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Hindi Story : इज्जत के वास्ते

Hindi Story. अमन दुबई की किसी कंपनी में इंजीनियर था. वह अपनी शादी के सिलसिले में भारत आया था. वह इस शादी से बेहद खुश था. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की शादी इतनी खूबसूरत लड़की सविता से होगी. तकरीबन एक महीना हंसीखुशी के माहौल में गुजर गया.

सविता पति का सुख पा कर निहाल हो उठी. उस का अंगअंग खिल उठा. लेकिन उस की खुशी उस दिन से गायब हो गई, जब अमन ने दुबई वापस जाने की बात कही.

यह सुन कर सविता रोने लगी. उस ने सुबकते हुए कहा, ‘‘मैं आप के बगैर अकेली कैसे रह पाऊंगी? मुझे  इस तरह छोड़ कर मत जाइए, वरना मैं पागल हो जाऊंगी.’’

‘‘ऐसा नहीं कहते सविता. मैं हमेशा के लिए तुम्हें छोड़ कर थोड़े ही जा रहा हूं. तुम क्या समझाती हो कि तुम्हें यहां छोड़ते हुए मुझे दर्द नहीं हो रहा है?

‘‘अरे पगली, मैं तो खुशहाल जिंदगी बिताने की खातिर पैसा कमाने दुबई जा रहा हूं. यहां मां तो हैं ही, मैं अपने भानजे प्रवीण को भी छोड़ कर जा रहा हूं. वह बहुत अच्छा लड़का है. वह यहीं पर रह कर अपनी डाक्टरी की पढ़ाई पूरी करेगा और तुम्हारी देखभाल भी, ताकि तुम खुद को अकेला महसूस न करो.’’

यह सुन कर सविता अमन के सीने से लिपट गई.

कुछ ही दिनों के बाद अमन दुबई चला गया. उस के जाने के बाद सविता गुमसुम रहने लगी. वह पति के खयालों में खोई रहती.

सविता की सास अपना ज्यादातर समय मंदिर में गुजारतीं या पड़ोसियों से गपशप करती रहतीं.

अपनी मामी की मायूसी देख कर प्रवीण भी काफी दुखी था. उस की पीड़ा को वह अच्छी तरह से महसूस कर रहा था, क्योंकि वह भी शादीशुदा था.

प्रवीण की शादी एक साल पहले गांव की एक अनपढ़, गंवार लड़की से हुई थी, जिसे वह नापसंद करता था.

प्रवीण के दूर के रिश्ते के मामा अमन की इच्छा थी कि वह यहां अपनी पढ़ाई पूरी करे और अपनी मामी व इस घर की देखभाल भी करे.

समय की रफ्तार के साथसाथ सविता भी अब कुछ सहज हो गई थी. वह कभीकभार प्रवीण से हंसीमजाक कर लिया करती थी, लेकिन प्रवीण इस का दूसरा मतलब ही निकालता था.

प्रवीण यही सोचा करता, ‘काश, सविता जैसी खूबसूरत औरत से मेरी शादी हुई होती, तो कितना मजा आता.’

एक दिन प्रवीण का दिल बहुत ही बेचैन था. वह देह सुख की कामना कर रहा था. उस ने अलमारी से एक पतली सी किताब निकाली और उसे देखने लगा. भड़काऊ तसवीरें देख कर वह मस्ती में आ गया, लेकिन मामी की जवानी के आगे उसे वे तसवीरें फीकी लगने लगीं.

प्रवीण ने वह किताब बंद कर के मेज पर रख दी और कुछ सोचने लगा. अचानक उस ने सविता को आवाज लगाई, ‘‘मामी, जरा चाय तो बना देना. मेरे सिर में तेज दर्द हो रहा है.’’

‘‘अभी लाई,’’ सविता ने कहा.

थोड़ी देर बाद चाय से भरे प्याले को प्रवीण की ओर बढ़ाते हुए सविता ने कहा, ‘‘इतना क्यों पढ़ते हो कि सिर में दर्द हो जाए? गांव से अपनी बीवी को क्यों नहीं बुला लेते, जो तुम्हारे सिर के दर्द को पलभर में दूर कर देगी?’’

‘‘बीवी को बुला कर क्या होगा मामी? जब आप यहां हैं, तो मुझे क्या सोचना? आप के नाजुक हाथों के बने खाने का तो क्या कहना…’’

‘‘बस… बस, अब और ज्यादा तारीफ न करो,’’ सविता ने हंसते हुए कहा.

‘‘कैसे न करूं… जब आप चीज ही ऐसी हैं, तो तारीफ करना मेरा फर्ज बन जाता है. इस समय मेरे सिर में तेज दर्द हो रहा है,’’ माथे पर अपनी उंगलियों का दबाव डालते हुए प्रवीण ने कहा.

‘‘मैं तुम्हारा सिर दबा दूं?’’ सविता ने पूछा.

‘‘आप दबाएंगी मेरा सिर? नहींनहीं, दर्द अपनेआप ठीक हो जाएगा,’’ प्रवीण ने झिझकते हुए कहा.

‘‘अपनेआप कैसे ठीक होगा? इधर आओ, मैं दबा देती हूं. अगर हम दोनों एकदूसरे की तकलीफ में साथ नहीं देंगे, तो और कौन देगा?’’ सविता ने अपनेपन से कहा.

सविता के हाथों की छुअन पा कर प्रवीण सिहर उठा. उस का रोमरोम खुशी से नाच उठा.

तभी सिर दबातेदबाते सविता की छाती अचानक प्रवीण के सिर से टकरा गई. अब तो वह बारबार अपने सिर को ऐसे झटके देने लगा, ताकि वह सविता की छाती से जा टकराए. लेकिन सविता ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया.

जब काफी देर हो गई, तो प्रवीण ने कहा, ‘‘अब बस भी कीजिए मामी, नहीं तो आप के हाथ भी दर्द करने लगेंगे.’’

सविता पीछे हट गई और मेज पर रखी चाय का प्याला उठा कर पलंग पर प्रवीण के पास ही बैठ गई. किताब के पन्ने पलटने पर जब सविता ने नंगी तसवीरें देखीं, तो वह गुस्से से बोली, ‘‘क्या तुम ऐसी गंदी तसवीरें देखते रहते हो?’’

प्रवीण ने झेंपते हुए पूछ लिया, ‘‘क्या आप को ये तसवीरें अच्छी नहीं लगतीं?’’

‘‘देखने से क्या फायदा?’’ सविता ने कहा.

‘‘फायदा तो इतना है कि मत पूछो. कम से कम दिल में उठ रहे सैलाब को तो शांत ही कर देती हैं.’’

‘‘ठीक है, तब तुम इन्हें ही घूरते रहो… मैं तो चली,’’ इतना कह कर वह उठ खड़ी हुई.

रात आधी से ज्यादा बीत चुकी थी, लेकिन सविता की आंखों से नींद कोसों दूर थी. वह बारबार बिस्तर पर करवटें बदल रही थी. उस की आंखों के सामने बारबार वही नंगी तसवीरें घूम रही थीं. उस के तनबदन में आग लग गई थी. ऐसे समय में उसे अमन की बहुत याद आ रही थी.

सविता बिस्तर से उठ खड़ी हुई. उस ने 2 गिलास ठंडा पानी पीया, तब कहीं जा कर उसे कुछ राहत महसूस हुई.

अगले दिन कालेज से लौटते ही प्रवीण ने रसोईघर में काम कर रही मामी को पीछे से अपनी बांहों में जकड़ लिया और बोला, ‘‘अब तो मैं जल्दी ही डाक्टर बन जाऊंगा. इसी बात पर चाय हो जाए.’’

‘‘यह क्या करते हो… छोड़ो मुझे .. ऐसी हरकतें मुझे बिलकुल पसंद नहीं,’’ सविता ने गुस्से से कहा और दूर जा कर खड़ी हो गई.

प्रवीण अपने कमरे की ओर बढ़ते हुए सोचने लगा, ‘लगता है, मामी दिल से तो मुझ पर मेहरबान हैं, लेकिन ऊपर से नखरे दिखा रही हैं. कोई बात नहीं, मैं इन्हें काबू में कर के ही रहूंगा.’

एक दिन सुबह के 8 बज गए, पर सविता की आहट न सुनाई दी. अपने कमरे से बाहर निकलते हुए प्रवीण ने चारों ओर देखा, पर वह कहीं भी दिखाई न दी. मां भी मंदिर गई हुई थीं.

तभी प्रवीण को ऊपर वाले कमरे से खांसने की आवाज सुनाई दी, तो वह सीढि़यां चढ़ते हुए बोला, ‘‘अरे, आप अभी तक सो रही हैं. तबीयत तो ठीक है न?’’

‘‘रातभर खांसतेखांसते मेरी छाती में दर्द हो गया है,’’ अपनी साड़ी को ठीक करते हुए सविता ने कहा.

‘‘तो आप ने मुझे क्यों नहीं जगा दिया? कम से कम कुछ दवा तो दे देता. कहां हो रहा है दर्द?’’ इतना कहते हुए वह सविता के करीब बैठ गया.

सविता ने झिझकते हुए अपनी छाती से आंचल को थोड़ा सा सरका दिया और बोली, ‘‘यहां दर्द है.’’

सविता की छाती पर हाथ रखते ही प्रवीण का मन बहकने लगा. उसे ऐसी उम्मीद नहीं थी कि सविता इतनी आसानी से ऐसा करने देगी.

जैसे ही सविता ने प्रवीण को अपनी हद से बाहर जाते देखा, तो वह गरज उठी, ‘‘प्रवीण, यह क्या बदतमीजी है? तुम हद से आगे बढ़ रहे हो…’’

‘‘हद… अब मुझ से अपनी हद में नहीं रहा जाता. जब संगमरमर सा बदन मेरे सामने हो, तो मैं कैसे अपनी हद में रह सकता हूं?’’

यह सुन कर सविता गुस्से से भड़क उठी और उस के हाथों को झटका देते हुए गरज पड़ी, ‘‘प्रवीण, मेरी मजबूरियों का फायदा न उठाओ, वरना तुम्हें पछताना पड़ेगा.

‘‘मैं ने तो अपनी छाती से आंचल को इसलिए सरकाया था कि एक डाक्टर को अपनी बीमारी बता रही हूं, लेकिन तुम तो पूरे हैवान निकले.

‘‘मुझे ऐसे आदमी का सहारा नहीं चाहिए, जो मेरी इज्जत पर ही नजर गड़ाए बैठा हो. मैं तुम से सख्त नफरत करती हूं. दूर हो जाओ मेरे सामने से.’’

