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Story in Hindi : बी प्रैक्टिकल – प्रमोशन के लिए क्या करना पड़ा

Story in Hindi. बीके सिंह ईस्ट ऐंड वैस्ट कंपनी में काम करते हैं. वे जन्मजात प्रैक्टिकल आदमी हैं. कायदे से उन के जैसे काबिल आदमी का प्रमोशन हो जाना चाहिए. वह भी तब, जब जोनल मैनेजर अपनी जाति का हो. लेकिन जुगाड़ बैठ नहीं रहा है.

दरअसल, बीके सिंह का मुकाबला एक दूसरे प्रैक्टिकल आदमी से है. दूसरा यानी केपी पांडे. वे चतुर तो हैं ही, बैकग्राउंड से मजबूत भी हैं. वे 10-20 हजार रुपए यों ही खर्च कर सकते हैं.

यह तो खतरे की घंटी है. सावधान हो गए बीके सिंह. उन को गिरने से पहले ही संभलने की आदत है. मन ही मन उन्होंने एक ऐसी चाल सोची, जिस की काट केपी पांडे के पास नहीं थी.

केपी पांडे विधुर हैं और बीके सिंह एक खूबसूरत पत्नी के पति. बीके सिंह की किस्मत से जलने वालों में जोनल मैनेजर भी थे. जोनल मैनेजर ने शादियां तो की थीं 3, पर 2 स्वर्ग सिधार गईं, एक ने तलाक दे दिया.

अरबपति आदमी पति न हो, तो लड़कियां चिंतित हो जाती हैं. जोनल मैनेजर की चिंता करने वालियों की भी कमी नहीं थी. यह चिंतन शिविर उन की टपकती हुई लार को धार बना रहा था.

एक दिन बीके सिंह ने अपनी पत्नी सुलोचना को कह ही दिया, ‘‘सोच रहा हूं कि बौस को किसी दिन डिनर पर बुला लूं. कैसा रहेगा?’’

‘‘कौन से बौस को? तुम्हारे तो कई बौस हैं. अभी तो बौस शायद खन्ना हैं, जिन से तुम्हारी बिलकुल नहीं बनती.’’

बात को काटते हुए बीके सिंह ने कहा, ‘‘जोनल मैनेजर को बुलाने की सोच रहा हूं. वे कई बार कह चुके हैं कि घर के खाने का मजा ही कुछ और है. बेचारे विधुर जिंदगी जी रहे हैं.’’

‘‘क्यों… हैट्रिक तो वे लगा ही चुके हैं. अब उन्हें क्या परेशानी है? वे एक और ले आएं.’’

बातचीत से यह अंदाजा तो लग ही जाता है कि सुलोचना उन पत्नियों में से नहीं हैं, जो केवल ‘जी हां’ कहती हैं. वह वकालत में ग्रेजुएट थी. प्रैक्टिस शुरू नहीं की थी. उसे अपने पति के पैतरे पसंद नहीं थे.

उसे जो बात पसंद नहीं आती, साफसाफ कहना पसंद करती थी. यह सच बीके सिंह पर भी शादी के सालभर के अंदर ही सामने आ चुका था.

बीके सिंह ने बच्चे पैदा करने की योजना पर बात करने की कोशिश की, तो सुलोचना ने साफ मना कर दिया. उस का मानना था कि पहले एकदूसरे को जान तो लें कि बच्चे पाल भी सकेंगे या नहीं. कम से कम 2 साल तो पूरे हो जाने दो.

बीके सिंह को अगर शाप देना आता, तो कमंडल से पानी ले कर सुलोचना को शाप दे देते, ‘ऐ दुष्ट बालिके, तू ने बाबा की आत्मा को कष्ट दिया है. जा, तू अनंतकाल तक मां नहीं बनेगी. पर ऐसा हो न सका.

‘‘मैं इस रविवार को ही उन्हें खाने पर बुला लेता हूं,’’ ऐसा कह कर बीके सिंह ने अपनी बात रखी.

सुलोचना ने भी ज्यादा बहस नहीं की, तो बीके सिंह ने उसे हां के रूप में लिया और रविवार को जोनल मैनेजर को डिनर पर बुला लाए.

जोनल मैनेजर हिंदी कविताओं के रसिया थे, साथ ही हनी सिंह के गानों के दीवाने भी.

डिनर सर्व कर रही सुलोचना को उन्होंने इशारा कर के बात बीके सिंह से कही, ‘‘हिंदी कविताओं में तो एक ही कवि हुए सुमित्रानंदन पंत… बाले तेरे रूपजाल में कैसे उलझा दूं लोचन. उन के बाद के कवि तो रोते रह गए. उस के बाद भी एक कवि और हो गए. नाम याद नहीं आ रहा. उन की कविता है, ‘अगर मैं ने किसी के होंठ चूमे, अगर मैं ने किसी की मदभरी अंगड़ाइयां चूमीं. महज इस से किसी का पुण्य, मुझ पर पाप कैसे बन गया?’ वाह… वाह… इसे कहते हैं कविता.’’

जोनल मैनेजर को पता था कि यहां कविताएं उन के अलावा किसी और को नहीं आतीं. जो पढ़ेंगे, वह सही ही होगी. वैसे भी बौस जो करते हैं, सही करते हैं. हुआ भी यही. सुलोचना मटन का डोंगा रख कर जा चुकी थी.

सुलोचना के चले जाने से जोनल मैनेजर साहब नाराज हो रहे थे. उन्होंने घूर कर बीके सिंह को देखा.

बीके सिंह प्रैक्टिकल आदमी थे. तुरंत वे बात की तह तक पहुंच गए. सुलोचना को आवाज दी, ‘‘अरे, जरा दही लाना.’’

सुलोचना दही ले कर आई. जोनल मैनेजर साहब ने हनी सिंह की चर्चा छेड़ दी, ‘‘दुनिया में जीना कितना मुश्किल

है. देखो बेचारे हनी सिंह को. उस पर बारबार बेहूदगी फैलाने के आरोप लगा दिए जाते हैं. वह तो गायक है. कलाकार इन चीजों से परे होता है. मैं कहता हूं कि मर्दऔरत का संबंध तो सदियों से चला आ रहा सच है.’’

