Hindi Family Story : पिता का फर्ज

Hindi Family Story . ‘‘देखो मम्मीजी, अब मेरा तो यही पीहर है और यही ससुराल. आप के भरोसे मैं अपना सबकुछ छोड़ कर आ गई,’’ पायल ने अपनी सास से कहा.

‘‘देखो बेटी, तुम ने और कृष्ण ने किया तो अच्छा नहीं… मांबाप की इजाजत के बिना तुम दोनों ने कोर्ट में शादी कर ली… कृष्ण ने भी कानोंकान खबर नहीं होने दी. अब तुम्हारे घर वाले आ धमके तो… मुझे तो बहुत डर लग रहा है,’’ कलावती ने चिंता जाहिर करते हुए कहा.

दरअसल, पायल और कृष्ण एकदूसरे से बहुत प्यार करते थे. जब पायल के पिता रामकिशोर ने इस शादी से इनकार कर दिया, तब पायल को यह कदम उठाना पड़ा. उस का यह कदम तकरीबन 30 साल की उम्र में उठा, जब उसे पीएचडी में दाखिला मिल गया.

रामकिशोर को जब यह पता लगा कि उन की बेटी पायल ने उन की मरजी के खिलाफ शादी कर ली, तो वे तिलमिला उठे, ‘‘ईंट से ईंट बजा दूंगा… उस लड़के के घर वालों से,’’ रामकिशोर ने उबलते हुए कहा.

‘‘शांति से काम लो… लड़का गैरबिरादरी का थोड़ी है, जो आप इतना गुस्सा कर रहे हो,’’ पत्नी कमला ने समझाते हुए कहा.

‘‘तुम चुप रहो… तुम्हारा ही तो कियाधरा है… एक जवान बेटी पर नजर भी नहीं रख सकीं,’’ रामकिशोर ने आगबबूला होते हुए कहा.

‘‘वह तो मेरा भगवान जानता है कि मैं ने नजर नहीं रखी या आप ने बाप का…’’ कमला आगे कुछ कहतीं, उस से पहले रामकिशोर ने चिल्लाते हुए जवाब दिया, ‘‘चुप होती है या…’’

‘‘मारो… मारो मुझे… हाय पैसा… हाय धन के चक्कर में घरपरिवार की तरफ ध्यान ही नहीं दिया,’’ कमला ने रोते हुए कहा.

उन दोनों की आवाजें सुन कर आसपड़ोस के लोग आ गए.

‘‘देखो वर्माजी… इस पायल की बच्ची ने मेरी नाक कटवा दी,’’ अपने पड़ोसी वर्माजी को देखते हुए भर्राई आवाज में रामकिशोर बोले.

‘‘तसल्ली रखो रामकिशोर… आप थाने में क्यों नहीं रिपोर्ट लिखवाते हैं उस बदमाश के खिलाफ जो आप की बेटी को बहलाफुसला कर ले गया है,’’ वर्माजी ने वकील वाली सलाह दी. वे पेशे से वकील जो थे.

‘‘आप ही कुछ मदद करो वर्माजी. लाइसैंस बनवाने की दलाली के सिवा मैं ने जिंदगी में कुछ किया ही नहीं,’’ रामकिशोर ने जवाब दिया.

वर्माजी अपने पड़ोसी रामकिशोर को ले कर थाने पहुंचे.

थानेदार ने पूरी कहानी सुनने के बाद कहा, ‘‘देखो रामकिशोर बाबू, आप की लड़की बालिग है. उस ने जो किया है वह कानून के दायरे में रह कर किया है, फिर भी आप की तसल्ली के लिए हम तीनों लड़के के घर चलते हैं. हो सकता है कि हमारी समझाइश की वजह से वह घर लौट आए.’’

‘‘जी थानेदारजी… आप की राय बिलकुल ठीक है. चलिए, अभी चलते हैं वरना मुट्ठी से रेत फिसलता जा रहा है,’’ रामकिशोर ने कहा.

थानेदार अपनी जीप में सवार हो कर रामकिशोर और एडवोकेट वर्माजी को ले कर लड़के के घर पहुंचे.

साधारण सा घर था. घर के आंगन को देख कर लग रहा था कि यह एक संयुक्त परिवार था.

कृष्ण के 3 बड़े भाई और बुजुर्ग मातापिता घर में मौजूद थे. घर की चहलपहल बता रही थी कि उस के तीनों भाई शादीशुदा थे. उन के बालबच्चे भी आंगन में खेलकूद रहे थे.