‘‘अब दूर नहीं हो सकता. भले ही आप मुझ से नफरत करें, लेकिन मैं तो आप से बेहद मुहब्बत करता हूं, इसलिए आप बगैर किसी हिचकिचाहट के मेरी बांहों में समा जाइए, वरना मजबूर हो कर मुझे जबरदस्ती करनी पड़ेगी.’’

‘‘क्या तुम मुझ  से जोरजबरदस्ती करोगे? ऐसा कहने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? दोबारा मुझे  छू कर दिखाओ. तुम्हारे हाथ न तोड़ दिए, तो मेरा नाम भी सविता नहीं.’’

‘‘इन बेकार की धमकियों में क्या रखा है? देखती नहीं, मेरी बांहें तुम्हें कसने को कब से बेकरार हैं?’’ इतना कहते हुए प्रवीण धीरेधीरे सविता की ओर बढ़ने लगा.

‘‘खबरदार, जो एक कदम आगे बढ़ाया, नहीं तो मैं तुम्हारा मुंह नोच लूंगी, आंखें फोड़ दूंगी, ताकि तुम फिर कभी किसी पर बुरी नजर न डाल सको,’’ सविता ने बिफरते हुए कहा.

तब तक प्रवीण उसे अपनी बांहों में कस कर जमीन पर पटक चुका था.

प्रवीण पर हैवानियत का भूत पूरी तरह से सवार हो चुका था. वह उसे बुरी तरह से नोचखसोट रहा था.

अचानक सविता ने एक ऐसी लात चलाई, जो सीधे प्रवीण की नाक पर जा लगी. वह दर्द से बिलबिला उठा. उस की नाक से खून का फव्वारा फूट पड़ा.

यह देख प्रवीण गुस्से से बौखला उठा. इस से पहले कि वह सविता पर दोबारा झपटता, वह दौड़तीचिल्लाती हुई नीचे की ओर भागी.

प्रवीण भी उस के पीछे भागा. जब सविता ने यह देख लिया कि आज उस की इज्जत बचने वाली नहीं है, तो उस ने एक फैसला ले लिया.

सविता दौड़ती हुई रसोई में घुस गई. उस के पीछे प्रवीण भी वहीं जा पहुंचा. उस ने रसोई में घुसते ही सविता को अपनी बांहों में जकड़ लिया, लेकिन इस बार सविता ने उस की जरा भी खिलाफत नहीं की, बल्कि खिलखिलाते हुए कहा, ‘‘वाह प्रवीण वाह, शाबाश… आखिर तुम अपने इम्तिहान में कामयाब हो ही गए.’’

‘‘क्या?’’ प्रवीण ने हैरानी से पूछा.

‘‘हां, सचमुच. मैं भी तुम से उतनी ही मुहब्बत करती हूं, जितनी तुम मुझ से,’’ सविता ने उतावलेपन से कहा.

‘‘ओह मेरी प्यारी अच्छी मामी,’’ इतना कहते हुए प्रवीण ने फिर उसे अपनी बांहों में भर लिया.

‘‘इतनी बेसब्री भी ठीक नहीं. पहले दरवाजा तो बंद कर दो. हां, ताला भी लगा देना…’’

‘‘उस के बाद क्या होगा?’’ प्रवीण ने पूछा.

‘‘जाओ, मैं नहीं बताती. जैसे तुम कुछ जानते ही नहीं,’’ सविता ने कहा.

‘‘अच्छा, यह लो चाबी, मैं ने ताले को अच्छी तरह बंद कर दिया है,’’ प्रवीण ने कुछ देर बाद कहा.

‘‘लेकिन तुम ने वह सामने वाली खिड़की तो अभी तक बंद नहीं की. उसे भी बंद कर के परदा गिरा दो. मुझे  रोशनी में शर्म आती है.’’

‘‘अच्छा, यह लो, खिड़की भी बंद किए देता हूं,’’ कहते हुए प्रवीण खिड़की की ओर बढ़ गया, तभी बगैर एक पल गंवाए सविता ने अपने हाथ में ली हुई चाबी को दरवाजे के नीचे से बाहर की ओर फेंक दिया और गैस सिलैंडर में लगे रबड़ के पाइप को झटके से खींच दिया.

पाइप खिंचते ही तेजी से गैस निकलनी शुरू हो गई. इतने में सविता ने पास रखी माचिस को उठा कर जला दिया. नतीजतन, एक जोर का धमाका हुआ और पलभर में ही दोनों की धज्जियां उड़ गईं.

-रवि प्रकाश गुगड़

Hindi Social Story : बदली परिपाटी

Hindi Social Story. लगता है रात में जतिन ने फिर बहू पर हाथ उठाया. मुझ से यह बात बरदाश्त नहीं होती. बहू की सूजी आंखें और शरीर पर पड़े नीले निशान देख कर मेरा दिल कराह उठता है. मैं कसमसा उठता हूं, पर कुछ कर नहीं पाता. काश, पूजा होती और अपने बेटे को समझाती पर पूजा को तो मैं ने अपनी ही गलतियों से खो दिया है.

यह सोचतेसोचते मेरे दिमाग की नसें फटने लगी हैं. मैं अपनेआप से भाग जाना चाहता हूं. लेकिन नहीं भाग सकता, क्योंकि नियति द्वारा मेरे लिए सजा तय की गई है कि मैं पछतावे की आग में धीरेधीरे जलूं.

‘‘अंतरा, मैं बाजार की तरफ जा रहा हूं, कुछ मंगाना तो नहीं.’’

‘‘नहीं पापाजी, आप हो आइए.’’ मैं चल पड़ा यह सोच कर कि कुछ देर बाहर निकलने से शायद मेरा मन थोड़ा बहल जाए. लेकिन बाहर निकलते ही मेरा मन अतीत के गलियारों में भटकने लगा…

‘मुझ से जबान लड़ाती है,’ एक भद्दी सी गाली दे कर मैं ने उस पर अपना क्रोध बरसा दिया.

‘आह…प्लीज मत मारो मुझे, मेरे बच्चे को लग जाएगी, दया करो. मैं ने आखिर किया क्या है?’ उस ने झुक कर अपनी पीठ पर मेरा वार सहन करते हुए कहा.

कोख में पल रहे बच्चे पर वह आंच नहीं आने देना चाहती थी. लेकिन मैं कम क्रूर नहीं था. बालों से पकड़ते हुए उसे घसीट कर हौल में ले आया और अपनी बैल्ट निकाल ली. बैल्ट का पहला वार होते ही जोरों की चीख खामोशी में तबदील होती चली गई. वह बेहोश हो चुकी थी.

‘पागल हो गया क्या, अरे, उस के पेट में तेरी औलाद है. अगर उसे कुछ हो गया तो?’ मां किसी बहाने से उसे मेरे गुस्से से बचाना चाहती थीं.

‘कह देना इस से, भाड़े पर लड़कियां लाऊं या बियर बार जाऊं, यह मेरी अम्मा बनने की कोशिश न करे वरना अगली बार जान से मार दूंगा,’ कहते हुए मैं ने 2 साल के नन्हे जतिन को धक्का दिया, जो अपनी मां को मार खाते देख सहमा हुआ सा एक तरफ खड़ा था. फिर गाड़ी उठाई और निकल पड़ा अपनी आवारगी की राह.

उस पूरी रात मैं नशे में चूर रहा. सुबह के 6 बज रहे होंगे कि पापा के एक कौल ने मेरी शराब का सारा नशा उतार दिया. ‘कहां है तू, कब से फोन लगा रहा हूं. पूजा ने फांसी लगा ली है. तुरंत आ.’ जैसेतैसे घर पहुंचा तो हताश पापा सिर पर हाथ धरे अंदर सीढि़यों पर बैठे थे और मां नन्हे जतिन को चुप कराने की बेहिसाब कोशिशें कर रही थीं.

अपने बैडरूम का नजारा देख मेरी सांसें रुक सी गईं. बेजान पूजा पंखे से लटकी हुई थी. मुझे काटो तो खून नहीं. मांपापा को समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए. पूजा ने अपने साथ अपनी कोख में पल रहे मेरे अंश को भी खत्म कर लिया था. पर इतने खौफनाक माहौल में भी मेरा शातिर दिमाग काम कर रहा था. इधरउधर खूब ढूंढ़ने के बाद भी पूजा की लिखी कोई आखिरी चिट्ठी मुझे नहीं मिली.

पुलिस को देने के लिए हम ने एक ही बयान को बारबार दोहराया कि मां की बीमारी के चलते उसे मायके जाने से मना किया तो जिद व गुस्से में आ कर उस ने आत्महत्या कर ली. वैसे भी मेरी मां का सीधापन पूरी कालोनी में मशहूर था, जिस का फायदा मुझे इस केस में बहुत मिला. कुछ दिन मुझे जरूर लौकअप में रहना पड़ा, लेकिन बाद में सब को देदिला कर इस मामले को खत्म करने में हम ने सफलता पाई, क्योंकि पूजा के मायके में उस की खैरखबर लेने वाला एक शराबी भाई ही था जिसे अपनी बहन को इंसाफ दिलाने में कोई खास रुचि न थी.

थोड़ी परेशानी से ही सही, लेकिन 8-10 महीने में केस रफादफा हो गया पर मेरे जैसा आशिकमिजाज व्यक्ति ऐसे समय में भी कहां चुप बैठने वाला था. इस बीच मेरी रासलीला मेरे एक दोस्त की बहन लिली से शुरू हो गई. लिली का साथ मुझे खूब भाने लगा, क्योंकि वह भी मेरी तरह बिंदास थी. पूजा की मौत के डेढ़ साल के भीतर ही हम ने शादी कर ली. वह तो शादी के बाद पता चला कि मैं सेर, तो वह सवा सेर है. शादी होते ही उस ने मुझे सीधे अपनी अंटी में ले लिया.

बदतमीजी, आवारगी, बदचलनी आदि गुणों में वह मुझ से कहीं बढ़ कर निकली. मेरी परेशानियों की शुरुआत उसी दिन हो गई जिस दिन मैं ने पूजा समझ कर उस पर पहली बार हाथ उठाया. मेरे उठे हाथ को हवा में ही थाम उस ने ऐसा मरोड़ा कि मेरे मुंह से आह निकल गई. उस के बाद मैं कभी उस पर हाथ उठाने की हिम्मत न कर पाया.