‘‘आदमी की सोच ही अब छोटी हो गई है सर. एक बच्ची नंगी पड़ी हो, तो भी हमें बेहूदगी नजर नहीं आती है, क्योंकि हम उसे औरत की नजर से नहीं देखते. सोच का ही सारा खेल है,’’ बीके सिंह ने कहा.

जोनल मैनेजर साहब खुश हो रहे थे कि बात की दिशा बिलकुल सटीक जा रही है. बात को और पकड़ाने के लिए उन्होंने सीधे सुलोचना से कहा, ‘‘आप को भी साथ में डिनर कर लेना चाहिए था.’’

‘‘जी नहीं, मैं मांसाहारी नहीं हूं,’’ छोटा सा जवाब दे कर वह चुप हो गई.

जोनल मैनेजर साहब के गरम त पर दो बूंद पानी पड़ा. वे बीके सिंह से बोले, ‘यह गलत बात है सिंह. सुलोचना अगर मांसाहारी नहीं हैं, तो शाकाहारी खाना बनवा लेते. तीनों मिल कर खाना खाते.’’

जोनल मैनेजर साहब को पूरी उम्मीद थी कि सुलोचना अपना कीमती समय उन की झोली में डाल देगी, लेकिन वह तो वहां से जा चुकी थी.

जोनल मैनेजर ने जल्दीजल्दी खाना खत्म किया और कार में बैठ कर चले गए. जाते समय सुलोचना नमस्कार करने के लिए हाजिर हुई, लेकिन इस से उन का मन नहीं भरा.

जोनल मैनेजर साहब के जाते ही बीके सिंह की साढ़ेसाती शुरू हो गई. वह उलझ पड़े, ‘‘अगर 2 मिनट उन के पास बैठ जाती, तो क्या बिगड़ जाता. घर आया मेहमान है, थोड़ा प्रैक्टिकल होना पड़ता है. काम भागे तो नहीं जा रहे थे.’’

‘‘कहां बैठ जाती… उस की गोद में… देखा नहीं, कैसे घूर रहा था वह. तुम अपनी बातें अपने पास ही रखो. मुझे ये चोंचले पसंद नहीं हैं.’’

इस बात को अभी 5 दिन भी नहीं बीते थे कि जोनल मैनेजर साहब की लार बदस्तूर टपकने लगी. उन्होंने बीके सिंह को बुलाया. उस दिन के खाने की तारीफ की. सुलोचना के गुणों की तारीफ की. संस्कारों पर भाषण दिया. लगे हाथ यह कहना भी नहीं भूले कि अगले महीने गुप्ता रिटायर हो रहा है. उस की जगह ईस्ट जोन को एक ईमानदार और मेहनती सबमैनेजर चाहिए.

बीके सिंह ने इसे अपने लिए औफर समझा. उन्होंने अगले रविवार आने का जोनल मैनेजर साहब को न्योता दे दिया.

सुलोचना को इस बात से न तो पहले कोई परेशानी थी, न अब है. उस ने नौकरानी से कह दिया कि एक आदमी का खाना ज्यादा बनेगा.

नियत समय से एक घंटा पहले ही अपनी नीयत संभाले जोनल मैनेजर साहब तशरीफ ले आए. इस बार उन के पास गानों की सीडी के साथसाथ एक किताब भी थी ‘लोलिता’.

बीके सिंह मिठाई लाने अभीअभी मार्केट चले गए थे. उन्हें अंदाजा नहीं होगा कि साहब एक घंटा पहले ही घर आ जाएंगे.

जोनल मैनेजर साहब ने आते  सुलोचना के हाथ में वह किताब रखी और बोले, ‘‘यह पुस्तक वर्ल्ड फेम की है. लोलिता नाम की एक किशोरी की कहानी है. आम सोच का पाठक इस में सैक्स देखता है, लेकिन यह एक चिंतन है. आप इसे जरूर देखें. आप तो एक सुलझी हुई औरत हैं.’’

सुलोचना ने किताब ले तो ली, लेकिन उसे उन के सामने ही टेबिल पर रख कर अंदर कमरे में जा कर तकिए पर नया कवर चढ़ाने लगी.

जब सुलोचना पानी ले कर जोनल मैनेजर के पास आई, तो उन्होंने कहा, ‘‘आप इतनी खूबसूरत हैं… मौडलिंग वगैरह क्यों नहीं कर लेतीं?’’

इस पर सुलोचना ने जो कहा, उस की उम्मीद नहीं थी, ‘‘आप की उम्र इतनी ज्यादा हो गई है. आप किसी आश्रम में क्यों नहीं चले जाते?’’

जोनल मैनेजर साहब यह सुन कर सोचने लगे, ‘क्या यह बदनसीब नहीं जानती कि उन के पति की किस्मत उन के ही हाथों में कैद है? क्या इस अभागी को इस बात की भी जानकारी नहीं कि वे अगर खुश हो जाएं, तो उस की जिंदगी बना सकते हैं?’

अब जोनल मैनेजर साहब अपने असली रूप में आने लगे,  ‘‘आप मेरी बेइज्जती कर रही हैं. मैं ने आप की तारीफ की और आप मेरी बुराई कर रही हैं. यह शिष्टाचार नहीं है.’’

‘‘इस में बुराई वाली बात कहां से आ गई. बूढ़ा होना कोई गुनाह नहीं है. सभी लोग बूढ़े होते हैं. यह बेइज्जती कैसे हो गई? एक सचाई आप ने कही और एक सचाई मैं ने.

‘‘रही शिष्टाचार की बात, तो किसी सहकर्मी के घर उस की गैरहाजिरी में आना और उस की पत्नी को बेहूदा किताब भेंट करना क्या है? मैं तो कहती हूं कि समय के पहले आना भी अशिष्टता है.’’

‘‘तुम नहीं जानती कि किस से बात कर रही हो. मैं चाहूं तो एक क्षण में तुम्हारे पति को सड़क पर खड़ा कर सकता हूं.’’

‘‘और अगर मैं चाहूं, तो तुम्हें अटैंप्ट टू रेप के जुर्म में जेल भिजवा सकती हूं. मैं ने भी वकालत की डिगरी चोरी से हासिल नहीं की है.

‘‘जब तक कोर्ट में यह साबित होगा कि तुम ने मेरे साथ जिस्मानी संबंध बनाने की कोशिश की या नहीं, तब तक तुम्हारा मुंह पूरी तरह से काला हो चुका होगा. चुपचाप शांत बैठो और खाना पकने तक इंतजार करो.’’

