद

इस साल के जनवरी महीने में उत्तराखंड राज्य पुलिस की स्पैशल टास्क फोर्स ने 2 ऐसे बीएएमएस डाक्टरों को पकड़ा था, जो जाली डिगरियों के बलबूते आम लोगों की जान से खिलवाड़ कर रहे थे. इसी तरह के राज्य में 36 दूसरे फर्जी डाक्टरों की निशानदेही की गई थी.

इन ज्यादातर फर्जी आयुर्वेदिक डाक्टरों की डिगरी राजीव गांधी हैल्थ ऐंड साइंस यूर्निवसिटी कर्नाटका की पाई गई, जो पूरी तरह से फर्जी निकलीं. इन्हें बाबा ग्रुप औफ कालेज मुजफ्फरनगर के मालिक इमरान और इमलाख द्वारा तैयार कराया गया था. 10 जनवरी, 2023 को स्पैशल टास्क फोर्स देहरादून की एक टीम द्वारा आयुर्वेदिक डाक्टर प्रीतम सिंह और मनीष को गिरफ्तार किया गया था.

आरोपियों से की गई पूछताछ में पता चला कि उन्हें जो बीएएमएस की फर्जी डिगरी दी गई थी, वह उन्होंने काफी पैसे दे कर बाबा ग्रुप औफ कालेज मुजफ्फरनगर के मालिक और चेयरमैन इमलाख और इमरान से हासिल की थी. वे दोनों मुजफ्फरनगर के रहने वाले हैं. इमलाख के बारे में जानकारी जुटाई गई तो वह कोतवाली मुजफ्फरनगर का कुख्यात हिस्ट्रीशीटर निकला. उसे उत्तर प्रदेश का सब से बड़ा ‘शिक्षा माफिया’ कहा जाता है.

स्पैशल टास्क फोर्स की जांच में तकरीबन 36 फर्जी आयुर्वेदिक डाक्टरों के साथसाथ इस गिरोह के संचालक इमरान और इमलाख के खिलाफ धारा 19/23, धारा 420, 467, 468, 471, 120 बी के तहत मुकदमा दर्ज किया गया.

बाद में इमलाख के खुलासे पर पुलिस ने 3 सरकारी मुलाजिमों को गिरफ्तार किया. ये आरोपी पैसे ले कर फर्जी वैरिफिकेशन कर डिगरी जारी करने में इमलाख की मदद करते थे. इस के बदले उन्हें मोटी रकम मिलती थी.

पिछले साल सितंबर महीने में हरियाणा में गुरुग्राम के एक गांव अलियर में सड़क किनारे एक लाश मिली थी. जब मामला खुला तो पता चला कि उस गांव के एक पीजी में रहने वाले 20 साल के लीलाधर की मौत गांव में ही चल रहे एक क्लिनिक में इलाज के दौरान हुई थी. लीलाधर को बुखार था, जिस के इलाज के लिए वह 26 सितंबर, 2022 की शाम इस क्लिनिक में गया था.

क्लिनिक के संचालक डाक्टर फईम ने मरीज का इलाज सही से नहीं किया और लीलाधर की मौत हो गई. यह बात किसी को पता न चले, इसलिए आरोपी डाक्टर ने अपने एक मुलाजिम के साथ मिल कर लाश को सड़क किनारे फेंक दिया.

इस मामले की तह में पहुंच कर पुलिस ने बताया कि डाक्टर फईम मूल रूप से उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के गांव मुंडा का रहने वाला था और उस के पास से डाक्टर की कोई डिगरी नहीं थी. वह फर्जी तरीके से क्लिनिक चलाता था.

सही कहें तो देशभर में ऐसे फर्जी डाक्टरों का जाल बिछा है, जो कईकई साल से अपने दड़बेनुमा क्लिनिकों में इलाज के नाम पर लोगों की जान से खेल रहे हैं. सरकारें उन के बारे में जानती हैं, पर आंख मूंद कर रखती हैं. जब इमलाख जैसे बड़े जालसाज पकड़े जाते हैं तो कुछ दिन सुर्खियां बनती हैं, पर बाद में फिर किसी फर्जी डाक्टर के क्लिनिक के आगे गरीब बीमार जनता की लाइन लग जाती है. देश के ‘अमृतकाल’ में फर्जी डाक्टरों की डोज किसी जहर से कम नहीं है.

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