घर के बाहर बनी पुलिया पर आसपास के आवारा लड़कों के साथ बैठी वह सिगरेट के कश लगाती जबतब कालोनी के लोगों को नजर आती. अपने दोस्तों के साथ कार में बाहर घूमने जाना उस का प्रिय शगल था. रात को वह शराब के नशे में धुत हो घर आती और सो जाती. मैं ने उसे अपने झांसे में लेने की कई नाकाम कोशिशें कीं, लेकिन हर बार उस ने मेरे वार का ऐसा प्रतिवार किया कि मैं बौखला गया. उस ने साफ शब्दों में मुझे चेतावनी दी कि अगर मैं ने उस से उलझने की कोशिश की तो वह मुझे मरवा देगी या ऐसा फंसाएगी कि मेरी जिंदगी बरबाद हो जाएगी. मैं उस के गदर से तभी तक बचा रहता जब तक कि उस के कामों में हस्तक्षेप न करता.

तो इस तरह प्रकृति के न्याय के तहत मैं ने जल्द ही वह काटा, जो बोया था. घर की पूरी सत्ता पर मेरी जगह वह काबिज हो चुकी थी. शादी के सालभर बाद ही मुझ पर दबाव बना कर उस ने पापा से हमारे घर को भी अपने नाम करवा लिया. और फिर हमारा मकान बेच कर उस ने पौश कालोनी में एक फ्लैट खरीदा और मुझे व जतिन को अपने साथ ले गई. मेरे मम्मीपापा मेरी बहन यानी अपनी बेटी के घर में रहने को मजबूर थे. यह सब मेरी ही कारगुजारियों की अति थी जो आज सबकुछ मेरे हाथ से मुट्ठी से निकली रेत की भांति फिसल चुका था.

अपना मकान बिकने से हैरानपरेशान पापा इस सदमे को न सह पाने के कारण हार्टअटैक के शिकार हो महीनेभर में ही चल बसे. उन के जाने के बाद मेरी मां बिलकुल अकेली हो गईं. प्रकृति मेरे कर्मों की इतनी जल्दी और ऐसी सजा देगी, मुझे मालूम न था.

नए घर में शिफ्ट होने के बाद भी उस के क्रियाकलाप में कोई खास अंतर नहीं आया. इस बीच 5 साल के हो चुके जतिन को उस ने पूरी तरह अपने अधिकार में ले लिया. उस के सान्निध्य में पलताबढ़ता जतिन भी उस के नक्शेकदम पर चल पड़ा. पढ़ाईलिखाई से उस का खास वास्ता था नहीं. जैसेतैसे 12वीं कर उस ने छोटामोटा बिजनैस कर लिया और अपनी जिंदगी पूरी तरह से उसी के हवाले कर दी. उन दोनों के सामने मेरी हैसियत वैसे भी कुछ नहीं थी. किसी समय अपनी मनमरजी का मालिक मैं आजकल उन के हाथ की कठपुतली बन, बस, उन के रहमोकरम पर जिंदा था.

इसी रफ्तार से जिंदगी के कुछ और वर्ष बीत गए. इस बीच लिली एक भयानक बीमारी एड्स की चपेट में आ गई और अपनेआप में गुमसुम पड़ी रहने लगी. अब घर की सत्ता मेरे बेटे जतिन के हाथों में आ गई. हालांकि इस बदलाव का मेरे लिए कोई खास मतलब नहीं था. हां, जतिन की शादी होने पर उस की पत्नी अंतरा के आने से अलबत्ता मुझे कुछ राहत जरूर हो गई, क्योंकि मेरी बहू भी पूजा जैसी ही एक नेकदिल इंसान थी.

वह लिली की सेवा जीजान से करती और जतिन को खुश करने की पूरी कोशिश भी. पर जिस की रगों में मेरे जैसे गिरे इंसान का लहू बह रहा हो, उसे भला किसी की अच्छाई की कीमत का क्या पता चलता. सालभर पहले लिली ने अपनी आखिरी सांस ली. उस वक्त सच में मन से जैसे एक बोझ उतर गया और मेरा जीवन थोड़ा आसान हो गया.

इस बीच, जतिन के अत्याचार अंतरा के प्रति बढ़ते जा रहे थे. लगभग रोज रात में जतिन उसे पीटता और हर सुबह अपने चेहरे व शरीर की सूजन छिपाने की भरसक कोशिश करते हुए वह फिर से अपने काम पर लग जाती. कल रात भी जतिन ने उस पर अपना गुस्सा निकाला था.

मुझे समझ नहीं आता था कि आखिर वह ये सब क्यों सहती है, क्यों नहीं वह जतिन को मुंहतोड़ जवाब देती, आखिर उस की क्या मजबूरी है? तमाम बातें मेरे दिमाग में लगातार चलतीं. मेरा मन उस के लिए इसलिए भी परेशान रहता क्योंकि इतना सबकुछ सह कर भी वह मेरा बहुत ध्यान रखती थी. कभीकभी मैं सोच में पड़ जाता कि आखिर औरत एक ही समय में इतनी मजबूत और मजबूर कैसे हो सकती है?

ऐसे वक्त पर मुझे पूजा की बहुत याद आती. अपने 4 वर्षों के वैवाहिक जीवन में मैं ने एक पल भी उसे सुकून का नहीं दिया. शादी की पहली रात जब सजी हुई वह छुईमुई सी मेरे कमरे में दाखिल हुई थी, तो मैं ने पलभर में उसे बिस्तर पर घसीट कर उस के शरीर से खेलते हुए अपनी कामवासना शांत की थी.

काश, उस वक्त उस के रूपसौंदर्य को प्यारभरी नजरों से कुछ देर निहारा होता, तारीफ के दो बोल बोले होते तो वह खुशी से अपना सर्वस्व मुझे सौंप देती. उस घर में आखिर वह मेरे लिए ही तो आई थी. पर मेरे लिए तो प्यार की परिभाषा शारीरिक भूख से ही हो कर गुजरती थी. उस दौरान निकली उस की दर्दभरी चीखों को मैं ने अपनी जीत समझ कर उस का मुंह अपने हाथों से दबा कर अपनी मनमानी की थी. वह रातों में मेरे दिल बहलाने का साधनमात्र थी. और फिर जब वह गर्भवती हुई तो मैं दूसरों के साथ इश्क लड़ाने लगा, क्योंकि वह मुझे वह सुख नहीं दे पा रही थी. वह मेरे लिए बेकार हो चुकी थी. इसलिए मुझे ऐसा करने का हक था, आखिर मैं मर्द जो था. मेरी इस सोच ने मुझे कभी इंसान नहीं बनने दिया.

हे प्रकृति, मुझे थोड़ी सी तो सद्बुद्धि देती. मैं ने उसे चैन से एक सांस न लेने दी. अपनी गंदी हरकतों से सदा उस का दिल दुखाया. उस की जिंदगी को मैं ने वक्त से पहले खत्म कर दिया.

उस दिन उस ने आत्महत्या भी तो मेरे कारण ही की थी, क्योंकि उसे मेरे नाजायज संबंधों के बारे में पता चल गया था और उस की गलती सिर्फ इतनी थी कि इस बारे में मुझ से पूछ बैठी थी. बदले में मैं ने जीभर कर उस की धुनाई की थी. ये सब पुरानी यादें दिमाग में घूमती रहीं और कब मैं घर लौट आया पता ही नहीं चला.

‘‘पापा, जब आप मार्केट गए थे. उस वक्त बूआजी आई थीं. थोड़ी देर बैठीं, फिर आप के लिए यह लिफाफा दे कर चली गईं.’’ बाजार से आते ही अंतरा ने मुझे एक लिफाफा पकड़ाया.

‘‘ठीक है बेटा,’’ मैं ने लिफाफा खोला. उस में एक छोटी सी चिट और करीने से तह किया हुआ एक पन्ना रखा था. चिट पर लिखा था, ‘‘मां के जाने के सालों बाद आज उन की पुरानी संदूकची खोली तो यह खत उस में मिला. तुम्हारे नाम का है, सो तुम्हें देने आई थी.’’ बहन की लिखावट थी. सालों पहले मुझे यह खत किस ने लिखा होगा, यह सोचते हुए कांपते हाथों से मैं ने खत पढ़ना शुरू किया.

‘‘प्रिय मयंक,

‘‘वैसे तो तुम ने मुझे कई बार मारा है, पर मैं हमेशा यह सोच कर सब सहती चली गई कि जैसे भी हो, तुम मेरे तो हो. पर कल जब तुम्हारे इतने सारे नाजायज संबंधों का पता चला तो मेरे धैर्य का बांध टूट गया. हर रात तुम मेरे शरीर से खेलते रहे, हर दिन मुझ पर हाथ उठाते रहे. लेकिन मन में एक संतोष था कि इस दुखभरी जिंदगी में भी एक रिश्ता तो कम से कम मेरे पास है. लेकिन जब पता चला कि यह रिश्ता, रिश्ता न हो कर एक कलंक है, तो इस कलंक के साथ मैं नहीं जी सकती. सोचती थी, कभी तो तुम्हारे दिल में अपने लिए प्यार जगा लूंगी. लेकिन अब सारी उम्मीदें खत्म हो चुकी हैं. मायके में भी तो कोई नहीं है, जिसे मेरे जीनेमरने से कोई सरोकार हो. मैं अपनी व्यथा न ही किसी से बांट सकती हूं और न ही उसे सह पा रही हूं. तुम्हीं बताओ फिर कैसे जिऊं. मेरे बाद मेरे बच्चों की दुर्दशा न हो, इसलिए अपनी कोख का अंश अपने साथ लिए जा रही हूं. मासूम जतिन को मारने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. खुश रहो तुम, कम से कम जतिन को एक बेहतर इंसान बनाना. जाने से पहले एक बात तुम से जरूर कहना चाहूंगी. ‘मैं तुम से बहुत प्यार करती हूं.’

‘‘तुम्हारी चाहत के इंतजार में पलपल मरती…तुम्हारी पूजा.’’

पूरा पत्र आंसुओं से गीला हो चुका था, जी चाह रहा था कि मैं चिल्लाचिल्ला कर रो पड़ूं. ओह, पूजा माफ कर दे मुझे. मैं इंसान कहलाने के काबिल नहीं, तेरे प्यार के काबिल भला क्या बनूंगा. हे प्रकृति, मेरी पूजा को लौटा दे मुझे, मैं उस के पैर पकड़ कर अपने गुनाहों की माफी तो मांग लूं उस से. लेकिन अब पछताए होत क्या, जब चिडि़या चुग गई खेत.

भावनाओं का ज्वार थमा तो कुछ हलका महसूस हुआ. शायद मां को पूजा का यह सुसाइड लैटर मिला हो और मुझे बचाने की खातिर यह पत्र उन्होंने अपने पास छिपा कर रख लिया हो. यह उन्हीं के प्यार का साया तो था कि इतना घिनौना जुर्म करने के बाद भी मैं बच गया. उन्होंने मुझे कालकोठरी की सजा से तो बचा लिया, परंतु मेरे कर्मों की सजा तो नियति से मुझे मिलनी ही थी और वह किसी भी बहाने से मुझे मिल कर रही.