थानेदार को घर आया देख कृष्ण के पिता ने पूछा, ‘‘कहिए थानेदार साहब, कैसे हमारे गरीबखाने पर आना हुआ आप का?’’

‘‘अरे, पटवारीजी आप… यह आप का घर है?’’ थानेदार ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘अरे भाई, रिटायर्ड पटवारी का घर तो ऐसा ही होता है. और जब आप वैशालीनगर में तैनात थे, तब आप के हलके से ही रिटायर हुए थे,’’ बुजुर्ग पटवारी ने कहा.

दरअसल, कृष्ण के पिता रिटायर्ड पटवारी थे, जिन्हें थानेदार साहब पहचानते थे.

‘‘देखो पटवारीजी, आप की सज्जनता और ईमानदारी का तो मैं कायल हूं और आप की इज्जत करता हूं, लेकिन आप के लड़के ने इन की लड़की भगा कर जो गलत हरकत की है, वह बहुत गलत है,’’ थानेदार ने कुरसी पर बैठते हुए कहा.

थानेदार की बात का पटवारी या उन के परिवार के बाकी सदस्य अपनी सफाई में कुछ कहते उस से पहले पायल सिर पर दुपट्टा डाले कमरे से बाहर आई और बोली, ‘‘थानेदार अंकल, गलत काम न पटवारीजी के लड़के कृष्ण यानी मेरे पति ने किया है और न मैं ने. मुझे किसी ने भगाया नहीं है और न मैं भाग कर आई हूं. कोर्ट में शादी कर के अपनी ससुराल अपनी मरजी से आई हूं.’’

यह सुन कर थानेदार साहब और एडवोकेट वर्माजी के चेहरे पर अंदेशे का कोहरा छंट चुका था.

‘‘बेटी, हम यहां किसी को गिरफ्तार करने नहीं, बल्कि सच्चाई जानने के लिए आए हैं. यह बात अपने पिताजी से कहो,’’ वर्माजी ने कहा.

‘‘देखो वर्मा अंकल, आप तो पिताजी के पुराने परिचित हैं. मैं अपने पिताजी से चंद सवाल पूछती हूं. अगर ये एक का भी जवाब सही दे देंगे तो मैं अभी आप के साथ इस घर को छोड़ कर चल दूंगी,’’ पायल ने कहा.

रामकिशोर चुपचाप बैठे रहे. उन्होंने कोई रिएक्शन नहीं दिया.

‘‘पूछो बेटी, तुम्हें क्या पूछना है?’’ थानेदार ने कहा.

‘‘अंकल, मेरे पिता से पूछिए कि मैं कौन से कालेज में पढ़ रही हूं या कौन सी पढ़ाई कर रही हूं?’’ पायल ने पहला शब्दबाण छोड़ा.

रामकिशोर बगलें झांकने लगे.

‘‘जवाब दो… रामकिशोरजी,’’ वर्माजी कहा. रामकिशोर जवाब तो तब देते, जब उन्हें पता होता.

‘‘मेरा दूसरा सवाल… इन्होंने कभी अपनी जवान बेटी से पूछा कि वह कैसे और किस के साथ कालेज आतीजाती हैं या कभी बसआटोरिकशा का किराया दिया?’’ पायल ने फायर किया.

‘‘हां भई रामकिशोर बाबू, बताओ जो यह आप की बेटी पूछ रही है,’’ थानेदारजी ने कहा.

रामकिशोर इधरउधर की बातें करने लगे, लेकिन उन के पास पायल की सवाल का कोई जवाब नहीं था.

‘‘थानेदार अंकल और वर्मा अंकल, मैं एक आखिरी सवाल और पूछ रही हूं. शायद पापा इस का जवाब दे सकें,’’ पायल ने कहा.

‘‘पूछो बेटी,’’ थानेदार ने बड़ी नरमी से कहा.

‘‘पिछले 4 सालों से इन्होंने मुझे किताबेंकौपियां खरीदने या स्कूलकालेज की फीस के पैसे दिए?’’  पायल ने फिर एक ऐसा सवाल पूछा जिस का एक बाप से जवाब मिलना ही चाहिए था.

‘‘मैं तो सारे पैसे इस की मम्मी को ही दे देता था. वह देती होगी इस को,’’ रामकिशोर ने अब कुछ कहा.

‘‘दे देती होगी… वाह रामकिशोर वाह, क्या जवाब दिया है आप ने,’’ थानेदार ने रामकिशोर पर तंज कसते हुए कहा.