जोनल मैनेजर साहब एकदम से दनदनाते हुए निकल जाना चाहते थे, लेकिन लग रहा था कि किसी ने सारी हवा निकाल दी हो. टांगें काम नहीं कर रही थीं. उन्हें बीके सिंह पर गुस्सा आ रहा था कि मनहूस कहां चला गया. अब तक उसे आ जाना चाहिए था. उस

को तो कलाकंद मिठाई लाने के लिए भेजा था, कोलकाता जाने को तो नहीं कहा था.

कलाकंद मिठाई का पैकेट लिए बीके सिंह आए तो देखा कि साहब किसी से फोन पर बात कर रहे हैं. उन्होंने बीके सिंह की ओर देखा भी नहीं और बोले, ‘‘आज का प्रोग्राम रहने दो, फिर कभी खा लेंगे. एक अर्जैंट फोन आ गया है…’’

बीके सिंह अभी बोलने के लिए उचित शब्द तलाश ही रहे थे कि साहब दनदनाते हुए निकल गए. भागते हुए बीके सिंह कार तक गए जरूर, लेकिन दरवाजा खोलने का भी मौका नहीं मिला.

अंदर आते ही बीके सिंह सुलोचना पर फुंफकारे, ‘‘तुम ने हमारे साहब की बेइज्जती की होगी. वह इतने गुस्से में क्यों थे?’’

सुलोचना, जो जोनल मैनेजर के जाने की खुशी मना रही थी, इस बेहूदा सवाल से झल्ला गई. उस ने कहा, ‘‘जोनल मैनेजर की बेइज्जती तो की ही, लेकिन उस के असली हकदार तुम हो. उस के कहने पर कलाकंद मिठाई लेने चले गए अकेली पत्नी को दांव पर लगा कर. बौस खुश हो गया, तो प्रमोशन हो जाएगा. क्यों?

‘‘तुम ने मुझे पहचाना ही नहीं आज तक, नहीं तो मुझे प्लेट में सजा कर पेश करने की हिम्मत नहीं दिखाते. अच्छा हुआ वह चला गया, नहीं तो चप्पल से खातिरदारी करती मैं उस की.’’

‘‘तुम समझती क्या हो अपनेआप को. बड़ा आदमी है, जरा हंसबोल लोगी, तो तुम्हारा यह रूप घिस नहीं जाएगा. वह अगले महीने मुझे ईस्ट जोन का सबमैनेजर बनाने वाला था. तुम ने सब गुड़गोबर कर दिया.’’

‘‘अपने बूते कुछ कर नहीं सकते, तो बीवी को ढाल बना लिया. मैं द्रौपदी

नहीं हूं कि दांव पर लगा दोगे और मैं कन्हैयाकन्हैया कर के रोने लगूंगी. मैं उस का मुंह नोच लूंगी. उस का भी और तुम्हारा भी. मुझे तो तुम्हारे चेहरे से घिन हो रही है.’’

बीके सिंह अभी इतने भी प्रैक्टिकल नहीं हुए थे कि बीवी की गालियां सुनने के बाद भी मुसकरा सकें. उन की नजर में जरा सा हंसबोल लेना गलत नहीं था. सभी करती हैं. यह जमाना ही कारोबार का है. जिस के पास जो बैस्ट है, दे रहा है. एक बार आदमी कामयाब हो जाए, तो कोई नहीं पूछता कि कामयाबी के सूत्र क्या थे?

सुलोचना थोड़ी पुराने खयालों की थी. वह अभी उतनी प्रैक्टिकल नहीं हुई थी. Story in Hindi

Social Issue: गरीब औरत कैसे पाए आजादी

Social Issue. सैलिब्रिटीज के बीच तलाक के मामले सुर्खियों में आते हैं और यहां दोनों पक्षों के बीच बराबरी नजर आती है. रितिक रोशन और सुजैन खान का मामला हो या आमिर खान और किरण राव का तलाक हो, इन में कहीं भी कोई विक्टिम नजर नहीं आता. दोनों ने अलग रहना तय किया और तलाक ले लिया.

कितना आसान लगता है न अलग होना? लेकिन मिडिल क्लास और गरीब तबके में ऐसा नहीं होता. यहां शादी और तलाक के मामले में औरत और मर्द के बीच कोई बराबरी ही नहीं है. शादी हो, गृहस्थी चलाना हो या तलाक का मामला हो, सिर्फ औरतें ही  झेलती हैं.

शादी औरतों की आजादी के खिलाफ एक मर्दवादी हथियार ही तो है. शादी के बंधन में कौन बंधता है? औरत ही न? मर्द तो आजाद ही रहता है. तलाक कहने में आसान लगता है,

लेकिन यह भी सिर्फ मर्दों के लिए ही आसान है. पहले के जमाने में मर्द जब चाहे अपनी पत्नी को छोड़ सकता था. उस पर कोई सामाजिक रुकावट नहीं थी. लेकिन औरतें ऐसा नहीं कर सकती थीं. पति नामर्द हो या बूढ़ा, औरत के लिए ‘परमेश्वर’ ही रहता था.

सब से बड़ी बात तो यह है कि

गरीब और मिडिल क्लास अपनी बच्चियों की कंडीशनिंग ही ऐसे करता है कि वे झेलने के गुर बचपन में ही सीख जाती हैं. ऐसे नहीं हंसना, ऊंची आवाज में नहीं बोलना, बिना इजाजत के कहीं नहीं जाना, सिर नीचे किए बड़ों की बातों को सुनते रहने, पति की सेवा करना यह सब बातें लड़कियों को बचपन से घुट्टी की तरह पिलाई जाती हैं.

ऐसी लड़की जब ससुराल जाती है तो उस के पीछे कोई सपोर्ट सिस्टम नहीं होता. लड़की की शादी होते ही मांबाप अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं. लड़की सुनती है, सहती है, घुटती है, मरती है लेकिन कुछ नहीं कर सकती. रास्ता ही नहीं होता. औप्शन के नाम पर मायका होता है, लेकिन यह मायका मुसीबत में कहीं नहीं होता. ऐसे में लड़की के पास बस एक ही रास्ता होता है कि वह घुटघुट कर जीना सीख ले.