पर अब सबकुछ भुला कर पूजा की वही पंक्ति मेरे मन में बारबार आ रही थी, ‘‘कम से कम जतिन को एक बेहतर इंसान बनाना.’’ अंतरा के मायके में भी तो उस की बुजुर्ग मां के अलावा कोई नहीं है. हो सकता है इसलिए वह भी पूजा की तरह मजबूर हो. पर अब मैं मजबूर नहीं बनूंगा…कुछ सोच कर मैं उठ खड़ा हुआ. अंतरा को आवाज दी.

‘‘जी पापा,’’ कहते हुए अंतरा मेरे सामने मौजूद थी. बहुत देर तक मैं उसे सबकुछ समझाता रहा और वह आंखें फाड़फाड़ कर मुझे हैरत से देखती रही. शायद उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जतिन का पिता होने के बावजूद मैं उस का दर्द कैसे महसूस कर रहा हूं या उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि अचानक मैं यह क्या और क्यों कर रहा हूं, क्योंकि वह मासूम तो मेरी हकीकत से हमेशा अनजान थी.

पास के पुलिसस्टेशन पहुंच कर मैं ने अपनी बहू पर हो रहे अत्याचार की धारा के अंतर्गत बेटे जतिन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई. मेरे कहने पर अंतरा ने अपने शरीर पर जख्मों के निशान उन्हें दिखाए, जिस से केस पुख्ता हो गया. थोड़ा वक्त लगा, लेकिन हम ने अपना काम कर दिया था. आगे का काम पुलिस करेगी. जतिन को सही राह पर लाने का एक यही तरीका मुझे कारगर लगा, क्योंकि सिर्फ मेरे समझानेभर से बात उस के पल्ले नहीं पड़ेगी. पुलिस, कानून और सजा का खौफ ही अब उसे सही रास्ते पर ला सकता है.

पूजा के चिट्ठी में कहे शब्दों के अनुसार, मैं उसे रिश्तों की इज्जत करना सिखाऊंगा और एक अच्छा इंसान बनाऊंगा, ताकि फिर कोई पूजा किसी मयंक के अत्याचारों से त्रस्त हो कर आत्महत्या करने को मजबूर न हो. औटो में वापसी के समय अंतरा के सिर पर मैं ने स्नेह से हाथ फेरा. उस की आंखों में खौफ की जगह अब सुकून नजर आ रहा था. यह देख मैं ने राहत की सांस ली. Hindi Social Story

Hindi Love Crime Story : फांस

Hindi Love Crime Story. ‘‘अरे, मुझे  दुकान जाने में देर हो रही है. खाना तैयार हुआ कि नहीं?’’ रमेश की बात का कोई जवाब उन की पत्नी लीला दे पातीं, इस से पहले ही फोन जोर से घनघनाया. फोन पर बात करती लीला को बीच में टोकने के लिए जैसे ही रमेश उन के पास पहुंचे, तो उन के चेहरे पर आनेजाने वाले भावों को देख कर चुप हो गए. लीला के चेहरे पर घबराहट साफ दिख रही थी.

फोन रख माथे पर आई पसीने की बूंदों को अपने पल्लू से पोंछते हुए लीला बोलीं, ‘‘सुनते हो, गजब हो गया. बड़ी भाभी का फोन था. वे कह रही थीं कि हमारी बेटी किसी यादव के लड़के के साथ घूम रही है. वह जो गांव के बाहर पुराना शिव मंदिर है न, उस के पंडित ने उन्हें कई बार साथ देखा है.’’

‘‘यह तुम क्या कह रही हो लीला? ऐसा कैसे हो सकता है? हमारी बेटी ऐसा कैसे कर सकती है?’’ रमेश को अभी भी यकीन नहीं हो रहा था.

‘‘भला, बड़ी भाभी झठ क्यों बोलेंगी? उन की हम से कोई दुश्मनी थोड़े ही है,’’ लीला का सब्र जवाब दे रहा था.

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‘‘तुम्हारी लाड़ली है कहां… बुलाओ उसे. अभी सब साफ हो जाएगा. हमारे संस्कारों की इस तरह कैसे वह धज्जियां उड़ा सकती है,’’ रमेश किसी चोट खाए सांप की तरह फुफकार रहे थे.

‘‘वह क्या घर में है, जो उसे बुलाऊं. कब की कालेज जा चुकी है. कह रही थी कि आजकल किसी समारोह की तैयारी चल रही है, इसलिए रोज सुबह जल्दी जा रही है और रात को भी देर से आती है.’’

लीला की यह बात सुन कर रमेश और भड़क उठे, ‘‘यानी कालेज जाने के नाम पर गुलछर्रे उड़ा रही है. बात और फैले, उस से पहले ही उस का घर से निकलना बंद कर दो. मैं जल्दी ही कोई अपनी बिरादरी का लड़का देख कर उस की शादी तय कर देता हूं.’’

अपने कागज संभालते हुए रमेश बिना खाना लिए ही दुकान के लिए निकल गए. बेटा अभी तैयार हो रहा था. रोज की तरह उस के लिए भी नहीं ठहरे.

लीला काफी देर तक अपना सिर पकड़े यों ही बैठी रहीं.

‘‘क्या बात है अम्मां, ऐसे क्यों बैठी हो?’’ महेश ने पूछा. उस के पीछे बहू भी खाने का डब्बा थामे खड़ी थी.

‘‘अम्मां, बाऊजी आज इन के लिए ठहरे नहीं? क्या कहीं और जाना था उन्हें?’’ बहू ने पूछा, तो लीला की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली.

‘‘अब क्या बताऊं तुम दोनों को. आभा ने हमारे मुंह पर कालिख पोत दी है. वह किसी जोगिंदर नाम के यादव के लड़के से मिलतीजुलती है. तुम्हारी ताई का फोन आया था. वे बता रही थीं कि पुराने शिव मंदिर का पंडित यह बात सब से कहता फिर रहा है और उस ने तो पंचायत बुलाने की भी धमकी दी है?’’

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यह सुनते ही महेश एकदम भड़क उठा, ‘‘काट दूंगा उस यादव के बच्चे को. मेरी बहिन की ओर आंख उठा कर देखने की उस की हिम्मत भी कैसे हुई. लगता है, वह अपनी औकात भूल गया है. तुम तो बस आभा को समझाओ. वह अभी नादान है, जरूर यादव के लड़के ने उसे बरगलाया होगा.’’

महेश तो बौखलाता हुआ दुकान के लिए निकल गया, पर घर में तो जैसे मातम छा गया था. इस बीच बड़ी भाभी का फोन फिर आया था. वे बता रही थीं कि उन के पड़ोस में रहने वाली श्यामा काकी को पंडित मिला था और कह रहा था कि आभा और जोगिंदर तो घर से भाग कर शादी करने का प्रोग्राम बना रहे हैं.

यह सुन कर लीला और परेशान हो गई थीं.

शाम को जब आभा घर लौटी, तो घर के माहौल में हुए बदलाव को उस ने साफ महसूस किया.

‘‘आ गई गुलछर्रे उड़ा कर. अपने मांबाप की इज्जत दांव पर लगाते तुझे  शर्म नहीं आई. क्या इसी दिन के लिए तुझे  पालपोस कर बड़ा किया था,’’ लीला आभा के सामने तन कर खड़ी हो गई थीं.

‘‘अब आप को पता लग ही गया है, तो अच्छा ही है. वैसे भी कुछ दिनों बाद मैं आप को बताने वाली थी. जोगिंदर अच्छा लड़का है, पढ़ालिखा है, अच्छा कमाता है. हमारी बिरादरी वालों की तरह आप को दहेज भी नहीं जुटाना पड़ेगा. उसे कुछ नहीं चाहिए.

‘‘वैसे भी शहर में उस की नौकरी लग गई है, हम शादी कर के वहीं चले जाएंगे. इस में आप की नाक कैसे कट गई?’’ आभा का बेबाक जवाब सुन कर सासबहू के सीने पर सांप लोटने लगे.

‘‘और अम्मां, साफ सुन लो, हम कोई गुलछर्रे उड़ाने कहीं नहीं जाते हैं. किस ने कह दिया तुम्हें कि हम गांव के बाहर कहीं जाते हैं. हम दोनों एकदूसरे को चाहते हैं, यह सच है,्र पर अभी मेरा सारा ध्यान पढ़ाई पर है.’’

‘‘बस बहुत हो गई तेरी पढ़ाई. आज से तेरा घर से निकलना बंद. तेरे बाऊजी का हुक्म है यह. और सुन ले, जल्दी ही अपनी बिरादरी के लड़के से हम तेरी शादी कर देंगे. उस जोगिंदर की बात भी मन से निकाल दे. तुम दोनों की शादी नहीं हो सकती,’’ लीला की आवाज में इस बार थोड़ी नरमी थी. वे चाहती थीं कि बात बिना बिगड़े सुलझ जाए. आभा ने खुद को कमरे में बंद कर लिया.

आभा का घर से निकलना बंद हो गया था. रमेश और महेश लगातार जोगिंदर को धमका रहे थे कि वह गांव छोड़ कर चला जाए.

बड़ी भाभी जब लीला से मिलने आईं, तो उन्होंने कहा कि पंडित ने उन्हें आभा के लिए अपनी बिरादरी का एक लड़का सुझाया है. ज्यादा पढ़ालिखा तो नहीं है, लेकिन बात फैले, उस से पहले उसी से आभा को बांध देना ठीक रहेगा.

अपनी बेटी को यों ही किसी के साथ ब्याह देने की बात हालांकि लीला को पसंद नहीं आई, पर जेठानी के सामने वे चुप ही रहीं.

आभा ने जिद पकड़ ली थी कि वह अगर शादी करेगी तो सिर्फ जोगिंदर से, वरना अपनी जान दे देगी.

जोगिंदर पर भी लगातार दबाव बढ़ रहा था और उस के परिवार वाले भी उसे समझा रहे थे कि वह यह बेवकूफी न करे, पर दोनों मानने को तैयार नहीं थे.

समाज की खोखली परंपराओं और धर्म के नाम पर फैलाए जाने वाले जातिवाद के दोनों ही पक्ष में नहीं थे.

2 दिन बाद एक खेत में दोनों की लाशें मिलीं. सब कह रहे थे कि उन्होंने आत्महत्या कर ली, पर आसपास कहीं सुसाइड नोट नहीं मिला था.