‘‘थानेदार अंकल, मैं 24 साल की हूं और एक प्राइवेट कालेज से पीजी कर रही हूं. पिछले 5 साल से मेरे पति कृष्ण मेरा खर्चा उठा रहे हैं और इन की वजह से ही मैं इतना पढ़ पाई. मैं कपड़े कहां से लाती रही. एक लड़की की जरूरतें क्या होती हैं, मेरे पिताजी ने आज तक कभी नहीं पूछा.

‘‘और आज ये पिताजी होने का दावा करने यहां आए हैं,’’ पायल ने बिलकुल सहीसही कहा.

रामकिशोर की आंखें नम हो चुकी थीं. उन के पास पायल के सवालों का कोई जवाब नहीं था.

थानेदारजी और वर्माजी भी खामोश बैठे थे. उन्होंने कृष्ण की पीठ थपथपाते हुए कहा, ‘‘बेटा, यह पायल तुम्हारी है. इसे हमेशा खुश रखना.’’

रामकिशोर ने भावुक होते हुए कहा, ‘‘बेटी, तुम सच कह रही हो. मैं ने कभी एक पिता का फर्ज पूरा नहीं किया. लेकिन अब मुझे अपना एक फर्ज निभाने दो.’’

पायल ने रजामंदी दी.

‘‘मैं तुम्हारी शादी अपने रीतिरिवाजों से बड़ी धूमधाम से करना चाहता हूं,’’ रामकिशोर ने कहा.

पटवारीजी ने बीच में बोल पड़े, ‘‘लेकिन मेरी एक शर्त है.’’

यह सुन कर सब चौंक गए.

‘‘कहिए, आप की कौन सी शर्त है समधीजी?’’ रामकिशोर ने हाथ जोड़ते हुए पूछा.

‘‘शादी बिल्कुल साधारण तरीके से होगी. किसी तरह का कोई लेनदेन नहीं होगा,’’ पटवारीजी ने कहा.

एक पल के लिए खामोशी छा गई.

फिर वर्माजी और रामकिशोर ने एकस्वर में कहा, ‘‘पटवारीजी की शर्त हमें मंजूर है.’’

पायल अपने पिता के गले लग कर फूटफूट कर रो पड़ी. Hindi Family Story

– गोविंद भारद्वाज

Hindi Short Story : सांझ का बरगद

Hindi Short Story. गांव के बाहर एक पुराना बरगद का पेड़ था. उस की फैली शाखाएं दूरदूर तक छाया देती थीं. लोग कहते थे कि वह बरगद जितना पुराना है, उतनी ही पुरानी उस की कहानियां हैं.

उसी बरगद की ही तरह थे रामनारायणजी. 70 साल की उम्र में भी उन का दबदबा पूरे कसबे में था. लोग इज्जत से उन्हें ‘मास्टर साहब’ कहते थे. उन्होंने जिंदगीभर स्कूल में बच्चों को पढ़ाया था. पत्नी सरला के न रहने के बाद उन का संसार केवल एक इनसान तक सिमट गया था, उन की बेटी सृष्टि.

सृष्टि जब 5 साल की थी, तभी उस की मां चल बसी थीं. रामनारायणजी ने दूसरी शादी नहीं की. उन्होंने अपनी जिंदगी की हर इच्छा, हर शौक और हर सपना बेटी के लिए त्याग दिया. वे उस के लिए पिता भी बने, मां भी बने और दोस्त भी.

सृष्टि बड़ी हुई. वह पढ़ने में तेज थी. शहर की यूनिवर्सिटी में प्रोफैसर बन गई. वहीं उस की मुलाकात अभिषेक से हुई.

अभिषेक शांत स्वभाव का नौजवान था. दोनों ने ब्याह कर लिया. शादी के बाद सृष्टि शहर में बसना चाहती थी, लेकिन रामनारायणजी अकेले थे.

‘‘बेटा, मैं तुम्हें रोकना तो नहीं चाहता…’’ रामनारायणजी ने कहा, ‘‘लेकिन इस घर की दीवारें तुम्हारे बिना बहुत खाली हो जाएंगी.’’

सृष्टि रुक गई. अभिषेक ने भी कुछ नहीं कहा. वह जानता था कि सृष्टि अपने पिता से बेहद प्रेम करती है.

धीरेधीरे साल बीतते गए. घर में 2 बच्चे भी हो गए, आरव और अन्वी.

पर एक विचित्र बात होने लगी. घर में हर फैसले का केंद्र रामनारायणजी होते. बच्चे किस स्कूल में पढ़ेंगे? कहां घूमने जाएंगे? कौन सी कार खरीदी जाएगी? यहां तक कि सृष्टि कौन सा रिसर्च सब्जैक्ट चुनेगी? हर बात में आखिरी फैसला उन का होता.