सच कहें तो गरीब औरतों के लिए तलाक के बाद का रास्ता आसान नहीं है. बहुत सी औरतें मजबूरी में बुरे रिश्ते में रहती हैं, क्योंकि उन्हें रिश्ते से बाहर निकलना और भी मुश्किल लगता है. हालांकि, औरतों के लिए कानून लगातार मजबूत हुए हैं, लेकिन कमजोर औरतें आज भी इन कानूनों के दायरे से कोसों दूर खड़ी हैं.

नौकरी हासिल करने से ही बदलेंगे हालात

गरीबी में पैदा होने वाली औरतों की जिंदगी कभीकभी इतनी मुश्किल हो जाती है कि हर सुबह उठना एक संघर्ष लगता है. गरीबी की जंजीरें बांधती हैं और परेशानियां चारों तरफ से घेर लेती हैं, लेकिन यह भी सच है की लाखों औरतें इन हालात से गुजरती हैं और मजबूती से खड़ी होती हैं. हर औरत में वह ताकत होती है, जिस की बदौलत वह अपनी जिंदगी बदल सकती है और इस बदलाव की पहली सीढ़ी है नौकरी.

आज वह जमाना नहीं है जब औरतें सिर्फ घर में कैद रह कर जिंदगी बिता देती थीं. आज घर से बाहर निकलने, पढ़ाई करने और छोटीबड़ी जौब हासिल करने में कोई रुकावट नहीं है. हर औरत को सब से पहले एक नौकरी हासिल करनी चाहिए, चाहे वह छोटी हो या बड़ी या शुरुआती लैवल की हो, क्योंकि आज के जमाने में औरत का सैलरी से बड़ा कोई साथी नहीं है. औरतें रुपए की ताकत से बुरे हालात से जू?ा सकती हैं और अपनी जिंदगी को नई दिशा दे सकती हैं.

जो औरतें गरीबी और परेशानियों से घिरी हैं, वे सब से पहले खुद से पूछें कि क्या मैं घर बैठ कर चमत्कार का इंतजार कर रही हूं? नहीं. चमत्कार तुम्हारे हाथों में है. एक नौकरी ढूंढ़ो, चाहे वह किसी दुकान में सहायिका का काम हो, घरेलू काम हो, या छोटीमोटी फैक्टरी में वर्कर की जौब हो. शुरुआत में जौब छोटी भी हो तो कोई बात नहीं, शुरुआत माने रखती है.

हर बड़ी कामयाबी छोटे कदमों से शुरू होती है. अगर औरतें घर से बाहर निकल कर नौकरी करेंगी तो न सिर्फ पैसे आएंगे, बल्कि आत्मविश्वास भी बढ़ेगा. वह खुद को मजबूत महसूस करने लगेगी. कई औरतें ऐसी हैं, जिन्होंने सड़क पर चाय बेचने से शुरुआत की और आज अपना छोटामोटा बिजनैस चला रही हैं. मेहनत से ही वह दरवाजा खुलेगा जो आज बंद लग रहा है.

घर से निकलो, संघर्ष करो

घर की चारदीवारी में बैठ कर सपने देखना आसान है, लेकिन उन्हें हकीकत में बदलने के लिए बाहर निकलना पड़ता है. गरीबी और परेशानियां रोक सकती हैं लेकिन हौसला मजबूत हो तो जीत निश्चित है. घर से निकल कर नौकरी ढूंढ़ने का संघर्ष सब से पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. चाहे वह लोकल जौब सैंटर जाना हो, पड़ोसियों से पूछना हो या औनलाइन ऐप्स पर अप्लाई करना हो.

शुरुआत में रिजैक्शन मिलेंगे, थकान होगी, लेकिन हर नाकामी और मजबूत बनाएगी. जो औरतें घर से निकलना ही नहीं चाहती हैं, तो उन के हालात कैसे बदलेंगे?

सुलतानपुर के एक छोटे से गांव की सुजाता के 4 बच्चे थे. पति शराबी था वह जो कमाता सब दारू में उड़ा देता था. सुजाता की ससुराल में उस की कोई कद्र नहीं थी, क्योंकि वह पैसे से कमजोर थी.

एक दिन सुजाता अपने बच्चों को गांव में छोड़ कर नोएडा आ गई. वहां सुजाता की सहेली कशिश जौब करती थी. कशिश ने सुजाता को अपनी कंपनी में लेबर के काम में लगवा दिया.

शुरुआत में सुजाता को काफी दिक्कत हुई, लेकिन एक साल में ही वह अपनी लगन और मेहनत की बदौलत उसी कंपनी में सुपरवाइजर हो गई.

सुजाता ने फैक्टरी के नजदीक की एक कालोनी में एक फ्लोर किराए पर लिया और अपने बच्चों को भी नोएडा बुला लिया. आज उस के बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ रहे हैं.

ऐसी तमाम औरतें हैं जो गांव से शहर आईं, संघर्ष किया और आज अपने परिवार को संभाल रही हैं. संघर्ष ही सिखाएगा कि तुम कितनी काबिल हो. समय बुरा हो तो दुनिया में कोई साथ नहीं देता, लेकिन सैलरी हमेशा साथ देती है. औरत के लिए उस की तनख्वाह ही उस का सब से बड़ा साथी है. पहली सैलरी मिलने पर जो खुशी मिलेगी वह अनमोल है.

गरीबी में फंसी औरतें अकसर दूसरों पर निर्भर रहती हैं, लेकिन सैलरी उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करती है. कई औरतें बताती हैं कि उन की पहली जौब ने उन्हें इतनी ताकत दी कि वे कभी पीछे नहीं मुड़ीं. औरत के लिए सैलरी सिर्फ पैसे नहीं गरिमा और सम्मान है.

जब रुपए होते हैं, तो बुरे हालात डराते नहीं बल्कि जूझना सिखाते हैं. गरीबी में तो छोटीछोटी परेशानियां भी पहाड़ जैसी लगती हैं. बीमारी, बच्चों की फीस, घर का खर्च यह सब मुश्किल लगता है लेकिन अगर कोई नौकरी हो तो फिर बड़ी से बड़ी मुश्किल से लड़ना भी आसान हो जाता है. आज की परेशानियां कल की सफलता की कहानी बनेंगी. मेहनत बेकार नहीं जाएगी.