आभा के सिर पर गोली लगी थी और जोगिंदर की कनपटी पर. खबर सुनते ही बड़ी भाभी दौड़ी चली आईं.

‘‘लीला, वह पंडित कह रहा था कि जोगिंदर ने पहले आभा को गोली मारी और फिर अपनी जान ले ली. वे दोनों शायद भागने की तैयारी कर रहे थे, पर किसी ने उन्हें देख लिया था.’’

अपनी बेटी की मौत की खबर से दुखी लीला को समझ  नहीं आ रहा था कि वे अपने दुख में रोएं या घर की इज्जत बच जाने पर राहत की सांस लें. क्या हो जाता, अगर जोगिंदर से आभा की शादी की सब मंजूरी दे देते. वे जोरजोर से रोने लगीं.

लीला इस बात को कैसे किसी को बतातीं कि जिसे लोग आत्महत्या समझ रहे हैं, वह हकीकत में हत्या है. समाज में अपनी इज्जत बचाने और यह साबित करने के लिए हत्या की गई कि धर्म के साथ खिलवाड़ कभी नहीं हो सकता.

तभी बगल वाली रमा चाची उन के कंधे थपथपाते हुए बोलीं, ‘‘दुख न कर लीला, कल ही मैं ने एक चैनल पर सुना था कि बाबा अमृतानंदजी प्रवचन देते हुए कह रहे थे कि मृत्यु का क्या शोक मनाना. जो आया है, वह जाएगा भी.’’

लीला को लगा कि उन के भीतर की फांस की चुभन बढ़ती ही जा रही है.  Hindi Love Crime Story

Crime Story: देवर के चक्कर में पति की हत्या

Crime Story: हरियाणा के सोनीपत जिले के थाना गन्नौर क्षेत्र के गांव झरगढ़ी के रहने वाले शाहनवाज की शादी 9 साल पहले साल 2016 में उत्तर प्रदेश के शामली जिले के थाना कांधला क्षेत्र के गांव गढ़ी दौलत की रहने वाली महफरीन से हुई थी.


शादी के बाद शाहनवाज और महफरीन की जिंदगी मजे से चल रही थी. शाहनवाज दिनभर काम कर के जब शाम को घर वापस लौटता, को महफरीन उस पर अपना भरपूर प्यार लुटाती थी. दोनों की जिंदगी हंसीखुशी से गुजर रही थी. इस दौरान महफरीन ने 2 बच्चों को जन्म दिया. पहला लड़का तकरीबन
8 साल का है, जबकि दूसरा लड़का तकरीबन 4 साल का है. जैसा कि सभी परिवारों में होता है, रिश्तेदार आतेजाते रहते हैं. शाहनवाज के मामा का लड़का तसव्वुर का भी वहां आनाजाना था. जब कभी तसव्वुर और महफरीन मिलते तो देवरभाभी होने के नाते एकदूसरे से हंसीमजाक भी करलेते थे.

शाहनवाज इसे यह सोच कर नजरअंदाज कर देता था कि देवरभाभी में मजाक तो चलता ही रहता है.
पिछले तकरीबन 6 महीने से महफरीन और तसव्वुर में अचानक से नजदीकियां ज्यादा बढ़ गई थीं. दोनों ने एकदूसरे का मोबाइल नंबर भी शेयर कर लिया था.
‘‘भाभी, आप मु?ो बहुत अच्छी लगती हो,’’ एक दिन तसव्वुर ने महफरीन से कहा.
इस पर महफरीन ने जवाब दिया, ‘‘रहने दो.’’ ‘‘रब करे आप को किसी की नजर न लगे…’’ तसव्वुर ने कहा, ‘‘मैं आप को दिल से कह रहा हूं कि आप बहुत खूबसूरत हो.’’ हिम्मत कर के तसव्वुर ने अपने दिल की बात भी कह दी, ‘‘भाभी, मैं तुम से प्यार करता हूं और तुम्हारे बगैर रह नहीं सकता.’’


तसव्वुर के मुंह से यह बात सुन कर महफरीन को थोड़ी देर के लिए अजीब सा लगा, लेकिन जब दोनों में काफी देर तक बात हुई, तो महफरीन भी तसव्वुर को अपना दिल दे बैठी.
इस के बाद तो उन दोनों में घंटों बात होने लगी, फिर दोनों चोरीछिपे मिलने भी लगे. दोनों ने प्यार की तमाम हदों को पार कर दिया.


पर जब देखो तब और घंटों तसव्वुर से बात करने पर शाहनवाज को महफरीन पर शक हो गया. उस ने 1-2 बार महफरीन को समझाया भी, लेकिन वह नहीं मानी और लगातार तसव्वुर से संबंध जारी रखे.
3 अगस्त की रात को शाहनवाज ने महफरीन को मोबाइल पर किसी से बात करते रंगे हाथ पकड़ लिया, ‘‘किस से बात कर रही थी? क्या चल रहा है?’’ महफरीन बोली, ‘‘कुछ भी नहीं, मैं तो बस…’’शाहनवाज ने गुस्से में उस का फोन छीना और देखा कि कौल लौग में बारबार तसव्वुर का नाम था. वह भड़क उठा और महफरीन की पिटाई कर दी.


उस रात महफरीन की आंखों में सिर्फ आंसू नहीं थे, नफरत और बदले की आग भी थी. महफरीन ने उसी रात तसव्वुर को  फोन कर कहा, ‘‘अब बहुत हो गया, उसे रास्ते से हटाना होगा.’’रात में ही महफरीन और तसव्वुर ने एक ऐसी योजना बनाई, जिस का किसी को अंदाजा भी नहीं था. इस के बाद महफरीन ने शाहनवाज से ऐसा बरताव किया जैसे पिटाई के बाद वह शाहनवाज की बात मान गई हो.

उस ने शाहनवाज को इस का जरा भी अहसास नहीं होने दिया कि उस के दिमाग में क्या चल रहा है.
7 अगस्त, 2025 को शामली जनपद के गांव खुरगान के बाशिंदे और शाहनवाज के ममेरे साले इमलाक की शादी थी. महफरीन और शाहनवाज ने मिल कर शादी में जाने का प्रोग्राम बनाया.


महफरीन बोली, ‘‘हम बाइक पर जाएंगे, ताकि जल्दी पहुंच सके, क्योंकि हरियाणा की बसों में बहुत भीड़ चल रही है. फिर गांव तक पहुंचने के लिए साधन भी नहीं मिलता है. बसअड्डे पर खड़े होकर घंटों इंतजार करना पड़ता है. अपनी बाइक होगी तो आसानी से घर तक पहुंच जाएंगे.’’


‘‘हां, यह सही रहेगा गरमी भी बहुत ज्यादा है. अपना साधन होगा तो पहुंचने में आसानी रहेगी,’’ शाहनवाज ने जवाब दिया, फिर थोड़ा रुक कर बोला, ‘‘एक दिन पहले चलेंगे. काफी दिन हो गए, तुम्हारे परिवार वालों से भी नहीं मिला हूं मैं. वे भी कहते रहते हैं…’’‘‘रात को तुम्हारे मायके गांव गढ़ी दौलत चलेंगे अगले दिन वहीं से खुगरान चलेंगे,’’ शाहनवाज ने अपना प्लान बताया.


जैसा कि महफरीन और शाहनवाज ने शादी के लिए प्रोग्राम बनाया था, उसी के मुताबिक 6 अगस्त, 2025 को दोनों बाइक पर सवार हो कर गांव गढ़ी दौलत पहुंच गए.शाहनवाज को देख कर महफरीन के मायके वाले भी बहुत खुश हुए. सभी ने घर और परिवार का हालचाल पूछा. दामादजी घर पर आए थे, तो शाहनवाज की खातिरदारी भी अच्छी तरह से हुई.


7 अगस्त की सुबह शाहनवाज अपनी बीवी महफरीन को बाइक पर बैठा कर गांव खुरगान के लिए निकल पड़ा. गांव में पहुंचने से पहले कसबा कैराना में उस ने कुछ सामान भी खरीदा और फिर से चल पड़ा.
बाइक पर पीछे बैठी महफरीन फोन पर बारबार किसी से बात कर रही थी. बाइक की स्पीड तेज होने के चलते वह समझा नहीं पा रहा था. उसे केवल इतना ही समझ आया कि शायद शादी वाले घर से फोन आ रहे होंगे कि कितनी देर में पहुंचोगे.


लेकिन महफरीन किसी से कोडवर्ड में बात कर रही थी. उस ने बोला, ‘मंजिल आने वाली है…’ थोड़ा आगे चलने पर उस ने फिर से कोडवर्ड में बात की, ‘पुल पार करो’ और इस के बाद फोन पर फिर से कहा ‘बस थोड़ा इंतजार करो.’ महफरीन के इन कोडवर्ड से खून और धोखे की गंध आ रही थी. सुबह के 10 बज रहे थे. शाहनवाज और महफरीन की बाइक नैशनल हाईवे पर दौड़ी जा रही थी.

जब वे पानीपतहरिद्वार नैशनल हाईवे पर बने एक फ्लाईओवर से थोड़ा आगे बेरी के बाग के निकट पहुंचे, तो पीछे से 2 बाइकों पर सवार 4 लड़कों ने ओवरटेक कर शाहनवाज की बाइक में टक्कर मार दी और शाहनवाज को डंडा मार कर बाइक रुकवा ली. उन्होंने चाकू से शाहनवाज पर ताबड़तोड़ कई वार किए. एक लड़के ने उस पर तमंचे से गोली चलाई. गंभीर रूप से घायल शाहनवाज सड़क पर नीचे गिर गया. वारदात को अंजाम देने के बाद वे सभी हमलावर फरार हो गए.


शाहनवाज की आंखों में दर्द और धोखे की झलक थी… शायद आखिरी बार उस ने महफरीन को देखा, जो चुपचाप खड़ी थी. महफरीन ने डायल 112 को फोन किया और पुलिस को सूचना दी, ‘‘हम पर हमला हुआ है. बदमाशों ने मेरे पति को मार डाला.’’ पुलिस मौके पर पहुंची और सड़क पर घायल पड़े शाहनवाज को अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उसे मरा हुआ घोषित कर दिया. जानकारी पा कर सोनीपत से शाहनवाज के परिवार वाले भी कैराना पहुंच गए. उन्होंने पुलिस को डेढ़ लाख रुपए की दूल्हे के लिए ले जाई जा रही नोटों की माला और बाइक लूटने की सूचना दी.