रामनारायणजी कभी आदेश नहीं देते थे. बस कहते, ‘‘मैं तो तुम्हारे भले के लिए कह रहा हूं.’’

यह सुन कर सृष्टि चुप हो जाती और अभिषेक भी.

एक दिन यूनिवर्सिटी से सृष्टि को विदेश में 2 साल के रिसर्च कार्यक्रम का प्रस्ताव मिला. यह उस की जिंदगी का सब से बड़ा मौका था. वह खुशी से भर उठी.

रात को सृष्टि ने सब से पहले अपने पिता को बताया. रामनारायणजी कुछ देर चुप रहे, फिर मुसकराए और बोले, ‘‘बहुत अच्छा है,’’ लेकिन उन की आंखों की नमी सृष्टि से छिपी नहीं.

अगले कई दिनों तक रामनारायणजी कुछ उदास रहने लगे. खाना कम खाने लगे. बच्चों के साथ भी कम बोलते.

सृष्टि बेचैन हो उठी. एक शाम उस ने कहा, ‘‘मैं मना कर देती हूं पापा.’’

रामनारायणजी ने तुरंत सिर उठाया, ‘‘नहीं बेटा, मैं तुम्हारे रास्ते में क्यों आऊंगा?’’ पर उन की आवाज कांप रही थी.

सृष्टि समझ  गई और उस ने प्रस्ताव ठुकरा दिया.

उस रात अभिषेक बहुत देर तक छत पर अकेला बैठा रहा. पहली बार उस के भीतर कुछ टूट सा गया था.

कुछ महीनों बाद आरव के स्कूल में एक नाटक हुआ. विषय था ‘पिंजरे का सब से सुंदर पक्षी’.

नाटक में एक बच्चा पक्षी बनता है जिसे उस का मालिक बहुत प्यार करता है. उसे सब से अच्छा खाना देता है. सोने का पिंजरा देता है. हर खतरे से बचाता है, लेकिन उड़ने नहीं देता.

आखिर में पक्षी कहता है, ‘‘मुझे तुम से शिकायत नहीं है. बस इतना दुख है कि तुम ने मेरे पंखों पर भरोसा नहीं किया.’’

नाटक खत्म हुआ. पूरा हाल तालियों से गूंज उठा, लेकिन रामनारायणजी के चेहरे का रंग बदल गया था. वे एकटक मंच की ओर देख रहे थे, जैसे कोई पुराना आईना अचानक सामने आ गया हो.

उस रात रामनारायणजी बहुत देर तक जागते रहे. सरला की तसवीर सामने रखी थी. वे धीरे से बोले, ‘‘मैं ने तुम्हारी बेटी को संभालतेसंभालते शायद उसे उड़ना ही नहीं सिखाया,’’ उन की आंखें भर आईं.

अगली सुबह रामनारायणजी ने सृष्टि को बुलाया, ‘‘बेटा, क्या वह रिसर्च कार्यक्रम फिर से मिल सकता है?’’

सृष्टि चौंक गई, ‘‘शायद हां पापा.’’

रामनारायणजी ने सृष्टि का हाथ पकड़ लिया और कहा, ‘‘तो अप्लाई कर दो.’’

‘‘लेकिन आप अकेले…’’ ‘‘नहीं…’’ रामनारायणजी ने बीच में ही रोक दिया, ‘‘पेड़ का काम छाया देना है, जड़ों से बांधना नहीं.’’

सृष्टि की आंखें नम हो गईं. सालों बाद उसे लगा कि उस के कंधों से कोई अदृश्य भार उतर रहा है.

6 महीने बाद सृष्टि विदेश चली गई. अभिषेक और बच्चे भी उस के साथ थे.

एयरपोर्ट पर विदा करते समय रामनारायणजी मुसकरा रहे थे. इस बार उन की आंखों में आंसू थे, पर अपराधबोध नहीं, बल्कि गर्व था.

हवाईजहाज आसमान में उड़ गया. रामनारायणजी देर तक उसे देखते रहे, फिर धीमे से बोले, ‘‘अब समझा हूं सरला, प्रेम पकड़ना नहीं होता. प्रेम तो वह साहस है, जिस में हम अपने प्रियजनों को उन की दिशा में उड़ने देते हैं.’’

बरगद की शाखाओं पर बैठे पक्षी उसी समय उड़ान भर रहे थे. और पहली बार मास्टर साहब को उन की उड़ान सुंदर लगी, अकेलापन नहीं. Hindi Short Story

-मुकेश कुमार बिस्सा

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