नौकरी हासिल करने का यह सफर आसान नहीं है, लेकिन नामुमकिन भी नहीं. औरतें गरीब हो सकती हैं, परेशान हो सकती हैं, लेकिन कभी कमजोर नहीं होती हैं. कमजोरी केवल सोच में होती है. एक बार इस कमजोरी को चुनौती मिल जाए तो यही कमजोरी ताकत बन जाती है.

जोरजुल्म से बाहर निकलना जरूरी

सीआरपीसी की धारा 125, हिंदू मैरिज एक्ट 1955, घरेलू हिंसा एक्ट, मुसलिम वुमन प्रोटैक्शन एक्ट जैसे तमाम कानून औरतों के साथ खड़े हैं, लेकिन कितनी औरतें हैं जो इन कानूनों तक पहुंच पाती हैं? कोई औरत तलाक के बाद पति से मासिक भरणपोषण मांग सकती है. औरत को यह मुआवजा मिलना पति की कमाई और बच्चों की जिम्मेदारी पर निर्भर करता है. कोर्ट अकसर अंतरिम मेंटेनेंस भी देता है, लेकिन गरीब औरतें इन कानूनों का इस्तेमाल नहीं कर पाती हैं.

घरेलू हिंसा एक्ट के तहत औरत को पति के घर में रहने का अधिकार है लेकिन कई मामलों में औरतें घर से निकाल दी जाती हैं और वह दरदर भटकने को मजबूर होती है.

गरीब औरतों के लिए सब से बड़ी समस्या यह है कि उन्हें अपने हकों के बारे में जानकारी ही नहीं होती. किसी औरत को कानून का रास्ता नजर भी आता है तो उस के पास कोई सपोर्ट सिस्टम नहीं होता. केस लड़ने के लिए वकील, कोर्ट फीस, समय और हिम्मत चाहिए गरीब औरतों के पास इनमें से कुछ नहीं होता.

कोई औरत किसी तरह कोर्ट में पहुंच भी जाए, तो पति इतना काबिल ही नहीं होता की वह भरणपोषण दे सके. ऐसे में मेंटेनेंस की रकम बहुत कम मिलती है या फिर पति अपनी गरीबी का रोना रो कर कोर्ट में हाथ खड़े कर देता है.

मिडिल क्लास औरत के सामने समाज का दबाव, मायके में बोझ बनने का डर और बच्चों की चिंता ये सब बातें होती हैँ जो उसे तलाक लेने से रोकती हैं. हालांकि कई राज्य सरकारों ने तलाकशुदा, विधवा या अकेली औरतों के लिए खास योजनाएं बनाई हैं, जिन से औरतों को मजबूत होने में मदद मिलती है.

राजस्थान और मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री एकल नारी सम्मान पैंशन योजना चलती है जिस में तलाकशुदा और विधवा औरतों को 1,000 से 3,000 तक की मासिक पैंशन दी जाती है. जिला लीगल सर्विसेज अथौरिटी से गरीब औरतों को मुफ्त वकील और कानूनी मदद मिलती है. ऐसी औरतों की मदद के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग और राज्य महिला आयोग बनाए गए हैं.

गरीब औरतों के लिए जब ससुराल और पति से रिश्ते खराब हो जाते हैं और कोई पारिवारिक या सामाजिक सपोर्ट नहीं होता तो उन के पास आखिरी रास्ता क्या बचता है?

‘‘तलाक का रास्ता कानूनी और सामाजिक चुनौतियों से भरा होता है, ऐसे में बहुत कम औरतें ही तलाक लेने की हिम्मत कर पाती हैं. हिंदू मैरिज एक्ट के तहत तलाक की याचिका दाखिल कर सकती हैं, लेकिन बिना पैसे या सपोर्ट के यह रास्ता आसान नहीं है, लेकिन इस के लिए कई सरकारी और गैरसरकारी संस्थाएं मदद कर सकती हैं.

अगर किसी औरत के पास वकील रखने के पैसे नहीं हैं, तो नैशनल लीगल सर्विसेज अथौरिटी या राज्य स्तर की लीगल सर्विसेज अथौरिटी के जरीए उन्हें मुफ्त कानूनी मदद मिल सकती है. यह औरतों को तलाक और मेंटेनेंस के मामलों में निचली अदालतो से ले कर सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी मदद करती है.

अगर आप पैसे के लिहाज से कमजोर हैं, तो आप इंडिजेंट सूट यानी गरीबी के आधार पर मुकदमा दाखिल कर सकती हैं, जहां कोर्ट फीस माफ होती है. साथ ही, लीगल सर्विसेज अथौरिटी एक्ट, 1987 के तहत महिलाओं को मुफ्त लीगल एड का अधिकार है.

तलाक के प्रोसैस के दौरान या बाद में, कोर्ट से मेंटेनेंस की मांग की जा सकती है, जो पति की आमदनी पर आधारित होता है. अगर बच्चे हैं, तो चाइल्ड सपोर्ट भी मिल सकता है. यह अंतरिम (अस्थायी) भी हो सकता है, जो मुकदमा चलते हुए मिलता रहता है.

नैशनल कमीशन फोर वुमन की हैल्पलाइन सातों दिन और 24 घंटे उपलब्ध है और घरेलू हिंसा, तलाक, इमोशनल सपोर्ट या कानूनी सलाह के लिए मदद करती है. पीडि़त औरतें पुलिस, अस्पताल या वन स्टौप सैंटर से कनैक्ट कर सकती हैं. 1091 या 7827170170 हैल्पलाइन नंबर पर लोकल एनसीडब्लू औफिस से संपर्क किया जा सकता है.

कोई भी औरत जो अपने बच्चों के साथ हो 181 या 1098 पर फोन कर के तत्काल मदद मांग सकती हैं. यहां औरत को शैल्टर भी मिल जाता है और तमाम तरह की मदद भी. इस के अलावा कई एनजीओ औरतों को शैल्टर, ट्रेनिंग और नौकरी के मौके मुहैया करवाती हैं. सेवियर फाउंडेशन जैसे संगठन दिल्ली में तलाकशुदा औरतों को पैसे से मदद, जिंदगी बेहतर करने के प्रोग्राम और समाज से लड़ने में मदद करते हैं.