एसपी रामसेवक गौतम, एएसपी संतोष कुमार सिंह और सीओ कैराना श्याम सिंह मौके पर पहुंचे. इस दौरान पुलिस ने मौके से शाहनवाज की बाइक भी बरामद की. फोरैंसिक टीम ने पहुंच कर सुबूत जुटाए.
वहीं, अस्पताल में महफरीन जमीन पर गिर कर बारबार बेहोशी का नाटक करने लगी, रोती रही. महफरीन की तरफ से कैराना कोतवाली में अज्ञात बदमाशों के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराई गई.

2 डाक्टरों की टीम द्वारा शाहनवाज की लाश का पोस्टमार्टम कराया गया
तो उस के शरीर में गोली लगना भी पाया गया, चाकुओं से वार किए गए थे, सो अलग.कैराना पुलिस के मुताबिक, महफरीन के बयान लिए तो उस ने पुलिस को चाकुओं से हमला करना ही बताया. पुलिस को महफरीन की बातों में दम नहीं लगा. उस की आंखों में पति की मौत के आंसू जरूर थे, लेकिन पकड़े जाने का डर भी साफ दिख रहा था.


पुलिस ने महफरीन को दोबारा से बयान लेने के लिए बुलाया, तो उस ने बयान देने से मना कर दिया. इस पर पुलिस को शक हुआ तो पुलिस ने उसे पूछताछ के लिए उठा लिया. इसी दौरान केस के खुलासे के लिए लगाई गई टीमों ने जब महफरीन की कौल डिटेल खंगाली तो सारे राज खुलते चले गए.
तसव्वुर से महफरीन की लगातार बातचीत और लोकेशन शेयरिंग से पूरा राज खुला. पुलिस की कड़ी पूछताछ में महफरीन टूट गई.


‘‘हां… मैं ने करवाया मर्डर… तसव्वुर से प्यार करती हूं. शाहनवाज ने मारा था  पिटाई सह नहीं पाई.’’
महफरीन ने आगे बताया कि शाहनवाज ने उसे तसव्वुर से मोबाइलपर बात करते हुए रंगे हाथ पकड़ा था. इस के बाद दोनों के बीच  झगड़ा हुआ. शाहनवाज ने उस की पिटाई भी की थी. इसी के बाद उस ने प्रेमी तसव्वुर के साथ मिल कर शाहनवाज की हत्या की योजना बनाई. उस का काम सिर्फ लोकेशन देना था.

हत्या की प्लानिंग के तहत उसे शाहनवाज को सही समय पर सही जगह तक ले जाना था.
कैराना और आसपास लगे 10 से ज्यादा सीसीटीवी कैमरों में 2 बाइकों पर सवार 4 हमलावर नजर आए.फुटेज से उन की बाइक का नंबर मिला. इस के कुछ ही घंटों में हत्या के आरोपी तसव्वुर और शोएब को पकड़ लिया गया. पुलिस की जांच में सामने आया है कि हत्या में इस्तेमाल तमंचा और चाकू गढ़ी दौलत गांव के एक नौजवान ने मुहैया कराए थे.   

लेखक     महेश कांत शिवा

Family Murder: दामाद की बेरहमी से हत्या, शव के किए तीन टुकड़े

Family Murder: मंजू पूरी रात अपने बेटे संजय के घर लौटने का इंतजार करती रही, लेकिन वह नहीं लौटा. सुबह होने पर मंजू ने संजय के दोस्तों से बेटे के बारे में पता किया तो दोस्तों ने बताया कि उस के 3-4 दोस्त उसे अपने साथ ले कर कहीं गए थे. मंजू ने उन दोस्तों के बारे में पता लगाना शुरू किया तो जो बात मालूम हुई, उसे सुन कर वह परेशान हो उठी.  उसे जानकारी मिली कि वहीदा का भाई सलीम संजय को शराब पिलाने की पार्टी में शामिल होने के लिए अपने साथ ले गया था. सलीम के साथ और भी युवक थे. वह संजय के ऊपर यह सोच कर झुंझला रही थी कि जब जाना ही था तो क्या उसे साथ जाने के लिए सलीम ही मिला था.

क्योंकि सलीम की बहन वहीदा को ले कर संजय की उस से दुश्मनी चल रही थी. अब मंजू का मन तरहतरह की आशंकाओं से घिरने लगा. उसे बेटे के गायब होने के पीछे किसी साजिश की बू आने लगी. सलीम अपने अब्बा फजरुद्दीन, मां मदीना और बहन वहीदा के साथ हरियाणा के जिला फरीदाबाद की नेहरु कालोनी में मंजू के पड़ोस में ही रहता था. मंजू का मन नहीं माना तो देर शाम वह सलीम के घर पहुंच गई. उस ने सलीम से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह संजय को अपने साथ ले कर तो जरूर गया था, मगर पार्टी खत्म होने के बाद घर जाने की बात कह कर संजय कहां चला गया, यह उसे नहीं मालूम.

जब संजय के बारे में कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली तो 19 अगस्त को मंजू थकहार कर बेटे की गुमशुदगी दर्ज कराने थाना डबुआ कालोनी पहुंची. पुलिस ने जब उस से किसी पर शक होने के बारे में पूछा तो उस ने शक जाहिर किया कि उस के बेटे को गायब करने में पड़ोस में रहने वाले सलीम और उस के पिता फजरुद्दीन का हाथ हो सकता है. फजरुद्दीन उस की इसलिए हत्या करना चाहता था, क्योंकि संजय ने उस की मरजी के खिलाफ उस की बेटी वहीदा से लव मैरिज कर ली थी. मंजू की शिकायत पर उसी दिन डबुआ थाने में भादंवि की धारा 346 के तहत मुकदमा दर्ज कर संजय की तलाश शुरू कर दी. संजय 16 अगस्त, 2018 से गायब था. उसे गायब हुए 3 दिन गुजर चुके थे. पुलिस ने संजय के सभी दोस्तों से पूछताछ की लेकिन उस के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.

थानाप्रभारी ने यह सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को भी दे दी. तब अपर पुलिस उपायुक्त (एनआईटी) निकिता अग्रवाल ने इस हत्याकांड के रहस्य से परदा उठाने के लिए एक टीम का गठन किया, जिस में एसआई ब्रह्मप्रकाश, ओमप्रकाश, एएसआई कप्तान सिंह, हैडकांस्टेबल ईश्वर सिंह, कांस्टेबल संदीप, रविंद्र, अनिल कुमार, बिजेंद्र, संजय आदि शामिल थे. इस टीम का नेतृत्व पुलिस इंसपेक्टर नवीन पाराशर कर रहे थे. उन्होंने मृतक संजय की मां मंजू तथा परिवारजनों से घटनाक्रम के बारे में पूछताछ की, तब उन्हें पता चला कि संजय ने अपने पड़ोस में रहने वाली दूसरे समुदाय की वहीदा से उस के परिजनों की मरजी के खिलाफ घर से भाग कर शादी कर ली थी.

इसी वजह से लड़की के भाई और अब्बा उस की जान के दुश्मन बने हुए थे. पुलिस आयुक्त अमिताभ ढिल्लो ने क्राइम ब्रांच (डीएलएफ) को भी थाना पुलिस के साथ जांच में लगा दिया. 3 टुकड़ों में मिली (Murder Story) लाश   मुकदमा दर्ज होने के तीसरे दिन 21 अगस्त को पता चला कि किसी युवक की लाश सैनिक कालोनी से थोड़ी दूर झाडि़यों में पड़ी है. यह जानकारी मिलने पर पुलिस टीम सैनिक कालोनी के पास उस जगह पर पहुंची, जहां लाश पड़ी होने की सूचना मिली थी. पुलिस को वहां एक युवक की सड़ीगली लाश मिली. लाश काफी विकृत अवस्था में थी. वह 3 टुकड़ों में थी.

लाश देख कर लग रहा था कि उस की हत्या कई दिन पहले हुई होगी. इस सड़ीगली लाश की शिनाख्त मंजू ने अपने गुमशुदा बेटे संजय के रूप में की. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर लाश पोस्टमार्टम के लिए रोहतक पीजीआई भेज दी और एफआईआर में आईपीसी की धारा 302 जोड़ दी गई. लाश बरामद होने के बाद पुलिस ने आरोपी फजरुद्दीन और उस के बेटे की तलाश शुरू कर दी. उसी दिन पुलिस को सलीम के बारे में एक गुप्त सूचना मिली, जिस के आधार पर पुलिस ने सलीम को गिरफ्तार कर लिया. उसे उसी दिन कोर्ट में पेश कर पूछताछ के लिए 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया.

सलीम से की गई पूछताछ के बाद पुलिस ने अगले दिन उस के पिता फजरुद्दीन उर्फ फजरू तथा सुमित उर्फ सोनी को भी गिरफ्तार कर लिया गया. सभी आरोपियों से सख्ती से पूछताछ की तो उन्होंने संजय की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली. संजय की हत्या के पीछे की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली.  मंजू अपने 2 बेटों संजय और अजय के साथ फरीदाबाद की नेहरू कालोनी में किराए के मकान में रहती थी. उस के पति रूप सिंह की कई साल पहले मौत हो चुकी थी. उस के पड़ोस में फजरुद्दीन अपने परिवार के साथ रहता था. दोनों परिवार अलगअलग समुदाय के थे लेकिन उन के बीच काफी अपनापन था. त्यौहारों के मौकों पर वे एकदूसरे की खुशी में जरूर शरीर होते थे.

पारिवारिक संबंध होने की वजह से दोनों ही परिवारों का एकदूसरे के यहां खूब आनाजाना था. फजरू की बेटी वहीदा बला की हसीन होने के साथसाथ बालिग हो चुकी थी. उधर मंजू का बेटा संजय भी 23 साल का हो चुका था. दोनों ही एकदूसरे को जीजान से प्यार करने लगे थे. दोनों का प्यार गुपचुप तरीके से काफी दिनों से चल रहा था. फजरुद्दीन और उस की बेगम मदीना को बेटी के प्रेम प्रसंग की जानकारी नहीं थी. वे समझते थे कि दोनों बच्चे यूं ही आपस में कभीकभार मिलने पर हंसीठिठोली कर लेते हैं. उन्होंने कभी भी इन संबंधों के बारे में ध्यान नहीं दिया था.