‘सेरुड्स’ जैसी संस्थाएं अलग हुई औरतों को ट्रेनिंग देती हैं. कंप्यूटर, फैशन डिजाइन और ब्यूटीशियन जैसे कोर्स मुफ्त करवाती हैं और शैल्टर भी देती हैं, ताकि वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें.

यह भी सच है की तलाक के प्रोसैस में समय लगता है, कभीकभी सालोंसाल लग जाते हैं, लेकिन आपसी सहमति हो तो समय नहीं लगता. अगर पति सहमत नहीं, तो जुल्म करने या डेजर्शन जैसे ग्राउंड्स पर याचिका दाखिल की जा सकती है.

क्या ज्यादातर शादियों में गरीब औरतें झेल रही हैं और उन के लिए तलाक का रास्ता बेहद मुश्किल है? यह सवाल बहुत गहरा और दर्दनाक है. यह सिर्फ सवाल नहीं, बल्कि समाज की पीड़ा है. सच तो यह है कि भारत में अमीर और गरीब औरतों के लिए

तलाक के बाद के हालात में बहुत बड़ा फर्क है. अमीर घर की औरतों को इकोनौमिकल सपोर्ट, वकील और नई जिंदगी की शुरुआत करने की सुविधा मिल जाती है, जबकि गरीब या गांवदेहात की औरतों के लिए हालात बेहद मुश्किल हो जाते हैं.

इन तलाकशुदा औरतों को भाईबहन या पिता रखने को तैयार नहीं होते. अगर वे काम पर जाने लगे तो उन अकेली को किराए पर मकान नहीं मिलते. बच्चे हों तो उन्हें किस के पास छोड़ कर जाएं, यह परेशानी है.

इस का एक सादा सा उपाय है. अपने जैसी 4-5 तलाकशुदा, विधवा, या अकेली औरतें एकसाथ रहना शुरू कर दें. उन्हें आसानी से मकान भी मिल जाएगा और एकदूसरे के बल पर मर्दों की ताकती निगाहों का मुकाबला भी कर सकेंगी. खटपट होगी जो आम घरों की बहनों में होती है पर गर्ज की वजह से सब के हल निकल सकते हैं.

सब से बड़ी बात है कि खाली समय में सिर्फ मोबाइल से न चिपके रहें. जहां भी कुछ पढ़ने को मिले, नयापुराना अखबार, कोई किताब, कोई पत्रिका, उसे उठा लाएं और जरूर पढ़ें. पढ़ाई सब से बड़ा हथियार है अपने ही समाज से लड़ने का. Social Issue

Hindi Kahani: ये विघ्नकर्ता – शादी और रिश्तेदारों की आपत्तियां

Hindi Kahani. जो संबंध संसद का वाकआउट से है, वह देव उठने का शादियों से है. देव उठे नहीं कि बैंड बजे नहीं. खबर सुन कर घोडि़यां हिनहिनाने लगती हैं, उस से ज्यादा भाईबंधु हिनहिनाने लगते हैं. शहनाई क्या बजती है, वरवधू के मांबाप के दिलों की धड़कनें बजने लगती हैं. और जब तक सारा जमाना उन धड़कनों को सुन न ले, किसी को चैन नहीं पड़ता.

शादी में वास्तविक समस्याएं कम होती हैं. जो होती हैं, उन का वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता. शादी में समस्याएं उत्पन्न की जाती हैं. विघ्न पड़ने के बाद ही कोई शादी निर्विघ्न संपन्न होती हैं. शादी वाले घरों में हर चेहरा तनाव से ढोलक की तरह तना हुआ होना चाहिए, वरना कई संशय खड़े हो जाते हैं. खासकर लड़की वालों के चेहरे जरा भी ढीले नहीं पड़ने चाहिए, ताकि लड़के वाले जब चाहे उन्हें बजा सकें और उस से उत्पन्न होने वाली गूंज से अपना उठा हुआ ईगो शांत कर सकें.

वैसे, समस्या की शुरुआत तभी हो जाती है जब पहली बार लड़के या लड़की वाले देखने आते हैं. आसपड़ोस, निकटस्थ लोगों के कान एंटीना की तरह 4 इंच लंबे हो कर घर की तरफ मुड़ जाते हैं, यह संकेत पकड़ने के लिए कि रिश्ता पक्का हुआ या नहीं. बिना सैटेलाइट ही ये सूक्ष्म संकेत सूत्र पकड़ लेते हैं कि क्याक्या खामियां निकाल गए हैं, डिमांड क्या रखी है. अलबत्ता तो इन की कृपा से रिश्ता पक्का होता नहीं, क्योंकि विवाह योग्य लड़केलड़की के घरों के पड़ोसियों के यहां पत्थर बहुतायात में पाए जाते हैं, जिन के निशाने अचूक होते हैं. होता हुआ रिश्ता पड़ोसियों के सीने पर सांप लोटने की तरह होता है.

अगर रिश्ता पक्का हो जाए, तो ये उसी दिन से कमर कस लेते हैं. कमर भी किस कदर कसते हैं, इस का राज तब खुलता है जब शादी की तारीख के लिए हलदी की गांठ खुलती है.

भाईबंधु हैं, तो यह उन का जन्मसिद्घ अधिकार है कि वे शादी को निर्विघ्न संपन्न न होने दें. विवाह की जो वेदी सजी है, उस में वे अपनी ओर से परेशानियों का घी डालते रहें ताकि उस से उठने वाला धुआं लड़केलड़की के मांबाप की आंखों में पानी ला दे.

यह पानी भाईबंधुओं के मन की शांति का तरल स्रोत है, जो उन के कलेजों पर ठंडे छीटों के रूप में पड़ता है. विघ्नहर्त्ता भले ही गणेश होंगे, लेकिन इन विघ्नकर्ताओं की मानमनुहार के बिना गणेशजी भी शादी संपन्न नहीं करवा सकते. अब तो इन के नखरे देख कर गणेशजी भी इन्हीं से आग्रह करते होंगे.

खैर, ज्योंज्यों शादी का दिन नजदीक आता है, इन भाईबंधुओं की एकाएक चालढाल बदल जाती है. रूठेरूठे से सरकार नजर आने लगते हैं. उन की उत्सुकता, जिज्ञासा इस बात को ले कर रहती है कि शादी में मनाने के लिए कब, कौन तशरीफ ला रहा है. उसे वहीं धोबीपछाड़ देने की पूरी तैयारी रहती है. जब शादी वाला इन्हें शादी की तारीख की खबर देता है, तो ये इस मुद्रा में आ जाते हैं जैसे संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत व पाक के प्रधानमंत्री आमनेसामने पड़ गए हों.

इन की पहले से ऐंठी हुई गरदनें और ऐंठ जाती हैं, चेहरे पर न के दृढ़भाव उभर आते हैं, मुंह से बोल नहीं फूटते, गोया एकाएक भारत-पाक वार्त्ता अकारण बंद हो गईर् हो. समझदारों को दरअसल संकेत होते हैं कि ये अब शादी में बिना नाजनखरे उठाए, शादी वाले को बिना झुकाए, पगड़ी कदमों में रखवाए बिना आने से रहे. फिर न्योते के बदले में शादी में न आने की शिकायतों का लंबाचौड़ा डौजियर सौंप देते हैं, जिसे देख हतप्रभ शादी वाला सोचता है, न्योता दे कर गलती कर दी या शादी कर के.

खैर, ये बिना जैड प्लस के ही अतिविशिष्ठ की श्रेणी में आ जाते हैं. फिर अगले कुछ रोज तक शादी वाले घर के लोग मिल्खा बने सुबहशाम इन के यहां दौड़ लगाते रहते हैं. आज यह रस्म है, कल तिलक ले कर जाना है, परसों तिलक आएगा, शाम को तेलबान है, आज मेहंदी है, रात को लेडीज संगीत है, रसोई का सामान लाना है. उफ , बहुत काम बाकी हैं, कड़ाही चढ़नी है, टैंट तनना है, कार्ड बंटने हैं.

ज्योंज्यों रस्में निकट आती हैं, इन की मूंछें बढ़ते सैंसेक्स की तरह ऊपर खड़ी होने लगती हैं. वरवधू के मांबाप रुपए की तरह कमजोर और ये महाशय डौलर की तरह मजबूत हो लेते हैं. जरा सा झुकने को तैयार नहीं होते. इन के यहां इतनी हाजिरी देनी पड़ती हैं, जितनी तो सरकारी बाबू एक लाइसैंस के लिए भी नहीं लगवाते. गोया, उन से कोई संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थायी परिषद की सदस्यता पर मुहर लगाने का अनुरोध किया जा रहा हो.

अंत में वरवधू के मांबाप की घोर पराजय घोषणा के बाद ये शादी में तशरीफ ले भी आते हैं, मगर पूरी शादी के दौरान मुंह, पूरियों से ज्यादा, फूले रहते हैं. चाल में एहसान करने के भाव होते हैं, मानो नहीं आते तो लड़की कुंआरी बैठी रहती, इन्हें उपस्थित न पा कर बरात दरवाजे से लौट जाती, लड़के की ताउम्र शादी नहीं होती. बिना वजह की कटुता इतनी ज्यादा होती है कि शादी की रसदार मिठाइयां भी इन के मिजाज में मिठास नहीं घोल पातीं.

भाईबंधु, चाचाताऊ, देवरजेठ, देवरानीजेठानी इत्यादि यों तो निकटतम रिश्ते के नाम हैं, मगर शादीब्याह में इन से अधिकतम दूर भी कोई नहीं होता. गणेश विघ्नहर्ता हैं, तो ये विघ्नकर्ता हैं. इन का एकमात्र उद्देश्य शादी निर्विघ्न, निरापद, आराम से निबटवाने में मदद करने के बजाय अड़चनें पैदा करना होता है.

जिस दिन शादी निबटती है, लड़की के मांबाप का तो कारगिल फतह हो जाता है. इधर, ये सफलता के टाइगर हिल पर अपनी मूंछों का झंडा इस सार्वजनिक घोषणा के साथ गाड़ देते हैं कि गणेश विघ्नहर्ता हैं, तो हम विघ्नकर्ता हैं. Hindi Kahani

Relationship Advice: आपसी कलह की नुमाइश न लगाएं

Relationship Advice: कुछ दिन पहले की बात है. दिल्ली मैट्रो में एक जोड़ा चढ़ा. लड़का और लड़की दोनों की उम्र 24-25 साल के आसपास रही होगी. दोनों ही कमाऊ लग रहे थे. लड़की खूबसूरत थी और लड़का हैंडसम. दोनों ने कपड़े भी अच्छे ब्रांडेड पहने हुए थे.

पर थोड़ी देर के बाद उन दोनों में ऐसा कुछ हुआ कि बाकी सवारियों के कान उन की बातों पर लग गए.

लड़की ने लड़के से पूछा, ‘‘क्या आप शुक्रवार की शाम को अपने दोस्तों के साथ बैठे थे?’’

लड़का बोला, ‘‘हां, बैठा था. तो क्या हुआ?’’

‘‘तुम सब ने ड्रिंक भी की थी न?’’ लड़की ने जैसे उस लड़के की पोल खोलते हुए कहा.

‘‘हां, की थी. तुम मुद्दे की बात करो न कि क्या पूछना चाहती हो?’’ लड़के की आवाज में थोड़ी कड़वाहट आ गई थी.

‘‘वहां तुम सब ने बकवास भी की थी…’’ लड़की ने तेज आवाज में कहा.

‘‘जब लड़के पीने बैठते हैं, तो बकवास ही करते हैं. पर तुम मेरी जासूसी क्यों कर रही हो?’’ लड़का अब और तेज आवाज में बोला.

लड़की कुछ बोलती उस से पहले ही लड़के ने उस का हाथ ?ाटक कर कहा, ‘‘तुम्हें यह सब किस ने बताया?’’

लड़की ने जबान नहीं खोली, जबकि लड़का उस पर हावी हो गया. वह गुस्से में तमतमाते हुए बोला, ‘‘कौन है, नाम बता? मुझे गुस्सा मत दिला. जब इतना कुछ जानती है, तो नाम भी बता दे. अब डर क्यों रही है?’’

लड़की ने पहले तो अपना हाथ छुड़ाया और बड़बड़ाते हुए एक खाली सीट पर जा कर ‘धम्म’ से बैठ गई.