गहराता गया प्यार सब कुछ ठीक ही चल रहा था. इधर वहीदा और संजय का प्यार और गहराता जा रहा था. उन्होंने आपस में शादी करने का फैसला कर लिया था लेकिन उन की शादी के बीच धर्म और समाज की अदृश्य दीवार सामने आ रही थी, जिसे किसी भी हालत में गिराना असंभव ही नहीं बल्कि एकदम से नामुमकिन था. इसलिए संजय का वहीदा ने आपस में सोचविचार कर अपने घरों से भाग कर कहीं बाहर   शादी करने की योजना तैयार कर ली. फिर योजना के अनुसार, वे पहली सितंबर, 2017 को किसी काम के बहाने अपनेअपने घरों से बाहर निकले. कालोनी से काफी दूर जा कर वहीदा संजय से लिपटते हुए बोली, ‘‘संजय, मुझे अपने साथ एक ऐसी दुनिया में ले चलो जहां हमारे प्यार के बीच कोई दीवार न बन सके.’’

संजय ने उसे विश्वास दिलाते हुए कहा, ‘‘वहीदा, तुम चिंता मत करो. अब दुनिया की कोई ताकत हमें जुदा नहीं कर सकती.’’

वहीदा को अपने प्यार पर खुद से बढ़ कर भरोसा था, इसलिए उस ने खुद को अपने प्रेमी संजय के भरोसे छोड़ दिया. संजय उसे ले कर राजस्थान स्थित अपने पैतृक गांव पहुंचा. वहां कुछ दिन रुकने के बाद उस ने वहीदा से कोर्टमैरिज कर ली. शादी के अगले दिन वहीदा घर की अन्य औरतों के परिधान के अनुसार अपनी गोरी कलाई में चूड़ा, मांग में सिंदूर, हाथ में मेहंदी लगा कर संजय के सामने पहुंची तो इस रूप में देख कर उस की आंखें फटी की फटी रह गईं. वह दुलहन के शृंगार में और भी ज्यादा खूबसूरत दिख रही थी. संजय वहीदा को अपनी पत्नी बना कर अपने आप को दुनिया का सब से भाग्यशाली समझने लगा. दोनों वहीं रहने लगे. चूंकि उस ने घर से भाग कर शादी की थी, इसलिए घर से कम ही निकलती थी.

संजय पर हुआ शक उस का डर बेवजह नहीं था. उधर वहीदा के घर नहीं लौटने पर मदीना और उस के शौहर फजरुद्दीन को जैसे सांप सूंघ गया. उन्हें यह भी पता लग गया कि संजय भी घर से गायब है. अब उन के लिए यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था कि जरूर संजय की वहीदा को भगा कर ले गया होगा. किसी तरह उन लोगों ने संजय के राजस्थान स्थित पैतृक गांव की भी जानकारी हासिल कर ली. फिर फजरू ने अपने जानकार लोगों को राजस्थान भेजा लेकिन काफी कोशिश के बाद भी वे वहीदा का पता नहीं लगा सके. आखिर निराश हो कर वे घर लौट आए. वहीदा अपनी अम्मी मदीना को बहुत प्यार करती थी. कुछ महीने गुजरने के बाद वहीदा को जब अम्मी की याद आई तो उस ने अम्मी के फोन पर संपर्क कर बताया कि वह इस संजय के साथ है और यहां बेहद खुश है. इसलिए वह उस की जरा भी चिंता न करें.

मंजू को भी बेटे ने फोन कर पूरी घटना के बारे में जानकारी दे दी थी. मंजू वहीदा को बहू के रूप में स्वीकार कर लिया था. जब संजय ने बताया कि करवाचौथ पर उस ने उस के लिए व्रत रखा और चांद निकलने पर पानी का घूंट हलक के नीचे उतारा तो बेटे के प्रति बहू के मन में प्रेम देख कर मंजू की खुशी के मारे आंखें भर आईं. उस ने फोन पर वहीदा से काफी देर तक बातें कीं और उसे सदा सुहागिन रहने का आशीर्वाद दिया. इस के बाद मंजू की अपने बेटेबहू से अकसर बातचीत होती रहती थी. संजय इसलाम धर्म स्वीकारने को था तैयार कुछ दिनों के बाद वहीदा के पांव भारी हो गए तो संजय के लिए उस की देखभाल करना कठिन हो गया. एक दिन वह वहीदा को ले कर फरीदाबाद लौट गया ताकि घर पर मां उस की ठीक से देखभाल करती रहे.

संजय और वहीदा के घर में आने की बात सुन कर वहीदा के अम्मीअब्बू संजय के घर आ कर अपनी बेटी और संजय से मिले. संजय उन का अपराधी था, इसलिए वह उन की हर शर्त माने के लिए तत्पर था. फजरू और उस की बेगम मदीना ने आपस में बातें करने के बाद संजय से कहा कि अगर उसे वहीदा के संग जीवन गुजारना है तो वह इसलाम धर्म अपना ले. संजय के ऊपर वहीदा की मोहब्बत का नशा इस कदर चढ़ा था कि वह उस के लिए धर्म परिवर्तन के लिए तैयार हो गया. लेकिन इस में पेंच तक फंस गया जब संजय के मामा और चाचा ने इस का जम कर विरोध किया. उन के विरोध के कारण संजय का धर्म परिवर्तन नहीं हो सका. इसी घटनाक्रम के बीच मदीना ने जबरन वहीदा का गर्भपात करवा दिया. इन बातों से दुखी और परेशान हो कर संजय का परिवार दूसरी जगह शिफ्ट हो गया.

दूसरी जगह जाने के बाद भी दोनों परिवारों के बीच उपजा तनाव कम नहीं हुआ. कुछ दिनों के बाद वहीदा को फिर गर्भ ठहर गया. इस का पता चलते ही फजरू ने वहीदा और संजय को अलग होने का फैसला सुना दिया. संजय की हत्या होने से 2 महीने पहले एक दिन फजरू और उस के दोनों बेटे संजय और वहीदा को ले कर उन के बीच तलाक कराने कोर्ट गए लेकिन संजय ने वहीदा को तलाक देने से इनकार कर दिया. अलबत्ता अपने अम्मीअब्बा के द्वारा संजय की हत्या कर दिए जाने की धमकी से डर कर वहीदा संजय के घर से अपने घर लौट गई. वहीदा के चले जाने के बाद संजय की दुनिया एकदम वीरान हो गई. बुरी तरह हताश और निराश हो कर संजय फरीदाबाद को छोड़ कर राजस्थान चला गया, जबकि उस की मां, भाई और बहन ने नेहरू कालोनी में रहना जारी रखा.

15 अगस्त, 2018 को वहीदा के भाई सलीम ने राजस्थान में रह रहे संजय को फोन कर के बताया कि मामला अब शांत हो गया है, इसलिए बात को खत्म करने के लिए फरीदाबाद लौट आओ. आखिर साजिश में फंस गया संजय अगले दिन संजय यह सोच कर फरीदाबाद आ गया कि जल्दी से यह मामला निपट जाए तो वहीदा और वह दोनों शांति के साथ अपना जीवन गुजार सकेंगे. उसे क्या मालूम था कि सलीम और उस का बाप उस की हत्या के लिए उसे मामला खत्म करने का सुनहरा ख्वाब दिखा रहे थे. संजय उन की चाल में बुरी तरह फंस गया. उसी दिन सलीम संजय को अपनी मोटरसाइकिल पर बिठा कर शराब पार्टी में शामिल होने की बात कह कर अपने साथ ले गया. सलीम संजय को 3 नंबर पहाड़ी की सुनसान जगह पर ले गया, जहां पर उस का पिता फजरू, दोस्त सुमित और मोहम्मद अली उन के आने का इंतजार कर रहे थे.

सुमित उर्फ सोनी और मोहम्मद अली सलीम के दोस्त थे. चारों ने पहले तो मीठीमीठी बातों में फंसा कर उसे इतनी अधिक शराब पिला दी कि वह अपनी सुधबुध खो बैठा. इस के बाद सभी ने संजय की इतनी पिटाई की कि वह अधमरा हो गया. पिटतेपिटते संजय जब बेहोश हो गया तो सलीम ने चाकू से गोद कर उसे मौत (Murder Story) के घाट उतार दिया. झाडि़यों में डाल दिए. फिर सभी वहां से फरार हो गए.

पुलिस ने सलीम, फजरुद्दीन उर्फ फजरू और सुमित उर्फ सोनी से पूछताछ करने के बाद उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. इस के 2 दिन बाद ही पुलिस ने चौथे आरोपी मोहम्मद अली को भी गिरफ्तार कर उस से पूछताछ की. उस ने भी अपना अपराध कबूल कर लिया. पुलिस ने उसे भी कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया. कथा लिखने तक चारों आरोपी जेल में बंद थे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, कथा में वहीदा परिवर्तित नाम है. Family Murder

बेटा करना चाहता था तीसरी शादी, कर डाला मांबाप का कत्ल

कोई प्रेमिका के प्रेम में अंधा हो कर मांबाप का ही कत्ल कर दे, सुन कर थोड़ा अजीब लगता है. लेकिन यह भी हकीकत है कि प्यार के नशे में डूब कर आदमी अंधा हो जाता है. अब्दुल रहमान का भी यही हाल था. लेकिन…  

28अप्रैल, 2018 को दिल्ली के कंट्रोल रूम को सूचना मिली कि जाकिर नगर की गली नंबर 7 में रहने वाले शमीम अहमद का दरवाजा अंदर से बंद है. काफी आवाजें देने के बावजूद भी उन के कमरे से कोई प्रतिक्रिया नहीं हो रही. चूंकि यह मामला दक्षिणपूर्वी दिल्ली के थाना जामिया नगर के अंतर्गत आता है, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम से वायरलेस द्वारा यह सूचना थाना जामिया नगर को दे दी गई. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी संजीव कुमार पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. वहां पर शमीम अहमद के बेटे अब्दुल रहमान के अलावा आसपास के लोग भी जमा थे.

अब्दुल रहमान ने पुलिस को बताया कि कल रात खाना खाने के बाद उस के अम्मीअब्बू अपने कमरे में सोने के लिए चले गए थे, जबकि वह दूसरे कमरे में सो गया था. रोजाना उस के अम्मीअब्बू ही सुबह पहले उठते थे. वही उसे जगाते भी थे, लेकिन आज वह अभी तक नहीं उठे. मैं ने काफी देर दरवाजा खटखटाया इस के बावजूद भी अंदर से कोई आवाज नहीं आ रही. वहां मौजूद पड़ोसियों ने भी अब्दुल रहमान की हां में हां मिलाई. अब्दुल रहमान की बात सुनने के बाद थानाप्रभारी संजीव कुमार ने भी दरवाजा खटखटाया लेकिन वास्तव में अंदर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो उन्हें भी शक होने लगा. तब उन्होंने लोगों की मौजूदगी में दरवाजा तोड़ दिया. दरवाजा तोड़ने के बाद जैसे ही पुलिस अंदर घुसी तो पहले कमरे में ही फर्श पर शमीम अहमद और उन की पत्नी तसलीम बानो की लाशें पड़ी थीं.