उन दोनों की यह आपसी लड़ाई सब ने सुनी और अनसुना भी कर दिया. पर यहां एक सवाल जरूर मन में उठा कि लोग अपनी पर्सनल बातों में इतने ज्यादा क्यों खो जाते हैं, जो अनजान लोगों के सामने अपनी भड़ास निकाल देते हैं और ऐसा जताते हैं कि कोई सुने तो सुने उन की बला से?

मजे की बात तो यह है कि यह वही पीढ़ी है, जो अपने घर में मां, बूआ, मौसी, चाचा, चाची जैसी अपने से बड़ी पीढ़ी को इस बात पर कोसती है कि वे लोग पीठ पीछे एकदूसरे की बुराई क्यों करते हैं या पड़ोस में क्या चल रहा है, इस पर मजे ले कर बातें क्यों करते हैं?

मैट्रो या बस जैसी सार्वजनिक सवारियों में यह आम हो गया है कि लोग आमनेसामने या फिर फोन पर चुगलखोरी करते दिखाई देते हैं. सास अपनी बहू की पोल खोलती दिख जाती है, तो बहू अपनी ननद के किस्से अपनी मां को सुनाती नजर आती है.

मर्द और लड़के भी इस सब में पीछे नहीं हैं. कोई औफिस में बौस की बखिया उधेड़ रहा होता है, तो कोई अपनी प्रेमिका को ब्लौक करने के किस्से सुना रहा होता है.

ऐसा होता क्यों है? क्यों हम अनजान लोगों के सामने अपने घरकुनबे का पुराण बांचने लग जाते हैं? इस की वजह यह है कि हमें यह सीख देने वाला शायद कोई बचा ही नहीं है कि सार्वजनिक जगह पर हमें कैसे बरताव करना है. और जब से सोशल मीडिया में ‘रीलरील’ खेलने का दौर चला है, तब से ऐसा लगने लगा कि हर कोई ‘गौसिप गैंग’ का हिस्सा बन गया है.

यहां सीख देने वाला कौन है? दरअसल, कुदरत ने हमें सुनने और बोलने की सैंस (इंद्रियां) तो दे दी है, पर कब और कितना बोलना है और कितना सुनना है, यह जो ‘व्यावहारिक बुद्धि’, जिसे इंगलिश में ‘कौमन सैंस’ कहते हैं, को इस्तेमाल करना हम भूलते जा रहे हैं.

पहले टीचर, परिवार और आसपड़ोस के बड़ेबूढ़े नई पीढ़ी को बता दिया करते थे कि इस ‘कौमन सैंस’ का कैसे इस्तेमाल करना है, पर अब तो स्कूलों में ऐसी बातें सिखाना गुजरे जमाने की बात हो गई है और अपनों की सुनता ही कौन है.

कभीकभार इस के नतीजे बहुत बुरे भी होते हैं, जो सार्वजनिक जगहों पर अमूमन दिखाई दे जाते हैं. जैसे क्रिकेट एक खेल है, जो मनोरंजन के लिए खेला जाता है, पर नासमझी की वजह से यह खेल का मैदान खूनी लड़ाई में बदलते देर नहीं लगती है.

18 फरवरी, 2025 को आकाश नाम का एक लड़का शाम को अपने दोस्तों के साथ फरीदाबाद के अगवानपुर चौक के पास बने दुर्गा बिल्डर के खाली प्लाट में क्रिकेट खेल रहा था. खेल के दौरान गेंद वहां मौजूद एक लड़के को लग गई, जिस से झगड़ा हो गया.

आसपास के लोगों ने उस समय मामला शांत करा दिया, लेकिन तकरीबन 15 मिनट बाद वही लड़का 5-6 साथियों के साथ लाठीडंडे और हौकी ले कर लौटा और आकाश पर हमला कर दिया. उन लोगों ने आकाश को इतना पीटा कि एक महीने अस्पताल में रहने के बाद उस की मौत हो गई.

इस वारदात में एक की जान गई और बाकी कोर्टकचहरी के चक्कर में फंसेंगे. पर ऐसी वारदात से एक सीख लेनी चाहिए कि कोई भी विवाद छोटी सी बात से शुरू होता है और हमारा अहम उसे इतना ज्यादा तूल दे देता है कि खेल का मनोरंजन मौत के मातम में बदल जाता है.

ऐसा ही कुछ घरेलू समस्याओं को सार्वजनिक जगह पर जाहिर करने से होता है. बहुत बार मैट्रो या बस वगैरह में 2 जानपहचान वालों की चुगलखोरी हाथापाई तक में बदलते देर नहीं लगाती है.

एक बार एक जोड़ा इस बात पर बहस करने लगा कि लड़की का पहना हुआ टौप कितने का होगा. लड़की ने ज्यादा कीमत बताई तो लड़के ने कहा कि सस्ता माल है. इसी बात पर उन दोनों ने अपने रिश्ते को सब के सामने उघाड़ना शुरू कर दिया. आखिर में लड़की ने लड़के को चांटा जड़ दिया और मैट्रो से उतर गई.

दिक्कत यह है कि हम आपसी गपशप और चुगलखोरी के साथ निजी बातों को सार्वजनिक करने के फर्क को समझ गए हैं. पहले गांवदेहात में लोग गपशप ज्यादा किया करते थे. उसी में बीच में चुगलखोरी और निजी बातों का तड़का लगा दिया जाता था और बात आईगई हो जाती थी.

पर अब चूंकि बातें करने की जगह और समय की कमी से हम मोबाइल फोन पर या कहीं भी आमनेसामने निजी बातों का पिटारा खोल कर बैठ जाते हैं. वहीं सारी गड़बड़ होती है. भीड़ में लोग आप की बातों को अनुसना करते हुए भी बड़े ध्यान से सुनते हैं और अनचाहे में ऐसी बातों के राजदार बन जाते हैं, जो बेहद निजी होती हैं.

नई पीढ़ी को इस सामाजिक बुराई से बचने के लिए अपने घरपरिवार वालों पर ध्यान देना चाहिए. उन के साथ समय बिताना चाहिए और घर की बातों को घर पर ही सुलझाना चाहिए. इस आदत से आप अपने रिश्ते बचा सकते हैं और कभी बात लड़ाई तक पहुंच भी जाए तो ठंडे दिमाग से उसे सुलझाने की कोशिश कर सकते हैं. सैंस के साथसाथ कौमन सैंस का भी इस्तेमाल करें. Relationship Advice

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