रहस्यमय मौतें अम्मी और अब्बू की लाशें देख कर रहमान दहाडें मार कर रोने लगा. पड़ोसी भी हतप्रभ थे कि दोनों की मौत कैसे हो गई. उन के शरीर पर किसी चोट आदि का निशान भी नहीं था. दोनों की मौत कैसे हुई उस समय इस का पता लगाना संभव नहीं था. थानाप्रभारी संजीव कुमार ने इस मामले की जानकारी डीसीपी चिन्यम बिश्वाल को दे दी. साथ ही क्राइम इन्वैस्टीगेशन टीम को भी मौके पर बुलवा लिया. थानाप्रभारी ने मौकामुआयना किया तो पता चला कि उस दरवाजे पर औटोमैटिक लौक लगा हुआ था, जो अंदर और बाहर दोनों तरफ से बंद हो जाता था. उन के कमरे में सवा 5 लाख रुपए की नकदी के अलावा ज्वैलरी भी मिली. इस से वहां पर लूट की संभवना नजर नहीं आई. कमरे में 2 लोग सो रहे थे, दोनों की ही संदिग्ध मौत हो गई थी. 

ऐसा भी नहीं था कि उन की मौत कमरे में मौजूद किसी जहरीली गैस की वजह से हुई हो क्योंकि जब कमरे का दरवाजा तोड़ा गया था तो उस समय कमरे में किसी जहरीली गैस आदि की स्मैल भी नहीं आ रही थी. यानी उस समय कमरे में पर्याप्त मात्रा में औक्सीजन थी. लग रहा था कि उन दोनों के खाने में कोई जहरीली पदार्थ मिला दिया गया होगा. बहरहाल इन दोनों की मौत कैसे हुई यह पोस्टमार्टम के बाद ही पता लग सकता था. लिहाजा थानाप्रभारी ने जरूरी काररवाई कर के दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. डीसीपी चिन्मय बिश्बाल ने भी घटनास्थल का दौरा किया. अब्दुल रहमान शमीम अहमद का इकलौता बेटा था. वही उन के साथ रहता था, इसलिए पुलिस ने अब्दुल रहमान से कहा कि जब तक इस केस की जांच पूरी न हो जाए वह दिल्ली छोड़ कर कहीं न जाए.

2-3 दिन बाद पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया था कि उन की मौत दम घुटने की वजह से हुई थी. यानी किसी ने उन का दम घोट कर हत्या की थी. पुलिस इस बात का पता लगाने में जुट गई कि उन का कातिल कौन है. उधर मृतकों का बेटा अब्दुल रहमान थाने और डीसीपी औफिस के चक्कर काट कर अपने मातापिता के हत्यारे का पता लगा कर उसे गिरफ्तार करने की मांग कर रहा था. जबकि पुलिस अलगअलग तरीके से जांच कर केस को खोलने की कोशिश में लगी थी. इस दौरान थानाप्रभारी संजीव कुमार ने अब्दुल रहमान से भी 2 बार पूछताछ की थी. लेकिन उस से कोई क्लू नहीं मिल सका था. उन के यहां जिनजिन रिश्तेदारों या परिचितों का आनाजाना था, पुलिस ने उन्हें भी थाने बुला कर पूछताछ की. 

इतना ही नहीं पुलिस ने उन पेशेवर हत्यारों को भी उठा लिया जो उस समय जेल से बाहर थे. लेकिन उन से भी कोई जानकारी नहीं मिली. इधर मामले को ले कर पुलिस भी परेशान थी. घटना के 3 सप्ताह बाद पुलिस ने अब्दुल रहमान को एक बार फिर थाने बुलाया. थाना प्रभारी और इंसपेक्टर भारत कुमार की टीम ने उस से फिर पूछताछ की. सख्ती से की गई पूछताछ में अब्दुल रहमान ने अपना मुंह खोलते हुए कहा कि अपने मांबाप का हत्यारा मैं ही हूं. मैं ने ही अपने दोस्तों के साथ उन की हत्या की थी. उस की बात सुन कर एक बार तो पुलिस भी आश्चर्यचकित रह गई कि वह अपने मांबाप का एकलौता बेटा था तो ऐसी क्या बात हो गई कि घर के इसी चिराग ने अपने मांबाप का ही खून कर दिया. पुलिस ने अब्दुल रहमान से मांबाप की हत्या करने की वजह जानने के लिए पूछताछ की तो उस ने उन की हत्या की जो कहानी बताई वह हैरान करने वाली थी.

फेसबुक की दोस्त बनी महबूबा अब्दुल रहमान अपने मांबाप की इकलौती संतान था. पिता शमीम अहमद और मां तसलीम बानो ने उसे हमेशा अपनी पलकों पर बिठा कर रखा था. वह उस की हर फरमाइश पूरी करते थे. मांबाप का लाडला अब्दुल रहमान पढ़ाई में भी होशियार था. उस का माइंड क्रिएटिव था इसलिए उस ने एनिमेशन में डिप्लोमा किया. मांबाप चाहते थे कि उन के बेटे की कहीं अच्छी जगह नौकरी लग जाए. शमीम अहमद ने करीब डेढ़ साल पहले उस की शादी कर दी थी, लेकिन किसी वजह से उस की पत्नी से नहीं बनी. दोनों के विचारों में विरोधाभास था, इसलिए उस ने पत्नी को तलाक दे दिया.

इस के बाद फेसबुक के माध्यम से अब्दुल रहमान की दोस्ती कानपुर की रहने वाली एक लड़की से हो गई. यह दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि दोनों ही एकदूसरे को दिलोजान से चाहने लगे. यहां तक कि दोनों शादी के लिए भी तैयार हो गए. लड़की ने कह दिया कि वह उस के लिए अपने घर वालों तक को छोड़ने के लिए तैयार है. अब बात अब्दुल रहमान को फाइनल करनी थी. वह तो तैयार था लेकिन उसे उम्मीद थी कि शायद उस के घर वाले कानपुर वाली उस की दोस्त से शादी करने के लिए तैयार नहीं होंगे. फिर भी अब्दुल रहमान ने अपने मातापिता से कानपुर वाली अपनी दोस्त के बारे में बताया और कहा कि वह उस से शादी करना चाहता है. शमीम अहमद ने साफ कह दिया कि वह अपनी बिरादरी की लड़की के साथ ही उस की शादी करना पसंद करेंगे. इसलिए कानपुर वाली उस लड़की को वह भूल जाए. उस के साथ उस की शादी नहीं हो सकती.

मांबाप पर भारी पड़ी प्रेमिका पिता ने जितनी आसानी से भुला देने वाली बात कही थी, वह अब्दुल रहमान के लिए उतनी आसान नहीं थी. बहरहाल घर वालों की बातों को दरकिनार करते हुए वह अपनी उस फेसबुक फ्रेंड के संपर्क में बना रहा. इतना ही नहीं वह उस से मिलने भी जाता था. इसी दौरान घर वालों ने अब्दुल रहमान की दूसरी शादी कर दी. घर वालों के दबाव में उस ने शादी कर जरूर ली थी लेकिन उस के दिल में तो उस की कानपुर वाली प्रेमिका बसी हुई थी. दूसरी शादी हो जाने के बाद भी वह अपनी प्रेमिका को नहीं भूला था. वह एक काल सेंटर में नौकरी करता था, इसलिए प्रेमिका को महंगे गिफ्ट आदि देने और उस से मिलने के लिए कानपुर जाता रहता था. वह अब्दुल रहमान पर शादी के लिए दबाव डाल रही थी. वह भी सोचता था कि यदि प्रेमिका ही उस की पत्नी बन जाए तो उस का जीवन हंसीखुशी से बीतेगा. लेकिन इस काम में सब से बड़ी रुकावट उस के मांबाप ही थे. 

अब्दुल रहमान ने एक बार फिर से अपने मांबाप को मनाने की कोशिश की कि वह उस की कानपुर वाली दोस्त के साथ उस की शादी कर दें. लेकिन शमीम अहमद ने बेटे को न सिर्फ जम कर फटकार लगाई बल्कि हिदायत भी दी कि वह उस लड़की को भूल कर अपनी घरगृहस्थी में ध्यान लगाए. अब्दुल रहमान की कोशिश नाकाम हो चुकी थी पर वह हारना नहीं चाहता था. आखिर उस ने भी एक सख्त फैसला ले लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए वह अपनी प्रेमिका को दुलहन बना कर घर लाएगा. इस के लिए उस ने अपने मांबाप को रास्ते से हटाने का फैसला ले लिया. यानी प्रेमिका की खातिर उस ने मांबाप तक की हत्या करने की ठान ली.

इतना बड़ा काम वह खुद नहीं कर सकता था. इस बारे में उस ने दिल्ली के नांगलोई इलाके के रहने वाले अपने दोस्त नदीम खान (32) और गुड्डू से बात की. दोनों ढाई लाख रुपए में यह काम करने के लिए तैयार हो गए. तीनों ने शमीम अहमद और तसलीम बानो की हत्या करने की पूरी योजना बना ली. योजना के अनुसार 27-28 अप्रैल की रात नदीम खान और गुड्डू जाकिर नगर इलाके में आ गए. अब्दुल रहमान के मातापिता जब खाना खा कर अपने कमरे में सोने के लिए चले गए तो रात 11 बजे के करीब अब्दुल रहमान ने फोन कर के अपने दोनों दोस्तों को घर बुला लिया. उन के घर आने के बाद अब्दुल रहमान उन्हें अपने मातापिता के कमरे में ले गया. उन के दरवाजे पर आटोमैटिक लौक लगा था जो दोनों तरफ से बंद हो जाता था.

इन लोगों ने मुंह पर तकिया रख कर एकएक कर दोनों का दम घोंट दिया और उन की लाशें बेड से उतार कर फर्श पर डाल दीं. इस के बाद अब्दुल रहमान ने दरवाजे को बंद कर दिया. अपना काम कर के नदीम खान और गुड्डू रात में ही वहां से चले गए. अब्दुल रहमान अपने कमरे में आ गया. इस के बाद उसे रात भर नींद नहीं आई. सुबह होने पर उस ने मोहल्ले के लोगों को यह कह कर इकटठा कर लिया कि पता नहीं क्यों आज अम्मी और अब्बू दरवाजा नहीं खोल रहे. अब्दुल रहमान से पूछताछ के बाद पुलिस ने नदीम खान को भी गिरफ्तार कर लिया जबकि गुड्डू फरार हो गया था. दोनों से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश किया जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. पुलिस मामले की तफ्तीश कर रही है.

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